(दृश्य एक)
हाथों में मिठाई का डिब्बा लिए नीलिमा उत्साहित स्वर में बोलते हुए कमरे के अंदर आई, पता है सुहासिनी,  सुहासिनी -क्या????
नीलिमा -तस्विन भैया ने शादी के लिए हाँ कर दी
सुहासिनी -अपने अंतस के सात दरवाजे के भीतर छिपे प्रेम के बिखराव को सँभालतीं हुई, हाथ में लिये भूरे रबर बैंड को खींचतान कर बाल में लगाने की बेवजह कोशिश करती हुई कहती
 “अच्छा तो तुम्हारे भैया तैयार हो गए घोड़ी चढने के लिए “
नीलिमा -हाँ हाँ सुहासिनी पहले तो मना कर रहे थे
ऐसा तेवर दिखाते थे जैसे शादी ही नहीं करेगें पर भाभी को देखते ही प्रेम के पंख फैलाए आकाश में उड़ने लगे, ये सब सुन निशंक टीस में डूबती जा रही सुहासिनी ने बड़ी  सतर्कता  के साथ नीलिमा का हाथ अपने हाथों में ले, “अरे जरा हमें भी बताओ कौन हैं वो मोहतरमा??? क्या नाम है उनका????”
नीलिमा -वो बनारस वाली मौसी के कोई रिश्तेदार की बेटी है, प्रेरना नाम है उनका..  पता है उस बड़ी बड़ी आम के फाँकों जैसी आँखों वाली ने जैसे ही अपनी मीठी आवाज़ में एक गाना सुनाया, भैया ने सारे तेवर ताख पे रख दिए झट शादी के लिए हाँ कर दी, उसकी बड़ी बड़ी आँखो एवं गालों में हँसी के गड्ढे ने सचमुच सबका मन मोह लिया, अम्मा तो जब से बनारस से आई तब से उनकी तारीफो के अध्याय पूरे मनोयोग से मंत्रमुग्ध हो पढ़े जा रहीं हैं..
ये  सब सुन भीतर ही भीतर चिलक उठी सुहासिनी एक उदास मुस्कान अधरों पे सजाए बोली – “ए जरा फोटो तो दिखाओ अपनी प्रेरना भाभी की”
नीलिमा – अरे मोबाइल अम्मा के कमरे में पड़ा है..
सुहासिनी -अपने  मनोभाव को छिपाने की कवायद में नीलिमा के हाथों से मिठाई के डब्बे से एक बड़ा कलाकंद अपने मुँह में डालती हुई बोली – ये शगुन वाली सबसे बड़ी पीस शादी तय होने की खुशी में मेरे मुँह में – कुछ इस तरह अभिनय करती अपने रुआंसी चेहरे पे चहक का वरक चढाती है..
पीछे से अम्मा आई कमरे में – अरे सुहासिनी आज तो मै बहुत खुश हूँ,  आखिर मेरे तस्विन को लड़की पसंद आई, अम्मा उत्साहित स्वर में मेरी बहू के लिए साड़ी अँगूठी तो तुम्हें ही पसंद करके लाना है, तुम्हारी पसंद हम सबको बड़ी भाती है..
सुहासिनी –  उत्सव प्रिय आनंदमयी लय के स्वाँग में अम्मा से गलबहियाँ करती कहती है, ” हूँ अम्मा अब तो तू बहू वाली हो गई “
“अम्मा -अच्छा हां, उत्सव गीत तैयार कर लेना शादी में गाने के लिये..”
सुहासिनी – अंदर से टूटती, दरकती गर्दन हिलाती हुई हुक्म की तामील होगी अम्मा”
अम्मा- “सुहासिनी के सर पे हाथ रख वात्सल्य भाव से देख बुरा न मानना तू मेरी किरायेदार नहीं बिल्कुल बेटी है, तभी ऐसे कह देती हूँ”  अच्छा सुन बगीचे से पपीता लाई हूँ जल्दी आ जाओ मेरी तरफ सब साथ में खाते हैं
अम्मा और नीलिमा कमरे के बाहर जातीं, सुहासिनी उन्हें नम आँखों से बाहर जाता देखती  फिर अगले ही पल मुँह में अपनी  ओढनी भर फफक फफक कर रोने लगती, शायद उसके अंतस के सात दरवाजोंं के भीतर छुपा तस्विन के प्रति लगाव कचोट रहा था उसे..
