Wednesday, February 11, 2026
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लखनलाल पाल की कलम से – रमकल्लो की पाती : तीन महीने बाद (भाग – 19)

प्राननाथ
चरन स्पर्श।
पढ़ाई पूरे रंग में आ गई है। सभी टीचर अपने-अपने विषय अच्छे से पढ़ाते हैं, पर एक बात बताऊँ प्राननाथ, चिल्लर सर जैसा कोई नहीं है। वे अपने विषय को डूबकर पढ़ाते हैं। सर जिस टॉपिक को लेते हैं, पहले उसका प्रसंग बताते हैं। प्रसंग न बताएँ तो टॉपिक समझ में थोड़े आएगा।
जायसी कृत ‘प‌द्मावत’ के ‘नागमती वियोग’ खण्ड को ऐसा पढ़ाया कि वह प्रसंग दिल को छू गया। विरह-वेदना की स्थिति में सर ने नागमती का दिल ही निकालकर रख दिया।
राजा रत्नसेन हीरामन तोते के मुँह से सिंघल द्वीप की राजकुमारी प‌द्मावती के रूप का वर्णन सुनकर उसे पाने के लिए सिंघलद्वीप चला जाता है। नागमती अपने निर्मोही पति के विरह में तड़पती रह जाती है। वियोग की चरम स्थिति में वह भौंरे और कागों के माध्यम से सन्देशा भिजवाती है-
पिउ सौं कहेउ संदेसड़ा, हे भौंरा ! हे काग !!
सो धनि बिरहै जरि मुई, तेहि क धुवाँ हम्ह लाग ।।
प्राननाथ, ये भौरा और कागा कहीं संदेशा पहुँचा सकते हैं? नागमती पागलपन की हद तक आशावान रही। उसे विश्वास था कि ये जन्तु मुझ विरही का सन्देशा प्रियतम तक जरूर पहुँचा देंगे। विरह से व्याकुल नागमती की आँखों से आँसू नहीं, रक्त बहता है –
रकत के आँसू परहि भुइँ टूटी। रेंग चली जस बीर बहूटी।
हर सुखद चीजें उसे दुख पहुँचाती हैं। तीज-त्योहार भी उसे अच्छे नहीं लगते हैं। सही तो थी नागमती, बिना प्रियतम के कहीं कुछ अच्छा लगता है !
वियोग सहना आसान नहीं होता। पीड़ा के लावा से होकर गुजरना पड़ता है। तलवार के हजारों वार से कहीं ज्यादा पीड़ादायक होता है विरह। उसमें एक अच्छाई यह है कि पीड़ा जितनी बढ़ती है, प्रियतम उतनी ही शिद्दत से याद आते हैं।
प्रियतम के इन्तजार में आँखें पथरा जाती हैं। मन की बेचैनी उलहना में परिवर्तित हो जाती है। असीम बेचैनी हो, तो उलहना गाली बन जाता है-
अबहूँ मया दिस्टि करि, नाह निठुर घर आउ।
मंदिर उजार होत है, नव के आइ बसाउ ।।
हे निष्ठुर ! अब भी मुझ पर दयादृष्टि करके घर लौट आ क्योंकि मेरा बना-बनाया घर उजड़ता जा रहा है। तू आकर नए रूप में उसे फिर से बसा दे।
वैरी ! तू इतना कठकरेजा कैसे हो गया? संयोग की वे मीठी यादें इतनी जल्दी भूल गया ? प्रेमरस से परिपूर्ण तेरा मनुहार मेरा अंग-अंग भिगो डालता था। मैंने भी तेरी उस धारा में अपने आपको डुबो लिया था, इस आशा के साथ कि मैं तेरी हो चुकी हूँ। मेरी जीवन नैया तेरे संग पार हो जाएगी। तू तो सब भूल गया। उन पलों को भी भूल गया, जब हम दोनों ने मिलकर खुशहाल जीवन के सुन्दर चित्र सजाए थे। चित्रों के सजाने में हम बराबर के भागीदार थे।
