- प्रवीण प्रणव
कविता केवल शब्दों का विन्यास, छंदों का विन्यास या तुकांत पंक्तियों का यांत्रिक मेल मात्र नहीं है; यह मनुष्य की चेतना की सबसे सूक्ष्म, प्रामाणिक, पवित्र और घनीभूत अभिव्यक्ति है। सभ्यता के उषाकाल से ही जब मानव समाज ने अपने अस्तित्व की खोज आरंभ की, तब अपनी संवेदनाओं, दुखों, आकांक्षाओं, उल्लास और सौंदर्यबोध को सहेजने के लिए उसने कविता का ही आश्रय लिया। भारतीय ज्ञान-परंपरा और मौखिक साहित्य के लंबे इतिहास में कविता का पठन, गायन और श्रवण सदैव एक सामुदायिक व अत्यंत जीवंत सांस्कृतिक अनुष्ठान रहा है। वैदिक ऋचाओं के सस्वर पाठ से लेकर भक्तिकाल के संतों के पदों तक और फिर आधुनिक दौर की जनवादी कविताओं तक, जब-जब कविता पढ़ी और सुनी गई, उसने समाज को सोया हुआ न रखकर मानवीय संवेदनाओं, करुणा और न्याय के प्रति निरंतर जागरूक किया है। हिंदी भाषा और उसके विभिन्न जनपदीय रूपों के विकास में ‘कविता के पठन की परंपरा’ अर्थात पाठ और वाचन की संस्कृति की बेहद केंद्रीय और प्राणवान भूमिका रही है। आज के इस अभूतपूर्व दौर में जब सूचना प्रौद्योगिकी और डिजिटल क्रांति ने ज्ञान तथा विचारों के प्रवाह को अत्यधिक तीव्र और त्वरित बना दिया है, तब यह मौलिक प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक और गंभीर हो जाता है कि कविता पढ़ने की यह सदियों पुरानी परंपरा वर्तमान समय में हिंदी भाषा, उसके सुधि पाठकों और समग्र समाज को किस रूप में समृद्ध तथा रूपांतरित कर रही है।
कविता की वास्तविक सार्थकता और उसके नियमित पठन की मूलभूत आवश्यकता पर विचार करते हुए वरिष्ठ साहित्यकारों और चिंतकों के विचार हमें गहरा जीवन-विवेक और आत्म-दृष्टि प्रदान करते हैं। प्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार अरुण कमल का मानना है कि कविता मनुष्य को अधिक संवेदनशील, सहिष्णु, करुणामय और विचारशील बनाती है। जब संपूर्ण समाज केवल आर्थिक लाभ, उपभोक्तावाद और भौतिक प्रगति की एक अंधी तथा निष्ठुर दौड़ में अंधे होकर शामिल होने लगता है, तब केवल कविता ही वह अदृश्य और सूक्ष्म तत्व है जो मनुष्यता को अपने भीतर बचाए रखती है। कविता की आवश्यकता इसलिए है ताकि हम दूसरों के अदृश्य दुख को महसूस कर सकें, दूसरों की पीड़ा में साझेदार बन सकें और अपने भीतर बची हुई आत्मीयता तथा संवेदना को जीवित रख सकें। यह संवेदना ही मनुष्य को समाज से जोड़ती है और उसे आत्मकेंद्रित होने से रोकती है।
आज के समाज की विडंबना यह है कि जब कोई माता-पिता अपने बच्चों को कविता या कलाओं के प्रति आकर्षित होते देखते हैं, तो वे आशंकित और चिंतित हो उठते हैं। यदि बच्चा बड़ा होकर कवि या कलाकार बनना चाहे, तब तो परिवार और समाज में एक विशेष प्रकार की चिंता व्याप्त हो जाती है क्योंकि आधुनिक समाज सफलता को केवल मौद्रिक लाभ से मापता है। परंतु दुनिया के कई अन्य देशों और समृद्ध संस्कृतियों में ऐसा दृष्टिकोण नहीं है। वहाँ अत्यंत गर्व और सम्मान के साथ अपनों बच्चों का परिचय देते हुए लोग कहते हैं कि मेरा बेटा या मेरी बेटी एक कवि है। ईरान जैसी महान साहित्यिक परंपरा वाले देश में किसी भी शुभ या नए काम की शुरुआत से पहले महान कवियों के मज़ार पर जाने और उनका आशीर्वाद लेने की एक पावन परंपरा रही है। हमारे अपने देश में भी दक्षिण भारत की समृद्ध मलयालम भाषा में बच्चों के विद्यारंभ या अक्षर आरंभ के समय आदि कवि का स्मरण किया जाता है, ठीक वैसे ही बंगाल और देश के अन्य कई सांस्कृतिक अंचलों में भी ऐसी ही सुंदर परंपराएँ रची-बसी हैं।