अचानक नीलिमा के पायल की छन छन उसके कानों में पड़ती वो झट बिस्तर से नीचे खड़ी हो खुद को सुनियोजित करने के क्रम में अपने पैर के नाखून फर्श पे पड़ी दरी पे गड़ाती हुई कुछ झुककर बिस्तर पे लगी चादर को ठीक करने का अभिनय करती हुई,  अरे नीलिमा तुम  क्या हुआ?? कुछ रह गया था क्या कमरे में???
 नीलिमा – “नहीं नहीं”  मोबाइल दिखाते हुए, “फोटो देख लो प्रेरना भाभी की”
सुहासिनी हाथों में मोबाइल ले, मुंडेर पे जल रहे अधबुझे दीये की तरह शांत नीरीह सी, उसके अंतस में सात दरवाजो में छिपा प्रेम सन्निपात की अवस्था में है, लेकिन वो प्राणो में कसक लिए मीठी सी आवाज़ मे कहती है, “अरे हाँ सचमुच बड़ा अच्छा मुस्कुराती है तेरी प्रेरना भाभी”
नीलिमा – पैसो का पैकेट देती हुई, “अम्मा ने साड़ी लाने के लिये पैसे दिये हैं”
 सुहासिनी पैसे को मुट्ठी में भर अपनी ही नियति पे किंकर्तव्यविमूढ सी बोली, “ठीक है कल लाती हूँ”
अगले दिन आद्रता से युक्त खाली मन लिए सुहासिनी अपने ही शहर की किसी दुकान में अंतस का हूक गटकते हुए, “भैया गाढे रंग में कांजीवरम या बनारसी, सिल्क की साड़ियाँ दिखाओ,,
(दृश्य दो)
वधू आगमन की पूर्व रात्रि को सुहासिनी मोहम्मद रफी के गानों को सुन आँखे नम करती रही, छत पे घूम घूम निहारती रही चांद को बड़ी  बेचैनी से  याद करती उन पलो को जबपिछले बरस गुप्तार घाट पे तस्विन ने जबरदस्ती उसे प्याज की पकौड़ियाँ खिलाई और अम्मा से बड़े ही अधिकार पूर्वक स्वर में कहा था, “अरे अम्मा इसको आदत डालनी पड़ेगी प्याज खाने की”
अँखियों में प्रश्न लिए खुद को ही कोसती आखिर क्यूँ मैं कुछ बोल नहीं सकी? न ही तस्विन कुछ पूछ सके, बस नेत्र ही प्रयासरत रहे हमेशा,, इसी कश्मकश में पूरी रात बीत जाती है..
अगली सुबह वो धानी रंग की साड़ी पहन छोटी सी बिंदी लगा, मैंचिग चुड़ियाँ पहन सज धज के वधू आगमन डायरीहाथ में ले  पहुँच जाती नीलिमा के आंगन में..
एक हाथ में चाय की केतली दूसरे हाथ में समोसे की प्लेट लेकर सबको बाँटती सक्रियता के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का अभिनय करने लगी…
चारो तरफ हो रहे प्रेरना-तस्विन के नाम के हास परिहास शूल की तरह उसके मन पे चुभ रहे थे, वो अपने दबे प्रेम को विसर्जित कर पाने में असफल होती जा रही थी..
तभी उसके कानों में आवाज टकराई “दुल्हन वाली गाड़ी आ गई, दुल्हन वाली गाड़ी आ गई”
सारी औरते घर की बाहर की ओर निकलते हुए पर वो खिड़की के पास खड़ी रही चाहते हुये भी बाहर न आ पाई..
आखिर ईर्ष्या ने अतिक्रमण कर ही लिया उसके मन पे  वो बाहर की ओर ऐसे देख रही “जैसे उसके जीवन के अमंगल का कोई अशुभ प्रतीक प्रेरना (दुल्हन)  के रूप में प्रत्यक्ष आ गया हो, पीछे से नीलिमा हाथों में तशतरी, चावल कलश, सूप लिए उसका आंचल खींच बोली, “सुहासिनी चलो बाहर  प्रेरना भाभी आ गई”
सुहासिनी उसे झटक कर टीस मिश्रित वेदना के साथ बोली, “नहीं तुम जाओ, मैं बाहर नहीं आऊगीं”
नीलिमा – पहले तो कुछ असहज हुई, पर शीघ्र ध्यान न देते हुए बाहर की ओर चल पड़ी..
