Wednesday, February 11, 2026
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संपादकीय – पुस्तक मेले में होलसेल लोकार्पण…!

कई बड़े प्रकाशकों ने तो अपने स्टॉल पर लोकार्पण के लिए अलग से स्थान नियत कर रखा है, जहाँ प्रकाशक लेखक से अधिक महत्वपूर्ण दिखाई दे रहा होता है। दीन-हीन लेखक तो अहसान का मारा पीठ दोहरी किए जा रहा होता है। उसकी कोशिश रहती है कि अधिक से अधिक लोगों के साथ फ़ोटो खिंच जाए, ताकि अगले ही दिन फ़ेसबुक पर ‘राग विमोचन’ गाया जा सके।

पुस्तक मेले भारत के तमाम शहरों में कुकुरमुत्तों की तरह उगने लगे हैं, और हिंदी के प्रकाशकों एवं लेखकों का प्रिय खेल बन गया है पुस्तक लोकार्पण, जिसे ‘विमोचन’ कहा जाता है।
मज़ेदार स्थिति यह है कि लेखक भी ‘विमोचन’ शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति दर्ज नहीं करता। प्रकाशक से तो अपेक्षा ही नहीं की जा सकती कि उसे ‘लोकार्पण’ और ‘विमोचन’ शब्दों के बीच के अंतर का ज्ञान हो।
‘विमोचन’ संस्कृत का मूल शब्द है और इसका अर्थ होता है-किसी संकट या विपत्ति से मुक्त करवाना। शायद यह बात तो तमाम हिंदी पाठकों को मालूम होगी कि हनुमान जी को ‘संकट मोचक’ कहा जाता है। हनुमान चालीसा के साथ-साथ संकट मोचन हनुमान अष्टक पढ़ने की सलाह दी जाती है। जब कमान से तीर छोड़ा जाता है, तो उसे भी तीर का मोचन माना जाता है। यानी कि ‘विमोचन’ शब्द का पुस्तक को सार्वजनिक करने से कुछ लेना-देना नहीं है।
वहीं ‘लोकार्पण’ शब्द तो अपना अर्थ स्वयं ही बता देता है कि पुस्तक को सार्वजनिक किया जा रहा है, ताकि पाठक उसे ख़रीद सकें। यहाँ पुस्तक को किसी संकट से बचाया नहीं जा रहा, यानी कि उसका मोचन नहीं किया जा रहा, बल्कि उसे लोक को अर्पित किया जा रहा है।
पुस्तक मेले में लोकार्पण भी केवल फ़ोटो खिंचवाने के अवसर से अधिक कुछ नहीं होता। लेखक धन्य हो जाता है कि अमुक हस्ती ने उसकी पुस्तक को हाथ में लेकर अपनी गर्व से अकड़ी गर्दन और आँखों में महानता का बोध लिए एक फ़ोटो खिंचवा ली।
कई बड़े प्रकाशकों ने तो अपने स्टॉल पर लोकार्पण के लिए अलग से स्थान नियत कर रखा है, जहाँ प्रकाशक लेखक से अधिक महत्वपूर्ण दिखाई दे रहा होता है। दीन-हीन लेखक तो अहसान का मारा पीठ दोहरी किए जा रहा होता है। उसकी कोशिश रहती है कि अधिक से अधिक लोगों के साथ फ़ोटो खिंच जाए, ताकि अगले ही दिन फ़ेसबुक पर ‘राग विमोचन’ गाया जा सके।
बेचारा लेखक पहले तो पांडुलिपि तैयार करता है, फिर प्रकाशक ढूँढ़कर किसी तरह उसे पुस्तक छापने के लिए राज़ी करता है। अगर मेले का मुख्य मंच लोकार्पण के लिए न मिले, तो स्टॉल में घिचड़-पिचड़ ढंग से पाँच लोगों के साथ खड़ा होकर दाँत निपोरता है और सोशल मीडिया पर अपने दाँतों की नुमाइश कर देता है।
जिस लेखक को मुख्य मंच मिल जाता है, वह दूसरे लेखकों की तरफ़ ऐसे देखता है, जैसे कह रहा हो-‘बच्चू! हमसे मुकाबले की सोचना भी मत…।’ उनके कंधे उनके रुतबे की गाथा सुना रहे होते हैं। लेखक मंच पर होने वाले कार्यक्रमों में तो कुछ गंभीर बातें सुनाई दे जाती हैं, मगर छोटे-छोटे स्टॉल तो कुछ ऐसा आभास भी देने लगते हैं कि कहीं तो करवा-चौथ की थालियाँ बाँटी जा रही हैं, तो कहीं केवल मैक्लीन्स मुस्कुराहट बिखेरी जा रही है।
कुछ वरिष्ठ लेखक इसलिए भी पुस्तक मेले में जाते हैं कि कहीं लोकार्पण करने के मौक़े के लाभ से वंचित न रह जाएं। उनका बस चले तो वे ऊँची आवाज़ में ग्राहकों को पुकार लगाने लगें-“लोकार्पण करवा लो!” वे बहुत गर्व के साथ कहते दिखाई देते हैं, “यार, आज तो थक गए। आज चार-चार विमोचन करने पड़े!” इनको भी नहीं पता कि पुस्तक का विमोचन नहीं होता, लोकार्पण होता है। मगर मन ही मन वे तुलना भी करते रहते हैं-“यार, आजकल तो राम प्रकाश की डिमांड है… वह तो हर रोज़ कम से कम पाँच विमोचन कर रहा है। उसको तो बुलाते भी बड़े प्रकाशक हैं!” ऐसे वज़नदारों की सही मायने में चाँदी होती है, जब पुस्तक मेला लगता है।