इसके बावजूद आज के उपयोगितावादी युग में यह मुख्य सवाल बार-बार सामने आता है कि आखिर कविता की व्यावहारिक आवश्यकता क्या है। जनकवि धूमिल ने अपनी प्रसिद्ध कविता की पंक्तियों में समाज की इसी व्यावहारिक और संकीर्ण सोच पर चोट करते हुए लिखा था कि “जब ससुरी कविता से न चोली बन सकती है, न कुर्ता बन सकता है, तो फ़ायदा क्या है इस कविता से”। परंतु यह अत्यंत आश्चर्यजनक और सुखद सच है कि इन तमाम भौतिकवादी संशयों और तर्कों के बावजूद हर कालखंड में कविता मौजूद रही है, आज भी हमारे जीवन में विद्यमान है और आने वाले अनंत समय तक रहेगी। इतिहास में कई बार विभिन्न विचारकों द्वारा कविता के अंत की आधिकारिक घोषणाएं भी की गईं, परंतु हर बार कविता फिनिक्स पक्षी की भाँति अपनी ही राख से पुनः उठ खड़ी होती है और नवजीवन प्राप्त करती है।
सच्चाई तो यह है कि कविता को मनुष्यता की सहज और प्राकृतिक मातृभाषा माना गया है। यदि आप विश्व की किसी भी भाषा या संस्कृति के लोकगीतों को उठाकर देखें, तो प्रश्न उठता है कि उन्हें आखिर किसने रचा। उन अमर लोकगीतों को किसी बड़े विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों ने नहीं, बल्कि निरक्षर सामान्य लोगों ने और उसमें भी विशेषकर स्त्रियों ने अपने दैनंदिन जीवन के अनुभवों, विरह, वात्सल्य और श्रम के बीच रचा है। आज तकनीक और ज्ञान के चरम विकास के बाद भी कोई भी आधुनिक और बौद्धिक कविता, उन सहज लोकगीतों की गहराई और मिठास से आगे नहीं निकल पाई है। वे लोकगीत आज भी मानव जाति की महानतम कविताएँ हैं। हमारे जीवन का हर छोटा-बड़ा अवसर कविता और संगीत के लिए एक पावन अवसर होता है। मनुष्य के जन्म से लेकर उसकी अंतिम यात्रा अर्थात मृत्यु तक, हमारे समाज का कोई भी अनुष्ठान बिना कविता, छंदों या गीतों के संपन्न होना असंभव है।
यदि आज के वैश्विक परिदृश्य को देखें तो दुनिया की एक बड़ी आबादी विभिन्न प्रकार के हिंसक युद्धों, साम्राज्यवादी लिप्साओं और सत्ता के दमन से जूझ रही है। ऐसे कठिन समय में इन हिंसक ताकतों और युद्ध के खिलाफ सबसे निर्भीक होकर आवाज़ उठाने वाले लोग कौन हैं। वे निश्चित रूप से कविता, साहित्य और कलाओं से जुड़े हुए अत्यंत संवेदनशील लोग हैं, जो निरंतर शांति और युद्ध के विरोध में अपनी आवाज़ बुलंद करते रहे हैं। हमारे पौराणिक आदि कवि वाल्मीकि के जीवन की वह अमर घटना स्मरण करने योग्य है, जब उन्होंने जंगल में मैथुनरत क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक को शिकारी द्वारा मार दिए जाने की अत्यंत कारुणिक घटना से व्यथित होकर उस शिकारी को कड़ा श्राप दिया था। वाल्मीकि के उस हृदयविदारक शोक से ही विश्व की प्रथम श्लोक-कविता का जन्म हुआ था। इसलिए कहा जा सकता है कि दुनिया की हर सच्ची कविता, हर आततायी और शिकारी के विरुद्ध एक नैतिक श्राप है जो मनुष्यता की रक्षा करती है।
विज्ञान, तकनीक, अर्थशास्त्र या अन्य तमाम विषय मनुष्यता के विकास के लिए वरदान और नेमत हैं, परंतु एक अत्यंत सूक्ष्म और गहरा कार्य ऐसा है जो ये सभी विषय मिलकर भी पूरा नहीं कर पाते और जिसे केवल कविता या ललित कलाएँ ही संपन्न करती हैं। कविता हमें जीवन को एक सर्वथा नए, अप्रत्याशित और सौंदर्यपूर्ण दृष्टिकोण से देखना सिखाती है। महान भारतीय फिल्मकार सत्यजीत राय के जीवन का एक अत्यंत सुंदर संस्मरण इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। बचपन में सत्यजीत राय अपनी ऑटोग्राफ की कॉपी लेकर विश्वकवि रवींद्रनाथ टैगोर के पास गए और उनसे प्रार्थना की कि वे उनकी कॉपी में कुछ पंक्तियाँ लिख दें। रवींद्रनाथ टैगोर ने उस नन्हे बालक की कॉपी में लिखा –
मैं सौन्दर्य की खोज में पहाड़ों में गया
मैं सौन्दर्य की खोज में समुद्र में गया
मैं जंगल में गया
लेकिन घर के बगल में
धान की बाली पर थरथराती ओस की बूंद को मैंने नहीं देखा
हमारे आसपास जो अद्भुत सौंदर्य बिखरा हुआ है, भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अपनी अंधी आँखों से उसे देख नहीं पाते; कविता हमें जीवन के उसी सूक्ष्म सौंदर्य को देखना और महसूस करना सिखाती है।
