साहित्य मनीषियों की अद्भुत दास्तानेः प्रकाश मनु;
डायमंड बुक्स (प्रा) लि., एक्स-30, ओखला इंडस्ट्रियाल एरिया, फेज-2, नई दिल्ली; 495 रुपए।
हर रचना में थोड़ा रचनाकार भी होता है। ठीक इसी तरह हर रचनाकार में उसकी रचना भी होती है। मगर रचना को पढ़कर तो रचनाकार के व्यक्तित्व का कुछ आभास, कुछ अंदाजा लगा सकते हैं, रचनाकार को पढ़कर उसकी रचना का आनंद लेना मुश्किल काम है। फिर जरूरी नहीं कि रचना में जो रचनाकार है, वास्तविक जीवन में भी वही हो। कई बार रचना के रचनाकार और दुनिया में चलते-फिरते रचनाकार के बीच विरोधाभास नजर आ सकता है। आता ही है। इसलिए रचनाकार को एक रचना की तरह पढ़ लेना कठिन काम होता है। मगर प्रकाश मनु रचनाकार को भी रचना की तरह पढ़ने में सिद्धहस्त हैं। वे रचनाकार के पास कुछ इस तरह जाते हैं, उसके जीवन के सफे कुछ इस तरह खोलते हैं कि वह खुद एक रचना बन जाता है, एक रचना की तरह उसमें से आनंद झरने लगता है।
साहित्य मनीषियों की अद्भुत दास्तानें उनकी ऐसी ही पुस्तक है, जिसमें रचनाकारों को बहुत बारीकी से पढ़ने की कोशिश की गई है। इसमें कुल इक्कीस रचनाकारों पर टिप्पणियां हैं। वे रचनाकार हैं- देवेंद्र सत्यार्थी, विष्णु प्रभाकर, रामविलास शर्मा, बाबा नागार्जुन, त्रिलोचन, भीष्म साहनी, रामदरश मिश्र, नामवर सिंह, विद्यानिवास मिश्र, श्यामाचरण दुबे, धर्मवीर भारती, रघुवीर सहाय, शैलेश मटियानी, कन्हैयालाल नंदन, विश्वनाथप्रसाद तिवारी, लाखन सिंह भदौरिया, शेरजंग गर्ग, बालस्वरूप राही, हरिपाल त्यागी, विष्णु खरे और बल्लभ सिद्धार्थ।
हालांकि मनु जी ने इस किताब में संकलित टिप्पणियों को ‘संस्मरणात्मक जीवनियां’ कहा है, कुछ लोग इसे ‘संस्मरण’ भी कह सकते हैं। कुछ लोग इनमें रेखाचित्र और कहानी का मिला-जुला आस्वाद पा सकते हैं। साक्षात्कार की बेबाक बानगी और समीक्षात्मक विश्लेषण भी इनमें साथ-साथ चलता रहता है। दरअसल, इन टिप्पणियों में इन सभी विधाओं का मिला-जुला रसायन है। इस तरह ये टिप्पणियां अन्य संस्मरणों, जीवनियों, रेखाचित्रों से भिन्न बन पड़ी हैं।



सूर्यनाथ सिंहजी का पूरा समीक्षात्मक आलेख कई बार पढ़ा।
बहुत ही प्रेरक, रोचक और ज्ञानवर्धक आलेख।
सृजन के क्षेत्र में श्रद्धेय प्रकाश मनुजी की जादूगरी एक अलग संसार में ले जाती हैं जहाँ पहुँच कर आप एक अद्भुत ताजगी से भर जाते हैं।
इस नई पुस्तक के प्रकाशन के लिए श्रद्धेय मनुजी को हार्दिक बधाई देता हूँ।
सुंदर आलेख के लिए सूर्यनाथसिंह को अलग से हार्दिक बधाई।
आदरणीय सूर्य नाथ जी!
