Friday, March 6, 2026
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महेन्द्र भीष्म के शीघ्र प्रकाश्य उपन्यास “हाँ ! मैं हूँ”  का अंश

समलैंगिकता पर आधारित कथाकार महेन्द्र भीष्म के शीघ्र प्रकाश्य उपन्यास “हाँ ! मैं हूँ”  का अंश।

मोनू का पहला जन्मदिन बडी धूमधाम से लखनऊ स्थित होटल क्लार्क अवध में मनाया गया। इसमें मीरा के मायके वाले, ससुराल पक्ष और कुछ निकट सम्बन्धी उपस्थित रहे। शुभम भी पांच दिन के अवकाश में लखनऊ आया और वापस अपने कार्य क्षेत्र मनाली चला गया।
       बिन्नी भाभी ने मीरा से चर्चा की थी कि ‘ऐसे कब तक चलेगा? एक साल से अधिक कभी ससुराल कभी मायके में रहते हो गए। पति-पत्नी दोनों को साथ रहना चाहिए, तभी गृहस्थ जीवन सुचारू रूप से चलता है।’ 
मीरा ने बिन्नी भाभी की बात का बुरा नहीं माना, बल्कि यह प्रश्न उसने शुभम से किया भी था। शुभम ने मीरा को आश्वस्त किया कि ‘नीचे यानि मैदान में स्थानांतरण होते ही साथ रहेंगे।’
मीरा ने शुभम से हुई बात भाभी के कानों तक पहुंचा दी। बिन्नी भाभी ने अपनी ननद को जादू की झप्पी लेते कहा, “मेरी बातों का कभी बुरा नहीं मानना।”
“नहीं, भाभी।” मीरा के नेत्र सजल हो आए। आलिंगनबद्ध ननद की पीठ सहलाते बिन्नी भाभी की आंखें भी पसीज उठीं।         
“बात मान जाया करो शुभम बेटा! पापा कुछ कह रहे हैं, तो कुछ समझकर ही कह रहे होंगे। उन्होंने दुनिया देखी है। बाल ऐसे ही सफेद नहीं हो गए हैं, उनके। अरे! अभी साल भर का हुआ है, मोनू। मनाली की ठंड झेल पाएगा?”
“मम्मी यहां मनाली में बर्फबारी के दिनों वेसी ठंड नहीं पड़ती, जैसी लखनऊ में ठिठुरन भरी ठंड होती है।”शुभम अपनी मम्मी को फोन पर समझाने की  कोशिश में लगा था, परन्तु उसकी मां कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थीं।
            पौत्र के मोह में आकर शुभम  की मम्मी एकाएक अपना निर्णय सुनाते बोलीं, “देख बेटा! तू छुट्टी लेकर लखनऊ आ जा। इस बार यहां, जाड़े में रह जा। छोटे बच्चे ठंड नहीं सह पाते, वहां पता नहीं किस हाल में तुम लोग उसे रखो।”
“मम्मी…”
 “…और सुनो! मेरा अंतिम निर्णय ..तुझे आना हो तो आ, मोनू और बहू मनाली कतई नहीं जायेंगे।” कहते मम्मी ने न केवल फोन काट दिया बल्कि मोबाइल को गुस्से में सोफे पर पटक दिया।
      घर के लोग जो वहां थे सभी सकते में आए गए, सभी की सांसें पहले से ही रुकी हुईं थीं। सबसे ज्यादा मीरा घबड़ाई हुईं थी कि कहीं उसकी सासु मां यह न सोचने लगे कि उसने मनाली जाने के लिए शुभम से कहा है।
      विनम्र और शांति प्रिय व्यक्ति को जब तेज स्वर में कोई सुनता है, तो वह सतर्क हो जाता है। शुभम की मम्मी बहुत दयालु, सादगी पसंद, धर्म पारायण महिला हैं। पौत्र के प्रति उनका अगाध स्नेह-प्रेम इस वार्ता में परिलक्षित होता है।
