हरेक शहरों में ऎसी कुछ जगहें होती हैं जहाँ लोगों की चहल पहल स्वमेय मूर्त होने लगती है । पार्क की गिनती उनमें से सबसे मुफीद जगहों में हो तो इसे मानने के लिए मन कभी हिचकता नहीं । इस छोटे शहर के हिस्से इतनी कम मुफीद सी जगहें आयी हैं कि गिनती की जरूरत पड़े। ऐसे में लोगों के लिए जगहों को चुने जाने के विकल्प का तो कोई सवाल ही नहीं उठता। इसलिए जगहों के मामले में छोटे, बड़े , साधारण , सुन्दर , बहुत सुन्दर जैसे वर्गीकरणों की जरूरत ही नहीं पड़ी इस शहर को कभी । ऐसे में बचती है तो बस एक ही जगह … कमला नेहरू पार्क ! विकल्पहीन लोगों के लिए यह जगह ऎसी कि आते जाते कोई ऐसा नहीं बच सका कि इस पर उसकी नज़र इनायत न हुई हो । ऊपर से नाम भी बहुत प्यारा …कमला नेहरू पार्क सुनने के लिए ध्यान न भी लगाएँ तब भी पार्क के भीतर आते जाते लोगों की जुबान पर उठती इस नाम की आवाजें कानों तक पहुँच ही आती हैं । 
कहाँ से आ रहे हो भाई?”…एक प्यारी सी आवाज़ उधर से सुनाई देते ही कोई कह उठेगा ….”कमला नेहरू पार्क !”
नामों से भी सभ्यता के तार जुड़े होते हैं । यह बात उतना ही सत्य है जितना कि हम सबका किसी न किसी मां के गर्भ से जन्म लेने की कथा। इस नाम का जिक्र जब कानों में सुनाई देता है तो देश की आजादी के पहले और उसके बाद की कई-कई यादें भी लोगों के जेहन में उभरने लगती हैं। आज़ादी के बाद अपने को संभालता हुआ एक प्यारा सा देश जिसकी झोली में आजादी के संघर्ष की कई कई कहानियाँ हैं। इसी देश का तिल भर हिस्सा ही तो है यह शहर । संघर्ष की कहानियों का जिक्र हो तो उसके साथ सैकड़ों नाम भी अपने आप कानों के करीब आ पहुँचते हैं। जैसे कि कमला और नेहरू, जैसे कि इस शहर के बीचों बीच इस नाम का बना यह पार्क । गौर फरमाया जाए तो कमला नेहरू पार्क के अहाते के बाहर बने फूटपाथ के दृश्य इस शहर की सामाजिक परिस्थितियों को कुछ हद तक परिभाषित कर देते हैं। इस शहर के बहाने देश की स्थिति भी आंखों के सामने मूर्तमान होने लग जाती है । ये अलग बात है कि जब से व्हाट्सअप्प यूनिवर्सिटी में लोगों ने दाखिला लिया है उनके हिस्से का समय छीन गया है।समय के अभाव में इस तरह के दृश्यों पर गौर फरमाने वालों की कमी हो गयी इस शहर में। दृश्य पर किसी की नज़र भले ही न जाए पर वह सशरीर कभी न कभी फूटपाथ वाली इस जगह पर जरूर पहुंचा हुआ होता है । यहाँ तक पहुँचने के भी कई रास्ते हैं जो जरूरतों से होकर गुजरते हैं … कभी चप्पल तो कभी जूते सिलवाने। कभी जूतों पर पॉलिश करवाने। कभी फुलकी चाट खाने । कभी फल खरीदने तो कभी टेकू की दुकान पर चाय का आनंद लेने । जरूरतें दुनिया के हर एक कोनों में आदमी को पहुंचा सकती हैं । फिर यह तो एक मामूली सा शहर है। हर बार जरूरतों से होकर गुजरने वाले रास्तों से ही चलकर लोग यहाँ फूटपाथ तक पहुंचते हैं । यह फूटपाथ उन्हें एक चलता फिरता बाज़ार जरूर नज़र आता है पर वहां बैठे