वर्षा ऋतु का शुभागमन आषाढ़ माह से हो चुका है। पावस ऋतु के चार महीनों अषाढ़ (आषाढ़), सावन (श्रावण), भादों (भाद्रपद) और कुआँर (आश्विन) के समय को लोकभाषा में ‘चौमासा‘ कहा जाता है। यह चौमासा शब्द ‘चातुर्मास‘ का ही अपभ्रंश है। आषाढ़ शुक्ल देवशयनी एकादशी से साधु–संतों, महंतों
आदि का चातुर्मास शुभारंभ हो गया है। उत्तर भारत तथा बुंदेलखण्ड में खासतौर पर आषाढ़ माह का उजियारी पाख (शुक्ल पक्ष) लोक देवताओं, ग्राम देवताओं, क्षेत्रपालों, खेरापतिओं, कुलदेवियों, कुलदेवताओं आदि के पूजापुजापे के लिए समर्पित रहता है।
हमारे ये लोकदेवता समाज विशेष के वे महापुरुष हैं, जिन्होंने लोकमंगल की स्थापना के लिए अपने जीवन का उत्सर्ग कर समाज में सांस्कृतिक मूल्यों की स्थापना, धर्मरक्षा एवं जनहितार्थ के कार्यों में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। कालांतर में लोक आस्था के कारण लोकदेवताओं के रूप में लोकमान्य हो गए। वास्तव में लोकदेवता समाज के वे महापुरुष हैं जो अपनी अलौकिक शक्तियों एवं लोकमंगल के कार्यों के कारण लोक आस्था के प्रतीक बन गये हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में गाँव के छोटे दिवाले (देवालय) पर, मंदिर पर, देवी की मठिया पर, मैड़े पर, पीपल के नीचे, नदी किनारे मैड़े आदि स्थानों पर गाँव का आस्थावान समाज इन लोकदेवताओं का पूजन परंपरागत रूप से करता आ रहा है।
लोकमान्यता है कि आषाढ़ माह में किया गया देवी–देवताओं का पूजन व मानामिनती अलाय–बलाय से रक्षा करती है। अनेक अनिष्टों से बचाती है। ग्रामीणों का यह लोकविश्वास उनकी आस्थाओं का ऐसा अखण्ड हिमालय है जो तमाम बदलावों के बावजूद आज भी अडिग खड़ा है। हालांकि अब इस विश्वास को आधुनिकताओं के घटाटोप और वीभत्स अँधेरे अपनी चपेटे में लेने के लिए तमाम हथकंड़ों की जोर अजमाइश कर रहे हैं। गाँव की पढ़ीलिखी नवपीढ़ी का इस तरह के लोकोत्सवोंं में कोई रुचि नहीं है। मगर गाँव का जो असली मन है, वह आज भी लोक परंपराओं, तीजत्योहारों आदि को अपनी देह से आत्मा की तरह चिपकाए हुए है।
यूँ तो भारतीय पंचांग के बारहों महीने अत्यंत महत्व के हैं किंतु पावस ऋतु अत्यंत मनोरम और सिद्धिदायक है।
ऋतुपरक साहित्य कवियों ने आषाढ़ मास को प्रकृति के आँगन में हँसता –मुसकुराता कुसुमसार कहा है, जो सुभाषित है और सुवासित भी। सुरभित है और सुरमीत भी। यक्षों, देवताओं व गंधर्वों आदि का प्रिय होने के कारण आषाढ़ मास सदैव लोकमंगल की प्रतिष्ठा की श्रीवृद्धि करता है।