      सार्थक प्रयास सफलता की कुंजी है। शुभम ने अपने होटल के उच्च पदाधिारियों से सार्थक प्रयास किए परिणामस्वरूप उसे  नववर्ष में पांच जनवरी से बीस जनवरी, 2017 तक के लिए कुल पंद्रह दिन का अवकाश मिल गया।
          4 जनवरी, 2017 को अमेरिका के 45 वें राष्ट्रपति के रूप में डोनाल्ड ट्रंप ने शपथ ली और यहां शुभम अपनी पूर्व निर्धारित तिथि 5 जनवरी को लखनऊ आ गया। लखनऊ में इस बार पूर्व वर्षों के अपारतया अधिक ठंड पड़ रही थी। इस ठिठुरन भरी ठंड से बचाव के लिए सोते समय शुभम और मीरा अपने मध्य में मोनू को लिटा लेते। कमरे में सर्दी से बचाव के लिए हीट कन्वर्टर भी रुक-रुक कर चलाते। सुबह देर से जब धूप में पर्याप्त गर्मी आ जाती, तब सभी लोग छत पर धूप सेंकते। सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था।
         एक खुशहाल परिवार में जितने भी गुण होने चाहिए वह शुक्ला परिवार में थे, जिसकी धुरी शुभम की मम्मी थीं। वास्तव में एक खुशहाल परिवार का मुखिया यदि जिम्मेदारी से अपने कर्तव्य का निर्वहन करता है और परिवार की सबसे बुजुर्ग स्त्री जो परस्पर विवाद की स्थिति में समझौता वादी और सहयोग करती है, तो ऐसे परिवार में कभी बिखराव हो ही नहीं सकता। मीरा के दिन और रात शुभम के साथ अच्छे व्यतीत हो रहे थे। सागरिका का फोन आता रहता था। उससे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष बातें चलती रहती थीं, सागरिका अक्सर शुभम के वर्तमान को लेकर भी उससे प्रश्न पूछती रहती थी। ऐसे अटपटे प्रश्न का कोई खास महत्व या यूं कहें उसपर मीरा का ध्यान नहीं गया। 
          समयकाल और परिस्थिति कब कहां किस मोड़ पर जीवन को बदलकर रख देती है, कुछ कहा नहीं जा सकता, जब तक कोई बात पर्दे के पीछे रहती है, तभी तक वह गुप्त रहती है और जब वह उजागर हो जाती है, तो वही बात संबंधों को कैसे बदल कर रख देती है, इसकी पहले से कल्पना भी नहीं की जा सकती। वह आगामी होने वाली घटना से स्पष्ट हो जाता है। हुआ यह कि शुभम अपना लैपटॉप खुला छोड़कर घर से बाहर किसी काम से गया हुआ था। मीरा के  लैपटाप की बैट्री डिस्चार्ज हो गई थी, उसे कोई काम याद आया और वह शुभम के लैपटॉप को ऑन कर अपना कार्य करने लगी। जब वह लैपटॉप में अपना कार्य कर चुकी, तो उत्सुकतावश पति महोदय के लैपटॉप में स्टोर सामग्री को देखने लगी। एक पत्नी का पूरा अधिकार है कि वह अपने पति का फोन, लैपटॉप या अन्य चीजें सहज  रूप से  देख सकती है, उनका निरीक्षण कर सकती है, परंतु मीरा की एक तो ऐसी कोई आदत नहीं थी दूसरे, शुभम के प्रति किसी प्रकार की कोई शंका उसके मन में नहीं थी।  