लोग व्यापारी की तरह कभी नज़र नहीं आते उन्हें। जैसे और लोगों की दुकानें हैं यहां , वैसे ही टेकू की भी एक दुकान है । चाय की दुकान । दुकान क्या है, बस यूं कहिये कि फूटपाथ पर पसरी बिना किराये वाली एक मुफ्त की जगह । अगर किराया देना पड़ता तो इस शहर में क्या , दुनिया के किसी भी शहर में टेकू की कभी कोई चाय की दुकान आकार ही न ले पाती । अल्फ्रेड को यह सोचकर अच्छा लगता है कि दुनिया में टेकू की भी एक चाय की दुकान है, जहाँ सन्डे को चर्च से लौटते वक्त वह थोड़ी देर आकर सुकून से बैठ लेता है। 
अल्फ्रेड की नज़रों में सुकून के भी कई रूप हैं जैसे कि चाय पीने का सुकून । लोगों की गपशप सुनने का सुकून। शहर में घटित हो रहे प्रेम के नए नए किस्से कहानियाँ जानने सुनने का सुकून। राजनीति की कहानियाँ बांचते लोगों की फिजूल बातों का मजा लेने का सुकून। 
चर्च में फादर डिसूजा कहते हैं कि जीवन में कुछ हो न हो, सुकून जरूर होना चाहिए। अल्फ्रेड को फादर की बातों के भीतर भी एक सुकून की जगह नज़र आती है । एक अमूर्त और सुरक्षित सी जगह। इस जगह को छीना झपटी और बेजा कब्ज़ा करने के लिए फिलहाल दूर दूर तक कोई नज़र नहीं आता इस भूमाफियाओं वाले शहर में। 
कई बार उसे लगता है कि सोनालिया डिसूजा के संग उसकी मुलाकातों में भी ऎसी ही एक सुकून से भरी अमूर्त सी जगह आकार लेने लगी है। इस जगह को वह सपनों में देखता है जो उसकी पहुंच से कोसों दूर है अभी। जरूरी नहीं कि हर सुकून वाली जगह तक आदमी पहुंच सके।जरूरी नहीं कि हर सुकून वाली जगह सुरक्षित हो। उसे कभी कोई छीन भी तो सकता है।सोनालिया डिसूजा के संग मुलाकातों से जन्मी जगह को लेकर वह कई सवालों से अपने को घिरा हुआ भी पाता है।
अल्फ्रेड ने जीवन में सुकून की जगहें तलाशीं नहीं कभी। बल्कि जहाँ जहाँ उसे सुकून मिला उसे ही अपना ठीहा बनाता गया वह। इन जगहों में एक टेकू की चाय की दुकान भी है जो आते जाते उसका ठीहा बन गया है । अल्फ्रेड को लगता रहा है कि लोगों की सामूहिक बैठकी से ही शहर की तासीर निकलकर बाहर आती है । इस बैठकी के लिए जीसस को एक मूर्त सी जगह तो देनी ही पड़ती लोगों को, सो उसने टेकू को यह जगह उपहार में दे दी होगी शायद । अल्फ्रेड की आस्था बचपन से ईश्वर पर रही आई है, सो जीसस का जिक्र आते ही उसको एक नई ऊर्जा मिलती है। उसे लगता है जैसे यही वो जगह है जहाँ अपने सुप्त होते जीवन को वह गति देने के लिए एक नई ऊर्जा हासिल कर सकता है । 
जीवन की जद्दोजहद का जिक्र हो और डायनों का जिक्र न हो, ऐसा कभी संभव नहीं। महंगाई डायन का चेहरा चौक चौराहे पर टंगा हुआ न भी दिखे तो भी उसका भय लोगों के चेहरे पर टंगा हुआ दिख जाता है इस शहर में। अल्फ्रेड के चेहरे पर भी उस भय को देखा जा सकता है।
