पीयूष कुमार द्विवेदी 'पूतू' की एक ग़ज़ल 3
  • पीयूष कुमार द्विवेदी ‘पूतू’
एक कहानी हर दिल में है।
किसको पढ़ना मुश्किल में है।
मजबूर हुआ हालातों से,
इंसान छुपा कातिल में है।
चलती-फिरती लाश समझ लो,
जान मेरी उसके तिल में है।
आँख भरी हैं मीना खाली,
मातम कैसा महफिल में है।
तैर सफीना आया सागर,
लगता खतरा साहिल में है।
याद सदा आता राहों का,
लुत्फ कहाँ वो मंजिल में है।
जाग रही है दूर कहीं माँ,
नींदें बेचे सुत मिल में है।
पूरे साल अँँधेरा घर में,
रोशन पर बिजली बिल में है।

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