लैपटॉप की हिस्ट्री में मीरा को ऐसे वीडियो, ऐसे आर्टिकल देखने को मिले, जिसकी वह कल्पना भी नहीं कर सकती थी। हिस्ट्री में और डाऊनलोड में  बहुतेरे वीडियो समलैंगिक संबंधों से संबंधित थे। मीरा ने गौर किया कि शुभम ऐसे वीडियो क्यों देखता है? उसके मन में एकाएक ख्याल आया कि कहीं शुभम को उसके और सागरिका के संबंधों का पता तो नहीं चल गया। इसी शंका के समाधान के लिए संशकित मीरा ने शुभम का लैपटॉप खंगालना शुरू किया। शुभम इतना इंटरेस्ट क्यों ले रहा है इन समलैंगिक वीडियो को देखने में? यह प्रश्न चिन्ह उसके मन में उभर आया क्योंकि सभी वीडियो पुरुष समलैंगिकता से संबंधित थे। मीरा के मन-मस्तिष्क में एकाएक सागरिका के द्वारा अक्सर पूछे जाने वाला प्रश्न भी टकराया, जो शुभम के वर्ताव को लेकर उससे अक्सर पूछा जाता था। मीरा ने लैपटॉप बंद किया और सागरिका को फोन लगाया। 
         सागरिका ने बातचीत में बहुत ही संतुलित और सधे हुए शब्दों में उसे जवाब दिए। सागरिका को कोई अंदाजा नहीं हुआ कि मीरा के मन में क्या चल रहा है। उसने यह स्पष्ट कर दिया कि उसके और मीरा के संबंधों के बारे में शुभम को कुछ भी नहीं पता है और वह इससे निश्चिंत रहे । उसने स्पष्ट किया कि  उसकी शुभम सर से कभी भी बात नहीं होती है। 
       सागरिका से संतोषजनक उत्तर न मिलने के बाद मीरा ने उन लम्हों को याद किया जब शुभम अकेले में किसी से बात करने के लिए घर की छत पर अक्सर चला जाया करता था। मन में जब व्यक्ति विशेष के प्रति शंका जन्म ले लेती है, तब सशंकित मन अपने साथी के पूर्व कार्य और व्यवहार का स्वयं से आंकलन करने लग जाता है।
          वह पल, वह समय जो पूर्व से निर्धारित था जब सामने प्रत्यक्ष-प्रकट-स्पष्ट हुआ, तो जैसे मीरा के मन-आंगन में भूचाल आ गया हो। हुआ यह कि मीरा ने किसी तरह शुभम का मोबाइल अनलॉक करने का कोड समझ लिया और एक दिन जब शुभम अपने किसी कार्य में व्यस्त था, तब मीरा ने शुभम के मोबाइल को खंगालना शुरू किया। 
      …. और वह सारे राज जो शुभम के थे, मीरा को ज्ञात होते चले गए। ‘तो क्या शुभम समलैंगिक है? तो क्या सागरिका उससे जो प्रश्न अक्सर पूछा करती थी, वह यही सब जानने का उद्देश्य था। मतलब सागरिका जानती थी कि शुभम समलैंगिक है। जैसे मीरा को एकाएक अपना जीवन अंधकारमय लगने लगा। उसे एक साथ अपना भूत, वर्तमान और भविष्य दिखने लगा। वह अभी तक एक समलैंगिक व्यक्ति की पत्नी बनकर उसके साथ रह रही थी। सिर पर पहाड़ टूटने जैसा महसूस हो रहा था। दु:ख और अवसाद से घिरी मीरा को अपना भविष्य अंधकारमय दिखाई पड़ने लगा। उसे बहुत-बहुत दु:ख हो रहा था कि आखिर शुभम ने उसे पहले  कभी अपने बारे में  बताया क्यों नहीं?… और ऐसे समलैंगिक व्यक्ति के साथ वह कैसे आगे का जीवन व्यतीत कर सकती है। उसे सागरिका पर भी क्रोध आ रहा था। इसी क्रम में मीरा ने एक बार फिर सागरिका को फोन करके जितनी जली-कटी बातें वह बोल सकती थी वह उसने गुस्से में सागरिका को बोल दीं।
 