बुंदेलखण्ड सहित देश के विभिन्न लोक अँचलों में चौमासे की आषाढ़ी संस्कृति अपनी अभिरामता के साथ उपस्थित होती है। हमारे देश के आँचलिक लोक साहित्य में चौमासे को लेकर अनेक उत्सवधर्मी परंपराएँ प्रचलित हैं। जिनमें उनके अपने गीत हैं–नीति हैं, रतनारी प्रीत है। अनेक प्रेमाख्यान हैं, हार–जीत की गाथाएँ हैं, सरित कथाएँ हैं, श्रुतियाँ हैं, वाचिक परंपराएँ हैं, लोकाचार एवं लोकविश्वास के साथ लोकमत विद्यमान है, जो हमारी सांस्कृतिक विविधताओं को दर्शाता है।
महाकवि कालिदास ने ‘ऋतुसंहार‘ में पावस को लेकर जो अत्यंत मनोरम रूपक सृजित किया है उसके विविध आनंदगंधी पक्ष व आयाम हैं। अवधी भाषा के महाकवि मलिक मुहम्मद जायसी ने ‘पद्मावत‘ के ‘बारहमासा‘ खण्ड में नागमती के विरह की तीव्रतम वेदनाओं का सजीवता देकर वियोग की असाधारण सृष्टि की है–
” चढ़ा असाड़.गगन घन गाजा
साजा विरह दूँद दल बाजा।। “
हमारी लोकनायिका भी वर्षा ऋतु में भी विरहाग्नि से उसकी देह जली जा रही है। उसका मन सुलग रहा है। जबकि समूची सृष्टि में पानी ही पानी है। आदमी नर से नारायण हो गया है। मगर नायिका मेघ दुंदभी सुनकर डर रही है…
बादर देख डरी
सखी मैं बादर देख डरी।
लोकजीवन में आज भी आस्थाओं और परंपराओं को जीभरकर जीता है। ऋतु पर्वों को आत्मसात करता है। हमारे लोक जीवन में अटूट विश्वास की अनेक फलित आस्थाएँ हैं। आनंदबोधी पक्ष हैं। वर्षा ऋतु के अनेक सगुन और अनुष्ठान हैं। लोकदेवियों, देवताओं से लेकर वृक्ष– पेड़–पौधे, नदी–नाले, पर्वत–पठार– कछार वनस्पतियाँ, खेत–खलिहान आदि के पूजन परंपराएँ हैं। जलचर–थलचर, नभचर याने मानव से लेकर वन्यजीव– जंतु आदि की जितनी भी प्राकृतिक विलक्षणताएँ हैं वे सृष्टि का विराट स्वरूप हैं। ये लोकजीवन में विभिन्न रूपों आकारों, ध्वनियों, स्मृतियों–श्रुतियों, उत्सवों, परंपराओं, कथाओं, नाटकों, गीतों लोकाख्यानों स्वांगों आदि में बखूबी उद्घाटित हुआ है।
वनांचल और गाँवों का उपेक्षित समाज अभावों भरा जरूर है किंतु पक्का लोकविश्वासी है। उसका रहन–सहन प्राकृतिक परिवेश पर आश्रित है। परंपराओं की चंदनी महक से सुवासित है। जिसमें रीति–रिवाजों की असंख्य जीवनदायिनी धुनें हैं। राते–जगराते और हुरयाते हैं, सुखद अरण्य परंपराएँ हैं, वे सभी लोक में समाहित हैं। इसी अनूठे लोक में उनके लोक देवता हैं, लोक देवियाँ हैं, लोकोत्सव–पर्व हैं, लोकगीत– संगीत है, और है वह सभी जो अंतःबोधी जीवन से जुड़ा है। .
