समीक्षक
डॉ. मधु संधु, पूर्व प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग,
गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर, पंजाब
‘अल्पविराम’ 2019 में राजकमल दिल्ली से प्रकाशित प्रवासी कथाकार उषा प्रिंयंवदा द्वारा लिखित उपन्यास है। कथाकार उषा प्रिंयंवदा, मन्नू भण्डारी और कृष्णा सोबती की त्रयी नई कहानी दौर के प्रमुख हस्ताक्षर हैं। कोई आधी दर्जन कहानी संग्रहों के अतिरिक्त उषा प्रिंयंवदा के आठ उपन्यास मिलते हैं। ‘पचपन खंभे लाल दीवारें’ (1961), ‘रुकोगी नहीं राधिका‘ (1967), ‘शेष यात्रा’ (1984), ‘अंतर्वंशी’ (2000), ‘भया कबीर उदास ’(2007) ‘नदी”(2013) और ‘अर्कदीप्त’ (2023)। 2007 में उन्हें राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल द्वारा ‘पद्मभूषण डॉ.मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। ‘अल्पविराम’ उपन्यास के राजकमल से तीन संस्कारण आ चुके हैं। उषा प्रिंयंवदा रेपर पर लिखती हैं-
“अल्पविराम एक प्रेम कथा है। बाकी वृतांत एक चौखटा है, एक फ्रेम। परंतु फ्रेम के बिना तस्वीर अधूरी है। इसी प्रकार प्रेम कहानी प्रवाल के बिना अपूर्ण है।”
उपन्यास ‘छाया के लिए’ समर्पित है । रेपर कहता है-
“ उषा प्रियम्वदा का यह उपन्यास एक लंबे दिवस्वप्न की तरह है- जिसमें तिलस्मी चमत्कारी अनुभवों के साथ- साथ अनपेक्षित घटनाएँ भी पात्रों के जीवन से जुड़ी हुई हैं। एक ओर यह मृत्यु के कगार पर खड़े परिपक्व व्यक्ति के तर्क विरुद्ध, असंगत, अपने से उम्र में आधी युवती के प्यार में आकंठ डूब जाने की कहानी है पर साथ- साथ एक अविकसित, अप्रस्फुटित, अव्यावहारिक स्त्री के सजग, सतर्क और स्वयंसिद्ध होने की भी यात्रा है। यात्रा का यह बिम्ब उषा प्रियंवदा के हर उपन्यास में मौजूद है। चाहे वह कैंसर से उभरने की यात्रा हो या अपने से विलग हुई संतान के लौटने तक की ।”
उपन्यास छह खंडों के 23 परिछेद और फिर परिशिष्ट को 311 पृष्ठों में समेटे है। कहानी यह है कि स्कूल के बाद सत्रह वर्षीय युवती शिंजनी की शादी कर दी जाती है। उसका पति प्रवाल श्रीवास्तव शादी के तीन दिन बाद पीएच. डी. करने विदेश चला जाता है और ग्यारह- बारह दिनों के अंदर ही उसकी मृत्यु का समाचार मिल जाता है। कुछ वर्ष बाद नायिका भी भाई और माँ के साथ कैंब्रिज पहुँच जाती है और स्मृति खो चुके, ग्रीक अधीना का पति लकी शॉ बन चुके प्रवाल का अचेतन शिंजिनी को देख सुषुप्तावस्था से अंगड़ाई लेने लगता है ।
मूलत: यह प्रेम कहानी है। जीवन की ढलान पर खड़े एक बीमार/ कैंसरग्रस्तता से उभर चुके विवाहित/तलाक़शुदा पुरुष और आसन्न युवा, लेकिन विधवा मान ली गई स्त्री की। यह मृदुभाषी नायक कभी पुरातत्वविद के रूप में, कभी स्थानीय विश्वविद्यालय के अध्यापक के रूप में, कभी विशिष्ट अतिथि के रूप में, देश में, विदेश में नायिका के आस- पास चक्कर लगाया करता है। बीच- बीच में फोन भी कर लेता है, कभी कोई कैसेट भी भेज देता है, ‘वार एंड पीस’ जैसे उपन्यासों पर भी बात करता है। उसको पूरा महत्व देता है, प्रशंसा करता है। अमेरिका में प्रपोज़ भी करता है। अंतत: शिंजिनी भारत लौट अधेड़ प्रेमी से विवाह करती है जो कुछ ही महीनों में कैंसर से मर जाता है। उधर दस वर्ष बाद अधीना की मृत्युपरांत प्रवाल को उसके सामान में अपना वह बक्सा भी मिलता है, जिसमें विवाह की तस्वीरें और आइडेंटिटी के पेपेर्स हैं। क्षीर्षेन्दु हल्दीपुरी की मृत्यु के बाद पहली शादी के दस वर्ष उपरांत वह बौस्टन में पहले पति प्रवाल श्रीवास्तव के संसर्ग में आती है और फिर वहीं रह जाने का सोचती है।