पिछले कई सालों से चीजों की कीमतें बढ़ती ही गयी हैं, पर दस पंद्रह सालों से अल्फ्रेड देख रहा है कि टेकू की दुकान पर हाफ कट चाय की कीमत एक ही जगह अटकी पड़ी है । न वह ऊपर जा रही , न नीचे आ रही । एकदम स्थिर। पांच रूपये की एक हॉफ कट चाय । इसे नीचे ले जाने की कल्पना एकदम अमानवीय लगती है। अल्फ्रेड की नज़र में महंगाई डायन वाले इस युग में इसका स्थिर होना भी उतना ही अमानवीय है। इस सोच को लिए टेकू की दुकान पर बैठे बैठे कई बार इतिहास में वह दस-पंद्रह बरस पीछे लौटता है और वर्तमान की धुरी पर फिर धीरे से सरक आता है । यह क्रिया उसे एक खेल की तरह लगती है । समय के भीतर डोलते रहने जैसा एक अरुचिकर खेल। इस खेल में नफे नुकसान का आकलन वह चाहकर भी नहीं करना चाहता । वह इस बात पर जाना नहीं चाहता कि फलां होटल में हाफ कट चाय दस रूपये की आती है और यहाँ पांच रूपये में क्यों ? इस बात पर न जाना चाहते हुए भी टेकू की देह पर टंगी पैबंद लगी पुरानी कमीज उसकी आँखों के सामने अक्सर घूम जाती है ।”प्यार”अल्फ्रेड की नज़रों में   तेजी से गुम होता  जा रहा एक शब्द है। तब भी न जाने क्यों इस प्यार नामक शब्द को टेकू की पैबंद लगी कमीज से जोड़कर देखने का एक नज़रिया उसके भीतर जन्म लेने लगा है आजकल। 
आदमी के भीतर का प्यार, आदमी को एक पका हुआ व्यापारी बनने से रोक देता होगा शायद ! 
प्यार का जिक्र आते ही अल्फ्रेड कई बार चौंक पड़ता है।उसकी आँखों के सामने जीवन में अर्जित की गयी सुकून भरी वो सारी अमूर्त जगहें एकाएक आकार लेने लग जाती हैं।उसे आखिर किससे प्यार है? …टेकू से, जिसके पास वह हर सन्डे आकर बैठता है ? सोनालिया डिसूजा से, जिसके आकर्षण में वह हर सन्डे चर्च जाने की प्रतीक्षा करता रहता है ? अपनी पत्नी सुहेमा जार्ज से, जिसकी महंगी जरूरतों को पूरा करने के लिए ऑफिस में रात दिन वह ऊपरी कमाई के चक्कर में गलत रास्तों पर चल पड़ा है। या फिर फादर डिसूजा से जिनकी बातें उसे सुकून से भर देती हैं । आखिर जीवन में किससे करता है वह प्यार ? ‘लव इज गॉड’ कोटेशन को आखिर किसने और क्यों कहा होगा?  ‘प्यार ही ईश्वर है!’ …प्यार के इस सामान्यीकृत परिभाषा को लेकर उसके मन में आजकल उथल पुथल सी मची रहती है । 
आजकल एक समय में एक स्त्री के कई कई पुरुषों से या एक पुरूष के कई कई स्त्रियों से प्यार हो जाने की कथाएं भी उसे सुनाई पड़ती हैं। अल्फ्रेड , सोनालिया डिसूजा को लेकर अपने भीतर जिस प्यार को महसूस करता है क्या इस परिभाषा से वह मेल खाता है ? प्यार को लेकर अब वह बहुत कन्फ्यूज्ड भी रहने लगा है। 
उसके भीतर मचे कन्फ्यूजन के पेरेलल टेकू की चाय की दुकान पर लोग प्रेम कहानियों के नए नए किस्से सुनने सुनाने में मशगूल रहते हैं । वह इस बात को लेकर भी कन्फ्यूज्ड रहने लगा है कि लोग जिसे प्रेम कहानियां कह रहे , वह प्रेम कहानियाँ हैं भी ? अगर प्रेम कहानियाँ हैं तो इस शहर में घटित होने वाली ज्यादातर कहानियों के अंत में लड़की की ह्त्या या फिर लड़के-लड़कियों के बीच ब्रेकअप की घटनाएं क्यों जुड़ जाती हैं ! प्यार को एक हल्के शब्द के रूप में परिभाषित करने वाली इन कहानियों को ध्यान से सुनने का आदी तब भी वह क्यों होता जा रहा ? अल्फ्रेड कई बार यह सवाल खुद से करता है और सोनालिया डिसूजा का चेहरा उसकी आँखों के सामने कुछ देर के लिए फिर घूम जाता है।