मैं नहीं जानती थी कि तू इतना बेवफा निकलेगा। अगर मैं जान जाती, तो तुझसे प्रेम न करती। तू मेरे सपनों को चकनाचूर करके दूसरे की दुनिया बसाने चला गया। हाय रे निर्मोही ! तू मेरी जगह होता, तो पता चलता कि विछोह क्या होता है। तुझे कभी पता क्यों चलेगा? तेरे साथ पूरा समाज खड़ा है। तुझे रोने-कलपने की जरूरत नहीं है। पुरुष सत्ता न जाने कितनी प‌द्मीनियाँ ढूँढ़कर तेरे कदमों में डाल देगी। तेरा दुख संसार का दुख और मेरा दुख सिर्फ मेरा है।
दुश्मन ! तू मुझसे किस जन्म का बदला ले रहा है। पहले तो कहता था कि मैं तुझे पलकों पर बिठाके रखूँगा, अब सब भूल गया। एक बार परदेस क्या गया, वहीं का होकर रह गया।
प्राननाथ, राजा रत्नसेन को नागमती की जरा-सी भी परवाह न थी। वह किस हालत में होगी, यह उसने न जाना। क्या पुरुष ऐसे ही होते हैं? स्वार्थ पूरा होते ही आगे बढने की आदत। हर चीज को जीतकर अपने कब्जे में करने की फितरत। क्या नारी भी एक वस्तु है, जिसे धन बल से या शारीरिक बल से जीतकर अपनी शोभा बना ली जाती है।
चिल्लर सर इसका उत्तर देते हैं, “नहीं। वह जीवन पथ की बराबर की संगिनी है।
किसी-किसी युग में नारी दयनीय रही है। वह स्थिति बदलनी चाहिए। नारी अपने अधिकार के लिए संघर्षरत है। पुरुष न तो उसे जबरन प्राप्त कर सकता है और न उसकी मर्जी के खिलाफ उसे छोड़ सकता है। आज की नारी सजग है।”
सर नागमती वियोग वर्णन एक माह में पूरा करवा पाये थे। मुझे तो उसके एक-एक चौपाई और दोहे रट गए हैं। वह वर्णन है ही इतना मार्मिक कि कोई भी उस ओर खिंच सकता है, लेकिन प्राननाथ, पता नहीं उस कवि ने नागमती को दुनिया धंधा क्यों कह दिया- “नागमती यह दुनिया धंधा। बाँचा कोई न यहि चित बंधा।”
चिल्लर सर इसे कवि की अन्योक्ति कह रहे थे।
प्राननाथ, और तो सब ठीक है पर कालेज से लौटते समय कुछ दिक्कत होने लगी है। गब्बे कालेज के बाहर रोज ठाड़ो मिलत। वह मुझे घूरता रहता है। मैं नई दिखत उसकी तरफ। क्या देखना ? वही तो है जिसे हर कोई थू-थू करता है। चौबीस घंटे शराब में धुत्त रहत। खलक सींग उसका शागिर्द है। बची-खुची शराब में दिन भर गुलामी करता है। प्राननाथ ओले स्वयं तो नष्ट होते ही हैं, फसल भी स्वाहा कर देते हैं। गब्बे
को ओले ही समझो।
प्राननाथ, तुम मेरी चिन्ता न करियो। मैं सब निपट-सुलझ लूँगी।
अपना ध्यान रखना।
आपकी ही
रमकल्लो
जीवन परिचय 
नाम – लखनलाल पाल 
जन्मतिथि- 2 जुलाई सन 1968 
जन्म स्थान- ग्राम व पोस्ट इटैलिया बाजा जिला हमीरपुर उत्तर प्रदेश 
शिक्षा – b.sc गणित M.A हिंदी b.ed पीएच-डी हिंदी 
प्रकाशित रचनाएं- हंस, कथादेश, कथाक्रम ,लमही ,युद्धरत आम आदमी, सृजन समीक्षा, पुरवाई आदि में कहानियां प्रकाशित। 
सम्प्रति – रमकल्लो की पाती उपन्यास धारावाहिक रूप से पुरवाई पत्रिका में प्रकाशित 
प्रकाशित पुस्तकें – बाड़ा ऋतदान, रमकल्लो की पाती (उपन्यास) पंच बिरादरी , कोरोना लॉकडाउन और लड़की (कहानी संग्रह )
 वर्तमान पता- कृष्णाधाम के आगे नया रामनगर उरई जिला जालौन उत्तर प्रदेश 28 5 001 
ई-मेल – [email protected]


