होम कविता अर्पणा शर्मा की कविता- अनंत कैद – पंगुता

अर्पणा शर्मा की कविता- अनंत कैद – पंगुता

4
68
परकटे परिंदे की तरह,
खंडित- पंगु शरीर में,
जब आत्मा फड़फड़ाती है,
तब मुझे उनकी व्यथा
समझ में आती है…
पंगुता का अभिशाप
लील लेता है पूरे जीवन को,
केवल असीम दृढ़ता ही
इससे पार पा पाती है…
हर तरफ हैं सैकड़ों प्रश्न:
क्यों..? कैसे..? क्या..?
सिर उठाकर इनका जवाब देने की हिम्मत,
बिरलों में ही आ पाती है…
मौका नहीं चूकते लोग –
हीनता का अहसास कराने का,
नीचा दिखाने का,
इसका फायदा उठाने का,
अटूट साहस और अदम्य जीजिविषा ही,
इसका डटकर सामना कर पाती है…
गहन जख्म दिये हैं
जिन्होंने दुखित ह्रदय को,
एक संस्कारी, धीर-गंभीर चेतना ही
उन्हें क्षमा कर पाती है…
छिन्न-भिन्न अंतस के टुकड़े,
सहेज कर आगे बढ़ती हूँ.
भग्न ह्रदय से,
जीवन का गीत रचती हूँ
पास ना आये हताशा,
दूर रहे निराशा,
एक दृढ़ इच्छाशक्ति ही चट्टान की तरह
वहाँ अडिग रह पाती है
जहॉँ आशा की नन्ही लौ टिमटिमाती है
औ’ आगे बढ़ने की राह दिखाती है…
अधिकारी, सूचना प्रौद्योगिकी, देना बैंक, भोपाल. संपर्क - arpanasharma.db@gmail.com

4 टिप्पणी

  1. अपर्णा आपकी कविता ने मन को भावुक कर दिया
    सुंदर रचना के लिए धुबकामनाएँ
    Dr Prabha mishra

    • प्रभा जी धन्यवाद। अर्पणा (अपर्णा नहीं) आप ही के शहर से हैं। आपका स्नेह उन्हें अवश्य पसन्द आएगा।

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.