Wednesday, July 24, 2024
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कल्पना मनोरमा की पाँच कविताएँ

1- अपना हिस्सा
यदि परखना है धुएँ को
तो कालिख से नहीं
उसकी उड़ान से परखो
आग से डरो मत,
बनाकर उँगलियाँ फौलादी
उठा लो अँगारों के मध्य से
अपना हिस्सा
प्रारंभ करो जीने का अभियान
सूरज उगने से पहले
ताकि जब भटकने लगे दिन
फिर भी तुम पहुँच सको
समय से अपने गन्तव्य पर
कुहासे वाले वातावरण से
मत खाओ भय
सोच की सतह से उठकर थोड़ा ऊपर
तुम्हें बढ़ाना ही होगा
अपनी परिधि का व्यास
उड़ना ही होगा
ध्रुवीय बिंदु के इर्दगिर्द
जैसे चील बादलों के ऊपर उड़कर
बच जाती है सूखी
‘नैना रतनारे जादू भरे’
में फँसना ज़रूरी तो नहीं
तुम्हें रखनी होगी दृष्टि सीधी
तभी देख सकोगी अपना लक्ष्य
अपना आपा पाने की करो जिद्द
किसी और से नहीं, खुद से
रौंद कर निकल जाओ उन रास्तों को
जो खड़े हैं उठाए मुश्किलों के पहाड़
सदियों से तुम्हारे आगे
खून में घुलने दो रफ़्तार पूरी तरह
नापनी पड़े दूरियाँ
तो नापो अपने कदमों के
बीच की दूरी
दूरियाँ नापने का शौक
अकसर यहीं से शुरू होता है.
2- पीर की जाति
सुनो, सुबह को धकेलो मत
पहला कदम बढ़ाकर आगे
उठा लो भोर को अपनी गोद में
झुकना पड़े तो झुक जाओ
धरती के सीने तक
और उठा लो उन ज़िन्दा लाशों को
जिन्हें शमशान की नौकरी तो मिली किन्तु
कब्रें नसीब न हो सकीं
छाती में गहरी धँसने दो
दर्द की कीलें
उठाने दो टीस को अपना सर
दुःख से निज़ात पाने की
मत करो सतही चेष्टा
बल्कि दर्द जब तुम्हें अकेला पाकर सताए
तो कील को हिलाओ और हिलाओ
और लगातार पीरों की जाति को परखो
जब उठने लगें पीर की हिलोरें
तब जाँचो अपनी यादाश्त
इन्हीं रास्तों के मध्य से मिलेगी
तुम्हें अभीष्ट चाल की शिनाख्त
दर्द की चोट पर यदि डर गईं तुम
तो दर्द खा जाएगा तुम्हारा ईमान
कन्धा ढूँढना बंद करो
पीर की जाति को उसी तरह परखना होगा
जैसे परखता जौहरी हीरा को
घर में घुसने से पहले
करो तैयारी खुद से लड़ने की
नींद को छोड़ना पड़े तो
छोड़ दो दहलीज़ की दाहिनी ओर
आँचल में सहेजे रखो कर्तव्यों के गुलमोहर
गुलमोहर के फूलों का
किसी ऐरे गैरे गुलदान में सजाना मना है
गुलमोहर के लाल फूलों को दहकने दो
अपनी थकी पलकों के तले
गंध रहित आभा
तुम्हें तटस्थ बनाएगी
तुम पहचान सकोगी आपनी जाति .
3- फ़िरोज़ी मफ़लर
सुनो! नवंबर की पीली शामों में
तुम अकेले-अकेले घूमने
मत जाया करो
इस महीने की धूप छलावा है

तुम धूप की गुनगुनी
ऊँगली पकड़े चलते रहोगे,
वह दाँव देकर भाग जाएगी
अपने प्रेमी के साथ

फिर तुम्हें रास्ता
खोजने से भी नहीं मिलेगा
क्योंकि सूखे पत्तों में अक्सर नहीं हमेशा
गुम जाते हैं हरे-भरे पत्ते

ठहरो, कहा तो
हम चलेंगे तुम्हारे साथ
बस पिछले बरस का तुम्हारा
अधूरा फ़िरोजी मफ़लर
बुनाई के अंतिम
मोड़ पर है।
आओ करें सर्दियों की तैयारियाँ
मिलकर हम दोनों .

