मैं अपने चैम्बर में होता हूँ तो कम्प्यूटर की स्क्रीन पर ही नज़रें जमाए होता हूँ। आजकल मेरा सारा काम कम्प्यूटर पर ही होता है। मेरा क्या आजकल अधिकांश लोगों के काम करने का मतलब होता है कम्प्यूटर पर काम करना। मेरा ऑफ़िस ऐसा है कि उसमें किसी को भी मिलने आने के लिए मुझ तक एकदम पहुँचना ज़रा मुश्किल है। उसे दो अलग-अलग स्तर पार कर के मुझ तक पहुँचना होता है। पहले स्तर पर बैठा हुआ लड़का मेरे सारे परिचितों, मित्रों तथा रिश्तेदारों को पहचानता है। यदि उनमें से कोई आता है तो वह बहुत अदब के साथ उनको साथ लेकर मेरे चैम्बर तक आता है। यदि कोई अपरिचित आता है तो वह लड़का दूसरे स्तर पर बैठे हुए लड़के से संपर्क करता है, और फिर मुझ तक सूचना आती है कि कोई मिलने आया है। मैं अपने चैम्बर में लगे मॉनीटर पर सीसीटीवी कैमरे के द्वारा आने वाले को देखता हूँ और तय करता हूँ कि आने वाले से मुझे मिलना है अथवा नहीं। यह एक प्रक्रिया है जो कई वर्षों से इसी प्रकार चल रही है। असल में ऑफ़िस आने के बाद मेरे पास लगभग आठ या नौ कार्य-घण्टे होते हैं, और काम भी लगभग इतने ही कार्य-घण्टों में पूरे होने वाले होते हैं। यदि मैं किसी के साथ बिना काम के घण्टे-डेढ़ घण्टे यूँ ही बेकार कर दूँ, तो मुझे कुछ कामों को कल तक लंबित करना पड़ेगा। इसीलिए मैंने यह व्यवस्था बना रखी है। इस व्यवस्था में एक गली और यह भी निकाल रखी है कि यदि कोई बाहर वाले लड़के के लिए अपरिचित आता है, जो अपने परिचय में मेरे साथ उसके रिश्ते, मतलब- चाचा-चाची, बुआ-फूफा, मामा-मामी, मौसा-मौसी आदि… आदि… आदि… बताता है, तो उसे भी पहले स्तर वाला लड़का पूरे सम्मान के साथ मुझ तक ले आता है। इस पूरी व्यवस्था का पालन पहले स्तर तथा दूसरे स्तर पर पूरी कड़ाई से किया जाता है, कड़ाई से इसलिए कि यदि कोई भी चूक होती है, तो दोनों ही स्तरों को मुझसे डाँट खानी पड़ती है।
मैं अपने चैम्बर में बैठ कर काम करते समय सीसी टीवी के मॉनीटर पर बीच-बीच में नज़रें डालता रहता हूँ। काम के बीच मैंने मॉनीटर की तरफ़ देखा तो वहाँ पहले स्तर के लड़के के पास कोई आदमी खड़ा हुआ दिखाई दिया। नाटा-सा आदमी। जो पहले स्तर पर बैठे हुए लड़के से बात कर रहा है। मैं काम छोड़ कर मॉनीटर पर ही देखने लगा। कुछ ही देर में मैंने देखा कि लड़का उस नाटे आदमी को लेकर मेरे चैम्बर की तरफ़ आ रहा है। पहले स्तर से मेरे चैम्बर तक आने में आधे मिनट का समय लगता है, मैंने उतने समय में अपनी टेबल ठीक की, पास रखे रूम फ्रेशनर को चैम्बर में स्प्रे किया और कम्प्यूटर की स्क्रीन पर इस प्रकार नज़रें जमा कर बैठ गया जैसे बहुत गंभीर कार्य में व्यस्त हूँ। यह मेरी एक अदा है, कि मैं आने वाले को आते ही यह एहसास दिलाना चाहता हूँ कि मैं बहुत ज़रूरी कार्य में व्यस्त हूँ, इसलिए आप जिस काम से आये हैं, वह जल्दी पूरा कर मुझे मुक्त करें। कई बार तो मैं आने वाले की तरफ़ देखने में भी कुछ सैकेंड की देरी करता हूँ। मेरे कम्प्यूटर की स्क्रीन मेरी टेबल की बायीं तरफ़ है और मेरे चैम्बर में प्रवेश का दरवाज़ा टेबल की दायीं तरफ़ है, इसलिए मैं कुछ देरी से देखने का यह कार्य बिना किसी शको-सुबह के आसानी से कर लेता हूँ। जब साथ आया लड़का मुझे पुकारता है- ‘सर…!’, तब मैं कुछ चिढ़ते हुए उस तरफ़ देखता हूँ, और लड़के के साथ आये व्यक्ति को देखकर अचानक चेहरे पर से चिढ़ के भाव हटाते हुए विनम्रता और स्वागत के भाव ले आता हूँ। आने वाला व्यक्ति यदि बहुत ज़्यादा ख़ास हो तो अपनी कुर्सी से उठ कर भी खड़ा हो जाता हूँ। मुझे अच्छे से पता है मिलने आने वालों में से कौन मेरे काम का है और कौन नहीं है, मेरी विनम्रता और मेरे चेहरे के भाव भी उसी हिसाब से कम या ज़्यादा होते रहते हैं। बात वही है कि आठ-नौ कार्य-घण्टों में व्यवधान नहीं आये।