स्टॉल चाहे छोटा हो या बड़ा, लोकार्पण के दौरान क्या कहा जा रहा है, सुनाई किसी को कुछ भी नहीं दे रहा होता। कुछ बेचारे लेखक सोच रहे होते हैं-“ऐ प्रकाशक भगवान! एक ज़माने में पुस्तक के पहले संस्करण की ग्यारह सौ प्रतियाँ छपा करती थीं, जो आज घटते-घटते तीन सौ तक पहुँच गई हैं। पुस्तक मेले में लोकार्पण करवा कर कितनी प्रतियाँ बिक जाती हैं? ज़रा हमें भी बताया जाए!”
हिंदी के सामान्य लेखक को यह भी नहीं मालूम कि रॉयल्टी किस चिड़िया का नाम है और वह किस रंग की होती है। मुझे याद है कि एक प्रमुख प्रकाशक के प्रकाशन संस्थान से जब मेरी पाँच पुस्तकें प्रकाशित हो चुकीं, तो मैंने उनसे रॉयल्टी स्टेटमेंट देने को कहा। जवाब आया कि मुझे उनके दो हज़ार रुपए देने हैं। मैं तो पढ़कर लगभग बेहोश ही हो गया था। अभी हाल ही में एक प्रकाशक ने फ़ेसबुक पर घोषणा करने की हिम्मत दिखाई कि उसकी सालाना बिक्री पचास लाख रुपये से अधिक रही। उसके लेखक गूगल करके देखने का प्रयास कर रहे हैं कि क्या रॉयल्टी प्रकाशक के घर से चल पड़ी है!
मगर लेखक भी ढीठ किस्म का प्राणी होता है-लिखना बंद नहीं करता। हालाँकि हिंदी लेखक के जीवन की त्रासदी यह है कि उसे बताना पड़ता है कि वह एक लेखक है। उस पर भी पूछा जाता है, “आप क्या लिखते हैं?”
आज सुबह एक व्हाट्सएप मैसेज आया-“मैं एक घोस्ट राइटर हूँ। यदि आप अपनी पुस्तक लिखवाना चाहें-कहानी, कविता, लघु कथा या उपन्यास, तो इस नंबर पर संपर्क करें!” अब सोचिए, आपको कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता भी नहीं लेनी है। बस अपना थीम भूत के सामने रखिए और भूत कहेगा-“जो हुक्म, मेरे आक़ा!” और आप पुस्तक मेले में अपनी पुस्तक का लोकार्पण करवा कर लेखक बिरादरी में रौब जमाइए।
कुछ बेचारे लेखकों के प्रकाशकों ने उनकी पुस्तक को लटका रखा है। सामग्री मँगवाकर भी कह रहे हैं कि इस पुस्तक मेले में तो किताब आने का कोई चांस नहीं है। ऐसे लेखक चाहकर भी लोकार्पण के मंच तक नहीं पहुँच पाते। बस दूसरों को मंच पर चढ़ते देखना ही उनकी नियति है। उनके दिल के अरमाँ आँसुओं में बह गए!
एक मज़ेदार सा व्हाट्सएप चुटकुला काफ़ी वायरल होता रहता है कि-“पुस्तक मेले में सैकड़ों पुस्तकों का लोकार्पण। छोले-भटूरे वाले की बिक्री पूरे पुस्तक मेले की सेल से कहीं अधिक!… विजयी हुआ छोले-भटूरे का स्टॉल!”
अब तो हर शहर में ‘लिट-फेस्ट’ लगने लगे हैं। इनकी शुरुआत तो ‘लिटरेचर फेस्टिवल’ के नाम से हुई थी, मगर जैसे कनॉट प्लेस को ‘सी.पी.’ कहने से हम अधिक मॉडर्न लगते हैं, ठीक वैसे ही ‘लिट-फेस्ट’ आधुनिक ड्रेस की तरह हमें मॉडर्न बनाता है। इन ‘लिट-फेस्ट’ के कुछ स्थायी चेहरे होते हैं… इन्हीं चेहरों को पुरस्कार और सम्मान भी मिलते रहते हैं। यहाँ के सबसे बड़े लेखक तो जावेद अख़्तर और गुलज़ार होते हैं। आजकल आनंद बक्शी साहब भी साहित्यिक लेखक बन चुके हैं। चलिए, मरणोपरांत ही सही… उनके बारे में लिखी किताब भी वायरल हो रही है।
सब जानते हैं कि कुछ बदलने वाला नहीं है। लेखक लिखते रहेंगे… प्रकाशक छापते रहेंगे… मेले लगते रहेंगे… लोकार्पण होते रहेंगे… और सोशल मीडिया तथाकथित ‘विमोचन’ के चित्रों से सजता रहेगा!
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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50 टिप्पणी