सच में, जब से हम प्रगतिवादी हुए, यथार्थवादी हुए तभी से हमारी आँखों ने प्रकृति की ओर देखना बंद कर दिया। प्रगतिशीलता का अर्थ प्रकृति, पर्व और परंपराओं से पलायन नहीं है। बल्कि उनका संवर्द्धन करना है। हमारी माटी का जो मांसल कुंवारापन है, उसकी जो सौंधी देहगंध है, नदियों की जो सुशीतल सुरम्यता है, वृक्षों–वनस्पतियों आदि की जीवनदायिनी प्रेमासक्त सघन छाँव है, गिरि–कंदराओं में आच्छादित विविध प्राकृतिक संपदाएँ हैं, उनसे हम दूर होते बहुत दूर चले गए हैं। अब चौमासे पावसी देवी गीतों की भक्तिरस डूबी अनुगूँजें यदाकदा ही सुनाई देती हैं। मगर सुनाई जरूर देती हैं…
पावस ऋतु का शुभागमन आषाढ़ मास में मातापूजन से होता है। मातृपूजन अर्थात् देवी पूजन। देवी अर्थात् जो धरती को भी जीवन देती है। धरती जिससे रस लेकर रसगंधी है। ऐसी मातृ देवियों का पूजन लोकविश्वास के साथ प्रारंभ हो जाता है। हम चाहे जितने प्रगतिवादी हो गए हों लेकिन हम जब गाँव में गाय के गोबर से लिपे हुए आँगन में बैठते हैं और जब माटी के ऊँचे चबूतरे पर बनी देवी की मठिया या दिवाले पर देवीजी को लाल झण्डा चढ़ाने जाते हैं तब हमारी आस्थाओं के पंख आकार लेने लगते हैं। सुहागिन महिलाएँ हों, कन्याएँ होंं या गाँव के बूढ़े–बारे, सभी देवी मैया के दरबार में, कालका की देहरी पर, बीजासेन की दयोड़ी पर भभूति और आशीर्वाद लेने को लालायित रहते हैं। देवी माई से सभी कुछ न कुछ माँगते हैं। कोई महिलाएँ पुत्र माँगती हैं, तो कोई सुख–समृद्धि धन– वैभव, तो कोई अटल सुहाग, तो कोई संतुलित जीवन, सुखी समाज की मंगलकामना करती हैं। यही है गाँव की कुलीन संस्कृति का उदारचरित्र वैशिष्ट्य। कुलीन का अर्थ बहुत विशिष्ट मायनों में चरित्र संपन्नता है। अनेक अभावों में रहने वालीं, दिनभर में एक बार जो कुछ खाने को मिल गया उससे ही तृप्ति पाने वाली अभावग्रस्त महिलाओं के समूह नाचते –गाते, ढोल बजाते दौड़े–दौड़े चले आते हैं देवी के द्वारे। वह देवी जो अदृश्य है, उसके दर्शन करने का आनंद इतना अप्रतिम है कि उसकी व्याख्या, उसके रस का स्वाद, उसकी विलक्षणता को बखान करना संभव तो नहीं है किंतु कुछ कहा जरूर जा सकता है। जिन्होंने उन क्षणों को जिया है, उनको भोगा है, वे देवी मैया के उस अमृत प्रसाद से भलीभांति परिचित होंगे।
झुण्ड में गाँव की महिलाएँ गाते–बजाते देवी की मठिया की ओर चल रहीं हैं। बड़ी–बूढ़ी आगे चल रहीं हैं और उनके भी आगे हरे बाँस में बड़ी पताका लेकर टोले के भगत के चेले आगे चल रहे हैं। उनके पीछे पूजा का थाल लिए कोई सुहागिन महिला या कन्या लिए चल रही है। थाल में अठवाईं (पूजा के लिए छोटी पूड़ियाँ), नारियल, बतासे, लपसी, होम–धूप, दीपक व देवीजी का श्रंगार आदि को सजाकर रखा गया है। एक कन्या लोटे में जल लिए संग में चल रही है। कुछ महिलाएँ पैंड भरते (दंडवत् हो चलना) चल रहीं हैं। समवेत स्वरों में देवी गीत गाती हुयीं माताओं की यह टोली जैसे ही देवी जी की मठिया के समीप पहुँचती है याचना की भावाभिव्यंजना और भी तीव्रता से गुँजायमान हो उठती है …