मुझे चैम्बर का दरवाज़ा खुलने की आवाज़ सुनाई दे गयी, मगर मैं कम्प्यूटर की स्क्रीन पर ही डूबा रहा। असल में मैं उस नाटे आदमी को सीसी टीवी के मॉनीटर पर देख कर पहचान नहीं पाया था कि यह कौन है। ‘सर…!’ लड़के की आवाज़ पर मैंने उस तरफ़ मुड़ कर देखा, नाटा आदमी बहुत आत्मीयता से मुस्कुरा रहा है। मुझे देखते ही उसके चेहरे की मुस्कुराहट एकदम बढ़ गयी। मैंने भी अपने चेहरे पर मुस्कुराहट लाने की कोशिश की। कोशिश इसलिए कि उस नाटे आदमी के चेहरे में मुझे कहीं कोई पहचान की झलक तो मिल रही है, मगर मुझे याद नहीं आ रहा कि यह है कौन। जब तक पहचान नहीं लूँ, तब तक तो अच्छा व्यवहार करना ही होगा। मैंने कुछ आत्मीयता के स्वर में कहा ‘आइए… आइए…’, अगर लड़का इस अपरिचित नाटे आदमी को लेकर आया है तो यह निश्चित ही कोई रिश्तेदार है, मगर मैं पहचान नहीं पा रहा हूँ इसको। मैंने नमस्कार की मुद्रा में पहले हाथ जोड़े और फिर अपने सामने रखे सोफ़े पर बैठने का इशारा किया। मेरे इशारे पर वह नाटा आदमी सोफ़े पर बैठ गया। मैंने अपने चेहरे पर आत्मीयता के भाव बनाए रखे और उस नाटे आदमी को पहचानने की फिर से एक कोशिश की। आधे बाँह की सफ़ेद शर्ट, जिस पर नीले रंग के चौखाने हैं, नीले रंग की पैण्ट, जिसमें शर्ट को इन किया हुआ है। कमर में एक घिसा हुआ सा बैल्ट बँधा है। पैरों में घिसे हुए फॉर्मल जूते। नीचे से अवलोकन करते हुए मैं चेहरे पर आया। घुँघराले, मेहँदी या इसी रंग की डाई से रँगे हुए बाल, मिचमिची सी आँखें, जिनके आस-पास ख़ूब लकीरें हैं और उन पर मोटे फ्रेम वाला मोटे लैंस का चश्मा चढ़ा है। कुछ कम घनी मूँछें जो काली डाई से रँगी हुई हैं। रंग अच्छा-ख़ासा गोरा। चेहरे को देखने के क्रम में मुझे एक बार फिर यह लगा कि चेहरा तो देखा हुआ है, मगर कब….? कहाँ…? कुछ याद नहीं आ रहा है।
‘और भाई गुड्डू कैसे हैं, हे हे हे हे हे ?’, गुड्डू…? यह तो मेरा घर का नाम है, इस नाम से तो मेरे रिश्तेदार ही बुलाते हैं। इसका मतलब यह तो तय हो गया है कि यह मेरा कोई रिश्तेदार है। लड़के को भी इसने बताया ही होगा कि यह मेरा रिश्ते में क्या लगता है, तभी तो लड़का इसे बाअदब यहाँ लेकर आया है। मगर अब यह तो उस लड़के को या फिर इस नाटे आदमी को ही पता है कि यह मेरा क्या लगता है।
‘जी… बस ठीक हूँ… आप कैसे हैं ?’ मैंने उत्तर भी दिया और प्रश्न भी किया।
‘बस… ठीक ही हैं… हे हे हे हे हे… आपको तो पता चल ही गया होगा कि रिटायर हो गया हूँ। यहाँ से ट्रांस्फ़र होने के बाद यहाँ जयंती कॉलोनी वाला डुप्लेक्स थ्री बीएचके मकान किराये पर उठा दिया था, फिर राजधानी में ही अरेरा कॉलोनी में फोर बीएचके डुप्लेक्स बना लिया था। बस रिटायरमेंट के बाद वहीं रह रहे हैं दोनों प्राणी। बच्चों का तो आपको पता ही है कि बेटी यूके में और बेटा यूएस में सैटल है। हे हे हे हे हे।’ नाटे आदमी ने इस तरह से कहा जैसे मैं ये सारी बातें जानता ही हूँ।
मैंने याद करने की कोशिश की कि मेरे किन रिश्तेदारों के बच्चे यूके या यूएस में सैटल हैं और जो अब राजधानी में रह रहे हैं, मगर कभी मेरे ही शहर में रह चुके हैं। मगर मुझे बहुत याद करने पर भी याद नहीं आया। बच्चे तो अधिकांश के अब कहीं न कहीं विदेश में ही सैटल हैं, अधिकांश रिश्तेदार भी राजधानी में ही सैटल हैं। उनमें से यह नाटा आदमी कौन है। बात तो इस प्रकार कर रहा है जैसे बहुत क़रीबी रिश्तेदार है। मेरे शहर में जयंती कॉलोनी में मकान है, जो अच्छी कॉलोनी है। उस पर अरेरा कॉलोनी राजधानी की सबसे पॉश कॉलोनी है, वहाँ भी इसने मकान बनवाया है, बच्चों को भी विदेश में सैटल कर दिया है, मतलब आर्थिक रूप से समृद्ध पार्टी है यह। यह एक ऐसा पक्ष है जिसे जानने के बाद मैं आने वाले व्यक्ति के प्रति हमेशा कुछ नरम हो जाता हूँ। आर्थिक रूप से समृद्ध रिश्तेदार सभी को पसंद आते हैं, मैं कोई अनोखा तो नहीं हूँ। मैं इसके लिए चाय, कॉफ़ी, या फिर नाश्ता भी बुलवा लूँगा, बस इस व्यक्ति का नाम और मेरे साथ इसका क्या रिश्ता है, यह इतना पता चल जाये, ताकि मुझे पता चले कि चाय में टरकाना है या इसे कॉफ़ी पिलवाने के साथ-साथ नाश्ता भी करवाना है।
‘जी मुझे पता है… और कैसी चल रही है रिटायरमेंट के बाद दूसरी पारी…?’ मैंने अपनी तरफ़ से झूठ बोलते हुए बहुत अपनेपन से प्रश्न किया। उनकी पत्नी के बारे में पूछते-पूछते रुक गया, कि पूछूँ तो संबोधन क्या दूँ, मामी, मौसी, बुआ, चाची या भाभी…?
