संवेदनाओं के महल
बनते बहुत है,
पर कब मड़ई की तरह
ढह जाते है,
कोई नहीं जानता !
जब एक लड़की
तडप रही सड़क किनारे ऐसे,
जैसे झुलसती लू में वृक्ष,
जिस पर गिराया
गया था तेजाब,
सभी टकटकी लगाकर
देख रहे ऐसे
जैसे परीक्षा का पेपर,
उसकी मदद कौन करेगा
कोई नहीं जानता !
जब एक युवक
हुआ दुर्घटनाग्रस्त,
खून से लथपथ
जैसे रक्तिम अरुणिमा से युक्त,
पास से गुजर रही
सरसराती गाडियाँ,
इंसान कहना और इंसान होना
में बहुत बड़ा फर्क है,
मानवीय संवेदनाओं की नींव
पल में उघङ गई ,
वह कब मर गया
कोई नहीं जानता !
जब एक अंधा इंसां
नहीं कर पा रहा सड़क पार,
बेटे से मिलने जाना था अस्पताल,
रो रहा ऐसे
जैसे ओस के कण
फ्तों से लगातार गिर रहे,
सुबह से शाम तक
सड़क किनारे खड़ा रहा,
कब, कौन आकर,
उसको कुचल गया
कोई नहीं जानता !
कोई नही जानता
कि परतें बनती जाती है,
और एक दिन,
कवि भी कविता
लिख देता है
कोई नही जानता !
बबिता कुमावत
सहायक प्रोफेसर
राजकीय महाविद्यालय नीमकाथाना सीकर
सुंदर सृजन , संवेदनाओं की माचिस तो सील चुकी है मानवता के दीपक कौन जलाए कैसे जलाए
बहुत ही शानदार कविता
सुंदर रचना