        सागरिका से बात हो जाने के बाद मीरा ने बिन्नी भाभी को सारी बातें रोते-रोते बता दीं। बिन्नी भाभी शुभम की सच्चाई जान बहुत दु:खी हुईं, मीरा की बातें सुनते वह गृहस्थ, संस्कारित भारतीय संस्कृति से बंधी महिला स्वयं रोने लगीं। स्वयं को संयत कर बिन्नी भाभी ने अपने बड़े होने की जिम्मेदारी का निर्वहन करते अपनी प्रिय ननद मीरा को ढाढस बंधाया और शाम को उसके बड़े भैया संग उसके पास आने का वादा किया। 
        शुभम जब लौट के घर आया तब संयोग से मम्मी पिंकी के साथ मोनू को लेकर पास के मंदिर में गई हुई थी। पापा अपने ऑफिस के लिए निकल चुके थे। घर में केवल मीरा और शुभम शेष थे।
    
    विनम्रता की देवी धर्मपत्नी मीरा को चंडी का रूप धरे देख शुभम हक्का-बक्का रह गया। मीरा की आंखें चौड़ी और सांस तेज-तेज चल रही थीं।
“क्या हुआ?.. क्या हुआ मीरा तुम ठीक तो हो?” शुभम ने होले से मीरा के बाएं कंधे पर अपना दाहिना हाथ रखते पूछा।
एक झटके से मीरा ने शुभम का हाथ परे झटक दिया।
“ऐसा भी क्या हुआ? तुम इतने गुस्से में क्यों हो? तबीयत तो ठीक है न तुम्हारी….
मम्मी..पिंकी..” शुभम ने पुकार लगाई। मीरा के उग्र रूप को देख उसे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। कुछ भी सुझाई नहीं दे रहा था।
“मम्मी और पिंकी मोनू को लेकर मंदिर गईं हैं।” मीरा की आवाज में उष्णता थी।
  मम्मीजी के साथ ‘जी’ और बहन पिंकी  के साथ ‘दीदी’ का सदैव सम्बोधन देने वाली मीरा के मुख से सीधे सपाट शब्द सुनने के बाद शुभम को आने वाले तूफान का आभास हो चला था। वह स्वयं को आने वाली विपत्ति के लिए तैयार करने लगा।
“तुम गे हो?”
 ‘आप’ से सीधे ‘तुम’ और इस प्रश्न की तो शुभम ने कल्पना भी नहीं की थी।
“क्या हुआ मीरा?”
“बोलो! आर यू गे।” मीरा का स्वर तेज बहुत तेज था। वह लगभग चीख रही थी।
“यस आई एम,  हाँ! मैं हूँ।” सधे स्वर में नितांत साफ सपाट उत्तर था शुभम का।
        वक्त जैसे रुक गया हो। जिस तरह से प्रश्न पूछा गया था ठीक उसी तरह प्रश्न का उत्तर आया था, आशा के विपरीत।
        निर्वात में कोलाहल जैसी स्थिति हो आई थी।
  “शुभम! जब तुम को पता था कि तुम गे हो, तब तुम्हें मुझसे विवाह नहीं करना था। तुमने मुझे धोखा दिया है। मेरे साथ चीटिंग की है, मुझे छला है।” हताश दुःखी मीरा की सांसें तेज चलने लगीं थीं।
“सच मानो मीरा मैंने तुम्हें धोखा नहीं दिया, न ही चीटिंग की है। अरे मुझे नहीं पता था कि मैं गे हूं। यह तो विवाह के बाद पता चला कि मेरी प्रवृत्ति गे जैसी है।” शुभम ने मीरा के कंधे पर हाथ रखना चाहा पर रख न सका। मीरा परे हट गई।
 “मुझे…. मुझे छुओ नहीं, मुझे तुमसे घिन आने लगी है।
“क्या अब ऐसा बोलोगी?” शुभम अवाक रह गया ।
“हां, बोलूंगी और हजार दफा बोलूंगी।” मीरा ने अपना कमरा अंदर से बन्द कर लिया।
“अरे यह क्या कर रहीं हो, दरवाजा क्यों बन्द कर लिया? मम्मी जी मंदिर से आती होंगी, क्या सोचेंगी। बाहर आओ मिलकर बात करते हैं।” शुभम विनम्रतापूर्वक बोला।