‘अरे काहे की दूसरी पारी भाई गुड्डू… बस सरकारी नौकरी छूटी तो बीमारियों ने धर लिया… हे हे हे हे हे… बीपी, शुगर, थायराइड सब एक के बाद एक आ गये। पिछले साल हार्ट की एंजियोप्लास्टी हुई और दो स्टेंट भी डल गये… हे हे हे हे हे।’ उसने बीमारी की बातों को भी हँसते हुए ही बताया।
मैंने महसूस किया कि वह अपनी हँसी- ‘हे हे हे हे हे’ को तकिया-कलाम की तरह उपयोग कर रहा है। बात सुख की हो या दुख की, सबका अंत यंत्रवत हँसी से ही कर रहा है। हार्ट में स्टेंट डल गये के बाद भी हे हे हे हे हे। क्रमबद्ध तरीक़े से पाँच बार ‘हे हे हे हे हे’, जिसमें अंतिम ‘हे’ पर कुछ अधिक ज़ोर दे रहा है। एक और बात यह भी समझ में आयी कि उसकी हँसी में ‘हे’ पर अनुस्वार नहीं है, मतलब ‘हें’ नहीं है। हँसते समय उसका चेहरा तो हँसता है, मगर आँखें इस हँसी में साथ नहीं देती हैं, बस मिचमिचाती रहती हैं। आँखें मिचमिचाना भी शायद इसका तकिया कलाम है, जब आँखें मिचमिचाता है तो अपना एक कंधा भी धीरे से उचका देता है। सब कुछ जैसे यंत्रवत होता है। ‘हे हे हे हे हे’ उसके बाद आँखें मिचमिचाना और उसके तुरंत बाद कंधे का उचकना।
‘ओह… अब तो ठीक हैं न आप ?’ मैंने उसके हार्ट में स्टेंट डलने की सूचना पर तदनुसार ही अपनी प्रतिक्रिया प्रदान की।
‘हे हे हे हे हे… कुछ न कुछ तो लगा ही रहता है अब… अच्छा हुआ सारी ज़िम्मेदारियाँ समय से पूरी कर दीं। बच्चों की शादी, नौकरी सब हो गयी… अब करना भी क्या है…. हे हे हे हे हे।’ इस बार उस नाटे आदमी ने अपने तकिया-कलाम को किसी संपुट की तरह बात के दोनों तरफ़ लगाया।
मैं अभी भी कोशिश कर रहा हूँ कि जो जान-पहचान के कुछ धुँधले से सूत्र इस नाटे आदमी के चेहरे में दिखाई दे रहे हैं, उनको पकड़ कर किसी स्थापना तक पहुँच सकूँ। उसका चेहरा मुझे कुछ सूत्र तो दे रहा है मगर वे सूत्र बहुत धुँधले हैं। एक और बात मैंने नोटिस की है, कि वह बात करते समय मेरी तरफ़ नहीं देखता है, मेरी टेबल पर पर रखे पैन-स्टैंड, पेपरवेट या और कुछ नहीं तो मेरी शर्ट की तरफ़ ही देख कर बात करता है, जैसे मुझसे बात नहीं करके उन वस्तुओं से ही बात कर रहा है वह। वह कुछ देर को चुप हो गया है और मैं ग़ौर से उसे देख कर उसे पहचानने का एक और प्रयास कर रहा हूँ।
‘हे हे हे हे हे…’ वह आदमी अचानक बिना किसी कारण के हँस दिया। मैं कुछ चौंक गया। मुझे लगा कि वह मुझे अपनी तरफ़ देखता पाकर इस तरह अचानक हँसा है, लेकिन वह मुझे देख कर नहीं हँसा है, वह यूँ ही हवा में देखते हुए हँसा है।
‘बाक़ी घर में सब ठीक…?’ मैंने प्रश्न इस प्रत्याशा में किया कि शायद इस प्रश्न के उत्तर में कोई सूत्र मिल जाये इसको पहचानने का।
‘ठीक ही हैं… मेरा तो आप जान ही चुके हैं… पत्नी का भी कुछ न कुछ लगा ही रहता है, हे हे हे हे हे। पहले पड़ोस का सहारा था, पर आपको तो पता ही है, वे लोग भी कभी कैनेडा कभी जर्मनी घूमते रहते हैं… कभी बेटे के पास तो कभी बेटी के पास। घर में तो टिकते ही नहीं हैं। हे हे हे हे हे।’ मेरा प्रश्न व्यर्थ हो गया। मुझे लग रहा था कि यह उत्तर में अपनी पत्नी को लेकर कुछ ऐसा कहेगा- आपकी मौसीजी, आपकी बुआजी… आपकी चाचीजी… तो कम से कम मुझे इसके और मेरे बीच के रिश्ते का तो पता चल ही जाता। मगर इसने एक तो ‘पत्नी’ कह कर मेरा प्रयास व्यर्थ कर दिया, उस पर ‘वे लोग’ का नया फुसंदा फोड़ दिया है। कोई तो मेरे नज़दीक के रिश्तेदार हैं, जो इसके घर के पास ही रहते हैं, जो कैनेडा और जर्मनी अपने बच्चों के पास आते-जाते रहते हैं। मुझे अब इससे चिढ़ हो रही है। एक तो मैं इसे पहचान नहीं पा रहा हूँ, उस पर यह मेरा समय भी नष्ट कर रहा है और पहचान के ठीक-ठाक सूत्र भी नहीं दे रहा है। लेकिन इसके अनुसार मैं इसका बहुत नज़दीक का रिश्तेदार हूँ, इसीलिए यह बातचीत उसी तरह से कर रहा है। मेरी स्थिति धीरे-धीरे बहुत विचित्र होती जा रही है, पहले तो इसको ही पहचानने का प्रयास करना था, अब ‘वे लोग’ कौन हैं, यह भी जानना है। इसको अगर पहचान गया और ‘वे लोग’ कौन हैं नहीं जान पाया तो कई दिन इसी तनाव में गुज़रेंगे कि आख़िर किन ‘वे लोग’ की बात कर रहा था यह।
‘अरे तो आप भी चले जाया कीजिए न अपने बच्चों के पास। क्यों यहाँ अकेले रहते हैं दोनों जन। दुनिया घूमिए अब। रिटायरमेंट तो होता ही इसी के लिए है। सरकार पैंशन किस बात की देती है, इसीकी तो देती है कि दोनों पति-पत्नी घूमो-फिरो अब ख़ूब।’ मेरी आवाज़ में पहले वाली सहजता अब नहीं है। मैंने उस नाटे आदमी के ठीक सिर के ऊपर दीवार पर लगे हुए सीसी टीवी के मॉनीटर पर देखते हुए कहा। मुझे अपने सिर के ऊपर देखते हुए देख कर उसने भी सिर को ऊपर की तरफ़ घुमाते हुए देखा। सिर पर मॉनीटर को लगे हुए देख कर उसके चेहरे की रंगत थोड़ी बदल गयी। उसके चेहरे पर भय के भाव आ गये। वह तेज़ी के साथ सोफ़े से उठा और मेरी दायीं तरफ़ रखी हुई कुर्सी पर आकर बैठ गया। दायीं तरफ़ दो कुर्सियाँ मैंने अति-विशिष्ट लोगों के लिए रखी हुई हैं, जो मेरी कुर्सी के ठीक समानांतर ही हैं। जिनको मुझे अतिरिक्त सम्मान देना होता है उनको मैं अपनी बराबरी पर रखी इन कुर्सियों पर बिठाता हूँ। ज़ाहिर-सी बात है कि उसका उस कुर्सी पर आकर बैठ जाना मेरे मन को गवारा नहीं हुआ। मेरी सहमति के बिना ही उसने अपने आप को अति-विशिष्ट बना लिया। कुर्सी पर बैठते ही उसके चेहरे के भाव थोड़े सामान्य तो हुए मगर उसकी साँसें अभी भी तेज़-तेज़ चल रही हैं, लग रहा है जैसे उसे कोई दौरा पड़ा हो।