विश्व साहित्य के महानतम रूसी उपन्यासकार लियो टॉलस्टॉय का कालजयी उपन्यास ‘अन्ना करेनिना’ इस सौंदर्य-दृष्टि का एक अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है। इस विशाल उपन्यास में एक दृश्य है जहाँ एक प्रमुख पात्र अपनी प्रेमिका द्वारा शादी के प्रस्ताव को ठुकरा दिए जाने के बाद अत्यंत शांत और अंधेरी रात में अकेला चला जा रहा है। टॉलस्टॉय उस सन्नाटे और पात्र की संवेदनात्मक तीव्रता का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि उस नीरवता में घास के रेशा-रेशा उगने की ध्वनि को स्पष्ट रूप से सुना जा सकता था। यहाँ घास के उगने की सूक्ष्म ध्वनि वास्तव में जीवन के निरंतर प्रवाह और जीवन की ही अमर ध्वनि है। कविता और साहित्य हमें जीवन की इसी अत्यंत सूक्ष्म ध्वनि को सुनने की संवेदनशीलता प्रदान करते हैं। जीवन के इस तरह के छोटे-छोटे क्षणों में जीवन को पहचानना और विकट परिस्थितियों में भी उम्मीद की किरण देखना हमें केवल कविता ही सिखा सकती है।
महान विचारक दोस्तोवस्की ने एक बार कहा था कि केवल सौंदर्य ही अंततः इस पूरी मनुष्यता को विनाश से बचाएगा। कविता का सबसे प्रमुख और पावन कार्य जीवन में इसी सौंदर्य की अनवरत खोज करना है। प्रायः सामान्य लोग यह मान बैठते हैं कि जो बड़े वैज्ञानिक हैं, समाजशास्त्री हैं, गणितज्ञ या दार्शनिक हैं, उन्हें भला कविता या साहित्य की क्या आवश्यकता हो सकती है। परंतु इतिहास गवाह है कि दुनिया के लगभग सभी महानतम वैज्ञानिक काव्य-प्रेमी और कला-अनुरागी रहे हैं। आधुनिक भौतिकी के जन्मदाता अल्बर्ट आइंस्टीन को जो लेखक सबसे अधिक प्रिय थे, वे दोस्तोवस्की ही थे। इसी तरह यदि आप महान ब्रह्मांड वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग को सुनें तो वे भी बार-बार अपने प्रिय कवियों का उल्लेख करते हुए कहते थे कि कविता और साहित्य मनुष्य की कल्पनाशीलता की सीमाओं को असीम विस्तार देते हैं। जिस व्यक्ति में जितनी अधिक कल्पनाशक्ति होगी, वह अपने क्षेत्र में उतना ही बड़ा, मौलिक और क्रांतिकारी कार्य कर पाएगा। इस असीम कल्पनाशीलता के विकास के लिए मनुष्य को कविता की अत्यंत आवश्यकता है।
कविता सदैव से युद्ध, दमन, अन्याय और तानाशाही के विरोध में इसलिए खड़ी होती है, क्योंकि कविता का मूल स्वभाव ही मनुष्यता और न्याय के पक्ष में होना है। समाज में जो सबसे असहाय, वंचित, शोषित और कमजोर वर्ग है, कविता सदा उसके पक्ष में अपनी आवाज़ बुलंद करती है। कविता की एक और अद्वितीय विशेषता यह है कि कविता किसी भी सत्ता या भय से डरती नहीं है। महान सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ बार-बार अपनी निर्भीक पंक्तियों में दोहराते थे कि “कुछ भी उठाने के लिए झुको मत”। प्रसिद्ध हास्य अभिनेता और कलाकार चार्ली चैपलिन की माँ ने भी बचपन में उन्हें यही अमूल्य शिक्षा दी थी। इसके साथ ही कविता हमें अपने वास्तविक ‘स्व’ को पहचानना सिखाती है। उर्दू के महान शायर मीर तकी मीर का एक शेर है “घर में जी लगता नहीं उस बिन तो हम होकर उदास/ दूर जाते हैं निकल हिज्राँ से घबराये हुए”।
जब कभी आप अपने जीवन में पूरी तरह से अकेले हों, अवसाद से घिरे हों, अथवा गहरे दुख के क्षणों में हों, तब किसी महान कवि की कविता उठाकर पढ़िए। दुनिया के बड़े-बड़े चिकित्सकों और मनोवैज्ञानिकों ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया है कि कविता अपने आप में एक परम औषधि और मानसिक इलाज है। कविता आपको हर तरह के व्यक्तिगत और सामाजिक दुख से उबारकर, पुनः जीवन के सकारात्मक प्रवाह से जोड़ने में अभूतपूर्व भूमिका निभाती है। जब कभी आपको लगे कि इस संसार में अब कुछ भी सुंदर नहीं बचा है और निराशा का अंधकार छा गया है, तो किसी कवि की पुस्तक खोलिए। वह कविता आपको निराशा के भंवर से निकालकर पुनः एक संवेदनशील और जीवंत इंसान बनाने का कार्य करेगी।