पात्र समृद्ध और अभिजात वर्ग के हैं। नायिका डिप्टी कलेक्टर पिता और कलेक्टर भाई के साथ बड़े बंगलों में नौकर- चाकरों के बीच देश- विदेश में शान शौकत से जीवन बिता चुकी युवती है और बुद्धिजीवी पुरातत्वविद नायक का परिवार हलदीपुर एस्टेट का मालिक है। उसका अमेरिका के बौस्टन में चार्ल्स नदी के तट पर एक फ्लैट है। दूतावासों को किराये पर दी गई दिल्ली की कोठियाँ, कनाट प्लेस में बड़ी- बड़ी दूकानें, ऊपर फ्लैट, दिल्ली में सत्रह जायदादें, विलायत में पढ़ाई, विदेशों में आना- जाना- वह अति समृद्ध है। नवाबगंज में नानी से मिली हवेली सौ करोड़ और चार फ्लैट में बालाजी बिल्डर को बेची जाती है। दंपति महीनों लंबा हनीमून- बंबई, लंदन, पेरिस, जर्मनी, स्पेन, इटली, ग्रीस आदि में मनाते हैं।
ममी सुचित्रा वर्मा संतुलित व्यक्तित्व की स्वामिनी है। जमाई के मृत्यु समाचार पर बेटी से कहती है- जो हुआ सो हुआ, तुम्हारी ज़िंदगी थोड़े ही खत्म हो गई है। वह कैलिफोर्निया में देखते ही प्रवाल को पहचान जाती है और नायक की बेटी के लिए प्रेमिल दृष्टि भी उससे बच नहीं पाती। अमेरिका आकर तो वह अपना काया कल्प ही कर लेती है। बेटी भी जानती है कि क्षीर्षेन्दु हल्दीपुरी की मृत्यु के बाद अगर वह प्रवाल के साथ अमेरिका में ही रहने का निर्णय लेगी, तो ममी आश्वस्त ही होगी।
नायक क्षीर्षेन्दु हल्दीपुरी अध्ययन- मनन में आकंठ डूबा रहता है। अनेक भाषाओं की हजारों पुस्तकों की घर में लाइब्रेरी है। वह गहरे और विस्तृत आयामों वाला विलक्षण व्यक्ति है। देश- विदेश के भ्रमण, पढ़ना- पढ़ाना, पुरातत्वविद होना उसकी विशेषताएँ हैं। पच्चास के बाद नायिका को देख उसका मन उस पर आ जाता है, मानों किसी ठूंठ पेड़ पर फिर से पत्ते हरहराने लगे हों।
उषा प्रियम्वदा ने नायिका के तिलस्मी चमत्कारी अनुभव कुछ ऐसे दिये हैं कि एक बार तो पाठक भी भूल-भुलैया में पड़ जाता है। भाई का स्थानांतरण होने पर शिंजनी और परिवार सुनसान जगह पर बने जिस बंगले में रहने आते हैं, उसके आसपास की कब्रें, फूलों के जंगल, लैवेंडर नायिका के अस्तित्व को दो दुनियाओं में बाँट देते है। कभी लॉर्ड फर्ग्यूसन की मेम से, कभी सती होने वाली स्त्री से, कभी विलासी राजा की रानी या मचला दे से उसका तादात्म्य होने लगता है। मूलत: शिंजिनी स्किज़ोफ़्रेनिया बीमारी की शिकार है, जब- तब उसे लगता है कि पूर्वजन्म में वह महारानी थी और यह बंगला उसके महल के ध्वसावशेषों पर बना है और अदृश्य शक्तियाँ इस जन्म में उसे यहाँ खींच लाई हैं। सपनों और दिवास्वप्नों की दुनिया उसे अस्पताल में, कोमा में पहुंचा देती हैं, जहां से वह स्वस्थ होकर लौट भी आती है।
समृद्ध, उच्चपदस्थ, आधुनिक परिवारों की स्त्री की स्थिति नारी विमर्श को स्पेस दे रही है। एक अबोध अनगढ़ बच्ची के माँ- बाप स्कूल के बाद 17-18 की उम्र में शादी थोप देते हैं, जबकि भाई को आई. ए. एस. बनाया जाता है। ऐतिहासिक वंशावलियों में भी स्त्रियॉं के नाम नहीं मिलते। महाराणा प्रताप के घोड़े का नाम तो विख्यात है, लेकिन रानी का नाम ? उपन्यास उस अतीत के पास पाठक को ले जाता है, जहां औरतों के लिए रंगमहल नाम के कैदखाने होते थे, रानियाँ सती होती थी, सती चौरे होते थे, लेकिन उन पर स्त्री के नाम का शिलालेख नहीं होता था। लिखा जाता था- राजा लक्ष्मणसिंह की पत्नी का सती चौरा, राजा विराट सिंह की स्त्री का सती चौरा वगैरह। कॉलेज लेक्चरर प्रस्तावना और इलिनी के, आफिसर अतिमा के माध्यम से, आधुनिक, आत्मनिर्भर और स्वतंत्र स्त्री की बात की गई है। क्षीर्षेन्दु / बमभोला यह भी चाहता है कि शिंजनी उसकी मृत्यु के बाद असमर्थ और निरुपाय स्त्रियों को समर्थ बनाने का अभियान चलाये ।
