Monday, July 22, 2024
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मालिनी गौतम की दो कविताएँ

1 – अजी रूठकर यूँ कहाँ जाइयेगा
आज का दिन एक अजीब-सी खामोशी का
पैरहन पहने आया
जिसकी सलवटें निकालते-निकालते
वक्त हाथ से फिसलता गया
घर के काम-काज में मदद करने के लिए
जेसल आती है
आज पता नहीं किस उलझन में थी वह भी
उसके पतले सुते हुए गेंहुए चेहरे पर
लाल-काली लकीरें लगातार बनती बिगड़ती रहीं
एक ख़ामोशी ने दूसरी ख़ामोशी को
बस ख़ामोश रहकर समझा
दिन ढल गया है
बाहर बच्चे शोर मचाते हुए खेल रहे हैं
आज घूमने जाने के लिए
जेसल के घर वाले रास्ते पर निकली
जेसल के घर जाना यानी
पहाड़ों के और नज़दीक जाना
मुझे देखकर उसका आदमी,बच्चे, सास-ससुर
सब घर से बाहर निकल आये
चूल्हे की आँच में
मक्की की रोटी बनाती जेसल का लाल चेहरा
सुबह से एकदम भिन्न था
यूँ भी औरतें कब झोंक देती हैं
अपने मन को आग में
कोई कब जान पाता है
मैं उसे मुस्करा कर देखती हूँ
एक मुस्कान दूसरी मुस्कान को
मुस्करा कर विदा करती है
कुछ देर बैठती हूँ चुपचाप पहाड़ की तलहटी में
छोटे छोटे बच्चे सूरज को हाँक रहे हैं
पहाड़ के उस ओर
मैं थोड़ी सी रौशनी सहेज लेना चाहती हूं
अपनी मुठ्ठियों में
कि मन के सीले और ख़ामोश दरवाज़े पर
रोशनी का विंड चैम लटका सकूँ
किसी आने वाले उदास दिन को
घण्टियों का पैरहन पहना सकूँ
बंधी मुट्ठियाँ लिए घर की ओर दौड़ती हूँ
ढलता सूरज पीछे से गुनगुनाता है
अजी रूठकर यूँ कहाँ जाइयेगा…
2 – जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला
मौसम तेजी से बदलता जा रहा है
सुबह की ठंडी हवा
मन को घड़ी भर राहत देकर
जा छुपती है पेड़ों पर टँगे स्तब्ध पत्तों के पीछे
और मन जलते-पिघलते
नदी हुआ जाता है
इन नामुराद पत्तों के खड़कने, हिलने-डोलने
और कुछ बोलने के इंतज़ार में
मैं अक्सर मापती हूँ
मन के बदलने की गति को
मौसम के बदलने की गति से
मौसम इशारे तो देते हैं कम से कम
अपने बदलने का
पर ये कमबख़्त मन तो
कब बदल जाते हैं
पता ही नहीं चलता
घाट का पानी यकायक सूख जाए
और आप मछली-सा तड़पने लगो
नदी के पीछे-पीछे दौड़ो
उसे पकड़ने के लिए
और मुट्ठी खोलकर देखो तो
हाथ नमक से भरे होते हैं
अपनी मुठ्ठी के नमक को
सहेज कर रख लेती हूँ अब
हर याद मीठी ही हो ज़रूरी तो नहीं
शाम साढ़े छह बजे भी घूमने निकलो
तो सूरज की तेज रोशनी
आँखों में इस तरह झाँकती है
मानों पल भर में
आँखों के सब राज़ खोल देगी
सोसाइटी के पीछे वाले मैदान में
फिर बंजारों ने तंबू गाड़े हैं
दो-चार दिनों में ही
मौन का नाता बन जाता है हमारे बीच
साँझ के वक्त वे साँवली दुबली-पतली औरतें
अपने माथे पर रखे
बड़े-बड़े मटकों से छलकते पानी में भीगते-भीगते
सँभलते -सँभलते कदम उठाती हैं
और मैं अपने मन में
पिघलती नदी के आवेग को
सँभालते- सँभालते
काली सड़क पर दौड़ लगाती हूँ
अक्सर ठिठक कर सोचती हूँ
मैं नदी में बह रही हूँ
या नदी मुझमें
इन दिनों सेमल ने अपना रेशम उड़ाया है जी भरकर
पत्ते-फूल सबसे बिछड़ने के बाद
रेशम हुआ है सेमल
सब खोकर भी भरा-भरा होना
शायद इसे ही कहते हैं
मेरा मन भी तो सब कुछ क्षिप्रा में तिरोहित करके भी
बरसों से भरा-भरा है
मैं चुपके से मुट्ठी खोलकर
उसमें से झरते नमक को देखती हूँ
और तभी खिजड़ी के झाड़ के नीचे लेटे
अर्जुन के रेडियो पर
गीत की स्वरलहरियाँ फूटती हैं
जाने वो कैसे लोग थे जिनके ….
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