“नहीं, दरवाजा नहीं खुलेगा मैं अपना सामान लगा रहीं हूं। भैया को सब बताने जा रहीं हूं।” मीरा के स्वर में आक्रोश कायम था।
“सुनो! मीरा। अरे सुनो भाई प्लीज़…”
       अपने कमरे के अंदर मायके जाने की तैयारी करती जा रही मीरा रो रोकर सारा हाल अपनी बिन्नी भाभी को बता रही है।
       मंदिर से घर आ चुकीं शुभम की मां और बहन पिंकी मीरा द्वारा तेज स्वर में कहे जा रहे शब्दों को समझने का प्रयास करने लगीं। मां, बेटी को सपने में भी आभास नहीं था कि उनका बेटा,भाई शुभम समलैंगिक है। वे दोनों जितना शुभम के गे होने से परेशान हो उठे थे, उससे कहीं अधिक मीरा के दुःखी मन और उसके मायके जाने की जिद को लेकर दुःखी हो रहे थे। मां, बेटी की कुछ समझ में नहीं आ रहा था। इस बीच पिंकी ने अपने पापा को घर जल्दी आने के लिए फोन कर दिया।
“मीरा बेटा दरवाजा खोलो।”
अपनी देवी जैसी सासू मां की विनम्र पुकार से वशीभूत मीरा ने कमरे के द्वार खोल दिए और सासू मां से बिलखते हुए लिपट गई।
     एकाएक मीरा का पैर फिसला या उसे चक्कर आया कोई कुछ समझ या उसे संभाल पाता इसके पहले ही वह फर्श पर धड़ाम से गिर कर बेसुध हो गई। 
         इस अप्रत्याशित घटना से सभी लोग कुछ पलों के लिए किंकर्तव्यविमूढ़ से क्या करें? क्या न करें? जैसी स्थिति में आ गए। आनन-फानन में मीरा को अलीगंज के प्राचीन हनुमान मंदिर के निकट स्थित नीरा नर्सिंग होम में ले जाया गया। 
      शुभम ने रास्ते में ही फोन से मीरा के बड़े भैया राकेश को मीरा के बेहोश होने और उसे नीरा नर्सिंग होम लेकर जाने की सूचना दे दी, जो अपनी धर्मपत्नी बिन्नी के साथ मीरा की ससुराल के लिए पहले से ही निकले हुए थे।
      मीरा को जल्दी ही होश आ गया। बिन्नी भाभी और राकेश भैया समय से उसके पास पहुंच चुके थे। शहर की सुप्रसिद्ध स्त्री रोग विशेषज्ञा डॉक्टर नीरा गुप्ता ने सूचित किया कि, “कमजोरी की वजह से पेशेंट को चक्कर आ गए थे। अब वह बिल्कुल ठीक है। उसे घर ले जा सकते हैं।” साथ ही उन्होंने सूचित किया कि, “पेशेंट को लगभग तीन माह का गर्भ भी है।”
       मीरा के गर्भवती होने की सूचना ने जहां मीरा की सासू मां व सभी को प्रसन्नता दी, वहीं मीरा के बड़े भैया राकेश बारंबार उलाहना दे रहे थे कि,  ‘मीरा के ससुराल पक्ष ने उन लोगों को अंधेरे में क्यों रखा? विवाह के पहले बताया क्यों नहीं कि उनका बेटा समलैंगिक है।’
     बातों-बातों में बात इतनी ज्यादा बढ़ गई की राकेश भैया ने शुभम को सरेआम अपने कटु वचनों से आहत कर दिया। मीरा को उसके बड़े भैया राकेश यह कहते हुए अपने साथ ले गए कि ‘अब वह दोबारा ऐसे धोखेबाज नपुंसक के साथ नहीं रहेगी।’
       घर आकर शुभम बहुत दु:खी मन से सोचता रहा क्या उसका समलैंगिक होना पाप है? क्या समलैंगिकता अपराध है? और यदि यह पाप है और अपराध है तो ईश्वर ने उसकी ऐसी प्रवृत्ति ही क्यों बनाई?