  1. ग़ज़ब सलाम और व्यंग्य सनम को सादर प्रणाम।
    विमोचन और लोकार्पण का अर्थ भी खूब स्पष्ट किया। प्रकाशक और लेखक के बेमेल,वर्तमान परिपेक्ष्य में,समीकरण की भी सही टांग खींची।
    आपके ही पब्लिशर नुमा चराग़ ने हमारी भी जेब फूंकी,आपकी रॉयल्टी खाई और हमारी तय शुदा मेहताना?;!
    प्रकाशकों को तो बस लोकार्पण का जनाजा निकालना ही है सो विमोचन ही हुआ।एक कहावत है जैसी टुच्ची देवी वैसे उत पुजारी बस यही लेखक और प्रकाशक का संबंध और समीकरण है। नामी प्रकाशक के साथ बैठे थे,एक वयोवृद्ध लेखक ने कहा जब मैं मर जाऊंगा तब किताब छापोगे।
    बस वणिक प्रकाशक को तो कारू का खज़ाना और बहाना मिल गए। बोला शर्मा जी अब तो इसे इनके मरने के बाद किसी मोटी आसामी से पैसा वसूल कर ही प्रकाशित करेंगे।
    खैर जानदार और शनील में लपेट कर ,,, ता वाला व्यंग्य बाण।
    बधाई हो।

    • भाई, सूर्यकान्त जी, यह तो ग़ज़ब की टिप्पणी लिखी है आपने। बिना किसी लाग-लपेट के… सीधी मारक टिप्पणी। बधाई।

  2. लेखक किसी तरह एक छोटी-सी खुशी अपने नाम करना चाहता है हालांकि वह बखूबी जानता है कि यह नकली खुशी है पर अपने शानदार और धारदार व्यंग्य लिख कर उसकी उस नकलीं खुशी पर भी तुषारापात कर दिया। लेखक बेचारा हाथ मलता रह गया। उस पर तुर्रा यह कि वह उसने खुद किताब लिखी या घोस्ट राइटर ने, यह तो उसके सिवाय या घोस्ट के सिवाय कोई नहीं जानता। आज खुशियों का वैसे ही अकाल है उस पर आपके इस संपादकीय ने लेखक की छोटी-छोटी खुशियां भी छीन ली। खैर, भला हो आपका, लेखकों को अपने पारदर्शी आइना दिखा दिया और पुस्तक व्यापार से अधिक भटूरे छोले वाला अधिक कमाता है। यह भी बता दिया।

    • संतोष जी, आपने कहा है कि – “भला हो आपका, लेखकों को अपने पारदर्शी आइना दिखा दिया और पुस्तक व्यापार से अधिक भटूरे छोले वाला अधिक कमाता है। यह भी बता दिया।” दरअसल संपादक का यह कर्तव्य हो जाता है कि समाज को आईना दिखाए। इस सार्थक टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।

  3. स्नेहिल शुभ, शुभ्र सुभोर भारत से
    आहा !क्या एहसास करवाया है सूर्यदव की सद्य उपस्थिति में!
    सब कुछ कह भी दिया शरीफ़ाना अँदाज़ से और कोड़ों के निशान जिस पर पड़े, उसको ही ख़बर हुई। बहुत प्यारे अंदाज़ में अंतर भी समझा दिया और गुरुदेव ने सच्ची सच्ची स्पष्ट रूप से पाठ भी पढा दिया।अब शिष्य इतने भी असंवेदनशील नहीं होंगे कि इतनी स्पष्टता से समझाने पर भी न समझें हों।
    वैसे तो हर बात, हर विषय को बड़ी स्पष्टता से समझाते ही हैं आप! कुछ बातें से हम जैसे, बेशक कम ही हों, बिलकुल पता नहीं होतीं। आपसे सूचना प्राप्त करना बड़ी उपलब्धि होती है। अति धन्यवाद
    सादर, सस्मान, क्षमा इतना खुलकर लिखने के लिए!

    • आदरणीय प्रणव जी जब आपसे शाबाशी मिलती है तो लगता है कि बात बन गई है। आपका स्नेह बना रहे… हर सप्ताह कुछ ना कुछ लिखा जाता रहेगा।

  4. वाह, शानदार “राग विमोचन ”
    किताबें भी रखी रखी थक जाती हैं ।मेले में घूम आना ही उनके जीवन की सार्थकता है ।
    इस बहाने लेखकों और प्रकाशकों का भी हवा, पानी बदल जाता है ।
    जय जय पुस्तक मेला
    Dr Prabha mishra