कविता केवल शांत रहने की कला नहीं सिखाती, बल्कि वह अन्याय के विरुद्ध असहमति की बुलंद आवाज़ बनना भी सिखाती है। एक प्रसिद्ध काव्य-अंश में कहा गया है कि जब पूरा समाज डर या षड्यंत्र के कारण चुपचाप बैठा हो, उस समय बोला गया सत्य का एक अकेला शब्द भी तोप के गोले दागने जैसी प्रचंड आवाज़ पैदा करता है। दुनिया के लगभग सभी लोग किसी न किसी रूप में कविता से अनजाने ही जुड़े हुए होते हैं, चाहे वे काम करते हुए लोकगीत गुनगुनाते हों या फिल्मों के सुरीले गीत सुनते हों। यह सच है कि समाज में हर किसी को गहन और जटिल साहित्य पढ़ने का अवसर नहीं मिलता, या हर कोई शास्त्रीय कविता की सूक्ष्मताओं को तुरंत नहीं समझ सकता। ठीक उसी तरह जैसे शास्त्रीय संगीत में हर कोई पंडित भीमसेन जोशी या कुमार गंधर्व के गायन की बारीकियों को एकदम से नहीं समझ पाता, लेकिन संगीत का प्रभाव हर आम व्यक्ति के जीवन में बना रहता है। अंग्रेजी का एक प्रसिद्ध मुहावरा है कि संगीत ही मनुष्य के भीतर संगीत की समझ पैदा करता है।
कविता के साथ भी ठीक यही नियम लागू होता है; जैसे-जैसे आप कविताएँ पढ़ने और सुनने लगते हैं, वैसे-वैसे आपकी काव्य-संवेदना और समझ का दायरा भी स्वतः विकसित होता जाता है। ‘क से कविता’ जैसी अनेक आधुनिक पहलें इसी सकारात्मक दिशा में कार्य कर रही हैं, जहाँ लोग अपनी स्वयं की लिखी कविताएँ पढ़कर आत्म-मुग्ध होने के बजाय, विश्व और हिंदी साहित्य के महान कवियों की श्रेष्ठ कविताओं का पाठ करते और सुनते हैं। जहाँ तक कविता में अभिव्यक्ति की तीव्रता का प्रश्न है, कविता एक साथ अनेक गहन भावों और विचारों को बहुत कम शब्दों में, अत्यंत तीखेपन और प्रभावशालीता के साथ व्यक्त करने की अद्भुत क्षमता रखती है। गद्य का विस्तार यह कार्य इतनी त्वरित गति से नहीं कर सकता। शेक्सपियर जैसे महान नाटककार और कवि अपनी रचनाओं में जितने कम शब्दों में जीवन के अंतिम सत्य कह जाते हैं, उस बात को समझाने में बड़े-बड़े उपन्यासकारों और दार्शनिकों को सैकड़ों पृष्ठ लिखने पड़ते हैं। शेक्सपियर का वह प्रसिद्ध वाक्य “To be or not to be is the question” अपने छोटे से आकार में जीवन के जिस विशाल संशय को समेटे हुए है, उसकी संपूर्णता को पकड़ने के लिए संपूर्ण दर्शनशास्त्र भी कम पड़ जाता है। इस संदर्भ में यह निर्भीक सत्य भी सामने आता है कि यदि कोई रचनाकार किसी लालच, भय या दबाव में आकर सच का साथ छोड़ देता है, तो वह कभी भी बड़ा साहित्यकार या सच्चा कलाकार नहीं बन सकता। कविता केवल वहीं अंकुरित और जीवित हो सकती है जहाँ मनुष्य का सर ऊँचा रहे, और सर केवल वहीं ऊँचा रह सकता है जहाँ सत्य की निष्ठा हो।
उर्दू के प्रसिद्ध और मूर्धन्य शायर शीन काफ़ निज़ाम ने अत्यंत मार्मिक बात कही कि वे शायरी के बारे में बहुत कुछ जानने का प्रयास करते हैं, परंतु वास्तव में शायरी क्या है, यह वे स्वयं भी पूरी तरह नहीं जानते। हम सभी आधुनिक मनुष्यों की मूल परेशानी यही है कि हम बाहर की दुनिया और ‘आदमी’ के बारे में बहुत सारी सूचनाएँ जानते हैं, लेकिन स्वयं ‘आदमी’ को अंदर से बिल्कुल नहीं जानते। अरबी भाषा में ‘शेर’ शब्द का मूल अर्थ होता है ‘जानना’ और ‘शायर’ का अर्थ होता है ‘जानने वाला’, इस प्रकार शायरी वास्तव में एक ‘जानी हुई चीज़’ है। परंतु यहाँ मौलिक सवाल यह उठता है कि आखिर यह ‘जानना’ क्या है। मजे की बात यह है कि जानना क्या है, इसे हम केवल तभी समझ पाते हैं जब हम वास्तव में जीवन को पूरी गहराई से जान लेते हैं।
महान सूफी संत और फारसी के अमर कवि हाफ़िज़ शिराज़ी का एक शेर है
कस नदानस्त के मन्ज़िलगहे माशूक कजास्त,
ईं कदर हस्त के बांगे जरसे मी-आयद।
इसका भावार्थ यह है कि कोई नहीं जानता कि उस परम प्रियतम या ईश्वर की वास्तविक मंज़िल और ठिकाना कहाँ है, बस इस बात की एक सूक्ष्म भनक या अहसास भर है कि दूर से किसी अदृश्य कारवाँ के चलने की घंटियों की धीमी आवाज़ आ रही है। सूफी दर्शन के अनुसार इस शेर का गहरा आध्यात्मिक अर्थ यह है कि इस अनंत कायनात और परम सत्ता को अपनी बुद्धि से पूरी तरह समझ पाना इंसान के बस की बात नहीं है, लेकिन उसकी दिव्य उपस्थिति के सुंदर संकेत इस संपूर्ण प्रकृति और जीवन में हर तरफ महसूस किए जा सकते हैं।
इसी तरह अल्लामा इक़बाल का फारसी का एक अत्यंत प्रसिद्ध ]शेर है:
दर ईं गुलशन परीशानम, चे जूयम?