मात्र समलैंगिक होने की जानकारी मिलते ही उसकी धर्मपत्नी उसके ससुराल के लोग एक साथ उसके इतने विरोध में आ जाएंगे। इसकी रंच मात्र भी कल्पना शुभम ने नहीं की थी। घर के अन्य लोग भी मीरा के चले जाने से आहत और दुःखी थे। मीरा का फोन लगातार स्विच ऑफ आ रहा था। मीरा के बड़े भाई ने उन सभी के फोन नंबरों को ब्लॉक कर दिया था। 
         अगले दिन शुभम के पापा अपनी बेटी पिंकी और धर्म-पत्नी को लेकर राजाजीपुरम मीरा के भाई राकेश के आवास पर पहुंच गए । उन सभी के स्वागत-सम्मान में बिन्नी भाभी ने कोई कमी नहीं की। परस्पर वार्ता हुईं, परंतु राकेश किसी भी सूरत में अपनी बहन को उनके साथ भेजने के लिए राजी नहीं हुआ।
        निराश, हताश शुभम के पापा, मम्मी और पिंकी वापस अपने घर न्यू हैदराबाद में आ गए। पोते मोनू के लिए हीड़ रहीं  उसकी दादी के रो रहे अंतर्मन की वेदना को कोई नहीं समझ पा रहा था। ‘हे भगवान!एकाएक यह क्या हो गया?’ बस यही सोच-सोच कर वह बेहाल हुई जा रहीं थीं।
          दो दिन बाद शुभम की छुट्टियां पूरी हुई और वह मनाली चला आया। मनाली आने से पूर्व उसने तमाम प्रयास किए कि जाने से पहले कम से कम एक बार वह मीरा और मोनू से मिल ले, पर मिलना तो दूर दोनों में से किसी की झलक भी देखना उसके लिए संभव नहीं हो पाया।
       बिन्नी भाभी एक मात्र संपर्क सूत्र बनी हुईं थीं। कालांतर में यही सूत्र काम आया कि कम से कम बिन्नी भाभी की सूझबूझ उनकी समझदारी की वजह से उन्होंने मीरा की उसकी सासू मां और ननद पिंकी से बातचीत करानी शुरू करा दी। 
       एक दिन शुभम की मां की अचानक तबीयत बिगड़ जाने से बिन्नी भाभी उन्हें देखने के बहाने मीरा और मोनू को साथ लेकर मीरा की ससुराल पहुंच गईं और मीरा को अपनी सासू मां की देखभाल के लिए समझा बुझाकर उसे वहीं छोड़ आईं। 
         यद्यपि घर आने पर बिन्नी को अपने पतिदेव की खूब खरी खोटी अपने इस कृत्य के लिए सुननी पड़ी थीं, पर बिन्नी भाभी द्वारा उठाया यह कदम मीरा और उसके बेटे के भविष्य और उसकी पारिवारिक एकता के लिए जरूरी था।
*भाग – पच्चीस*
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2 टिप्पणी

  1. महेंद्र जी!