  5. इस बार का संपादकीय -” पुस्तक मेले में होलसेल लोकार्पण…” प्रकाशक और लेखक के बीच संबंधों को उजागर करता है। इसके साथ ही पुस्तक मेलों और वहां की चमक-दमक, घिसड़-पिसड़ आदि को आगोश में लेकर जीवंत चित्रण किया गया है।
    लेखक बिरादरी की यह हकीकत छिपी नहीं है कि वह मर-मरकर लिखता है पर प्रसिद्धि के नाम पर उसे निराशा ही हाथ लगती है। इसके लिए लेखक खुद जिम्मेदार है। वह तुरंत प्रसिद्धि चाहता है। लेखन मदारी का काम नहीं है कि दर्शकों के आगे हथेली पर आम उगा देता है। यह एक तपस्या है जिसमें छीजना पड़ता है तब कहीं वरदान मिलता है। बीच में तपस्या भंग हो गई तो उससे भी गए। आज के लेखक में धैर्य नहीं है।
    “दीन-हीन लेखक तो एहसान का मारा……..” इन पंक्तियों में आपने प्रकाशक और लेखक के संबंधों पर जो हल्की सी चपत लगाई है उसकी गूंज बहुत मारक है। लिखता लेखक है और कमाई प्रकाशक की होती है। लेखक एहसान के मारे उसकी अंतरात्मा में घुसा जा रहा है।
    विमोचन और लोकार्पण का अंतर आपने बहुत स्पष्ट शब्दों में किया है। विमोचन शब्द का अर्थ भले ही पुस्तक लोकार्पण के संदर्भ में सही न हो पर मेला माफियाओं ने इसे ईजाद कर दिया है तो अब यह उसी अर्थ में चलेगा जिस अर्थ में वे ले रहे हैं। उनकी सत्ता को भले ही आपने चुनौती दे दी है पर वे अपने फैसले से डिगेंगे नहीं। प्रकाशक नाम ही काफी होता है।
    घोस्ट राइटिंग और ए आई वाला लेखन वास्तविक साहित्यकारों के लिए नुकसानदायक है। इसकी छंटनी जब तक समय की छन्नी करेगी, तब तक देर हो जायेगी।
    पूरे संपादकीय में पुस्तक मेले की हर गतिविधि का खुला चित्रण देखने को मिल रहा है। कहीं व्यंग्य है तो कहीं उसका समाधान भी है। और अंत में तो आपने स्पष्ट ही कर दिया है कि ‘कुछ बदलने वाला नहीं है।’
    इस सच्चाई को हम स्वीकार करें या न करें पर है तो है।
    मैं मानकर चल रहा हूं कि यह संपादकीय हम सबके लिए है। जब कभी मेरी पुस्तक का लोकार्पण होगा तो क्या मैं इसी रोल में नहीं आऊंगा? बिलकुल आऊंगा.. मुझे भी तो प्रशंसा चाहिए, लोग मुझे भी तो साहित्यकार समझें। मेरा साहित्य जन-जन तक पहुंचे। इसे मानव विडंबना कहूं तो अतिशयोक्ति न होगी।
    आपने संपादकीय से जो तीर का मोचन किया है, वह सीधे लक्ष्य पर जाकर टिकता है।
    आंखों देखी गजब संपादकीय लिखी है आपने। बहुत-बहुत बधाई सर

    • भाई लखनलाल पाल जी, आप जिस गहराई से संपादकीय को पढ़ते हैं और उस पर बेहतरीन टिप्पणी लिखते हैं, यह किसी भी संपादकीय के लिये ख़ुराक का काम करता है। ऐसी टिप्पणियां ही मुझे और बेहतर लिखने के लिये प्रेरित करती हैं।

  6. पुस्तक मेले का सालभर इंतज़ार किया जाता है कि इसमें तमाम साहित्यिक (और व्यवसायिक भी)गतिविधियों का आयोजन किया जाये। एक वर्ष में अनगिनत पुस्तकें प्रकाशित होती हैं, पुस्तक मेले में कम से कम इन्हें स्वयं के प्रदर्शन का और “विमोचन” का अवसर तो मिल जाता है। विमोचित होने के नाम पर कुछ लोगों के हाथों का स्पर्श भी पा जाती हैं। और ये “राग विमोचन” तो किसी लेखक के जीवन का सबसे सुरीला राग होता है, इसे बजते रहना चाहिए, मेलों में तो ख़ासतौर से ताकि इसकी आवाज़ दो से तीन लोगों तक पहुंच सके और उन्हें प्रेरित भी करती रहे कि अगला विमोचन उनकी पुस्तक का….।

    शानदार और ईमानदार व्यंगात्मक संपादकीय के लिए साधुवाद!

    • रचना आपका कहना है कि – और ये “राग विमोचन” तो किसी लेखक के जीवन का सबसे सुरीला राग होता है, इसे बजते रहना चाहिए।

      सच्चाई से लबरेज़ है आपकी टिप्पणी।

  7. अत्यंत रोचक संपादकीय । पुस्तक मेला , लेखक , प्रकाशक और लोकार्पण सभी का सुंदर प्रस्तुतिकरण ।विमोचन और लोकार्पण के अंतर के ज्ञान से अनभिज्ञ प्रकाशक और लेखक भी पढ़कर ज्ञान प्राप्ति के लिए अवश्य ही धन्यवाद दे रहे होंगे । बहुत बढ़िया संपादकीय आदरणीय ।

