जब तिवारी जी गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष बने, तब भी अंदर से एकदम गँवई शख्स ही रहे। उन्होंने इसी इंटरव्यू में शायद बताया था कि वे ट्रेन में मिलने वाले लोगों को यह कभी नहीं बताते कि वे यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर या विभागाध्यक्ष हैं। वे हमेशा खुद को एक गँवई किसान के रूप में दर्शाते हुए ही बात करते हैं, जिससे सामने वाला खुलकर बात करता है और अपने भीतर की सारी बातें निस्संकोच कहता-सुनता है।
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हिंदी के अपने ढंग के निराले कवि-आलोचक और चिंतक विश्वनाथप्रसाद तिवारी जी से आप जब भी मिलें, उनके खिले-खिले से व्यक्तित्व की आब सबसे पहले असर डालती है। गँवई धज में भी कितनी बारीक प्रतिभा, कौशल और खुद्दारी छिपी होती है, यह तिवारी जी से मिले बगैर शायद नहीं जाना जा सकता। शायद इसलिए कि वे अपनी तरह के व्यक्ति हैं—अपनी तरह के कवि, लेखक, आलोचक और उनसे मिलना एक भरपूर शख्सियत से मिलने सरीखा है जो एक प्रसिद्ध कवि तो है ही, पर साथ ही एक बड़े कद का आदमी और एक संवेदनशील पारिवारिक सदस्य सरीखा भी है। एक ऐसा सहृदय साहित्यकार, जो आपके घर-परिवार तक की चिंताओं में शरीक है और भीतर-बाहर से आपके साथ है।
याद पड़ता है, तिवारी जी से मेरी पहली मुलाकात त्रिवेणी सभागार के किसी साहित्यिक कार्यक्रम में हुई थी। वहाँ मुझसे परिचय होने पर अचानक खिलखिलाते हुए साथ खड़े सज्जन से उन्होंने कहा, “देखो भाई, दिल्ली में प्रकाश मनु जैसे लोग भी हैं। क्या लगते हैं कहीं से ये दिल्ली वाले? एकदम सीधे-सादे आदमी। इन्हें देखकर कौन कहेगा कि ये भी दिल्ली के ही हैं।”
फिर कुछ और बातें हुईं। और यह भी कि वे आगे जब भी आएँगे, मिलेंगे। उसके बाद वे जब-जब दिल्ली आए, फोन पर बातें हुईं और मुलाकातें भी। कभी मिलना नहीं हो पाया, तो फोन पर तो जरूर बतिया लिए। इसमें उन्हें भी अच्छा लगता था, मुझे भी। हर बार उन्होंने ‘दस्तावेज’ के लिए कोई रचना या लेख भेजने के लिए आग्रह किया। पर किसी संपादकीय दबदबे के साथ नहीं। बल्कि एक अजब सी अविश्वनीय विनम्रता के साथ कि, “जो कुछ आप लिख रहे हैं, उसी में जो उचित समझें, आप हमें दें। हम उसे छापेंगे।” साथ ही ‘दस्तावेज’ पत्रिका के अंक भी लगातार मिलते रहे।
उन्हीं दिनों बीसवीं शताब्दी के अंत की कहानियों पर एक लंबा लेख मैंने उन्हें भिजवाया जिसे उन्होंने बड़े सम्मान से छापा। लगातार दो किस्तों में और वे दोनों किस्तें कुल मिलाकर पत्रिका के लगभग पैंतीस पृष्ठों तक चली गई थीं।
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यों कहानी वाले इस लेख की भी बड़ी अजब कहानी है। उसे कहना मेरे लिए कोई सुखकर नहीं है, इसीलिए कि उसके साथ ज्ञान जी का नाम भी जुड़ा है जिनकी मैं बड़ी इज्जत करता हूँ।
कहानी पर यह लेख मुझसे भाई ज्ञान जी ने लिखवाया था और बार-बार आग्रह करके लिखवाया था। उन्होंने ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में छपा मेरा लेख पढ़ा था ‘लेकिन कहानी अब भी संभावना है’। यह लेख याद पड़ता है, मैंने नब्बे के दशक के प्रारंभ में लिखा था। मैंने वर्ष भर में छपे सभी महत्त्वपूर्ण कहानी संग्रहों को पढ़ने के बाद, जो संभवत: साठ-सत्तर से कुछ अधिक ही रहे होंगे—उन पर एक विस्तृत लेख लिखा था। लगातार कई दिनों की अथक मेहनत से यह लेख लिखा गया था। और इसमें उन कहानियों को रेखाकित किया था जिनसे मेरे खयाल से कहानी का आगे का रास्ता निकलता है।
इस लेख की एक खासियत यह थी कि यह किसी बनी-बनाई आलोचनात्मक शैली या शब्दावली में नहीं लिखा गया था और इतनी सारी कहानियाँ पढ़ने के बाद मेरे भीतर जो प्रतिक्रियाएँ या रिफलेक्शस पैदा हुए, उन्हीं को मैंने सिलसिलेवार सामने रखा था। जिन कहानियों ने एक संवेदनशील पाठक के रूप में मुझे गहराई से छुआ और जिनमें आज का समय, संवेदना और आज के आदमी की मुश्किलें थीं, उन्हें मैंने खास तौर से रेखाकित करने की कोशिश की, फिर भले ही वे एकदम नए लेखकों की क्यों न हों!