4. गहना
पहनना है गहना तो बेशक पहनो
किन्तु खो मत देना
पाज़ेब की रुनझुन में
वह नगीना जिसकी पहचान
बड़ी मुश्किल से करवाई है तुम्हें
कुदालों की बाट देखना बंद कर,
उठाओ अपनी सुइयाँ
जिन्हें पकड़ाया गया पैदा होते ही
तुम्हारे हाथों में
प्यास बढ़ने पर ताको मत इधर-उधर
पैना करो अपनी तुरपाई वाली सुइयों को
निर्मल जल का सोता
फूटने को मचलता मिलेगा
खोद लो कुआँ उन्हीं सुइयों से और
बुझा लो प्यास अपनी
इतना करने के बाद भी
जीत का जश्न मनाना मना है!
जीत की साँसों में समझो हार को
जो देती आई है पटखनी
तुम्हारे सबसे भावुक पलों में तुम्हें
मैं तो कहती हूँ
ओढ़कर अपना आत्मविश्वास
बना डालो अपने सबसे थके दिन को अमर
क्योंकि जिंदगी का अभियान
सालों में नहीं प्रत्येक दिन में छिपा है
सोचकर ये बना डालो
जीवन की धूप से माँग टीका
सबसे ज्यादा ज़रूरी है तुम्हारे लिए
अपने लिए सुहागिन बने रहना.
5- पहली बार

पहली खबर, पहली शादी, पहला बच्चा
और पहला विचार, अहम् है!

साल के पहले दिन का अनछुआ
पहला मिनट
पहली बार किसी स्त्री का पेट से होना
पहली बार सुनना
अंडे से निकलकर चूज़े का
पहली बार पंख खुजला कर
पहली उड़ान जाँचना
समुद्र से निकली
सूरज की पहली नारंगी किरण
हिमालय की गोद से नदी की
पहली छलाँग
दांपत्य जीवन में प्रवेश करते युगल के लिए
सहभागिता मन्त्र के साथ
पहली भाँवर में पहला पाँव बढ़ाना

हल की फाल का पहली बार
खेत को भीतर से छूना
बीज को अँकुरित हो पहली बार
नीले आसमान को देखना

गुलाब की डाली पर खिलने को आतुर
पंखुड़ी की पहली चटकन
भूखे व्यक्ति के मुँह में गया
पहला निवाला

पुत्र को पिता द्वारा पहली ज़िम्मेदारी सौंपना
कन्या के पहले मासिक धर्म की सूचना
माँ को पहली बार मिलना

नवीन शब्द को पढ़ने की देरी भर
उसका नया रहना
रहता है नया उतनी ही देर
जितनी देर उस पहले पल के जीवन में
घटित अवधूत मौन का पहला क्षण
और फ़िर पलक झपकते
उसका पुराना होना
हम देखते रहते हैं उम्र भर
पुरानापन इस क़दर नए को खींचता है
अपनी ज़द में
कि नवता अपना नयापन भूल कर
हो जाती है पुराने में मग्न
जीवन भी पुरानी गाथा है.

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1 टिप्पणी

  1. कल्पना जी सभी कविताएँ बहुत अच्छी हैं आपकी ।तीसरी कविता ‘फिरोजी मखमल’ पढ़कर याद आया कि यह कविता हमने शायद पहले भी पढ़ी है।
    पर फिर भी अंतिम कविता हमें बहुत अधिक अच्छी लगी। यह तो बिल्कुल सच है कि पहली बार किए गए हर कार्य का उत्साह और उमंग भी अलग ही होती है और उसकी खुशी भी अद्भुत!
    बहुत-बहुत बधाइयां आपको।

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