प्यार के भी कई रूप हैं। किसी इंसान को किसी दूसरे इंसान से प्यार हो सकता है। अल्फ्रेड को कई बार यह भी लगता है कि निर्जीव चीजें अब इंसानों की जगह ले रही हैं।
अल्फ्रेड की पत्नी को निर्जीव चीजों से बहुत प्यार है। अल्फ्रेड से भी ज्यादा। क्यों? अल्फ्रेड यह जानना नहीं चाहता। कई बार जानने के रास्ते दुख से भरे हुए भी हो सकते हैं। उन रास्तों पर न चलो तो दुखों से बचा जा सकता है। अल्फ्रेड को पता है कि इन रास्तों से सुकून की जगहें जन्म नहीं ले सकतीं । 
टेकू की चाय की दुकान पर बाकायदा चार छः कुर्सियां पड़ी मिलती हैं और दो तीन बेंच । शहर के मोटे और थुलथुले सेठ-व्यापारी सुबह सुबह मोर्निंग वाक से निपटकर जब इन कुर्सियों पर आ धमकते हैं, उस वक्त टेकू की यह चाय की दुकान सचमुच दुकान की तरह लगने लगती है । कई तो इन कुर्सियों को अपनी बपौती भी समझते हैं । कोई नया आदमी बैठा हुआ दिख जाए तो ये उसे उठाकर भी बैठ जाते हैं । इन्हीं थुलथुले सेठ-व्यापारियों से टेकू की आजीविका चलती है ऐसा भी नहीं , उसकी आजीविका में सर्वहारा वर्ग के वो युवा, अधेड़ और बूढ़े भी शामिल हैं जो यहाँ बैठकर चाय पीते हैं, सिगरेट का कश खींचते हैं और नाक से धुंआ उड़ाकर जीवन को हल्का बनाने की कोशिश करते हैं । इनकी ख़ास विशेषता यह है कि इन्हें अखबार पढ़ने की लत है और उन्हें मालूम है कि टेकू की चाय की दुकान पर छोटे बड़े हर अखबार पढ़ने को मिल जाती हैं। इसलिए भी लगभग हर रोज वे यहां धमक आते हैं।
इस वर्ग के लिए राजनीति इतना प्रिय बिषय क्यों हो गयी, यह बात अल्फ्रेड को समझ में अभी तक नहीं आ सकी । इनमें से कुछ लोगों को चाय पीते-पीते अल्फ्रेड ने दलगत राजनीति पर बहस करते भी कभी कभी सुना है। कुछ को तीन तलाक और लव जेहाद को लेकर उलझते हुए भी देखा है । पिछले सत्तर सालों में ये हुआ, ये नहीं हुआ, यह मुद्दा भी उन्हें आपस में रमाये रखता है । गरीबी , बेरोजगारी , महंगाई , सामाजिक अत्याचार इत्यादि से आजिज़ आ चुके आदमी को जीवन जब अधिक कठिन लगने लगे तो वह सुकून की जगहें तलाशता है । यहाँ के दृश्य देखकर अल्फ्रेड को लगता है कि यहां आने वाले हर आदमी की नज़र में सुकून की जगहें भिन्न भिन्न हैं, जहाँ वह ठहरकर रम जाना चाहता है।इनकी त्रासदी यह है कि जहाँ से जीवन में कठिनाईयां शुरू हुई हैं ये लोग उसी दिशा में दौड़ लगाते हुए दिखाई पड़ते हैं । राजनीति,मीडिया, बेकार की बहसें …. कमोबेश ये सभी सुकून की जगहों को अतिक्रमित कर रही हैं, इसके बावजूद उनमें भी लोग सुकून की जगहें तलाश रहे हैं। अल्फ्रेड के लिए प्यार के साथ साथ यह मसला भी एक अबूझ पहेली है।