नमानीद अस्त दीदे, दर गुलूयम!
वे कहते हैं कि मैं इस संसार रूपी विशाल उपवन में अत्यंत हैरान और परेशान होकर भटक रहा हूँ, भला मैं यहाँ क्या ढूँढ रहा हूँ। मेरी स्थिति यह हो गई है कि मेरी आँखों की बची हुई रोशनी भी अब मेरे गले में अटकी हुई एक मूक चीख या अंतिम साँस बनकर रह गई है। शायरी या कविता का वास्तविक अर्थ यही है कि हम जीवन भर एक परम सत्य और सौंदर्य को ढूँढ रहे हैं, और यह ढूँढना एक ऐसी अनंत यात्रा है जिसकी तलाश कभी भी पूर्ण या मुकम्मल नहीं होती। इसलिए जो कविता या शायरी का सच्चा पाठक है, उसमें अकेले रहने का, आत्म-मंथन करने का हौसला होना चाहिए। आज के इस अत्यधिक शोरगुल और भागदौड़ वाले दौर में हम सब कुछ बनने और होने के लिए तैयार हैं, लेकिन अपने स्वयं के साथ अकेले रहने के लिए तैयार नहीं हैं। एक दौर था जब हमारे समाज में ‘सन्नाटे का शोर’ हुआ करता था अर्थात मौन में भी गहरा विचार होता था, लेकिन वर्तमान समय में चारों तरफ ‘शोर का सन्नाटा’ व्याप्त है जहाँ अपार कोलाहल के बावजूद भीतर एक गहरा शून्य और सन्नाटा है। अतः जिस व्यक्ति ने भी शायरी का अर्थ ‘जानना’ समझ लिया, और इस जानने का अंतिम सत्य यही स्वीकार किया कि उसने अंततः कुछ नहीं जाना, वास्तव में उसी ने कविता और जीवन के रहस्य को समझा है।
वैश्विक स्तर पर भी अनेक महान कवियों और दार्शनिकों ने कविता के पठन को मनुष्य के आत्मिक विकास और बौद्धिक परिपक्वता के लिए अत्यंत अनिवार्य माना है। प्रसिद्ध अमरीकी कवि रॉबर्ट फ्रॉस्ट ने कविता की परिभाषा देते हुए कहा था कि कविता का जन्म तब होता है जब किसी सुप्त भावना को अपना स्पष्ट विचार मिलता है और उस विचार को सही शब्द प्राप्त होते हैं। वहीं भाषा और साहित्य के महान आधुनिक आलोचक टी. एस. एलियट ने कविता के सामाजिक महत्व पर विचार करते हुए कहा था कि दुनिया की कोई भी भाषा तब तक जीवंत, गतिशील और समृद्ध नहीं रह सकती, जब तक कि उस भाषा में कविता पढ़ने और रचने की एक निरंतर बहती हुई जीवंत परंपरा मौजूद न हो।
आज का आधुनिक समय ‘इंस्टेंट’ यानी त्वरित और ‘वायरल’ संस्कृति का समय बन चुका है। सोशल मीडिया और स्मार्टफोन के इस युग में युवा पीढ़ी के भीतर रातों-रात प्रसिद्ध हो जाने और अपनी हर बात को ‘वायरल’ कर देने की एक तीव्र तथा व्याकुल ललक दिखाई देती है। 15 से 30 सेकेंड की रील्स, शॉट्स और क्लिप्स के इस उथले दौर में मनुष्य के भीतर ठहराव, संजीदगी, धैर्य और विचारों की गहराई की निरंतर भारी कमी आती जा रही है। इस सतही प्रवृत्ति ने युवाओं को किसी भी गंभीर विषय, इतिहास या विचार की गहराई में जाने के बजाय केवल ऊपरी और उथले ज्ञान के आधार पर अपनी त्वरित धारणाएँ बनाने की ओर ढकेला है। साहित्य और कविता के क्षेत्र में भी इस प्रवृत्ति का नकारात्मक प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। केवल सतही तुकबंदी, राजनीतिक नारों या केवल अत्यधिक भावुक पंक्तियों को ही महान कविता मान लेने की एक व्यापक भ्रांति आज चारों ओर फैल रही है।
जब कोई युवा बिना पर्याप्त पठन-पाठन किए, बिना किसी समृद्ध साहित्यिक परंपरा से जुड़े या बिना महान कवियों को पढ़े सीधे काव्य-सृजन करने लगता है, तो उसकी रचनाओं में विचार, जीवन-दृष्टि और संवेदना की वह गहराई कभी नहीं आ पाती जो वर्षों के गंभीर पठन, निरंतर वाचन और आत्म-चिंतन से विकसित होती है। गहन साहित्यिक पठन के अभाव में आज की युवा पीढ़ी समाज, राजनीति, प्रकृति, दर्शन या जटिल मानवीय संबंधों पर अत्यंत जल्दबाज़ी में और बेहद सतही निष्कर्ष निकालने लगती है। यही वह बिंदु है जहाँ ‘कविता के पठन की परंपरा’ एक अत्यंत आवश्यक ‘सुधारक’, ‘संरक्षक’ और ‘मार्गदर्शक’ के रूप में हमारे सामने आती है। जब युवा स्तरीय और कालजयी कविताएँ पढ़ते हैं, तो उन्हें यह स्पष्ट समझ में आता है कि किसी भी विचार को परिपक्व होने में और शब्द को वास्तविक अर्थ पाने में लंबा समय और धैर्य लगता है। कविता का नियमित पठन युवाओं को त्वरित और उथले निष्कर्षों से बचाकर धैर्यपूर्वक गहराई से विचार करने की आदत प्रदान करता है।