जिसने विश्वनाथप्रसाद तिवारी जी के साहित्य का एक अक्षर भी न पढ़ा हो, वह इस संस्मरणात्मक आलेख को पढ़कर ही उनका चाहने वाला बन जाएगा। प्रकाश मनु, तिवारी जी का न केवल व्यक्तित्व अपितु उनके विचार, भाव, संवेदनाएँ, सरोकार, साहित्य आदि सब कुछ इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं कि विश्वनाथप्रसाद तिवारी पढ़ने वाले के मानस में अंकित हो कर रह जाते हैं।
मनु जी की लेखनी इसी तरह हमें नवाज़ती रहे!
संस्मरण के रूप में श्री विश्वनाथप्रसाद तिवारी जी के बारे में आदरणीय प्रकाश मनु जी की लेखनी से बहुत कुछ जानने को मिला। तिवारी जी के विराट व्यक्तित्व को जानना सुखद था। आपके संस्मरण , आपके आलेख खूब-खूब लंबे होते हैं। परंतु आप इतनी तरलता के साथ लिखते हैं कि पाठक बीच में पुस्तक को रख ही नहीं पता। आपकी रचना खुद को पढ़वा ही ले जाती है। यह आपकी वर्षों की साधना का ही परिणाम है।
आपका लंबा लेकिन रोचक संस्मरण पढ़ा सर!पढ़ते हुए अपने समय के ग्रामीण किसान का चित्र खिंच गया। लाल बहादुर शास्त्री भी याद आए। लगभग ऐसा ही सीधा सरल चरित्र और वेशभूषा भी। आदरणीय विश्वप्रसाद तिवारी जी से बिना मिले भी आपके संस्मरण के माध्यम से उनको जानना कठिन नहीं रहा। बल्कि जितना आपके इस संस्मरण के माध्यम से उन्हें जान पाए, उतना उनसे मिलकर नहीं जान पाते।
आपके संस्मरण को पढ़कर एक बात तो महसूस हुई कि कुछ लोग ऐसे रहते हैं जिन पर बाहरी आबोहवा का कोई असर नहीं होता। वे अपने परिवेश से, परिवार से,संस्कार शिक्षा व ज्ञान से जो अच्छा, श्रेष्ठ व सकारात्मक एक बार सीख लेते हैं, वह उनके अंदर इतनी गहराई से बैठ जाता है जिसमें परिवर्तन की कोई गुंजाइश नहीं रहती। दरअसल ऐसे ही लोग अच्छे और बुरे के अंतर को बेहतर पहचान पाते हैं और यह बात दृढ़ रहती है कि जो अच्छा है वह हर हाल में अच्छा है ।किसी को देखकर, सुनकर या समय को देखकर ,अपना जो अच्छा है उसको हमें नहीं छोड़ना है। अपने संस्कारों को भूलते नहीं। ऐसे लोग बहुत सहृदय और संवेदनशील होते हैं उनकी अपनी अपेक्षाएँ ज्यादा नहीं होतीं और ना ही वह दूसरों से कोई अपेक्षाएँ करते हैं। ऐसे लोग अपने स्वभाव और अपने कर्म दोनों के प्रति ही बहुत दृढ़ होते हैं। जो सरल हृदय होते हैं वह बहुत सहजता से किसी से भी जुड़ जाते हैं। कहानियों पर लंबे लेख के लिये आपने जो परिश्रम किया वह काबिले तारीफ है सर! हम कल्पना नहीं कर सकते के लिखने के लिये कोई -कोई (हम जानते हैं कि सब नहीं कर सकते) लेखक इतनी अधिक मेहनत करते हैं। अगर हम लिखने की बात सोचें तो शायद हम अपने आपको पहली कक्षा में ही पाएँगे। निश्चित ही तिवारी जी के प्रति हमारी श्रद्धा इस बात से और बढ़ी कि वे एक अच्छे संपादक हैं।आजकल अच्छे संपादक देखने से भी नहीं मिलते। महावीर प्रसाद द्विवेदी की आत्मकथा को पढ़ते हुए वे हमारे लिए एक बेहतरीन संपादक की छवि रखते हैं। आज आपके संस्मरण को पढ़ने के बाद लगा कि ऐसे लोग समुद्र में मोती की तरह ढूँढने से नजर आ ही जाते हैं।