अपने जीवन में प्यार को तलाशते हुए, प्यार की कहानियां सुनते हुए उसे एक अरसा बीत गया पर प्यार को लेकर मन के भीतर बहुत कुछ आज भी अटका रह गया है जो अल्फ्रेड को परेशान करता है । 
यहाँ आकर बैठते हुए इतने लम्बे अरसे में प्यार को लेकर बस वह इतना भर समझ सका है कि जिस तरह इंसान सुकून की जगहें ढूँढ़ता फिरता है उसी तरह प्यार भी इंसानों के भीतर अपनी जगहें तलाशता रहता है। जरूरी नहीं कि उसे वो जगहें मिल ही जाएं ।  फादर ने भी यही तो कहा था उससे जब उसने सोनालिया डिसूजा को लेकर उनसे अपने मन की बात कह डाली थी।
वह फादर की बात आजतक नहीं भूल सका है
हर आदमी एक दूसरे में अपने लिए प्यार की जगह तलाशता है, पर एक व्यापारी की तरह! जितना देना है, उससे हर एक को कुछ ज्यादा ही चाहिए। फिर यहीं से तो चीजें दरकने लगती हैं। जरूरी नहीं कि सोनालिया डिसूजा तुमसे प्यार करती ही हो ।जरूरी नहीं कि तुम सोनालिया डिसूजा से प्यार करते ही हो। हो सकता है तुम दोनों के भीतर एक व्यापारी छुपा हो जो तुम्हें आपस में एक दूसरे के करीब ला रहा हो ।  
फादर की बातों को लेकर अल्फ्रेड अपने ऊपर कभी परीक्षण करने की कोशिश नहीं करता। उसे डर लगता है कि उसका प्यार दुनिया के उस सामान्यीकृत परिभाषा ‘लव इस गॉड’ से कहीं परे तो नहीं ! अल्फ्रेड को फादर की बातें सच लगती हैं जब वह टेकू की पैबंद लगी कमीज को देखता है और अपनी पत्नी की असीमित जरूरतों से उसकी तुलना करता है ।पत्नी की जरूरतें उसे किन रास्तों पर ले जा चुकी हैं यह सोचकर ही वह शर्म से डूबने लगता है कभी कभी। इन रास्तों ने उसे इंसानों से कितना दूर कर दिया है । उन इंसानों से जिनके भीतर भी एक ईश्वर के बैठे होने की कहानी दुनिया में जीवित है । उन इंसानों के साथ साथ उनके भीतर बैठे ईश्वरों से भी तो वह कितना दूर होता चला जा रहा है, उनके प्यार से भी वह कितना दूर छिटक गया है ।    
उसे  महसूस होता है कि अपने ग्राहकों के लिए टेकू का प्यार दुनिया में किये जाने वाले किसी भी प्यार से सबसे ऊपर है। “लव इस गॉड” की परिभाषा से पूरी तरह बंधा हुआ प्यार। 
पूरी दुनिया आज व्यापार की जद में आ गयी पर टेकू ? …..वह आज तक व्यापारी नहीं बन सका और शायद इसलिए उसकी देह पर पैबंद लगी कमीज भी कभी दूर न हो सकी !
फादर डिसूजा भी तो अपने फॉलोवर्स से उसी तरह प्यार करते हैं जिस तरह टेकू अपने ग्राहकों से करता है।
क्या कभी वह इन दोनों की तरह जीवन में हो सकेगा?
टेकू को भी तो इस महंगाई डायन वाले समय में अपने ग्राहकों से”लव इस गॉड” की परिभाषा से बंधा हुआ प्यार चाहिए! क्या पाने से ज्यादा कोई लौटाएगा उसे ? 
आजकल टेकू की दुकान पर बैठे बैठे इस तरह के विचार अल्फ्रेड के दिलों दिमाग पर कौंधने लगते हैं और फिर अचानक उसकी आँखों में टेकू की पैबंद लगी कमीज   चुभने लगती है।
रमेश शर्मा
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