(दृश्य तीन)
अम्मा नीलिमा सहित सारी औरते मंगल का पर्याय बनी नई दुल्हनियाँ को घर में प्रवेश कराते हुए, सीधे पूजा घर में ले गई, सुहासिनी दूर कमरे की खिड़की के पास खड़ी स्तब्ध सी  पर अगले ही पल कही कोई मेरे मन का भेद जान  न ले, ये सोच फुर्ती के साथ पूजा वाले घर में जाती  उत्सव के माहौल को उन्नत करती ताली बजाती हुई गीत गाने लगती, पर ज्यो ही अवगुंठन में छिपे प्रेरना के मुस्कुराते चेहरे पे नजर पड़ती, न चाहते हुए एक टीस दहक जाती उसके भीतर वो बिल्कुल शांत हो जाती, बगल में बैठी सुधा भाभी केहुनी से उसे हिलाते हुए – क्या हुआ सुहासिनी???
सुहासिनी -” नहीं भाभी कुछ भी तो नहीं” कहते हुए ताली बजाके गाने लगती उत्सव के इस झिलमिल स्पंदन में चारो ओर प्रेरना-तस्विन के नाम के हास-परिहास-चुटकी को सुन वो स्नेह धीरज, सहिष्णुता को अपनाती हुई एक विक्षिप्त प्रतिक्रिया में हल्के से मुस्कुराती, पर अन्ततः अपने भीतर उफनते पीड़ा, ईर्ष्या के समुद्र से व्यथित हो झटके से खड़ी हो नीलिमा के पास जा उसके कानों में  “नीलिमा मेरा सर दर्द हो रहा है, मैं कुछ देर के लिए अपने कमरे में जा रही हूँ..”
कमरे में आते ही सुहासिनी बिस्तर पे लुढ़क जाती है हताश सी, तभी कमरे के दरवाजे पे खट खट की आवाज़ सुनाई देती है..
सुहासिनी -कौन ?
 – अरे दीदी हम है नैका ( महरी)
सुहासिनी – दरवाजा खुला है अंदर आ जाओ
हाथ में बायन की टोकरी लिए नैका ज़मीन पे बैठते हुए बोली “का दीदी बहुत जल्दी चली आयो”
सुहासिनी – हाँ, नैका चाची असल में सर फटा जा रहा था दर्द से,
नैका हाथ आगे बढाते हुए – इधर सर करौ दीदी लावो हम दबा दें सर..
सुहासिनी -अरे नहीं नहीं दवा लिए हैं अब आराम है.. तुम बताओ चाची कैसी लगी दुल्हनियाँ ?
नैका – अभी तौ हम स्थिर से देखे नाही बस एक दफा आनन फानन में देखे.. कुल मिलाकै ठीक तो लगत बाय,
सुहासिनी -इस्तरी में लगे आधे सुलगे कोयले की तरह जलके फिर व्यंग्यपूर्ण मुस्कान में – अच्छा चाची तो तुम्हें अच्छी लगी दुल्हनियाँ ?
नैका – काहे का भवा दीदी????
सुहासिनी – बड़े बड़े नाखून, कलर्ड बाल बड़ी फ़ैशनेबल लग रही है..
नैका -सर के आँचल सभाँलती हुई – अरे दीदी! आपके जैइसन सब सुन्दरता लैके नाय पैदा होता,
ये सुन सुहासिनी  जोर जोर ठहाका लगाती है.. वह पत्नी प्रेमिका में प्रेम बहनापा हो ही नहीं सकता इस आप्तवाक्य (प्रमाणित वाक्य) को पोषित करती अपने प्रेमी की परिणीता के प्रति चाह कर भी प्रेम का अविष्कार नहीं कर पा रही है..
अगली सुबह वो प्यारी सी धीर गम्भीर सुहासिनी एक पत्र अम्मा नीलिमा के नाम लिख मकान छोड़ चुपचाप निकल जाती है..
विभिन्न समाचार पत्रों, ई पत्रिकाओं यथा, अरूणोदय साहित्यिक पत्रिका, साहित्यनामा, स्याही की आवाज़ सहित तमाम साझा संग्रहों में कविताएं व लेख प्रकाशित. संपर्क - mishrasupriya812@gmail.com

1 टिप्पणी

  1. ” ए‌क प्रेमिका ऐसी भी “. प्रेमिका की कशमकश और व्यथा को अभिव्यक्त करती ममस्पर्शी कहानी

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