‘क्या हुआ…? तबीयत तो ठीक है न आपकी ?’ मैंने उसकी स्थिति देखी तो तुरंत प्रश्न किया।
‘मैं बिना ऊपर देखे ही बैठ गया था… ऊपर टीवी लगा है दीवार पर… अगर कहीं गिर जाता तो सीधे मेरे सिर पर ही गिरता… सिर की चोट इस उम्र में बहुत ख़राब होती है। ब्रेन हेमरेज हो जाये तो आदमी न ज़िंदा में रहता है, न मरे में। मेरे फूफाजी स्कूटर से गिर गये थे, एक महीने तक अस्पताल में रहे, बैंक-बेलेंस जब समाप्त हो गया तो अस्पताल से निकल कर सीधे श्मशान चले गये। हे हे हे हे हे।’ बात समाप्त होते-होते ही वह इतना सामान्य हो गया कि उसका तकिया-कलाम वापस आ गया।
उसकी इस बात ने मुझे चौंका दिया- यह तो गहरे अवसाद में है, इसे तो किसी मनोचिकित्सक की आवश्यकता है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि इसके और मेरे बीच कोई रिश्ता ही नहीं है, यह बस अवसाद में डूबा हुआ कोई आदमी है, जो मुझे अपना रिश्तेदार समझ कर यहाँ मेरे पास आ गया है। मेरा एक दोस्त भी ऐसा ही था, वह पेड़ के नीचे नहीं खड़ा होता था कि पेड़ गिर न जाये, वह सड़क पर लगे बिजली के तारों के नीचे से नहीं निकलता था कि कहीं तार उस पर टूट कर गिर न जायें। बाद में पता चला था कि वह बहुत गहरे अवसाद में था। बरसों-बरस उसका इलाज चला, मगर अभी भी वह पूरी तरह ठीक नहीं हो पाया है।
‘ऐसे कैसे गिर जायेगा, अच्छे से फिट किया गया है उसे दीवार पर। क्लैम्प लगा कर कसा गया है, गिर ही नहीं सकता।’ मैं अब कुछ चिड़चिड़ा रहा हूँ उसको लेकर। मैंने अपनी बात को कुछ रोष तथा कुछ रुखाई के साथ कहा। मगर मैंने देखा कि मेरी आवाज़ के भावों का उस पर कोई असर नहीं पड़ा है। कोई दूसरा होता तो शायद बुरा मान जाता।
‘अरे नहीं, आप नहीं जानते… जब भूकम्प आता है न तो ये क्लैम्प-व्लैम्प कुछ काम नहीं करते। ज़रा ज़मीन थरथरायी और ये उखड़े दीवार से। और भूकम्प का भी कोई तय थोड़े ही कि कब आ जाये। हे हे हे हे हे।’ उसने अपनी आदत अनुसार बात को समाप्त कर आँखें मिचमिचाईं और फिर एक कंधा धीरे से उचकाया।
मेरी स्थिति धीरे-धीरे बहुत विचित्र होती जा रही है, मेरे प्रश्न भी समाप्त होते जा रहे हैं। कहाँ से कोई सूत्र तलाश करूँ इसके और अपने बीच के रिश्ते को पकड़ने के लिए। और अब तो यह नई चिंता मुझे सता रही है कि यह कोई मनोरोगी तो नहीं, जो स्वयं को मेरा रिश्तेदार बता कर यहाँ आ गया है।
‘आप अपने बच्चों के पास क्यों नहीं चले जाते घूमने…?’ मुझे याद आया कि मेरा यह प्रश्न सिर पर टीवी गिरने के चक्कर में व्यर्थ हो गया था, मैंने प्रश्न को एक बार फिर उसके सामने रख दिया।
‘जाते हैं न… बीच-बीच में जाते रहते हैं। बड़े बेटे के यहाँ बेटी हुई थी, तब उसने पहले से टिकट भेज दी थीं, तब सात-आठ महीने रुक कर आये थे अमेरिका में। फिर बेटी के यहाँ जुड़वाँ बच्चे हुए तब उसने बुलवा लिया था। तब तो साल भर रुकना पड़ा था। बच्चे तो बुलाते रहते हैं, मगर हमारा ही वहाँ मन नहीं लगता… अपना घर फिर अपना घर है… हे हे हे हे हे…।’ उसने मेरे प्रश्न पर लंबा सा उत्तर दिया और अपने पिछले सालों का पूरा ट्रेवल प्लान मेरे सामने रख दिया। मेरे अंदर अब क्रोध का बगूला उठने लगा है। यहाँ तो मैं इसको पहचानने की कोशिश में लगा हूँ और वहाँ यह मुझे सात समंदर पार की सैर के क़िस्से सुनाने में लगा है।
‘वह तो आप लोग नैनी बन कर बच्चे पालने जाते हैं। वहाँ उन देशों में वर्कर बहुत महँगे मिलते हैं, इसलिए विदेश में रह रहे बच्चे, अपने यहाँ बच्चे होने पर माँ-बाप को नैनी बना कर साल-छह महीने के लिए बुला लेते हैं। उनका भी काम हो जाता है और चार रिश्तेदारों के बीच माँ-बाप का भी सिर ऊँचा हो जाता है, कि अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, कैनेडा घूम कर आये हैं, बच्चों ने इतना पैसा ख़र्च कर के बुलवाया था। अब यह बात किसी को थोड़े ही पता है कि माँ-बाप का टिकट जितने का आया उससे दस गुना बच्चों की नैनी पर ख़र्च हो जाना था।’ मैं अब अपने आपे से बाहर हो रहा हूँ। एक तो पहचान नहीं पा रहा हूँ इसे, उस पर यह भी उल्टी-सीधी सूचनाएँ देकर मेरी उलझन को और बढ़ा रहा है। मैंने चिढ़ में ही उसकी बात के जवाब में थोड़ी कड़वी बात कह दी। असल में यह मेरे अंदर की एक ग्रंथि है, मेरे कई रिश्तेदारों, परिचितों के बच्चे दूसरे देशों में हैं, अक्सर वे लोग शान दिखाते हुए विदेश जाते हैं। मुझे पता है कि वे अपने बच्चों के बच्चे पालने जा रहे हैं, पर यह बात उनसे कह नहीं पाता, आज अवसर मिल गया मुझे अपने अंदर की भड़ास निकालने का तो मैंने इस नाटे आदमी पर निकाल दी।