पुरुष विमर्श कहें या उत्पीड़न- पात्र दर्द भोग रहे हैं। क्षीर्षेन्दु की पत्नी कभी उसके पास नहीं रहती और सम्बन्धों की डोर पूर्णत: टूटी होते के बावजूद तलाक में उसका सब कुछ हथिया लेती है।
जीवन के सबसे बड़े दुख में भी व्यक्ति कैसे निर्लिप्त रह सकता है, इसे क्षीर्षेन्दु की मृत्यु के समय देख सकते हैं- उसकी पूर्वपत्नी, बेटे बहू अमेरिका घूमने में व्यस्त हैं और भाभी होटल से फेशियल करवाने में।
जैसे उषा के ‘नदी’ उपन्यास में वर्गभेद के कारण प्रवीण के प्रेमी की हत्या कर दी जाती है, उसी तरह यहाँ भी प्रेम का शक होने पर गँवई गाँव के राजकुमार को मार- मार कर पागल कर दिया जाता है और वह सड़कों पर सर्दी से ठिठुरता मर जाता है। कलेक्टर मृणमय वर्मा की चपरासी की बेटी पत्नी को ससुराल स्वीकारता नहीं और पिता- भाई उसे अर्थ बटोरने का साधन ही मानते हैं। दो बेटियों की माँ अतिमा मृणमय से संबंध तो रख सकती है, लेकिन शादी नहीं कर सकती, क्योंकि वह वर्मा है, छोटी जाति का है।
अमेरिका के 250 वर्षीय इतिहास, सिविल वार, हत्याओं, अङ्ग्रेज़ी सत्ता से मुक्त होने की लड़ाई, 1857 की मार- काट, बहादुर शाह जफर को पकड़ना और दिल्ली में कत्लेआम, ऐय्याश नवाबों का भी लेखिका ने जिक्र है और भारतीय राजाओं का ऐतिहासिक चित्रण भी है।
एक रहस्यमय ब्रीफकेस उषा प्रियंवदा के उपन्यासों के अंत में कथा को विशेष मोड़ देता है। ‘अर्कदीप्त’ उपन्यास की तरह ही नायिका शिंजिनी को भी ‘प्रेमपत्र उर्फ पति की डायरी‘ वाला ब्रीफकेस पति क्षीर्षेन्दु की मृत्यु के बाद मिलता है। यहाँ प्रेम है, स्मृतियाँ हैं, नायिका के आर्थिक भविष्य की चिंता और उसे सुगम बनाने के ठोस आयोजन हैं। कई चौंकाने वाले रहस्य हैं। पति के प्रथम विवाह, चार बेटे, लम्पता, विलासवृत्ति, कैंसर, विद्वता, लक्की शाह की अमेरिकन एजेंसी द्वारा जासूसी। चतुर क्षीर्षेन्दु जानता है कि शिंजिनी उस स्किज़ोफ़्रेनिया बीमारी की शिकार है, जिसमें रोगी को तरह- तरह की छायाएं दिखाई देती है, लेकिन वह क्रांतिकारियों की, फर्ग्यूसन साहब की, राजमहलों की, मनगढ़ंत कहानियाँ बना- बना कर सुनाते हुये उसका मन जीतने का प्रयत्न करने लगता है। उपन्यास में ऐतिहासिकता और परामनोविज्ञान, तादात्म्यीकरण तथा दिवास्वप्न परस्पर घुल- मिल गए हैं।
उपन्यास सार्थक जीवन की तलाश में जुटी एक युवती शिंजिनी की कहानी है। जीवन का एक उद्देश्य होता है, उसी का पीछा करना सार्थकता है। क्या माँ या मौसी, जेठानी या बड़ी भौजी की तरह घर गृहस्थी में सार्थकता लाना ही उसका जीवन लक्ष्य है ? शुरुआती जीवन में कोई भी निर्णय वह स्वयं नहीं ले पाती। पढाई, विवाह, विदेश यात्रायेँ- सभी निर्णय ममी, डैडी, भाई और पति ही लेते हैं। अमेरिका जाने के बाद वह धीरे धीरे अपने विचार, दिशा, पसंद बनाती है और व्यक्त भी करने लगती है। मानों बिना इबारत की खाली दीवार में रंग भरने लगती है। अंतिम