    आपके शीघ्र प्रकाश्य उपन्यास “हां !मैं हूँ!”के अंश को पढ़ा। काफी रोचक है! शायद इस विषय पर हमने पहली बार पढ़ा। एक पत्नी की दृष्टि से इस मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति के बारे में समझने का प्रयास किया।
    जबकि मीरा और सागरिका के बीच भी वही बात थी जो शुभम के साथ थी।तो शुभम के बारे में जानकर उसे इतना क्रोध क्यों आया? एकाएक शॉक्ड हो जाना तो समझ में आता है। सिर्फ इसलिए की शुभम को उसके और सागरिका के बारे में नहीं पता था इसलिए उसने शुभम पर अपना पूरा क्रोध उतार दिया।
    लेकिन यह एक ऐसा मनोविकार है जिसे सुधारा भी जा सकता है।
    फिर अंत भला तो सब भला।
    भले ही इसे सामाजिक मान्यता प्राप्त हो लेकिन फिर भी पता चलने पर इसे समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता है।
    इस दिशा में सोच बदलने की भावना से लिखा यह प्रयास काबिले तारीफ है।
    दरअसल जो भावनाएँ, संवेदनाएँ अपने रंजन की दृष्टि से लोक मर्यादाओं की उपेक्षा कर,तोड़ कर आगे बढ़ती हैं; प्रत्यक्ष में इसका विरोध तो होता ही है।वे भी करते हैं जो मन से सहमत होते हैं।लेकिन यह तय है कि यह स्थाई उपाय नहीं है। इसीलिए समाज में वैवाहिक संस्कार का नियम है।
    लेकिन अगर ग़लती होती है तो सुधार के साथ लौटने का स्वागत किया जाना चाहिये।

  2. आदरणीय महेंद्र जी आपके द्वारा लिखित उपन्यास “हां में हूं” को पढ़ते वक्त मेरे दिल दिमाग में एक भूकंप सा उत्तेजना सी छाई रही ,
    शायद इसलिए कि में प्रकृति के साथ किसी भी तरह की अप्राकृतिकता के खिलाफ हूं फिर चाहे वह मनुष्य जानवर पंछी
    जड़ चेतन किसी के भी अहित में हो

    कुदरत नर मादा दो अलग अलग बनाए हैं इनका ही आकर्षण
    हर मन को लुभाता हे
    इससे अलग मानसिकता जब मानव मन में जन्म लेती है हमक्या सोचे कि यह प्राकृतिक तौर पर उत्पन्न हुई हे या उसके आस पास का सामाजिक माहौल या उसके कमजोर क्षणों में उसका मानसिक शारीरिक शोषण या शारीरिक उत्तेजना वश समलैंगिकता में लिप्तता,या अकेलेपन किसी ऐसे ही व्यक्ति से संपर्क,,,,बहुत सी बातें हो सकती हे,जिससे वह समलैंगिकता की तरफ आकर्षित हो सकता हे
    एक समलैंगिक आदमी सामान्य जीवन नहीं जी सकता ,ऐसा भी नहीं हे हम इस उपन्यास के अंश में पढ़ भी रहे हे
    मीरा जो स्वयं भी समलैंगिक हे उसका भूचाल उठाना ,गृहस्थी को बिखराना अत्यधिक गलत हे ,जब इंसान इससे अलग हो सकता हे तो कोशिश अवश्य करनी चाहिए ,परिस्थितिवश जो हुआ हो गलती से ,उसे सुधार जा सकता हे ,प्रकृति के खिलाफ कार्य
    में असौंदर्यता है ,कुरूपता है ,भले इसे कही मान्यता मिली हो
    मगर यह एक मनोविकार ही हे जो किन्हीं अपरिस्थिति वश पनपता हे,समझ आने पर सामान्य हुआ जा सकता हे
    कोशिश ही कामयाब होती हैं
    आदरणीय महेंद्र जी आप एक विद्वान लेखक हैं मनोवैज्ञानिक विषयों पर आपका लेखन उत्कृष्ट हे
    साधुवाद

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