ज्ञान जी का नाम बहुत सुना है और ‘पहल’ से भी परिचित हैं। पर आपके साथ हुए हादसे को पढ़कर दुख हुआ। हालांकि हमारा उनसे कोई परिचय नहीं है और ना ही हम उन्हें ज्यादा जानते हैं। नाम बहुत सुना है। आप काम सौंपें भी और मेहनत करने के बाद उसे नकार दें यह तो वाकई तकलीफदेह और हताश कर देने जैसी बात है। इंसान निराश होकर नकारात्मकता में डूब सकता है। जबकि आपने उसके लिए भारी मेहनत की हो। सौ- डेढ़ सौ कहानी संग्रह को पढ़ना और उससे चयन करके अपना श्रेष्ठतम लिखना यह सरल नहीं है। यहाँ तिवारी जी की सकारात्मक सोच नजर आती है। जो श्रेष्ठ है वह पाठक के सामने आना ही चाहिये। निश्चित रूप से यह संपादक की दृढ़ता की मिसाल थी कि उन्होंने उसे भले ही दो भागों में, लेकिन आपका लेख छापा। किसी अन्य को प्रसन्न करने के लिये या सिर्फ इसलिए कि कोई खास नाराज ना हो जाए, सच्चाई से नहीं फिरना चाहिये। तिवारी जी के व्यक्तित्व को प्रणाम पत्रिका चाहे कोई सी भी हो लेकिन वही अच्छी है जो लेखकों की पत्रिका हो, संपादक की नहीं। आपके लेख के लिये जिस तरह तिवारी जी ने आपको आश्वस्त किया वह काबिले तारीफ है किसी संपादक से इस तरह का आश्वासन मिलना बहुत बहुत बड़ी बात है कि,” आपने जैसा लिखा है, बिल्कुल वैसा का वैसा बिना काट- छाँट के छप जाएगा।”
इंटरव्यू के माध्यम से तिवारी जी के गाँव से शहर की ओर तथा किसानी से अध्यापन की ओर का इतिहास और सलीके से पता चला ।
कुछ लोगों का ऐसा स्वभाव या कहें बौद्धिक क्षमता रहती है कि जो भी एक बार देखते हैं, सुनते हैं, या पढ़ते हैं, वह उन्हें एक बार में ही याद हो जाता है। और किसी-किसी की कोशिश भी रहती है कि जो कुछ पढ़ा जा रहा है वह एक ही बार में समझ लिया जाए। इस मामले में वे गंभीर रहते हैं ।
संवेदनशीलता और सह्रदयता की यह विशेषता होती है कि वह वेदना, पीड़ा या दुख, फिर चाहे वह किसी की भी क्यों ना हो; बहुत जल्दी द्रवित हो जाती है। अपने दुख से तो सभी दुखी होते हैं लेकिन एक सहृदय लेखक हर पीड़ा से अपने को जुड़ा महसूस करता है। यह मानवीय गुण का प्रतीक है। वरना अपने लिए तो सभी जीते हैं और अपने लिए ही सोचते हैं। सारी दुनिया ऐसे लोगों से ही भरी पड़ी है।
तिवारी जी की इस बात से तो हम भी सहमत हैं कि जब कोई इंसान अत्याचार का विरोध करने के लिए शस्त्र उठाने में असमर्थ हो तो फिर वह कलम को ही शस्त्र बनाकर अपने विरोध को दर्शाता है।
माँ के बारे में तिवारी जी ने जो भी कहा वह हिस्सा बड़ा ही मार्मिक लगा।
हम सोचते हैं कि समझदारी और शिक्षा दोनों अलग-अलग चीज हैं। यह जरूरी है कि शिक्षा से समझदारी विकसित होती है और प्रखर भी। अपने बचपन में नंदन में हमने घनश्याम दास बिरला जी का एक प्रसंग पढ़ा था ।ऐसा याद आ रहा है कि वह भी बहुत पढ़े-लिखे नहीं थे लेकिन फिर भी देखिये कि उनका नाम किताबों में तब भी था और संस्मरण भी थे जो दूसरों के लिए प्रेरणा थे।
बाबा के प्रसंग ने भी द्रवित किया।
एक बात जेहन ठहर गई बाबा की कि,”सोने की कुदारी से खेत नाही कोड़ल जाला।”मतलब सोने की कुदारी से खेत की गुड़ाई नहीं की जाती तिवारी जी के मामले में उनके बाबा यही सोचते थे कि वह खेती के लिए नहीं बने। तिवारी जी के यात्रा वर्णन के बारे में जिस तरह से आपने लिखा है उसे पढ़ते हुए काका कालेलकर की *दक्षिण गंगा गोदावरी* का यात्रा वृतांत याद आ गया। बेहद खूबसूरत था। विधा चाहे जो भी हो लेखन की प्रभावशीलता ही उसे श्रेष्ठ बनती है।