हमारे लिए यह सुखद आश्चर्य है कि इससे पहली वाली पत्रिका में प्रकाश मनु जी ने अपने गुरु जी पर लिखा और उसे पढ़कर हम समृद्ध ही नहीं बल्कि बहुत अधिक प्रभावित भी हुए, और इस बार आपने प्रकाश मनु जी पर लिखा। पर पढ़ा तो हमने मनु जी को ही आपके मध्यम से।
वैसे प्रकाश मनु जी को जिस तरह से हमने पढ़ा उस दृष्टि से उनके व्यक्तित्व को समझना हमारे लिए कम से कम अब तो कोई कठिन नहीं। मानव मन की संवेदनाओं को समझने में भी बड़ी बारीकी से काम लेते हैं। बेहद संवेदनशील ,निर्मल, कोमल मन और भाव है उनके। शरद पूर्णिमा के पूर्ण चंद्र की निर्मल कांति की भाँति और प्रबुद्धता में सूर्य रश्मि सा विस्तार। बेहद सरल, बेहद सह्रदय।
यह बात बिल्कुल सही है की रचना में रचनाकार तो थोड़ा ना थोड़ा होता ही है और हमारे लिए तो यह महत्वपूर्ण इस दृष्टि से भी है कि हम तो रचना में रचनाकार को ही महसूस करते हैं और कोई दुखद प्रसंग होने पर चिंतित भी हो जाते हैं ।रचनाकार को लेकर तो हमारी दृष्टि में तो रचनाकार ज्यादा होता है। रचना को पढ़कर उनकी सोच, समझ , ज्ञान और किसी हद तक स्वभाव का भी पता चलता है ।हो सकता है कि एक ही रचना पढने से समझना उचित निर्णय न हो लेकिन हम उसे अगर एक से अधिक बार पढ़ते हैं तो शब्द अपने को व्यक्त करने लगते हैं। हम तो उनकी एक ही रचना को पढ़कर उनके और उनकी लेखनी दोनों के कायल हो गए।
यह हमें भी सही लगता है कि रचनाकार को साथ लेकर चलें, तो रचना ठीक से अपने अर्थ खोलने लगती है क्योंकि उसके काल के साथ उसका वातावरण और परिस्थितियाँ भी बोलती हैं। लेखक की वैचारिक प्रबुद्धता भाषा और शैली से पता चलती है जो रचना की दिशा तय करती है।
रचनाकार को रचना के साथ उपस्थित रखना जरूरी है ऐसा हम सोचते हैं।
हम इस बात से भी पूरी तरह सहमत हैं किअपनी अंतरंगता में अपन जिन्हें चुनते हैं, उनमें अपन खुद भी थोड़ा-सा शामिल होते हैं। इसका मुख्य कारण यह है हम कहीं ना कहीं उनकी सोच में, स्वभाव में, एकरूपता पाते हैं। यही कारण है कि पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि यह सोच हमारी सोच से काफी मिलती है। हम ऐसे लोगों के समीप रहना चाहते हैं जो हमें अपने जैसी सोच और समझ के निकट लगते हैं।
” मेरी झोली बड़ी थी, बहुत बड़ी। उसके जल्दी भर जाने का तो सवाल ही न था। फिर मेरे भीतर अतृप्ति गहरी थी, बहुत गहरी।”हम भी अगर कोई लेखन हमें प्रभावित करता है तो लेखक को भीतर-बाहर से जानने की जिज्ञासा तो उससे भी कहीं ज्यादा रखते हैं।पढ़ तो कल लिया था लेकिन कल लिखना नहीं हो पाया।
इस बेहतरीन वाला जवाब समीक्षा के लिए आपका दिल की गहराइयों से शुक्रिया इस रचना के माध्यम से हम प्रकाश मनु जी को और बेहतर समझ पाए।
प्रस्तुति के लिए तेजेंद्र जी कवि अतिरिक्त शुक्रिया अदा करना चाहते हैं जो इतना अच्छा-अच्छा पढ़वा रहे हैं जिनके सारे दिल से हम दोनों दिन प्रभु हो रहे हैं लेकिन ज्ञान की भूख तृप्त नहीं होती। झोली हमारी भी बहुत बड़ी है
पुरवाई का तो विशेष शुक्रिया जिससे जुड़ना हमारे लिए सौभाग्य की बात है।