  8. आज के अपने संपादकीय में आप ने पुस्तक मेलों के पीछे की कहानी बड़े मनोरंजक ढंग से प्रस्तुत की है।
    ‘विमोचन’ शब्द के गलत प्रयोग के विषय में भी बात की है। प्रतिभा के बिना लेखन को लेकर
    महत्वकांक्षा पालना कितना हास्यास्पद व करुणास्पद हो सकता है, इस ओर भी आप ने हमारा ध्यान दिलाया है।
    धन्यवाद व शुभ कामनांए

    • आदरणीय दीपक जी, दरअसल विमोचन शब्द का इतना अधिक दुरुपयोग होता रहा है कि इस पर सही बात रखना हमारा कर्तव्य बनता है। आपके समर्थन के लिये हार्दिक धन्यवाद।

  9. सादर अभिवादन
    ये शब्द अच्छा लगा राग विमोचन , बेहद सटीक ।
    आजकल रही इन मेलों की सच्चाई है । रोचक व सटीक संपादकीय ।

  10. आदरणीय सर,
    आपका यह संपादकीय ‘पुस्तक मेले में होलसेल लोकार्पण…!’ वर्तमान हिंदी साहित्य की उस नब्ज को पकड़ता है, जो आज प्रदर्शनवाद की बीमारी से ग्रस्त है। आपने लेख की शुरुआत में ही पुस्तक मेलों की तुलना ‘कुकुरमुत्तों’ से करके उस अनियंत्रित और अनियोजित फैलाव की ओर संकेत किया है, जहाँ गुणवत्ता से अधिक संख्या बल हावी हो चुका है। प्रकाशकों द्वारा स्टॉलों पर लेखक की स्थिति को ‘दीन-हीन’ और ‘अहसान तले दबे’ व्यक्ति के रूप में चित्रित करना आज की कड़वी सच्चाई है, जहाँ मुख्य मंच न मिलने पर लेखक का ‘दाँत निपोरना’ और उसे सोशल मीडिया की नुमाइश बनाना उसकी आंतरिक असुरक्षा और मंच-लोलुपता को पूरी तरह नग्न कर देता है।
    आपने ‘विमोचन’ और ‘लोकार्पण’ के शास्त्रीय एवं भाषाई अंतर को जिस स्पष्टता के साथ समझाया है, वह हिंदी जगत के तथाकथित विद्वानों के लिए एक आवश्यक पाठ है। यह वाकई हास्यास्पद और त्रासद है कि खुद को शब्दों का जादूगर कहने वाले लोग यह नहीं जानते कि ‘विमोचन’ किसी विपत्ति या संकट से मुक्ति के लिए प्रयुक्त होता है। संपादक के तौर पर आपका यह प्रहार बहुत गहरा है कि प्रकाशकों से तो भाषाई शुद्धता की उम्मीद वैसे भी नहीं की जा सकती, मगर लेखकों की चुप्पी और स्वीकृति उनकी अज्ञानता या फिर समझौतावादी नीति को उजागर करती है।
    संपादकीय का वह पक्ष बहुत प्रभावशाली है जहाँ आपने ‘होलसेल’ संस्कृति पर चोट की है। मंच के रुतबे और स्टॉल की ‘घिचड़-पिचड़’ के बीच के द्वंद्व को आपने जिस सूक्ष्मता से उभारा है, वह साहित्य के बढ़ते श्रेणीवाद (Classism) को दर्शाता है। बड़े प्रकाशकों द्वारा लेखक से अधिक स्वयं को महत्वपूर्ण दिखाना और लेखकों का केवल फोटो खिंचवाने तक सीमित रह जाना साहित्य के ‘मंडी’ में तब्दील होने का प्रमाण है। रॉयल्टी के प्रश्न पर आपके व्यक्तिगत अनुभव ने इस पूरे विमर्श को एक प्रामाणिक धरातल प्रदान किया है। जब एक स्थापित लेखक को पाँच किताबों के बाद भी रॉयल्टी के बजाय देनदारी का बिल थमाया जाता है, तो यह उस समूचे प्रकाशन तंत्र की नैतिकता पर सवालिया निशान लगा देता है जो करोड़ों के टर्नओवर का दावा तो करते हैं, मगर लेखक को उसका वाजिब हक देने में ‘गूगल’ करने पर मजबूर कर देते हैं।
    आपने ‘घोस्ट राइटर’ और ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ के दौर में लेखन की गिरती साख, छोले-भटूरे के स्टॉल की जीत और ‘लिट-फेस्ट’ के नाम पर चल रहे वीआईपी कल्चर की जो तस्वीर खींची है, वह निराशाजनक होते हुए भी एक साहसी स्वीकारोक्ति है। ‘राग विमोचन’ गाने वालों और ‘करवा-चौथ की थालियाँ’ बाँटने जैसी स्थिति बन चुके लोकार्पण समारोहों पर आपका यह व्यंग्य हिंदी साहित्य के इस ‘तमाशा युग’ का सबसे सटीक दस्तावेज है। आपने स्पष्ट कर दिया है कि भले ही कुछ न बदले, लेकिन इस विद्रूपता को आईना दिखाना बेहद जरूरी है ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इस भीड़ का हिस्सा बनने से पहले कम से कम अपनी रीढ़ की हड्डी की मजबूती जाँच लें।