सोशल मीडिया और आधुनिक तकनीक के जहाँ कुछ गंभीर नकारात्मक पहलू हैं, वहीं इसका सबसे अद्भुत और सकारात्मक पक्ष यह भी है कि आज डिजिटल माध्यमों के कारण विश्व भर का विपुल साहित्य केवल एक क्लिक पर पढ़ने और सुनने के लिए सर्वत्र उपलब्ध हो चुका है। अतीत के दौर में जहाँ दुर्लभ पुस्तकें, पुरानी पांडुलिपियाँ या वरिष्ठ कवियों की महान कृतियाँ केवल बड़े शहरों के विशाल पुस्तकालयों तक सीमित हुआ करती थीं, आज वे देश-विदेश के किसी भी सुदूर कोने में बैठे सामान्य पाठक की मोबाइल स्क्रीन पर मुफ़्त उपलब्ध हैं। जब युवा इस विशाल और प्रामाणिक साहित्य को डिजिटल माध्यमों से पढ़ते हैं, तो उनके भीतर कई तरह के गुणात्मक और वैचारिक परिवर्तन आने लगते हैं। उदाहरण के लिए, जब कोई पाठक गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’, नागार्जुन या सुदामा पांडेय ‘धूमिल’ की प्रखर कविताएँ पढ़ता है, तो वह समाज में मौजूद आर्थिक और सामाजिक विषमताओं, उन विषमताओं के पीछे छिपे वास्तविक कारणों और आम आदमी के दैनंदिन संघर्षों के प्रति अत्यधिक जागरूक हो उठता है।
इसी प्रकार, जब पाठक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, शमशेर बहादुर सिंह या केदारनाथ सिंह की सूक्ष्म कविताएँ पढ़ता है, तो वे कविताएँ व्यक्ति को अपनी आंतरिक भावनाओं, प्रेम, करुणा, अलगाव और अस्तित्व के बोध को गहराई से समझने की एक नई मनोवैज्ञानिक दृष्टि प्रदान करती हैं। प्रकृतिवादी और जनवादी कवियों जैसे सुमित्रानंदन पंत, केदारनाथ अग्रवाल या नागार्जुन की प्रकृति विषयक कविताएँ पढ़कर पाठक अपने आसपास बिखरे पेड़-पौधों, नदियों, मौसमों के चक्र और पर्यावरण के हो रहे भयानक क्षरण के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाता है। इस प्रकार, आधुनिक डिजिटल माध्यमों के ज़रिये हो रहा यह निरंतर काव्य-पठन पाठक के अवचेतन मन में एक अत्यंत गहरी वैचारिक, नैतिक और मानवीय नींव का निर्माण कर रहा है।
वरिष्ठ साहित्यकार और चिंतक नंदकिशोर आचार्य ने साहित्य के उद्देश्य पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और मौलिक सवाल उठाते हुए कहा कि एक लेखक के लिए लिखना उसकी अपनी आंतरिक मजबूरी या ज़रूरत हो सकती है, क्योंकि अपनी तीव्र भावनाओं और विचारों को व्यक्त करने का उसके पास यही एकमात्र माध्यम है; लेकिन मूल प्रश्न यह है कि कोई पाठक भला किसी लेखक की व्यक्तिगत भावनाओं को क्यों पढ़े। उन्होंने प्रसिद्ध कवि रघुवीर सहाय की कविता की पंक्तियों को उद्धृत करते हुए कहा कि कविता की वास्तविक सार्थकता इसी में है कि जब कोई कवि अपनी कविता सुनाकर उठे, तो चारों ओर एक गहरा सन्नाटा छा जाए और पाठक अपने स्वयं के भीतर उतरने पर विवश हो जाए। विज्ञान या समाजशास्त्र जैसे विषय मनुष्य को अपने से बाहर की वस्तुगत दुनिया में ले जाकर ज्ञान प्राप्त करने का मार्ग दिखाते हैं, लेकिन केवल साहित्य, कविता और कलाएँ ही वे विधाएँ हैं जो मनुष्य को अपने स्वयं के भीतर झाँकने, आत्म-निरीक्षण करने और अपनी चेतना को परिष्कृत करने के लिए निरंतर प्रेरित करती हैं।
