1 – पहुँचो ऊपर
इस चतुर होती दुनिया में
कदम – कदम कौन चलता है ?
अब तो आ गई हैं लिफ्ट
और एस्केलेटर्स
उन पर कदम रखो और पहुँच जाओ ऊपर।
आखिर,
सबको ऊपर चढ़ा आदमीे ही देखना है न !
लेकिन,
जो कदम – कदम चढ़ता है सीढ़ियों पर
वो जानता है अपने संकल्प,
उसने अपने हर कदम पर संजोई है ताकत,
साधा है लक्ष्य को।
हालांकि,
अब दुनिया में ऐसे मुट्ठीभर लोग ही बचे हैं जो
आदमी की मंज़िल ही नहीं देखते
उसका रास्ता भी देखते हैं।
पर,
देखते हैं।
2 – खाली – भरा आदमी
कितने लोग
कितनी भीड़
कितने उत्सव
कि अब तो घिरा है आदमी
सोशल मीडिया से भी।
लेकिन शहर, समय
यूँ आदमी को टाँचियाँ मार रहे हैं
कि आदमी
हर दिन खिरता जा रहा है।
भरे पूरे बदन का
लम्बा चौड़ा,
मुस्कुराता आदमी
खाली हो रहा है हर दिन।
कोई नहीं कि जिससे वह कह सके
कि वह खाली हो रहा है,
बूँद – बूँद।
और एक दिन,
रीत जाएगा पूरा का पूरा।
तुम कान तो दो उसे
उसे बहुत कुछ कहना है।
उसके कंधे पर हाथ तो रखो
वह पूरा भरा हुआ है
तुम्हारे कंधे पर हाथ रखते ही
बस,
छलछला पड़ेगा।
लेकिन डरों से घिरा आदमी
अब छ्लछ्लाता भी नहीं।
बस, खामोशी से रीतता जाता है।
जैसे बेबसी का मारा
बारिश में भीगता बंदर।
3 – बहनों के मन
युवावस्था में बहनें
देखती हैं
एकदूसरे के लिए सपनों में राजकुमार।
पर,
ब्याह दी जाती हैं
अलग – अलग घरों में
जैसे – तैसे।
वर्षों बाद भी उनकी आँखों में ये सपने फीके नहीं पड़ते
उन्हें ताउम्र याद रहते हैं
एकदूसरे के पसंद किए गीत
जिनमें पल -पल दिल के पास तुम रहती हो —
और तुमसे बढ़कर दुनिया में न देखा कोई और जुबा — होते हैं।
वो अलग – अलग घरों में बिस्तर पर करवटें बदलती रहती हैं
बेचैन हो बैठ जाती हैं कभी – कभी।
घरवाले पूछते हैं
क्या हुआ ?
वो कहती हैं
कुछ नहीं।
क्या,
सब कुछ शब्दों में कहा जा सकता है ?
वे भावनाओं के अथाह बवंडर में घूमती हैं
चकरी -सी।
तूफ़ान ही तूफ़ान के बीच रास्ता क्या इतना साफ दिखता है
कि किसी को बताया जा सके।
अनुपमा तिवाड़ी
संपर्क – anupamatiwari91@gmail.com

3 टिप्पणी

  1. अनुपमा जी कविताएँ जीवन की यथार्थ पर सहजता से प्रस्तुत करती हैं l
    “आदमी की मंज़िल ही नहीं देखते
    उसका रास्ता भी देखते हैं।
    पर,
    देखते हैं।” बहुत आशा जगाती है, उनके मन में जो कदम कदम आगे बढ़ने में विश्वास रखते हैं l देर तक याद रहने वाली कविता

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