    • भाई चन्द्रशेखर जी इसे कहते हैं संपादकीय को रेशा-रेशा करके पढ़ना, समझना और उस पर लिखना। कोई पहलू छोड़ा नहीं आपने। हार्दिक धन्यवाद।

  11. व्यंग्यात्मक संपादकीय लेखन साहित्यिक जगत की दयनीय स्थिति का खुला रूप प्रस्तुत करने हेतु बहुत-बहुत बधाई

  12. पिछले दिनों नई दिल्ली में संपन्न हुए विश्व पुस्तक मेले समेत अन्य अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक जमावड़ों और दूसरे साहित्यिक मंचों से ऐसे अनेक विमोचन नामक औपचारिकताओं को निभाते देखा। आज का लेखक ऐसे तथाकथित रसमी सम्मान से ही अपने को कृतार्थ और गौरवान्वित अनुभव कर लेता है। प्रकाशक को एक मोटी कीमत चुका बेचारा लेखक अपनी पुस्तक की 15-20 से लेकर 100 कॉपियां तक उससे खरीद कर विमोचन के अवसर तलाशता रहता है या उन्हें अपने सगे संबंधियों और मित्रों में मुफ्त बांटता रहता है। ऐसे विमोचन में खींची फोटो भी सोशल मीडिया में खुले हाथों बांटी जाती हैं। पुस्तकें आम पाठकों तक कभी नहीं पहुंचती और उनका अस्तित्व मात्र लेखक के बायो तक ही सीमित रह जाता है।

  13. हालाँकि हिंदी लेखक के जीवन की त्रासदी यह है कि उसे बताना पड़ता है कि वह एक लेखक है। उस पर भी पूछा जाता है, “आप क्या लिखते हैं?” बिल्कुल वास्तविक स्थिति कहीं अपने। पुस्तक तो मैं भी लिखने की सोच रही थी पर आपने तो मेरे लिए विमोचन खड़ा कर दिया।

  14. पुस्तक मेले में होलसेल लोकार्पण… शीर्षक से आपने नए लेखकों की बड़ी निरीह तस्वीर प्रस्तुत की है। वस्तुत: लेखन से अधिक लेखक कहलाना महत्वपूर्ण हो गया है। यही कारण है कि लेखक अपनी पुस्तक का लोकार्पण वरिष्ठ साहित्यकार से करवा कर , मीडिया में तस्वीर डाल कर लेखकों की जमात में शामिल हो जाना चाहता है। इसके लिए पुस्तक मेले से उपयुक्त स्थान कहां मिलेगा, जहां अनेक वरिष्ठ लेखक सहजता से उपलब्ध हो जाते हैं और आपके अनुसार कुछ तो जाते ही इस इरादे से हैं कि वहां उन्हें, उनके द्वारा लोकार्पण का अवसर मिलेगा। रॉयल्टी इत्यादि पुस्तक से जुड़ी बहुत सी बातों पर आपने धारदार व्यंग्य में लिखने चलाई है। अब पुस्तक का प्रकाशन सरल नहीं रह गया है फिर भी लेखकों की संख्या अभूतपूर्व ढंग से बढ़ रही है।
    धारदार संपादकीय के लिएसाधुवाद।

  15. व्यंग्यात्मक, सटीक सम्पादकीय। आपने पुस्तक मेलों का सजीव चित्रण किया है। लोकार्पण की होड़ लगी रहती है। करने और करवाने वाले दोनों की। विशेष व्यक्ति तो एक होता है, शेष भीड़, जो मुफ्त में मिली पुस्तकों का बैग भरकर ले जाते हैं। हिन्दी का लेखक पैसे देकर ख़ुशियाँ खरीदता है।
    विमोचन और लोकार्पण का अंतर आपने बहुत अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया है।एक बार मेले में ही यह प्रश्न उठा था। कुछ का कहना था, पुस्तक को किसी कपड़े या काग़ज़
    से ढका हुआ होता है, लोगों को दिखाने से पहले उसे बाहर निकाला जाता है, मुक्त किया जाता है यानी मोचन होता है, इसलिए विमोचन किया जाता है।
    किसी ने विचार किया और फिर सोचे बिना प्रचलन में आ गया

  16. “हिन्दी का लेखक पैसे देकर ख़ुशियाँ खरीदता है।” – कितना दर्द छिपा है इस एक वाक्य में सुदर्शन जी। बहुत बहुत शुक्रिया।

  17. विमोचन और लोकार्पण में अंतर बढ़िया बताया सर । वैसे मेले में पुस्तक लोकार्पण प्रचार अभियान का नया तरीका बन गया है। पुस्तक कानाम लोगों को पता चल जाता है। फिर भी अंततः जोर-शोर से लाई गई पुस्तकें भी पढ़ी जाएगी या नहीं इसकी गारंटी नहीं है। लेकिन आने वाले दिनों में यह और बढ़ने की संभावना है। जिससे अच्छा लेखन दब भी सकता है। ले दे कर ये दवाब धीरे-धीरे सबको गिरफ़्त में लेगा । व्यंग्यात्मक शैली में लिखे इस धारदार सम्पादकीय के लिए बधाई सर

  18. आदरणीय तेजेन्द्र जी!