कविता के निरंतर पठन, वाचन और श्रवण की इस सांस्कृतिक परंपरा से निश्चित रूप से हिंदी भाषा के पाठकों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है। परंतु यदि इसका अधिक सूक्ष्मता और गहराई से विश्लेषण किया जाए, तो इस परंपरा से स्वयं हिंदी भाषा की तुलना में कहीं अधिक प्रत्यक्ष लाभ उन पाठकों और समग्र समाज को हुआ है। स्तरीय और गंभीर कविताएँ निरंतर पढ़ने से पाठक की शब्दावली समृद्ध होती है, उसकी अभिव्यक्ति क्षमता में निखार आता है और भाषा की बारीक समझ परिपक्व होती है। कविता मनुष्य के दिल और दिमाग को निष्ठुर या कठोर होने से बचाती है। वह पाठक के भीतर करुणा, सहानुभूति, प्रेम और सह-अस्तित्व की मानवीय भावना का निरंतर सिंचन करती है। आज के अत्यधिक तेज़-तर्रार, प्रतिस्पर्धी और तनावपूर्ण आधुनिक जीवन में कविता का पठन पाठक को एक अद्भुत शांति, आंतरिक संतुलन और मानसिक ठहराव यानी माइंडफुलनेस प्रदान करता है।
साथ ही, हिंदी भाषा को भी इन जागरूक पाठकों से अप्रत्यक्ष रूप से अपार लाभ पहुँचा है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिस भाषा में श्रेष्ठ साहित्य निरंतर पढ़ा और रचा जाता है, वह भाषा कभी भी मृत, बासी या अप्रासंगिक नहीं होती। इस पठन-पाठन की परंपरा के कारण ही हिंदी भाषा आज भी आम जनमानस के दैनिक मानसिक और संवेदनात्मक जीवन का अभिन्न हिस्सा बनी हुई है। पठन की इस अनवरत परंपरा से विभिन्न क्षेत्रीय बोलियों के सुंदर शब्द, नए काव्यात्मक प्रयोग और विविध लोक-संवेदनाएँ हिंदी की मुख्यधारा में समावेशित होती रहती हैं, जिससे हिंदी भाषा निरंतर अधिक समृद्ध, लचीली और जीवंत बनती जा रही है।
एक समय था जब गंभीर साहित्य या कविता पढ़ने वाले लोगों को समाज में ‘पुराने ज़माने का’, ‘पिछड़ा’ या अति-बौद्धिक मानकर उपेक्षित कर दिया जाता था। परंतु आधुनिक डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों और सोशल मीडिया के नए माध्यमों ने इस पुरानी धारणा को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। आज के दौर में हिंदी कविता पढ़ना, सुनना या उसका वाचन करना युवाओं के बीच बेहद ‘कूल’, ‘ट्रेंडी’, ‘आधुनिक’ और ‘ग्लैमरस’ माना जाने लगा है। इस क्रांतिकारी सांस्कृतिक बदलाव में कई अभिनव डिजिटल पहलों और प्रतिष्ठित ऑनलाइन मंचों का अमूल्य योगदान रहा है। ‘रेख़्ता’ और ‘हिंदवी’ जैसे विशाल और कलात्मक डिजिटल संग्रहालयों ने उर्दू शायरी और हिंदी कविता को इतने सुंदर, सुगम, आधुनिक और आकर्षक रूप में प्रस्तुत किया है कि करोड़ों युवा रोज़ाना इन प्लेटफ़ॉर्मों पर जाकर कविताएँ पढ़ते और साझा करते हैं।
‘कविता कोश’ जैसे डिजिटल प्रयासों ने हिंदी साहित्य का एक विशाल और प्रामाणिक ऑनलाइन बैंक तैयार कर दिया है, जहाँ प्राचीन काल के कबीर, सूर, तुलसी से लेकर आधुनिक काल तक की प्रामािक कविताएँ एक क्लिक पर उपलब्ध हैं। इसी प्रकार ‘हिंदी कविता’ और ‘उर्दू स्टूडियो’ जैसे लोकप्रिय यूट्यूब चैनलों ने समाज की बहुचर्चित हस्तियों, अभिनेताओं और चिंतकों को हिंदी व उर्दू कविता के पाठ से जोड़ा, जिससे प्रभावित होकर लाखों नए युवा कविता पढ़ने और समझने की ओर स्वतः आकर्षित हुए। इन सभी आधुनिक डिजिटल मंचों ने युवा पीढ़ी के भीतर यह गहरा गर्वबोध जगाया है कि अपनी मातृभाषा और देश की समृद्ध साहित्यिक भाषा में कविता पढ़ना वास्तव में एक अत्यंत उच्च सांस्कृतिक, बौद्धिक और गरिमामय पहचान का प्रतीक है।