कैसे के दर्शन पाऊं री
मैया तोरीं ऊंची दुअरियाँ
मैया के द्वारे एक बाँझ पुकारै
देव ललन घर जाऊँ री
मैया तोरीं ऊँची दुवरियाँ
।।।।
देवी माँ के जस गाते–गाते किसी महिला पर माँ की सवारी भी आ जाती है। भगत जी मानामिनती करते हैं उस अदृश्य देवी की जिसे किसी ने आज तक नहीं देखा। लेकिन यह विश्वास हमें लोकपरंपराओं ही ने दिया है। तभी तो मैया से दिल की बात कही है, तभी यह आस्था के स्वर जीवंत हुए हैं। जीवन की यह आस्था ही लोकसंस्कृति का प्रत्यक्ष दर्शन है। यही है चौमासे की आषाढ़ी संस्कृति से साक्षात्कार करने के आनंदगंधी क्षण।
हमारी यह आषाढी परंपराएँ ढकोसले नहीं हैं। लोकविश्वास की जीती–जागती यथार्थ कथाएँ हैं, जिनमें शास्त्र भी है और विज्ञान भी।
जेठ की असह्य गरमी से धरती फट गयी है। प्यास से आकुल–विकल है। उसे मेघों की अपार जलराशि से ही तृप्त किया जा सकता है। इसीलिए आषाढ़ माह में ‘चिरैया नखत” में बरसात की कामना की जाती है। पुख्ख या पुष्य नक्षत्र ही लोक जीवन में चिरैया नखत कहा जाता है। प्यासी धरती की प्यास बुझाने के लिए बादलों का बरसना बहुत जरूरी है।आषाढ़ के काले बादल केवल गरजते ही नहीं हैं झमाझम बरसते भी हैं। मघा नक्षत्र में मूसलाधार बरसात होती है जो खेतीबाड़ी के लिए के अत्यंत लाभकारी मानी गई है। एक लोकोक्ति है –
मघा न बरसें भरें न खेत।
माता न परसे भरे न पेट।।
आषाढ़ माह में ही अपने पशुधन की रक्षा तथा रोग–बीमारी से बचाव के लिए गाँव के मैड़े पर ‘उसारौ‘ की पूजा की जाती है। लोकमान्यता में यह पूजा तमाम आफत आसमान से सभी की रक्षा करती है। प्रकृति पूजक एवं कृषि साधक समाज शगुन मनौती मनाते हैं। गाँव के बाहर पीपल के नीचे बड़े चबूतरे पर कारसदेव के धाम पर बैठकर गोटें गाते हैं। उनकी मनौती करते हैं। हमारे पशुओं को, मवेशियों को अनेक रोगों से वह रक्षा करें। आजीवन निरोग बने रहें ऐसी मंगलकामना देवगीतों में हम करते हैं। चौथ की रात को ढाँक बजती है। डिंग – डिंग का जो अलौकिक नाद होता है वह अंधेरी रात को चीरता हुआ चारों ओर खुशबू की तरह बिखर जाता है। उस समय जब गोट की टेक उठाई जाती है तो काले बादल घिर आते हैं और लोकरस का विवेक बरसने लगता है झर – झर–झर–झर। धरती रसवंती हो उठती है। नये–नये बीज अँकुरित हो उठते हैं धरती की छाती पर और हमारे आपके हृदय भीतर सोयीं उद्दाम भावनाएँ जाग्रत हो उठतीं हैं नव सृजन के लिए ।