निर्णय उसके अपने हैं- नायक से शादी का निर्णय, क्षीर्षेन्दु की मृत्यु के बाद प्रवाल के बच्चे को पति का नाम देने का निर्णय। प्रवाल श्रीवास्तव के साथ बौस्टन रहने का निर्णय। पाश्चात्य ढंग की वेश भूषा, हेयर स्टाइल, बूस्टन में गाड़ी ड्राइव करने का निर्णय। हाशिये पर रहना उसने छोड़ दिया है। नायक भी जैसे ही अपनी लम्पट वृत्ति से मुक्त हो एक शोधार्थी, तापस, पुरातत्वविद का जीवन अपनाता है, उसे लगता है कि जीवन सार्थक हो गया है। प्रवाल अपने अतीत की ओर लौटने में जीवन की सार्थकता पाता है। ममी और मौसी तो सदैव इसी के पक्ष में रही हैं।
लेखिका ने बदलते वक्त की बातें भी की हैं। जैसे नौकरानी कुक हो गई है। हवेलियों की जगह मल्टी स्टोरी माल ले रहे हैं। आधुनिकता का चक्रव्यूह है कि आज किताबें नहीं पढ़ी जाती, बस उन पर बनी फिल्में, टी. वी. ड्रामें देख लिए जाते हैं- अन्ना करेनिना हो या वार एंड पीस।
आम प्रवासी की वेदनाओं का अंत नहीं। अमेरिका कैसी संभावनाओं का देश है, यह तो प्रवासी ही जानते हैं। पेडीक्योर करने वाली सुलेखा की पीड़ा कि कहाँ नेपाल में उनके पैर पूजे जाते थे और कहाँ उसे रोटी रोजी के लिए पेडिक्योर करना पड़ रहा है। लोगों के पैर धो-धो कर जीवन यापन करना पड़ रहा है। समुद्र में डूबने और अपने सारे पेपर खोकर अनाम हो चुके प्रवाल की पीड़ा शब्दातीत है । शव नहीं मिला, तो उसे ढूंढने का प्रयास भी नहीं किया गया- विदेशी विद्यार्थियों की विडंबित स्थिति !
दांपत्य के जोड़े और मौजे के जोड़े का प्रतीक आया है। नायिका का जर्मनी में खरीदे मौजे के जोड़े का एक मौज़ा खो जाता है। यह उसका प्रिय जोड़ा था। परेशानी में वह दूसरा भी फेंक देती है, जबकि कालांतर में खोया हुआ मौज़ा मिल जाता है। ठीक ऐसे ही उसका पति प्रवाल श्रीवास्तव अमेरिका में खो जाता है। वह दूसरी शादी कर लेती है और दस वर्ष बाद प्रवाल उसे मिल जाता है।
माणिक मोतियों की तरह भाषा में सूत्र बिखरे पड़े हैं। जैसे-
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जीवन का एक उद्देश्य होता है, उसी का पीछा करना सार्थकता है।
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शौर्य और धन, दोनों ही रूप के लोभी रहे हैं, क्योंकि उनमें क्षमता है उसे लूटने की।
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जब लोग आत्महत्या करने के लिए ऊंचाई से कूदते हैं, तो उनके गले से अपने आप एक अवश, आर्त चीख निकाल जाती है।
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अपनी छाया दर्पण में हमेशा यथार्थ से सुंदर लगती है।
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बिना खाये- पकाए, सुई- धागा थामें, कढ़ाई- बुनाई जाने कोई औरत टोटल वुमन नहीं होती- चाहे कितनी पीएच. डी. कर ले, या कितनी ऊंची कुर्सी पर बैठ जाये।
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पूर्णविराम तो तभी लगता है, जब कहानी/ ज़िंदगी खत्म हो जाती है।
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छोटे बच्चे को अप्रत्याशित चांटा लग जाये तो वह रोता नहीं, स्तब्ध रह जाता है।
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अक्सर सुंदर, मुखर, वाचाल माताओं की बेटियाँ उनके व्यक्तित्व से दबी हुई और बुझी बुझी हो जाती हैं ।

*डॉ. मधु संधु की कलम से – अल्पविराम : सार्थक जीवन की खोज*
डॉ.मधु संधु जी!