‘हे हे हे हे हे…’ मेरी इतनी कड़वी बात के उत्तर में भी उसकी हँसी सामने आयी। उसके चेहरे पर मेरी बात का बुरा लगने के फिर कोई चिह्न नहीं हैं।
‘दो दिन से गर्मी भी बहुत बढ़ गयी है… अब तो बरसात हो ही जानी चाहिए। इस बार तो नौतपा भी ऐसे तप रहा है जैसे सूरज बिलकुल सवा नेज़े पर आ ही गया हो। घर से बाहर निकलना भी मुश्किल हो गया है। हे हे हे हे हे।’ उसने टेबल पर रखे मेरे चश्मे से की तरफ़ देखते हुए कहा। वह पैंतरा बदल कर बातचीत के सबसे कॉमन विषय ‘मौसम’ पर आ गया है। मुझे यह बहुत शातिर आदमी लग रहा है अब, जिस काम से आया है, वह नहीं बता रहा है, बाक़ी सब जगह गोल-गोल घुमा रहा है मुझे। मैंने भी उसकी मौसम की जानकारी की बात को आगे बढ़ाने की बजाय उसकी बात का कोई उत्तर नहीं देकर मौसम पर पूर्णविराम लगा दिया।
‘वैसे एक बात तो है, देश अब सही हाथों में आया है। सारा काम एकदम ईमानदारी से चल रहा है। पहले तो बिना रिश्वत खिलाए आप अपना कोई काम करवा ही नहीं सकते थे। अब लग रहा है कि हाँ देश में सरकार है। काश…! जब हम नौकरी में थे, तब ही ऐसा हो जाता। हे हे हे हे हे।’ उसने मौसम की बात को व्यर्थ जाते देखा तो दूसरा पत्ता फेंका। यह दूसरा पत्ता ऐसा है जिसके ख़ाली जाने की इस समय देश में लगभग नहीं के बराबर गुंजाइश है। इस समय चारों तरफ़ अचानक कुछ ऐसा ही हो गया है। इस प्रकार कि एक सियार अगर ‘हुआँऽऽऽ’ करता है तो सारे उसके स्वर में स्वर मिलाने लगते हैं। मगर उसके दुर्भाग्य से आज उसका यह पत्ता भी ख़ाली जाने वाला है।
‘अच्छा…? तो फिर आप एक मकान वहाँ राजधानी में और एक यहाँ कैसे बनवा पाते ? अपने बच्चों को विदेश कैसे भेज पाते ?’ मैंने इस बार उसकी तरफ़ नहीं देखा है बस कम्प्यूटर स्क्रीन पर देखते हुए ही अपनी बात गोलमोल करके कह दी है।
‘इस बात को तो आप भी मानेंगे कि देश अब ईमानदार हाथों में है। आज़ादी के बाद अगर देश को ऐसे ईमानदार हाथ मिल जाते तो देश की स्थिति आज दूसरी ही होती। भ्रष्टाचार ने बहुत नुकसान किया है देश का। हे हे हे हे हे।’ उसने भी या तो गेंडे की खाल पहनी है या कछुए का खोल, मेरी बातों का उस पर कोई असर ही नहीं हो रहा है। वह अपनी ही कहने में लगा है।
‘अच्छा… आपके हिसाब से अब सच में हमारा देश अच्छे हाथों में है ? अब यहाँ सब कुछ ठीक चल रहा है ?’ मुझे अब इस पर इतना क्रोध आ रहा है कि मैं इसे बेइज़्ज़त करना चाह रहा हूँ।
‘बिलकुल… जब लीडर अच्छा मिल जाता है, तो देश अपने आप अच्छा हो जाता है। हे हे हे हे हे।’ उसने इस बार मेरी शर्ट के बटन की तरफ़ देखते हुए कहा।
‘तो फिर अपने बच्चों को वापस क्यों नहीं बुला लेते यूके और यूएस से ? अब तो देश हो गया है उनके रहने लायक़। बंद करवाइए वहाँ पर उनका डॉलर और पोंड्स पीटना और बुला लीजिए उनको वापस यहाँ।’ मैंने कुछ क्रोध के साथ कहा। मेरी बात का उस पर कोई असर नहीं हुआ।
‘हे हे हे हे हे…!’ कुछ देर की चुप्पी के बाद उसने हवा में देखते हुए कहा।
उसकी हे हे हे हे हे समाप्त होते ही कमरे में कुछ देर को ख़ामोशी छा गयी। इस ख़ामोशी में मेरे अंदर इस चूहे-बिल्ली के खेल को समाप्त करने की उत्कंठा बढ़ रही है। मैं ऐसा ही हूँ। जब मुझे समझ में आ जाता है कि किसी व्यक्ति से मेरा कोई फ़ायदा नहीं होना है, तो मैं धीरे-धीरे क्रूर होने लगता हूँ। इस नाटे से आदमी के साथ चल रही आँख-मिचौली को भी मैं अब समाप्त करना चाह रहा हूँ।
‘राजधानी से यहाँ कैसे आना हुआ आपका ?’ मैंने एकदम सीधा प्रश्न किया। यह नाटा आदमी इतनी देर से भूमिका बाँध रहा है। आया तो मेरे पास किसी काम से ही है। जब आपको अचानक किसी ऐसे व्यक्ति से कोई काम पड़ जाता है, जिसके संपर्क में आप बहुत दिनों से नहीं हैं, तो आप उससे मिल कर बहुत देर तक ऐसी ही भूमिकाएँ बाँधते हैं, रिश्तों की, परिचय की नज़दीकी को स्थापित करने की कोशिश करते हैं, ताकि उसके बाद अपना काम निकलवाया जा सके। यह नाटा आदमी मेरा जो भी रिश्तेदार हो, पर यह आया तो किसी न किसी काम से ही है।
‘हे हे हे हे हे… आप तो जानते ही हैं कि मैंने अपनी पूरी सरकारी सेवा पूरी ईमानदारी से की है। जबकि मैं तो ऐसी जगह बैठा था, जहाँ एक इशारे पर पैसे बरसते हैं। सरकारी अस्पताल में स्टोर-कीपर होना कोई छोटी बात नहीं है, सारी दवाओं की ख़रीद-फ़रोख़्त उसके ही हाथ में होती है। मगर यह बात सारे रिश्तेदार जानते हैं कि मैंने उस पद पर कितनी ईमानदारी से काम किया। मेरे ऊपर के अफ़सर पैसा खाते थे, पर मैं कान से हाथ लगा कर मना कर देता था। हे हे हे हे हे…।’ उसने कुछ विनम्रता के साथ कहा।