आपने “एक नाव के यात्री” पुस्तक की चर्चा की है। संभव हुआ तो हम उसे पढ़ना चाहेंगे।
राजेंद्र यादव जी और नामवर जी के बारे में आपका लिखा पढ़कर थोड़ा आश्चर्य हुआ। मन्नू भंडारी हमारी प्रिय कहानीकारों में से हैं। एक लंबे समय तक हम इस संशय में रहे कि मन्नू भंडारी मेल है कि फीमेल। तब मोबाइल का जमाना नहीं था।
पता नहीं लोग दोहरा चरित क्यों रखते हैं वह भी शीर्ष पर बैठकर।
बहुत अर्थपूर्ण कविता है ” सड़क पर चलता है एक लंबा आदमी” आपके लेखन में वह ताकत है कि आप जिसके बारे में लिखें उसे अमर कर दें। वह बात अलग है कि ऐसे लोगों को ढूँढने में आपकी नजर, सोच, दिल, दिमाग; सभी कुछ बहुत परिपक्व है और कलम की ताकत तो महसूस होती है। इस बेहतरीन संस्मरण के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया आपका ।आदरणीय तिवारी जी को हमारा सादर चरण स्पर्श। आपको और आपकी कलम को ,दोनों को ही सादर प्रणाम प्रस्तुति के लिए तेजेंद्र जी का तहेदिल से शुक्रिया और पुरवाई का आभार तो बनता ही है।
विश्वनाथ प्रसाद तिवारी जी पर प्रकाश मनु जी का संस्मरण अच्छा लगा। उन्होंने तिवारी जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर पूरी ईमानदारी से लिखा है। उनके सादा जीवन को देखने का अवसर मुझे दो बार मिला है। एक बार अपनी उरई में और दूसरी बार झांसी में। वे कठिन से कठिन माहौल को हल्का-फुल्का बनाने में सिद्धहस्त हैं। झांसी के एक वाकये की बात करना चाहूंगा। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय झांसी में माननीय कुलपति महोदय सुरेन्द्र दुबे जी ने एक कार्यक्रम रखवाया था। बहुत से साहित्यकारों के साथ तिवारी जी, कथा लेखिका मैत्रेई पुष्पा जी तथा अन्य बड़े साहित्यकार शामिल थे। तिवारी जी उस समय साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष थे। स्वाभाविक है कि उस कार्यक्रम में लिखित रूप में तो वे विशिष्ट थे ही, कुछ लोगों के लिए अध्यक्ष के रूप में विशिष्ट दिख रहे थे, कुछ लोगों के लिए वे साहित्यकार और संपादक के रूप में विशिष्ट थे। बड़े हाल में कार्यक्रम चल रहा था। मैत्रेयी पुष्पा जी ने बोलना शुरू किया। बोलते बोलते वे अपने उपन्यास इदन्नमम पर आ गई। उन्होंने वहीं बैठे एक साहित्यकार का नाम लेकर बोली कि इस उपन्यास पर साहित्य अकादेमी पुरस्कार इन्होंने नहीं मिलने दिया। वे साहित्यकार सामने बैठे कुर्सी से उठकर बोलने को हुए तो मैत्रेयी जी ने कहा, आप बैठ जाइए । इसका मेरे पास सबूत है। आपने बाकायदा चिट्ठी लिखी थी। वे शख्स तनफनाते हुए बैठ गए। जब बारी तिवारी जी के बोलने की आई तो उन्होंने इस बात को इस अंदाज में व्यक्त किया कि हर व्यक्ति उनकी प्रशंसा करने लगा। वे बोले कि रचनाकार पुरस्कारों से बड़ा नहीं बनता है , वह अपने लेखन से बड़ा होता है, अपने कर्म से बड़ा होता है। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी जी को नोबेल पुरस्कार नहीं मिला। आज दुनिया सिर्फ महात्मा गांधी जी को जानती है। और जिनको नोबेल पुरस्कार मिले हैं उनके नाम कितने लोगों को पता है? उनका यह वक्तव्य ताजिंदगी नहीं भूल सकता हूं मैं।