उषा प्रिंयंवदा को हमने पढ़ा है पहले भी।आपने सही लिखा कि उषा प्रियंवदा, मन्नू भण्डारी और कृष्णा सोबती की त्रयी नई कहानी दौर की प्रमुख हस्ताक्षर हैं।
आपकी लिखी हुई पूरी समीक्षा पढ़ी।काफी अच्छी समीक्षा लिखी है आपने, जो उपन्यास को पढ़ने के लिए प्रेरित करती है। वैसे तो समीक्षा को पढ़कर कथानक लगभग समझ में आ गया।
समीक्षा पढ़कर उपन्यास के लिये महसूस हुआ कि आपने बिल्कुल सही लिखा है कि-
*“उषा प्रियम्वदा का यह उपन्यास एक लंबे दिवास्वप्न की तरह है- जिसमें तिलस्मी चमत्कारी अनुभवों के साथ- साथ अनपेक्षित घटनाएँ भी पात्रों के जीवन से जुड़ी हुई हैं। एक ओर यह मृत्यु के कगार पर खड़े परिपक्व व्यक्ति के तर्क विरुद्ध, असंगत, अपने से उम्र में आधी युवती के प्यार में आकंठ डूब जाने की कहानी है पर साथ- साथ एक अविकसित, अप्रस्फुटित, अव्यावहारिक स्त्री के सजग, सतर्क और स्वयंसिद्ध होने की भी यात्रा है। यात्रा का यह बिम्ब उषा प्रियंवदा के हर उपन्यास में मौजूद है। चाहे वह कैंसर से उभरने की यात्रा हो या अपने से विलग हुई संतान के लौटने तक की ।”*
बड़ा उलझा हुआ सा कथानक है इस उपन्यास का। स्थायित्व नजर नहीं आया। पूरा उपन्यास एक भूल भुलैया सा है, समीक्षा पढ़कर ऐसा महसूस हुआ ।
अपरिपक्व उम्र में विवाह परिस्थितियों के अनुरूप मानसिक विचलन को पोषित करते हैं। ऐसी स्थिति में भटकाव संभावित है।
जहाँ तक इस तरह के उपन्यास की समीक्षा लिखने की बात है, यह सरल काम नहीं है। आपको दाद देते हैं इस समीक्षा के लिये।
सहेजने जैसा धन अगर हमें इसमें कुछ पसंद आया तो वह है- माणिक्य और मोती की तरह बिखरे हुए भाषा -सूत्र
*जीवन का एक उद्देश्य होता है, उसी का पीछा करना सार्थकता है।*
*शौर्य और धन, दोनों ही रूप के लोभी रहे हैं, क्योंकि उनमें क्षमता है उसे लूटने की।*
*अपनी छाया दर्पण में हमेशा यथार्थ से सुंदर लगती है।*
*बिना खाये- पकाए, सुई- धागा थामे, कढ़ाई- बुनाई जाने ,कोई औरत टोटल वुमन नहीं होती- चाहे कितनी पीएच. डी. कर ले, या कितनी ऊंची कुर्सी पर बैठ जाये।*
*पूर्णविराम तो तभी लगता है, जब कहानी/ ज़िंदगी खत्म हो जाती है।*
*छोटे बच्चे को अप्रत्याशित चांटा लग जाये तो वह रोता नहीं, स्तब्ध रह जाता है।*
*अक्सर सुंदर, मुखर, वाचाल माताओं की बेटियाँ उनके व्यक्तित्व से दबी हुई और बुझी बुझी हो जाती हैं ।*
बेहतरीन समीक्षा के लिए आपको बहुत-बहुत बधाइयाँ।