Wednesday, March 25, 2026
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सूर्यकांत शर्मा की कविता – युद्ध

युद्व की भीषणता
का बढ़ता जा रहा
शैतानी आकार।
दिन पर दिन
बारूदी सतह का
होता जा रहा
विस्तार।
हिंसा -हमला
घात- प्रतिघात
सुरसा मानिंद
बढ़ाते जा रहे
अपना हिंसक
व्यवहार।
साँसों पर
युद्ध जनित प्रदूषण
का शेषनागी अवतार
ज़कड़ता जा रहा
हलाहल विष सा
धिक्कार।
तिस पर भी
सत्ता-लिप्सा औ
लोलुपता-लम्पटता का
दिन दूना,रात चौगुना
बढ़ता जा रहा
अय्यारी अवतार ।

सूर्यकांत शर्मा
संपर्क – [email protected]
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2 टिप्पणी

  1. हमारे आस पास कई देशों में हो रहे युद्धों की विभीषिका से आज सारा संसार और सारी मानव जाति प्रभावित है। युद्ध जो अपने आप में समस्या होते हैं किसी समस्या का हल नहीं हो सकते। आपने इस सामयिक चिंतन को विचारोत्तेजक शब्द दिए हैं।

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