एक और सूत्र मिला… यह आदमी जब मेरे शहर में था तो अस्पताल में स्टोर-कीपर के पद पर था। मैंने एक बार फिर अपने दिमाग़ पर ज़ोर डाला कि मेरा कौन सा रिश्तेदार अस्पताल में था। अस्पताल वाले रिश्तेदार सबको याद रहते हैं, सबका तो काम पड़ता है अस्पताल से। अस्पताल, पुलिस-थाना, कोर्ट-कचहरी, बिजली विभाग… ये वे विभाग हैं, जहाँ पदस्थ रिश्तेदारों से सब अच्छे संबंध बना कर रखते हैं। मगर मुझे अभी भी याद नहीं आया कि मेरा कौन सा रिश्तेदार मेरे ही शहर के अस्पताल में स्टोर-कीपर के पद पर था।
‘अगर भ्रष्टाचार करने पर आता तो आज जाने कहाँ होता। हे हे हे हे हे…।’ मुझे चुप देख कर उस नाटे आदमी ने अपनी बात में बात जोड़ी। इस बार उसका हे हे हे हे हे बहुत ज़्यादा विनम्रता में डूबा हुआ है, कि मैं उसकी इस बात की तारीफ़ करूँ या न करूँ वह पहले से ही विनम्र हो गया है, आभार के अंदाज़ में।
और कहाँ पहुँचना चाह रहे हो ? एक मकान यहाँ मेरे शहर में है, एक राजधानी के सबसे पॉश इलाक़े में है, एक बच्चा इंग्लैंड में है, एक अमेरिका में है। इससे आगे कहाँ पहुँचना चाह रहे हो भाई। अस्पताल के स्टोर-कीपर की तनख़्वाह में इतना सब हो जाता है क्या ? मेरे मन में बहुत से प्रश्न घुमड़े, मगर मैं अब इस बात को दूसरी तरफ़ मोड़ कर और समय व्यर्थ नहीं करना चाहता। मैं अगर कुछ भी कहूँगा तो यह आदमी उसे भी कहीं और घुमा कर पहुँचाएगा, इसलिए मैंने कुछ नहीं कहा, बस प्रश्नवाचक निगाहों से उसकी तरफ़ देखता रहा।
‘मेरा यहाँ का जो मकान है, उसका सात-आठ साल का प्रॉपर्टी-टैक्स बक़ाया हो गया है। किरायेदार ने बताया ही नहीं कि नोटिस आ रहे हैं। जब हम लोग यहाँ रहते थे, तब यह मकान नगरपालिका की सीमा में नहीं आता था, इसलिए तब प्रॉपर्टी-टैक्स लगता ही नहीं था। शायद सात-आठ साल पहले उस कॉलोनी को नगरपालिका की सीमा में ले लिया गया। तब से ही प्रॉपर्टी-टैक्स लगने लगा। हमें पता ही नहीं चला और हर साल का टैक्स और फिर उस पर नहीं भरने की पैनल्टी… सब कुछ मिल कर सात-आठ साल में बड़ी रकम हो गयी है। हे हे हे हे हे…।’ मुझे उसके उत्तर से कुछ समझ नहीं आया कि इन सबसे मेरा क्या लेना देना ? मुझे क्यों सुना रहा है यह सब। मैंने प्रत्यक्ष में कुछ नहीं कहा, बस पहले की ही तरह प्रश्नवाचक नज़रों से उसकी तरफ़ देखता रहा।
‘कम होता तो मैं तुरंत ही जमा कर देता, मगर बड़ी रकम है, अब रिटायरमेंट के बाद बहुत सोच-समझ के घर चलाना पड़ता है… तो मैंने सोचा कि… हे हे हे हे हे….।’
क्या सोचा भाई…? मेरे अंदर धीरे-धीरे क्रोध बढ़ रहा है।
‘कितनी बड़ी रकम है ?’ मैंने कुछ ठंडे स्वर में पूछा।
‘हे हे हे हे हे… तीन हज़ार के लगभग हर साल का टैक्स और उस पर दो हज़ार के लगभग पैनल्टी… लगभग चालीस हज़ार का नोटिस आया है। हे हे हे हे हे।’ उसके उत्तर ने मुझे एकदम चिढ़ा दिया।
‘जयंती कॉलोनी में आपका जो थ्री बीएचके डुप्लेक्स है, वह तो पॉश कॉलोनी है, आपको उस मकान से कम से कम बीस हज़ार किराया तो आता ही होगा, किरायेदार से कहिए कि दो महीने का किराया आपको न देकर प्रॉपर्टी-टैक्स में जमा करवा दे, इसमें क्या बड़ी बात है।’ मेरे अंदर क्रूरता बढ़ रही है, मैं अब इसे बेइज़्ज़त करना चाहता हूँ। यहाँ बैठ कर मेरा समय ख़राब कर रहा है, बिना मतलब की बातों से। मकान इसका, किरायेदार इसका, प्रॉपर्टी-टैक्स इसको भरना है, इन सबसे मुझे क्या मतलब ? और अभी तो मैं यही नहीं जान पाया हूँ कि यह मेरा कौन सा रिश्तेदार है।
‘हे हे हे हे हे… आख़िर में तो वह करना ही पड़ेगा, मगर आपकी मामीजी ने कहा कि जाकर एक बार गुड्डू से मिल लीजिए।’ आपकी मामीजी…? मतलब यह जो सामने बैठा है यह मेरा मामा है ? मैंने तुरंत दिमाग़ में जाकर अपने सारे मामाओं के चेहरे स्कैन किये, मगर इस नाटे आदमी का चेहरा किसी से भी मैच नहीं हुआ। असल में तो मेरा अपने मामाओं से बहुत मिलना-जुलना है… अपनी माँ के चचेरे, फुफेरे, मौसेरे, ममेरे यहाँ तक कि मुँहबोले भी सारे भाइयों को जानता हूँ मैं। यह मेरा कौन सा नया मामा पैदा हो गया है ? मेरे चेहरे पर उलझन के भाव आ गये।
‘आपकी मामी की बात सप्ताह में तीन-चार बार रीना दीदी से व्हाट्सएप वीडियो कॉल पर होती रहती है। वे अभी जर्मनी में हैं बेटी के पास… उसको लड़का हुआ है। जब आपकी मामी ने रीना दीदी को ये प्रॉपर्टी-टैक्स की परेशानी के बारे में बताया तो उन्होंने तुरंत कहा कि इसमें क्या बड़ी बात है, तुरंत जाकर गुड्डू से मिल लो, उसकी बहुत जान-पहचान है, कुछ न कुछ हल निकल आयेगा। हे हे हे हे हे…।’ ये किसी रीना दीदी का भाई है… और उसी रिश्ते से मेरा मामा लगता है, मतलब यह कि मुझसे सीधा रिश्ता इसका नहीं है बल्कि रीना दीदी का है। मगर ये रीना दीदी कौन हैं, मेरे दिमाग़ ने एक बार फिर नकारात्मक उत्तर दिया रीना दीदी की पहचान को लेकर। अब मुझे विश्वास हो गया है कि यह कोई मनोरोगी है, जो भटक कर मेरे पास आ गया है।