    इस बार का संपादकीय हास्य-व्यंग्य, लेखकों की मजबूरी, बेबसी और प्रकाशकों की मौंजाँ-इ-मौजाँ का चलचित्र सा लगा। लोकार्पण तो सुना हुआ था।
    2023 में हम पहली बार लोकार्पण और विमोचन से परिचित हुए।

    आपने दोनों के अर्थ खोलकर विधिवत् स्पष्ट किये ,इसके लिए तो आपका शुक्रिया बनता है।

    हर शब्द अपना एक विशिष्ट स्थान और विशेष अर्थ रखता है और जो उसका स्थान है वहीं उसका प्रयोग उसकी महत्ता और अर्थ को प्रभावी बनाता है।

    शायद 3 वर्ष पहले एक सम्मान समारोह में जाने का मौक़ा मिला था। किताबें विधिवत् सुंदर पेपर से पैक और रिबिन से बँधी हुई थीं,वहाँ विमोचन शब्द ही प्रयोग हुआ था। हम तो लोकार्पण और विमोचन में उलझे ही रहे।वैसे बंधन वहाँ भी खुला।उस समय जिसको जैसा समझ में आया। जिसने किया वह जाने।
    बहरहाल मोचन शब्द का अर्थ पता था।
    “को नहीं जानत है जग में, कपि संकट मोचन नाम तिहारो।”
    वि उपसर्ग लगने से इसका महत्व बढ़ जाता है। हनुमान जी के संदर्भ में यह विशिष्ट हो जाता है।
    पुस्तक मेले में फोटोग्राफी का ही दिखावा ज्यादा होता है।
    वाकई हास्यास्पद स्थिति लगती है।
    हमें भी रॉयल्टी किस चिड़िया का नाम है नहीं पता। भविष्य में कभी पता चला तो बताएंगे जरूर।जब आपके ही प्रकाशक ने आपके ऊपर ₹2000 और निकाल दिए तो हम जैसे लोग तो पता नहीं उस खेत की मूली हैं जिसे जानवर भी ना खाए।
    सालाना बिक्री 50 लाख वाला प्रसंग पढ़कर हँसी भी आई और लेखक पर तरस भी आया ।
    हमारे ख्याल से तो पुस्तक लिखने से ज्यादा अच्छा काम छोले भटूरे का ठेला लगाना है।
    दुनिया ऐसी ही है और ऐसे ही चलती रहेगी।
    जो बदलेगा, उसका स्वरूप कैसा होगा यह आने वाली पीढ़ी तय करेगी।
    यहाँ एक बात बताना जरूरी समझ रहे हैं लगभग 2 साल पहले हमने एक वरिष्ठ साहित्यकार के कहानी संग्रह की भूमिका लिखने का पहली बार साहसिक कदम उठाया था। सोचा कि इस भूमिका को पुरवाई में दिया जाए। जब पुस्तक के कवर पेज देने की बारी आई तो हमने उनसे कवर पेज का फोटो माँगा, पता चला कि प्रकाशक ने आज तक पुस्तक छाप कर ही नहीं दी है जब से तैयार हुई है तब से उसके पास है। और जिनकी पुस्तक थी, इतने लंबे अंतराल, और काम की व्यस्तता के चलते वे प्रकाशक का नाम पता ही भूल गए थे।
    बहरहाल नाम तो याद आ गया है उन्हें लेकिन पुस्तक अभी तक भी नहीं आई है।
    बड़े-बड़े प्रकाशकों के ये हाल हैं।
    अच्छा संपादकीय है पढ़कर खासा मनोरंजन हुआ।
    अजब प्रकाशकों के गजब ढंग।
    अजब लोकार्पण गजब विमोचन!
    और बेचारा लेखक!!!!

    इस व्यंग्य के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।

    • आदरणीय नीलिमा जी, संपादकीय से जुड़े बहुत से मुद्दे आपने अपनी टिप्पणी में शामिल किये हैं। इससे संपादकीय के नये आयाम भी खुल कर सामने आए हैं। आप पुरवाई के साथ स्नेह बनाए रखें।

  19. जितेन्द्र भाई: विमोचन और लोकार्पण शव्दों की सटीक तथा सही जानकारी मिलने से जो ज्ञान गँगा में वृद्धी हुई है उसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद और साधुवाद। आपका सम्पादकीय पढ़कर शायद कुछ लेखकों को यह आइडिया भी मिल सकता है कि अगले पुस्तक मेले में अपनी पुस्तक रखने के बजाए क्यों न छोले भटूरे का ठेला लगाया जाए। इस से प्रकाशकों की ख़ुशामद करने की चकचक से निजात और ढ़ेर सारी कमाई। चित भी मेरी और पट भी मेरी।

    • जय हो विजय भाई। विमोचन शब्द का दुरुपयोग एक लंबे अरसे से होता आ रहा है। यह आवश्यक था कि कम से कम लेखकों तक यह बात पहुंचाई जा सके। और हां, यह छोले भटूरे के ठेले वाला आइडिया बुरा नहीं है।

