Sunday, July 21, 2024
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शन्नो अग्रवाल की कविताएँ

1. चाँद तुम चाँदनी मैं तेरी
जमीं-आसमा का फरक है तो क्या
तुम धड़कनों में आकर बसे हो मेरी
चाँद तुम हो मेरे चाँदनी मैं तेरी l
आसमा पे हो तुम मैं हूँ कदमो तले
मैं भटकती यहाँ तू वहाँ पर जले
महफ़िलें सज रहीं तारों की वहाँ
हैरान सा है हर नजारा जहाँ
तन्हाइयों का दामन है फैला हुआ
साज तुम हो मैं रागिनी हूँ तेरी l
जमीं-आसमा का फरक है तो क्या
तुम धड़कनों में आकर बसे हो मेरी
चाँद तुम हो मेरे चाँदनी मैं तेरी l
अजनबी रास्तों पे कदम के निशां
मंजिलों की तरफ बढ़ रहे परेशां
अकेले न तुम जा सकोगे कहीं
रात की शबनम पलकों पे गिरा
दामन सी मैं तुमने पकड़ा सिरा
तुम मेरे हमकदम मैं हूँ साया तेरी l
जमीं-आसमा का फरक है तो क्या
तुम धड़कनों में आकर बसे हो मेरी
चाँद तुम हो मेरे चाँदनी मैं तेरी l
2. जीवन का क्रम
सुबह नभ में रंगों की छटा ऐसी ही थी
लेकिन अब यह जीवन की संझा है
सुबह ही तो आकाश के कोने में
जब लालिमा बिखरी थी
तो यही सूरज उदित हुआ था
अपने पथ पर एक अकेला यात्री
बन कर चल पड़ा था
दिन भर अपनी ऊर्जा को बिखेरा
और उसकी रश्मियों की ऊष्मा
धरती को विभोर करती रही
कण-कण में स्फूर्ति और
जीवन की धड़कन भरती रही
और अब संझा के आगोश में
निढाल हो चुका है वही सूरज
एक लंबी यात्रा से शिथिल होकर
काले स्याह बादलों के पीछे
उसका जर्जर अस्तित्व छुप रहा है
और लालिमा प्रस्थान कर चुकी है
कल यही सूरज फिर उसी उम्मीद से
अपन पूरी ऊर्जा लेकर आयेगा
अपना कर्तव्य पूरा करने
फिर शुरू होगा वही जीवन का क्रम
किरणों का धरती पर उतर कर
उसके अंग-अंग पर बिखर जाना
सूरज की ऊष्मा का स्पंदन
धरत की रग-रग में समा जाना
फिर अपने जीवन के अंतिम क्षणों को
संझा को समर्पित करके डूब जाना l
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