आज के इस बाजारीकृत दौर में जहाँ हर दूसरा व्यक्ति स्वयं को तुरंत लेखक, शायर या कवि के रूप में प्रस्तुत करने और वाहवाही लूटने की जल्दी में दिखाई देता है, वहीं ‘क से कविता’ जैसे कुछ अत्यंत समर्पित मंच भी संचालित हो रहे हैं जो विशुद्ध रूप से केवल पाठकों और श्रोताओं का मंच हैं। ऐसे मंचों पर लोग अपनी लिखी हुई कच्ची-पक्की रचनाएँ पढ़कर आत्म-मुग्ध होने या तालियाँ बटोरने नहीं आते, बल्कि वे कबीर, तुलसी, ग़ालिब, रश्मिरथी के दिनकर, निराला, मुक्तिबोध, अज्ञेय, अरुण कमल या अनामिका जैसे स्थापित और कालजयी कवियों की महान रचनाओं का पाठ करते हैं। जब एक युवा पाठक किसी महान कवि की रचना को बुलंद और संवेदनशील आवाज़ में पढ़ता या सुनता है, तो वह सैकड़ों वर्ष पुरानी उस समृद्ध साहित्यिक परंपरा, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत से सीधे जुड़ जाता है। ऐसे मंच व्यक्ति के भीतर पनपने वाले ‘लेखक होने के अहंकार’ को पूरी तरह समाप्त कर उसे एक अत्यंत ‘विनम्र, सचेत और समझदार पाठक’ बनाने का पावन कार्य करते हैं। और यह तथ्य सर्वविदित है कि एक अच्छा और विनम्र पाठक ही अंततः एक बेहतर इंसान, संवेदनशील नागरिक और समाज का सजग प्रहरी बनता है।
संक्षेप में कहा जाए तो कविता के पठन की यह अनवरत परंपरा केवल अतीत के किसी पुराने इतिहास का अवशेष मात्र नहीं है, बल्कि यह हमारे आने वाले भविष्य के सुंदर, न्यायपूर्ण और संवेदनशील समाज के निर्माण की एक अनिवार्य और प्राथमिक शर्त है। वर्तमान डिजिटल युग में जहाँ एक ओर सतही ज्ञान, उथले मनोरंजन और त्वरित प्रसिद्धि का गंभीर संकट मौजूद है, वहीं दूसरी ओर विपुल प्रामाणिक साहित्य की आसान उपलब्धता और नव-उन्मेषी डिजिटल मंचों ने कविता के व्यापक प्रचार-प्रसार के अभूतपूर्व नए द्वार भी खोले हैं। अरुण कमल, शीन काफ़ निज़ाम और नंदकिशोर आचार्य जैसे देश के वरिष्ठ साहित्यालोचकों के विचार हमें निरंतर यही याद दिलाते हैं कि कविता वास्तव में मनुष्यता की रक्षा का सबसे मजबूत आत्मिक कवच है। जब तक हमारे समाज में कविता निष्ठापूर्वक पढ़ी और सुनी जाती रहेगी, तब तक भाषा की प्राणवत्ता बची रहेगी, और जब तक हमारी भाषा और कविता बचे रहेंगे, तब तक मनुष्य के भीतर की करुणा, प्रेम, विवेक, सह-अस्तित्व और संवेदनशीलता पूरी तरह सुरक्षित रहेगी। हिंदी भाषा को समृद्ध और सशक्त करने के साथ-साथ कविता का यह निरंतर पठन हर पाठक को एक बेहतर, अधिक सचेत, करुणामय और संपूर्ण मनुष्य बनाने का ऐतिहासिक कार्य संपन्न करता है।

- प्रवीण प्रणव
समकालीन हिंदी साहित्य के बहुमुखी प्रतिभा वाले साहित्यकार हैं, जो अपनी कविताओं, ग़ज़लों और आलोचनात्मक आलेखों के लिए जाने जाते हैं। वे एक सॉफ़्टवेयर प्रोफेशनल हैं और एक बहुराष्ट्रीय संस्थान में आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। उनके दो काव्य संग्रह ‘खलिश’ और ‘चुप रहूँ या बोल दूँ’ प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी पुस्तक ‘लिए लुकाठी हाथ’ भी साहित्यिक गलियारों में चर्चा का विषय रही है।
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प्रवीण प्रणव का यह लेख कविता को केवल साहित्यिक विधा न मानकर मनुष्य की संवेदना, सामाजिक चेतना और आत्मबोध से जोड़ता है। लेखक ने वैदिक ऋचाओं से लेकर लोकगीत, भक्तिकाल और आधुनिक कविता तक पठन-वाचन की परंपरा की सार्थक पड़ताल की है। लेख का विशेष आकर्षण यह है कि इसमें तकनीक और सोशल मीडिया को कविता के लिए केवल चुनौती नहीं, बल्कि नए अवसर के रूप में भी देखा गया है। कविता की मानवीय भूमिका, कल्पनाशीलता और प्रतिरोध की शक्ति पर अनेक साहित्यकारों के संदर्भ लेख को व्यापक आधार देते हैं। समग्रतः यह विचारोत्तेजक लेख गंभीर काव्य-पठन की आवश्यकता को प्रभावशाली ढंग से रेखांकित करता है।
धन्यवाद।