पावसी पकवान की धूम मच जाती है। बरसात में जठराग्नि मंद होने के कारण रात में बियारू (रात्रि भोजन ) का निषेध हो जाता है। यही नहीं निरोगी शरीर बनाए रखने के उद्देश्य से अरौना भोज देव स्थानों, बगीचों आदि पर प्रारंभ हो जाता है। इन्हें ही गकरियाँ कहते हैं। पूजापुजापे इसी माह में खास तौर पर किये जाते हैं।भये–वियाव (जन्म,विवाह) का रक्कस, सुहागिनों को भोजन कराके सुहागलैं जिमाईं जातीं हैं। पूरे महीने भर खा–खा खैया और “ता–था–थैया” मची रहती है।
अनेक स्थानों पर वृहद वृक्षारोपण की जीवनाधारित परंपरा भी आषाढ़ मास में प्रारंभ होती है। प्रकृति संरक्षण के मूल भाव से उल्लसित हरेला पर्व की पहचान बना हुआ है। यह भी लोकजीवन और लोकसंस्कृति का श्रद्धास्पद हरियाली महोत्सव है। वनदेवी के पूजन का अनुष्ठान है।
हमारे आज के अतिसाधन संपन्न जीवन से लोक पर्वों का उन्मूलन हो चुका है। अब हम प्रतीकात्मक पर्व भी नहीं मनाते या यों कहें हम पर्वों की परमोज्ज्वल परंपरा को विस्मृत कर चुके हैं। अब आल्हा–ऊदल की वीर गाथाएँ सावन की राखी की मर्यादा कजरी, झूला गीत और चौमासे की रसीली रंगतें,चौका पउआ के खेल, कंतातौली के खेल, बरसात में भींगते हुए पशुओं को चारा चराते बरेदियों चरवाहों की लोककल्पित अनगढ़ कथाएँ, बिषखूटा, पुछउवल पहेलियों के जन्म, टेसू, नौरता व झाँझी आदि लोकोत्सव इसी पावसी संस्कृति की देन है।
हमारी ये लोकपरंपराएँ आदिम राग हैं। अनंत हैं, अछोर हैं,असीम हैं। अमरचेता हैं। शाश्वत हैं ये। यह विलुप्त तो हो जातीं हैं, किंतु कभी मरतीं नहीं हैं।
बस, जरासी माटी खरोंचो, थोड़ा–सा खाद–पानी डालो ये पिकवा उठतीं हैं, हरयाने लगती हैं, अमरवेल की तरह फैलने लगतीं हैं, चंदन की तरह महकने लगतीं हैं।
पर हत् भाग्य! अब माटी खरोंचने की फुरसत है किसे…?
आमोद–प्रमोद गँवई लोकजीवन की संजीवनी शक्तियाँ हैं। इनमें कहीं भी मर्यादाओं का अतिक्रमण नहीं, चरित्र का हनन नहीं, अश्लीलता का मनन नहीं। खरे सोने से दमकते चरित्र लोकजीवन की पहचान हैं। भूखे पेट सोने में कोई गुरेज नहीं। मगर चुराकर नहीं खायेंगे। अनैतिकता कतई मंजूर नहीं।“मैंनत की खानैं, हरि गुन गानैं” श्रम संस्कृति के अनुपम उपहार हैं। जीवन के मूलाधार हैं। सच में यही तो है लोकजीवन में चौमासे का महत्व और चातुर्मास का पावनतम् संदेश।
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आदरणीय रामशंकर भारती जी, आप का यह बहुआयामी आलेख
लोक-भाषा, लोक-संस्कृति, लोक परंपरा, लोकधर्मिता और लोकमान्यताओं का सुन्दर मेल यह चौमासा है जिसे स्पष्ट करता है.
इस आलेख ने सचमुच मन को असीम शांति प्रदान की और अतीत की स्मृतियों को उजागर किया.
सर आप की भाषा और परिवेश अलग अलग है किन्तु हमारे महाराष्ट्र में भी वहीं परिवेश होता है.
श्रावण मास से जो त्योहार शुरू होते हैं उनका समापन दीपावली में होता है.
आज कल थोड़ा अधिक व्यस्त हूं इसलिए ध्यान नहीं दे पाया.
