कृति – कतार में लगे लोग (लघुकथा संग्रह)
रचनाकार – डॉ. वर्षा ढोबले, समीक्षक – डॉ. रमेश यादव
प्रकाशक- संदर्भ प्रकाशन, भोपाल मूल्य – ₹ 299/- केवल,
डॉ. वर्षा ढोबले का नया लघुकथा संग्रह ‘कतार में लगे लोग’ संवेदना, भावुकता, प्रभावशाली अंत और सामाजिक चेतनाओं की दृष्टि से परिपूर्ण संग्रह है। इनमें से कुछ लघुकथाएं सामाजिक व्यवस्था पर सीधे एवं तीखा प्रहार करती हैँ, तो कुछ सकारात्मक संदेश के ताने-बाने में बुनी गईं हैँ। इनमें विचारों की एक कड़ी परिलक्षित होती हैं और बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती हैँ। अतः साहित्य जगत में इस पठनीय संग्रह का गर्मजोशी के साथ स्वागत किया जाना चाहिए। सुदृढ़ एवं आदर्श समाज निर्माण में साहित्य की अपनी अहम भूमिका होती है, जिसका निर्वावहन इस संग्रह में मार्मिक लघुकथाओं के माध्यम से किया गया है। लेखिका ने इन लघुकथाओं में अपनी भावनाओं, पीड़ाओं, दर्द और संवेदनाओं को आंतरिक गहराई से प्रस्तुत किया है जो पाठकों के अंतर्मन को छू लेती हैँ। इन्हें पढ़ते हुए कथा के दृश्य आँखों के सामने उपस्थित हो जाते हैँ। यही इस संग्रह की सफलता की खासियत है।
इस संग्रह में विभिन्न परिवेश एवं विविध विषयों पर आधारित कुल 83 लघुकथाओं का समावेश किया गया है, जो निश्चित रूप से पठनीय हैँ। लघुकथा के आयामों पर खरी उतरती ये लघुकथाएं समाज को दर्पण दिखाने का काम करती हैँ। लघुकथा लेखन गद्यकुल की सबसे छोटी विधा है। अतः संक्षेप में अपनी बात को कहना, पाठकों को गहराई में उतरकर सोचने पर मजबूर करना इन लघुकथाओं की विशेषता है। इनकी बुनावट में संवेदनाएं तो हैँ ही साथ ही नए आविष्करण को भी परखा जा सकता है। वैचारिक संस्पर्श के साथ संग्रह में भावुकता, कसावट और बुनावट की भी झलक महसूस की जा सकती है।
संग्रह की पहली लघुकथा ’सीख’ बड़ी ही मार्मिक है जो काफी सूझ-बुझ के साथ प्रस्तुत हुई है। चिड़ियों की चहचहाट को सांकेतिक रूप से पेश करते हुए घर की तीनों बहुओं के तू-तू, मैं-मैं को समय की मांग के अनुसार कमरों के साथ-साथ रसोई को भी अलग-अलग कर दिया जाए, इस संदेश के साथ प्रस्तुत होती है। इससे घर में रिश्ते और शांति बनी रहेगी, इस संदेश को प्रेषित करती है। ‘संकल्पबद्ध’ कथा में बैंक मैनेजर द्वारा एक गरीब, बुजुर्ग ग्राहक के साथ उसके ही मातहत द्वारा किए गए अन्याय के खिलाफ खड़े होने तथा गरीब को न्याय दिलाने के प्रति संकल्पबद्ध होना अपने आपमें एक सजग और सतर्क नागरिक की भूमिका को चित्रित करती है। समाज में आज भी अच्छे लोगों की कमी नहीं है, इसे इंगित करती यह कथा हर जिम्मेदार कर्मचारी की आँखें खोलने का काम करती है। है। ‘तर्पण’ कथा भी बड़ी मार्मिक है जिसमें बाबूजी जी की तेरहवीं सम्पन्न होने का बाद फूफा जी द्वारा, एक साल के भीतर ‘गया’ जाकर तर्पण करने की बात पर बहू रेखा प्रश्न उपस्थित करती है, “कैसा तर्पण? बाबूजी का श्राद्ध तो हर साल हम विधिवत करेंगे ही। क्या ‘गयाजी’ में तर्पण करने से बाबूजी की यादों का हम तर्पण हम कर पाएंगे? उनकी जो यादें हमसे जुड़ी हैँ, उन यादों को हमारे साथ रहने दें।” सामाजिक कर्मकांड तथा आडंबर पर यह लघुकथा एक करारा प्रहार है। इसी तरह ‘जुराबें’ लघुकथा एक संयुक्त परिवार की मनोदशा की संवेदनशील प्रस्तुति है। इसमें अम्मी की मौत के बाद संदूक से निकली गाँठ लगी जुराबें, रिश्तों की मजबूती के प्रतीक के रूप में सशक्त रूप से प्रस्तुत होती है। इसका अंतिम वाक्य – अम्मी हमेशा कहती थीं, ‘जुराबों में गाँठ लगाकर रखने से वे यहाँ-वहाँ गुम नहीं होती।’ बहुत कुछ कह जाती है। कम शब्दों में बहुत बड़ी बात कह जाना ही लघुकथा की विशेषता होती है जो इस संग्रह में प्रस्फुटित होती हैँ। ‘कतार में लगे लोग’ बुजुर्गों के प्रति संवेदना तथा सहानुभूति को दर्शाती संवेदना में पगी सार्थक लघुकथा है। हर छोटे-बड़े काम के लिए लंबी-लंबी कतारें हमारे देश की नियति बन चुकी है। ‘बुजुर्गों, महिलाओं के लिए विशेष खिड़की’ जैसे एक छोटी-सी व्यवस्था बुजुर्गों के आत्मसम्मान और सामयिक समाधान को इंगित करती है। ‘मंच’ एक अनूठी कथा है जो लघुकथा के जन्म और जरूरत की दास्तान को दर्शाती है। इसमें प्रतीक का सुंदर प्रयोग किया गया है। इसी तरह ‘ठंडी छाँव’, ऑनलाइन, स्टेटस, एक कप चाय, जन्मकुंडली, परिवार, दर्द, माँ, मीठे बोल, मिन्नी, जस करनी तस, उनकी वापसी, अधूरी बात, माँ मिल गई, इन्श्युरेंस, भ्रष्टाचार, संतुलन, आम के टोकरे, बेशकीमती, डॉलर बनाम रुपया आदि लघुकथाएं भी अपने-अपने शीर्षक के अनुरूप कथ्य की विविधताओं को प्रस्तुत करते हुए लघुकथा की कसौटी पर खरी उतरती हैँ। ये लघुकथाएं गंभीरता से नुकीले अंदाज में समाज व्यवस्था पर चोट करती हैँ। लघुकथा का शीर्षक उसका प्रवेश द्वार होता है, जो इस संग्रह में सटीकता से प्रस्फुटित होती हैँ।
संग्रह की कुछ लघुकथाएं प्रयोगधर्मी हैँ, जो साहित्यिक विस्तार की दृष्टि से अत्यंत आवश्यक है। समयानुरूप नए-नए प्रयोग किए जाने चाहिए। इससे बहती सरिता की तरह शीतलता, कोमलता तथा ताजगी बनी रहती है। लघुकथाओं को लेकर अकसर चर्चा की जाती है – उसके आकार की लघुता, शब्द संख्या, सटीकता आदि को लेकर। मगर कथाकार जिस समय काल में, जिस परिवेश में अपनी कथा कहन को संवेदना, व्यग्रता से साँचे में ढालता है वह भी महत्वपूर्ण है। इसमें व्यंग्य को, संदेश को, यथार्थ को जिस खूबसूरती से प्रस्तुत करता है वह भी अधिक महत्वपूर्ण है। अपनी यति-गति से गुजरती हुई संकेतों, प्रतीकों के माध्यम से विविध दशाओं से गुजरते हुए लघुकथा कितनी एकाग्रता से विषय को शिखर तक ले जाती है, यह भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। लघुकथा एकरेखीय नहीं है। वह मनस्थितियों का संघर्ष भी है, विरोधों की तल्खी भी है, तटस्थता की चुप्पी की भीतरी व्यथा भी है, समाजशास्त्र का छोटा सा एकांश भी है, चरित्र की छोटी झलक भी है। इतना जरूर है कि सारा कथाविन्यास अपने व्यंजक शीर्ष के साथ सार्थक संदेश के प्रति समर्पित हो। लघुकथा न बौन्साई है, न किसी कहानी का लघु-संस्करण हो। इसका अपना अलग ढांचा है, व्याकरण है। कितनी सफाई और बारीकी से कथ्य को पेश करते हुए कहन को प्रेषित किया गया है, यह ज्यादा मायने रखता है। डॉ. वर्षा की अधिकांश लघुकथाओं में इनका निर्वहन मासूमियत के साथ किया गया है।
गरीबी पर आधारित ‘ढोल’, ‘टिफिन बॉक्स’ ‘स्वाद’ तकदीर और मजबूरी की कथा-व्यथा को प्रस्तुत करती हैँ, जो सामाजिक मानसिकता पर करारा चोट करती हैं। ‘प्यास’ कथा में माँ बनने की लालसा में पति-पत्नी के मानसिक और आत्मिक संतुष्टि को दर्शाती है। ‘राहत की सीख’ में घर की आर्थिक परेशानी के बावजूद एक विद्यार्थी की नेकी और ईमानदारी को चित्रित करती है। ‘रिक्शावाला’ और ‘रँगा सियार’ में नेताओं के खोखले वादे और उनके ढोंगीपन की पोल खोलती है जो गरीब बूढ़े रिक्शावाले के माध्यम से करारा कटाक्ष करती हैँ।
‘अपनी बात’ में लेखिका लिखती हैं कि मूलतः मराठी भाषी होते हुए भी वे हिंदी साहित्य एवं नाट्य शास्त्र में बचपन से ही अपनी रुचि रखती रही हैं। मिले अवसरों में खरी उतरती रही हैँ। उनके इस पहले लघुकथा संग्रह में विधानुरूप लेखन की जिज्ञासा, बारीकी, सहजता, प्रवाह, मानवी मूल्यों और प्रभावी लेखन शैली की अनुभूति की जा सकती है, जो पाठकों को अंत तक पढ़ने के लिए मजबूर करती है। डॉ. वर्षा जी बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी हैँ। कई विधाओं में सृजन करते हुए वे साहित्य सृजन में अपनी उपस्थिति को मजबूती से पेश करती हैँ। उनकी प्रतिभा सम्पन्न लेखनी भविष्य में भी इसी तरह सार्थक, पठनीय, उत्कृष्ठ एवं समृद्ध सृजन करती रहेगी इन्हीं शुभकानाओं के साथ….।

समीक्षक – डॉ. रमेश यादव
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