‘रीना दीदी…?’ मैंने प्रश्नवाचक नज़रों से देखते हुए प्रश्न किया।
‘ओह… मैंने घर का नाम ले लिया दीदी का, रजनी पटेल… आपकी चाची…। हे हे हे हे हे…. हे हे हे हे हे…।’ मेरे प्रश्न पर उसने तुरंत उत्तर दिया और पहली बार उसने अपने तकिया-कलाम का एक के बाद एक दो बार उपयोग किया। शायद वह मेरे प्रश्न से कुछ घबरा सा गया है। दूसरी बार के ‘हे हे हे हे हे’ में उसकी एक प्रकार की कातरता दिखाई दी मुझको।
रजनी चाची… ओह… पिताजी के दूर के रिश्ते के भाई की पत्नी हैं वे। ये उनका भाई है ? वह जो कुछ देर पहले रहस्यमय तरीक़े से ‘वे लोग’ का ज़िक्र आया था, वह रजनी चाची और चाचा का ज़िक्र था। याद आया जब मैं स्कूल में पढ़ता था तब एक मामाजी आते थे माँ से राखी बँधवाने। जब पहली बार आये थे तो माँ से पूछने पर पता चला था कि पिताजी के दूर के रिश्ते के भाई के साले हैं, यहीं सरकारी अस्पताल में पदस्थ हुए हैं। पिताजी के भाई के साले, मतलब पिताजी के भी साले… मतलब मेरे मामा… इसी रिश्ते से राखी बँधवाने आते थे माँ से। सारे बच्चे मामा कहते थे। कुछ सालों तक आये थे, फिर पता चला कि उनका ट्रांस्फ़र हो गया है यहाँ से, और वे चले गये हैं। ओ हाँ… यही तो चेहरा है… बचपन में देखा था… बरसों बाद देख रहा हूँ… इसलिए याद नहीं आ रहा था, बस धुँधली सी याद है उस चेहरे की। वैसे भी इतना नज़दीक का रिश्ता नहीं था कि याद रखा जा सके। अब तो रजनी चाची से भी मिले हुए बरसों हुए… पिताजी के जाने के बाद उनके रिश्ते, उनके नाते, सब छीज गये। वैसे भी हर पीढ़ी को अपने रिश्ते मिलते हैं निभाने के लिए। और यह तो पिता के सगे भाई के भी साले नहीं हैं, दूर के रिश्ते के भाई के साले हैं। मगर इस नाटे मामा का नाम क्या है ? क्या कह कर बुलाते था मैं इसे…? कुछ याद नहीं आ रहा है। दिनेश, सुरेश, मुकेश, महेश…?
‘देखिए आजकल प्रॉपर्टी-टैक्स का सारा मामला ऑनलाइन होता है, उसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। जो एमाउंट पोर्टल पर निकल रहा होगा, वह आपको जमा करना ही होगा… उसमें नगरपालिका का अध्यक्ष भी कुछ नहीं कर सकता।’ अब मैं सीधे-सीधे टालने की मुद्रा में आ गया हूँ। फ़िज़ूल ही इतनी देर से इसको नज़दीकी रिश्तेदार समझ कर एंटरटेन कर रहा हूँ।
‘भाई गुड्डू मैं बहुत उम्मीद से आपके पास आया था, आप तो पत्रकार हैं… आपका कहा नगरपालिका अध्यक्ष नहीं टाल सकता… बस पैनल्टी माफ़ हो जाये और बाक़ी एमाउंट की किश्तें बन जायें…। हे हे हे हे हे…।’ अब वह घिघियाने पर आ गया है।
‘किश्तें क्यों…? एकमुश्त क्यों नहीं…? जब वे लोग पैनल्टी में थोड़ी-बहुत रियायत देंगे तो एक साथ पूरा ही एमाउंट जमा करवाएँगे। और हाँ पैनल्टी पूरी माफ़ नहीं होगी, थोड़ी-बहुत कम हो जायेगी। किश्तें क्यों करवाना चाहते हैं ?’ मैंने रूखे स्वर में पूछा।
‘असल में मैंने उस मकान को बेचना चाह रहा हूँ अब, जो ख़रीदेगा वही भरेगा किश्तें… मैं क्यों भरूँ…? हे हे हे हे हे। बस इतनी मदद करवा दीजिए।’ वह गिड़गिड़ा रहा है। हँस भी रहा है और मेरी चिरौरी भी कर रहा है। मैंने कोई उत्तर नहीं दिया, अब मैं चाहता हूँ कि यह यहाँ से उठ कर चला जाये।
‘कहीं अगर थोड़ा-बहुत कुछ लेना-देना हो तो वह भी मैं कर दूँगा। चालीस हज़ार का नोटिस है, आठ-दस हज़ार ले-लाकर अगर पूरा केस ख़त्म कर दें तो मैं दे दूँगा। चालीस हज़ार टैक्स भरूँगा तो सरकार के पास चला जायेगा, इसके बजाय दस हज़ार सीधे आपके अध्यक्ष को मिल जायेगा, या जो भी रखना चाहे… भले ही आप….। हे हे हे हे हे।’ उसने इस बार लगभग मेरी ठोड़ी से बात की। आँखों तक अभी भी नहीं आ पाया है वह।
‘मगर देश में अब भ्रष्टाचार है कहाँ ? देश तो अब ईमानदार हाथों में है न ?’ मैंने व्यंग्य के साथ पूछा।
‘यह भ्रष्टाचार थोड़े ही है, यह तो किसी ज़रूरतमंद आदमी की मदद करना है। हे हे हे हे हे।’ उसने अपनी आवाज़ में थोड़ा-सा घिघियाना भर दिया है। मैंने ग़ौर से उस ज़रूरतमंद आदमी को देखा, जिसके पास दो शहरों के पॉश इलाक़ों में मकान हैं और जिसके बच्चे अमेरिका में जॉब कर रहे हैं।
‘भाई गुड्डू रीना दीदी ने कहा था कि आप करवा ही देंगे काम। अब मैं तो यहाँ किसी को नहीं जानता आपके सिवा। मेरे लिए तो सब कुछ आप ही हैं… हे हे हे हे हे। आपकी तो मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक सब जगह पहुँच है। आपके तो एक इशारे पर काम हो जायेगा।’ अंतिम अस्त्र चापलूसी होता है, जो उसने चला दिया है।