बहुत बढ़िया और शुभकामनाएं
विजय महादेव गाडे
डाॅ रामशंकर भारती जी का आलेख ‘लोकजीवन में चौमासा संस्कृति’ में चतुर्मास के महत्व को रेखांकित किया गया है। यह चतुर्मास मानव के लिए जीवनदाता है। कृषि संस्कृति के गणितीय आलोक में देखें और प्रश्न करें कि बारह में से चार निकाल दें तो क्या बचेगा? उत्तर होगा शून्य। साल के बारह महीनों में ये चौमासे के चार महीने निकाल दें तो न खेती होगी और न अन्न उपजेगा। बिना अन्न के जीवन कहां? बिना जीवन के शून्य ही तो है।
इसीलिए लोक चौमासे की आस में पलक पांवड़े बिछाए रहता है। वर्षा के लिए इन्द्र से, मेघों से याचना करता है। उन्हें खुश करने के लिए गीत गाते हैं और इन गीतों से उन्हें रिझाते है। जब वह उनकी अरज नहीं सुनता है तो अपने अपने देव-देहुरा से सिफारिश लगवाता है। वर्षा में देर हो जाने पर लोग अपने-अपने देई-देव की मनौती मानते हैं।
जब बरसात होने लगती है तो इष्टदेवों पर लोक विश्वास बढ़ जाता है। बरसात हो ही रही है तो लगे हाथ व्यक्तिगत वरदान भी मांगने लगते हैं। बुंदेलखंड में देवी गीतों मे थोड़ा बहुत बदलाव देखा गया है। पर भाव एक ही है व्यक्तिगत –
तोरी उठन कहां तोरी बिठन कहां
मनहंस चाल मृगलोचनि लाड़ली के भुवन कहां
माई के दुआरे एक बांझिन पुकारे जगतारिन ,
दे दो ललन घर जाऊं अपने, चली जाऊं अपने
मनहंस चाल मृगलोचनि लाड़ली…..
भारती जी ने इस लेख के माध्यम से पूरे लोक को समाहित कर दिया है। लोक की परंपराएं तो है ही साथ में उसमें निहित वैज्ञानिकता को भी उजागर किया गया है। यद्यपि आज के समय में मानव अपनी मिट्टी से, उससे उपजे लोकपर्वों से दूर होता जा रहा है। फिर भी ऐसा कुछ बचा रह गया है कि समय आने पर ये पर्व हमारे भीतर जीवंत हो जाते हैं। हम चाहे जितने आधुनिक हो जाएं, अपनी संस्कृति को कितना ही सिकोड़ दें वह मिटती नहीं है। वह हमेशा साथ बनी रहती है। वह आपके दरी चादरों में कराहती मिलेगी। जरा सा अवसर मिल जाने पर वह फैल जाती है।
आलेख में कालिदास एवं जायसी जैसे लोकप्रेमी साहित्यकारों का हवाला देकर चतुर्मास की लोक व्याप्ति को साकार कर दिया है। यह लोक ही है जो भूखे पेट भी पर्वों का उल्लास मना लेता है। स्वांग रच लेता है, गोटें गा लेता है। क्योंकि वह उसी माटी में रचा-बसा है जिसमें ये स्वांग, गीत और नृत्य जन्मे हैं। वह चाहकर भी इनसे अलग नहीं जा सकता है। कोई उन्हें हूस कहे, बोदा कहे, खूब कहता रहे। वह तो अपनी धुन में मस्त गाता है -‘ बादर देख डरी , सखी मैं बादर देख डरी।’
इस गीत की व्यंजना का जवाब नहीं है। डरने में भी कितना उल्लास है। नायिका अपनी सखी से कहती है कि मैं बादल को देखकर डर गई हूं। बादल सोचे कि यह डर गई है तो और डरवाऊं। इसमें मान मनुहार जो है। बादल का मान भी है और महत्व भी है। इसी महत्व में वह और बरसता है। क्योंकि उसे तो नायिका को डराने में मजा आ रहा है। ऐसा कौन डरता है भाई ? कोई डरे या न डरे,नायिका तो डरती है। कृषि के खातिर, उल्लास के खातिर उसका यह अभिनय बुरा नहीं कहा जा सकता है।
भारती जी ने लोक की जैसी विशद व्याख्या की है वह हृदय को छूती है। लोक बरबस मन के आंगन में झूम उठता है।
बढ़िया आलेख के लिए भारती जी को बहुत-बहुत बधाई