  20. बुक फेयर में होते विमोचन तथा लोकार्पण में अंतर बताते हुए आपने अपने संपादकीय पुस्तक मेले में होल सोल लोकार्पण में प्रकाशकों के हाथों पिसते दयनीय चेहरे वाले लेखकों पर अच्छा व्यंग्य किया है, जो आज की सच्चाई है। लोकार्पण में वही गिने चुने चेहरे रहते हैं, जिनके सम्मुख लेखक अपने सम्मान से समझौता करता प्रतीत होता है।
    इसके साथ ही यह भी सच है कि ‘लिट-फेस्ट’ में कुछ स्थाई चेहरे होते हैं उन्हें ही विभिन्न सम्मान और पुरस्कार मिलते हैं।
    अंतिम वाक्य लेखक की मज़बूरी या अपनी रचनाओं के प्रति मोह या प्रसिद्धि की ललक मन को मथता है…सब जानते हैं कि कुछ बदलने वाला नहीं है। लेखक लिखते रहेंगे… प्रकाशक छापते रहेंगे… मेले लगते रहेंगे… लोकार्पण होते रहेंगे… और सोशल मीडिया तथाकथित ‘विमोचन’ के चित्रों से सजता रहेगा!
    लेकिन अपनी बात समाप्त करने से पूर्व यहाँ मैं यह भी उद्धृत करना चाहूँगी कि लेखकों की भी दो श्रेणियां होती हैं एकदम वह जो सिर्फ लिखना जानते हैं तथा कुछ वह जो सिर्फ प्रसिद्धि के लिए लिखते हैं और ऐसे ही लोग सफल होते हैं क्योंकि लिखने से अधिक आज पुस्तक का प्रचार प्रसार आवश्यक है क्योंकि वही माल बिकता है जो दिखता है।
    यही कारण है कि पुस्तक मेले में होल सोल लोकार्पण आज की सच्चाई बन गई है।
    सच्चाई पर कलम चलाने के लिए साधुवाद आपका।

  21. सुधा जी, आपने लिखा है कि – “लेखकों की भी दो श्रेणियां होती हैं एकदम वह जो सिर्फ लिखना जानते हैं तथा कुछ वह जो सिर्फ प्रसिद्धि के लिए लिखते हैं और ऐसे ही लोग सफल होते हैं क्योंकि लिखने से अधिक आज पुस्तक का प्रचार प्रसार आवश्यक है क्योंकि वही माल बिकता है जो दिखता है।”

    इन शब्दों में आपकी भावनाएं बहुत ख़ूबसूरती से बयां हुई हैं। आपने संपादकीय को पसंद किया बहुत बहुत शुक्रिया।

  22. तेजेन्द्र जी सच में ही सच लिखा आपने। पर मेला तो मेला होता है लेखक आपस में मिल बैठते हैं। आजकल विज्ञापन और सेल्फ़ी युग है अपनी तारीफ़ स्वयं ही करनी या करवानी पड़ती है। अब लेखकों की तो बाढ़ है चुनना पाठक को है।
    फ़ेसबुक पर इतना पढ़ने को मिल जाता है कि किताबें धरी ही रह जाती हैं। मेरे पास ख़ुद बहुत बड़ा संग्रह है अच्छे लेखकों की पुस्तकों का पर मैं चाहते हुए भी कम समय दे पाती हूँ। पुरवाई पर लेख और कहानियाँ पढ़ पाना भी भी कम हो गया है आजकल पर एक ललक तो बनी ही रहती है।

  23. हास्य व्यंग्य का पुट लिए आपका संपादकीय एक बार फिर नये मुद्दो को उठाता यथार्थ के बिल्कुल करीब लगा।एक एक शब्द मानों सामने ही घटित हो.रहा हो।पढते हुए हास्य का भाव बना रहा ।हमारे जमशेदपुर में रोज पुस्तकें लोकार्पित होती हैं ,स्तरीय हों या नहीं लेकिन सौ पचास अनगढ़ रचनाए लिखने वाला नवोदित भी पुस्तक तो अवश्य प्रकाशित करवाता ही है वह भी अपने खर्च पर। प्रकाशकों का सहयोग यदि किसी जुगाड या पैरवी से मिल भी जाये तो रायल्टी की बात तो सोची भी नहीं जा सकती। ..न लेखक लिखना छोडेंगे न यह.लोकार्पण रुकेगा।प्रसिद्धि, नाम यश की कामना बहुत कुछ करवाती है।आपने संपादकीय में लिखा है —
    मगर लेखक भी ढीठ किस्म का प्राणी होता है-लिखना बंद नहीं करता। हालाँकि हिंदी लेखक के जीवन की त्रासदी यह है कि उसे बताना पड़ता है कि वह एक लेखक है। उस पर भी पूछा जाता है, “आप क्या लिखते हैं?”
    बहुत ही गहनता से पडताल कर अपनी बात कह पाने का दायित्व संपादकीय ने निष्ठा से निभाया है।पुस्तक मेलों में लोकार्पण का रोचक विवरण सरल हास्य की सृष्टि करता है ।साथ ही विमोचन और लोकार्पण का अंतर बताया आपने जिसे बहुत लोग आज भी नहीं समझते।
    बहुत ही सुंदर सार्थक एवं सारगर्भित संपादकीय के लिए आपको हार्दिक बधाई।
    सादर प्रणाम भाई।

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