‘ठीक है… मैं देखता हूँ क्या हो सकता है।’ मैंने बात को पूर्णविराम लगाने के अंदाज़ में कहा और उसके उठ कर जाने का इंतज़ार करने लगा। मगर वह उसी प्रकार कुर्सी पर बैठा है। वह नाटा सा आदमी… मेरा दूर के रिश्ते का मामा, जिसका नाम मुझे अभी भी पता नहीं है। उसके उस प्रकार बैठे होने से मेरे अंदर क्रोध का एक भभूका सा उठा। मैंने प्रत्यक्षत: इशारा कर दिया है कि अब जाओ मुझे काम करने दो, उसके बाद भी जाने का नाम नहीं ले रहा है, उसी प्रकार कुर्सी पर, मेरी अति विशिष्ट वाली कुर्सी पर बैठा हुआ है। उसके अंदर जाने का कोई उपक्रम होता नहीं देखकर अब मैं उसे यहाँ से बाक़ायदा भगाने के बारे में सोच रहा हूँ। मेरे पास इस तरह के लोगों से निपटने के बहुत क्रूर तरीक़े हैं, मैं यथायोग्य तरीक़ा आज़माने के बारे में सोच रहा हूँ। वह उसी प्रकार निश्चिंत रूप से कुर्सी पर बैठा है, आज नगरपालिका अध्यक्ष से मेरी बात करवाए बिना शायद यहाँ से जाने वाला नहीं है यह।
‘आप अभी कह रहे थे न कि टीवी आपके सिर पर गिर जाता तो आपको चोट आती… आपको पता है मेरा ये ऑफ़िस इस पाँच मंज़िला इमारत के बेसमेंट में है। इस इलाक़े में तीस-चालीस साल पहले एक बार बड़ा भूकंप आया था, अगर अभी भूकंप आ जाये, तो ये पूरी इमारत भरभरा कर आप पर गिरेगी, फिर आपका सिर तो क्या बचेगा, पूरी चटनी बन जायेगी आपकी।’ मैं अब पूरी तरह से क्रूरता पर उतर आया हूँ अपने उस मामा को भगाने के लिए। मैंने उसकी सबसे कमज़ोर नस पर प्रहार किया है। मेरी बात से उसके चेहरे पर अचानक ख़ौफ़ की, दहशत की लहर आ गयी है। वह घबरा कर एकदम कुर्सी से खड़ा हो गया। कुछ देर तक भयभीत नज़रों से मुझे देखता रहा फिर पलट कर दरवाज़े की तरफ़ बढ़ गया।
‘सुनिए… जाते हुए बाहर मेरे लड़के से डॉ. आनंद सक्सेना का नंबर ले जाइएगा, वे मेरे बहुत अच्छे मित्र हैं। उनसे मिल लीजिएगा एक बार।’ मैं अपने अंदर की क्रूरता को अब पूरी तरह संतुष्ट करना चाहता हूँ। इस व्यक्ति ने जितना मेरा समय व्यर्थ किया है, वह पूरा अपने मनोरंजन से वसूलना चाहता हूँ।
‘ये डॉ. आनंद सक्सेना नगरपालिका मैं हैं क्या ?’ उसने रुक कर पलटते हुए पूछा। उसका चेहरा अभी भी डर से भरा हुआ है।
‘नहीं वे साइकियाट्रिस्ट हैं… दिमाग़ के डॉक्टर… अभी आपको उनकी ज़्यादा ज़रूरत है।’ मैंने उसकी आँखों में आँखें डालते हुए कहा। मेरी बात से उसके चेहरे पर छाया ख़ौफ़ दयनीयता में बदलने लगा। उसका चेहरा पीला पड़ने लगा। वह हड़बड़ी में मुड़ा तो गिरते-गिरते बचा, वह उसी प्रकार लड़खड़ाते हुए दरवाज़ा खोल कर बाहर निकल गया। मैं कुर्सी पर बैठा-बैठा याद करने की आख़िरी कोशिश कर रहा हूँ कि अभी-अभी जो मेरे सामने से उठ कर गया है उस नाटे मामा का नाम क्या था ?
- पंकज सुबीर
उपन्यास- ये वो सहर तो नहीं, अकाल में उत्सव, जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था, रूदादे-सफ़र।
कहानी संग्रह- ईस्ट इंडिया कम्पनी, महुआ घटवारिन और अन्य कहानियाँ, कसाब डॉट गांधी एट यरवदा डॉट इन, चौपड़े की चुड़ैलें, होली, प्रेम, रिश्ते, हमेशा देर कर देता हूँ मैं, ज़ोया देसाई कॉटेज, ख़ैबर दर्रा। ग़ज़ल संग्रह- यही तो इश्क़ है। व्यंग्य संग्रह- बुद्धिजीवी सम्मेलन। यात्रा वृत्तांत- यायावर हैं, आवारा हैं, बंजारे हैं। जीवनीपरक पुस्तक- ज़िंदगी की किताब। लम्बी कविता- देहगाथा। कविता संग्रह- उम्मीद की तरह लौटना तुम। संपादन- नई सदी का कथा समय, विमर्श- नक़्क़ाशीदार केबिनेट, बारह चर्चित कहानियाँ, विमर्श दृष्टि- सुधा ओम ढींगरा का साहित्य, कुछ उदास कहानियाँ।
सम्मान- राजेन्द्र यादव हंस कथा-सम्मान, ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार, जे. सी. जोशी शब्द साधक जनप्रिय सम्मान, वागीश्वरी पुरस्कार, अंतर्राष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान, वनमाली कथा सम्मान, शैलेश मटियानी चित्रा-कुमार पुरस्कार, अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान, स्पंदन कृति सम्मान, आचार्य निरंजन नाथ सम्मान, स्पेनिन डॉ. सिद्धनाथ कुमार स्मृति सम्मान, शांति गया शिखर सम्मान, व्यंग्य यात्रा सम्मान, सृजन कुंज सम्मान, पूश्किन सम्मान, दुष्यंत कुमार संग्रहालय कमलेश्वर सम्मान, पृथ्वीनाथ भान साहित्य सम्मान, धर्मवीर भारती शताब्दी सम्मान, रवींद्रनाथ त्यागी स्मृति व्यंग्य यात्रा सोपान सम्मान।
संपर्क- सम्राट कॉम्प्लैक्स बेसमेण्ट, बस स्टैण्ड के सामने, सीहोर, मध्य प्रदेश- 466001
मोबाइल- 9977855399, ईमेल- [email protected]

वाह बहुत ही जानदार कहानी है। जो छीजते रिश्ते नातों को करीब से बयां करती है।कहानी में नाटे आदमी को जानने और फिर भ्रष्टाचार के विरुद्ध ताने बाने को केंद्र में रखकर लिखी गई कहानी है।यह कहानी आज की सोच और अपनों से संवादहीनता को भी उकेरती है।
कहानी में थोड़ा सा दोहराव है जो संपादकीय सजगता से दूर किया जा सकता है।
कहानीकार को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई।
एक सशक्त कहानी, जो बहुत कुछ कह जाती है।