Wednesday, July 24, 2024
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अनूप सैनी ‘बेबाक’ की कविता – वे हाथ

वे हाथ जो जुड़े हुए थे अब तक
नमस्कार की मुद्रा में
जो उठ रहे थे सेवा में आम आदमी की
जो बांट रहे थे सब्जी-पूड़ी,केले, राशन
जो पिला रहे थे दारू
जो तैयार थे हर दम
आपके सुख-दुःख में
जो दे रहे थे धोक आपके पांवो में
वही हाथ ,
हाँ… हाँ.. वही हाथ…
अब हिलने लगे हैं टाटा बाय की मुद्रा में
…चुनाव जीतने के बाद
विजयी मुस्कान के साथ..
…और देखना चंद ही दिनों में
कानून की किताब पर हाथ रख कर
धर्म,सत्य और कर्त्तव्य निष्ठता की शपथ
लेने के बाद
कल उन्हीं हाथों में होंगी
बेंत.. लाठी..अथवा…डंडा
और ………हमेशा की तरह
..पीठ होगी तुम्हारी ही हर बार।।
अनूप सैनी ‘बेबाक’
हिंदी व्याख्याता,
राज. सरकार
9680989560
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