होमकवितासूर्यकांत शर्मा की कविता - आँखें कविता सूर्यकांत शर्मा की कविता – आँखें By Editor March 9, 2024 1 206 Share FacebookTwitterPinterestWhatsApp अनंग ख़्वाब की प्यास जगाती आँखें। अभिसार आमंत्रण देती आँखें। आप्त काम सी काम कमान आँखें। भविष्य आंकती आँखें जीवन बरगद ताकती आँखें। जीवन समर झांकती आँखें। सृजन विहंगम दृश्य निहारती आँखें। साहिर की सहर का इंतज़ार करती आँखें। आधी आबादी को समान अधिकार का सपना संजोती आँखें। कितने कितने सपनों को संवारती आँखें। आँखों को आँखों से बुहारती आँखें। आँखों ही आँखों में समझाती आँखें। सूर्यकांत शर्मा संपर्क – [email protected] Share FacebookTwitterPinterestWhatsApp पिछला लेखअर्चना उर्वशी का गीत – मन की घटाएंअगला लेखश्यामल बिहारी महतो की कहानी – तबादले के बाद Editor RELATED ARTICLES कविता रितेश ऽ निगम की कविता – यादों के तार February 8, 2026 कविता कमलेश कुमार दीवान की नज़्म – ओ दस्तगीर February 8, 2026 कविता चित्रा देसाई की कविताएँ February 8, 2026 1 टिप्पणी अच्छी कविता है सूर्यकांत जी आपकी!आपकी कविता को पढ़कर आंखें पिक्चर की याद हो आई !उसमें गाना था -उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता।…… उसकी एक पंक्ति है- “हर तरह के जज़्बात की है ऐलान हैं आंखें” वही भाव महसूस हुआ। जवाब दें कोई जवाब दें जवाब कैंसिल करें टिप्पणी: कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें! नाम:* कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें ईमेल:* आपने एक गलत ईमेल पता दर्ज किया है! कृपया अपना ईमेल पता यहाँ दर्ज करें वेबसाइट: Save my name, email, and website in this browser for the next time I comment. Δ This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed. Most Popular कविताएँ बोधमिता की November 26, 2018 कहानीः ‘तीर-ए-नीमकश’ – (प्रितपाल कौर) August 5, 2018 अपनी बात…… April 6, 2018 पुस्तक समीक्षा – डॉ अरुणा अजितसरिया एम बी ई April 6, 2018 और अधिक लोड करें Latest रितेश ऽ निगम की कविता – यादों के तार February 8, 2026 कमलेश कुमार दीवान की नज़्म – ओ दस्तगीर February 8, 2026 दिलीप कुमार का व्यंग्य – माफी की दुकान February 8, 2026 डॉ मुकेश असीमित का व्यंग्य – हुक्का-वार्ता February 8, 2026 और अधिक लोड करें
अच्छी कविता है सूर्यकांत जी आपकी!आपकी कविता को पढ़कर आंखें पिक्चर की याद हो आई !उसमें गाना था -उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता।…… उसकी एक पंक्ति है- “हर तरह के जज़्बात की है ऐलान हैं आंखें” वही भाव महसूस हुआ। जवाब दें
अच्छी कविता है सूर्यकांत जी आपकी!आपकी कविता को पढ़कर आंखें पिक्चर की याद हो आई !उसमें गाना था -उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता।……
उसकी एक पंक्ति है-
“हर तरह के जज़्बात की है ऐलान हैं आंखें”
वही भाव महसूस हुआ।