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8 टिप्पणी

  1. इस उन्नीसवीं पाती ने तो निहाल कर दिया। पढ़कर चित्त बड़ा प्रसन्न हुआ कि अब रमकल्लो अपनी पढ़ाई में पूरी तरह रम चुकी है। और सभी शिक्षकों में उसे चिल्लर सर के पढ़ाने का तरीका बहुत पसंद है। भले ही बोलते हुये उनके मुंह से थूक की छींटे गिरती हों। पढ़ाकू छात्र इस पर गौर नहीं करते। रमकल्लो को भी अपनी पढ़ाई से मतलब। वह क्लास में हर पाठ को ध्यान से सुनती है। क्लास में जब चिल्लर सर राजा रत्नसेन और उनकी पत्नी नागमती की कहानी पूरे एक महीने तक सुनाते हैं तो वह कहानी के हर प्रसंग की व्याख्या इस तरह करते चलते हैं कि छात्र उसे अच्छी तरह समझ सकें।

    इस कहानी ने उसके दिल पर पति-पत्नि के रिश्ते को लेकर जो गहरी छाप छोड़ी उसके बारे में वह नारी जीवन को लेकर इस पाती में अपने विचारों व भावनाओं की अच्छी अभिव्यक्ति करती है। एक तोते के संदेश ने ऐसी आग लगाई कि रानी नागमती जीवन भर उसमें झुलसती रही। एक मूढ़ तोते की बात सुनकर जिस तरह राजा रत्नसेन राजकुमारी पद्मिनी की खोज में अपनी पत्नि नागमती को छोड़ कर निकल पड़े उसे सुनकर किसी भी नारी का हृदय रो पड़ेगा। रानी नागमती की विरह वेदना की कल्पना करके रमकल्लो का हृदय भी तड़प उठा। अगर उसके साथ भी यही हुआ तो क्या वह सह पायेगी?

    संवेदनशील रमकल्लो को नागमती से सहानुभूति है जो अपने प्रियतम को अपनी विरह वेदना के बारे में कागा और भौंरा के द्वारा संदेशा भेजती है। इस पर वह अपने प्राननाथ से एक तार्किक सवाल करती है: “प्राननाथ, ये भौंरा और कागा कहीं संदेशा पहुँचा सकते हैं?”

    लोगों की बुरी नीयत को भी वह आसानी से ताड़ जाती है और उनसे सतर्क रहना भी उसे आता है। गब्बर जैसे शराबी गुंडे की घूरती आँखों से वह इतनी तंग आ चुकी है कि इसके बारे में भी वह जिक्र करना नहीं भूलती। पर वह अपने प्राननाथ को आश्वासन देती है कि वह इस बात को लेकर चिंतित न हों। गब्बर जैसे गुंडों से निपटना उसे अच्छी तरह आता है। आदिकाल से नारी को किसी न किसी रूप में प्रताड़ना मिलती आई है। ऐसी अबला नारियों के बारे में वह सुनती आई है। इसलिए उसे अपनी नई पीढ़ी की धारा में बहना है। अपने को सशक्त व सजग बनाना है।

    रमकल्लो जिस तरह प्रगति के मार्ग पर अपना परचम लहराते हुये चल रही है किसी को भी उस पर गर्व होगा। उससे बस यही कहना चाहूँगी:

    कभी अनुराग कभी विराग
    तुम साज संग राग हो
    तुम शक्ति और उपासना
    इस अनंत में विहाग हो।

    नव युग की नव अनुभूति
    तुम अब नहीं गंवार हो
    पतझर में एक बहार सी
    संकट के समय कटार हो।

    लगन और उमंग की
    तुम बनी मिसाल हो
    रह रही हो अकेली
    फिर भी तुम निहाल हो।

    तुम आन बान से रहो
    चट्टान सी खड़ी रहो
    प्रशस्ति पंथ में सदा
    जी जान से अड़ी रहो।

    जो तराशता रहा तुम्हें
    वह एक शिल्पकार है
    जो दे रहा प्रशस्ति तुम्हें
    वह कलम औजार है।

    लखनलाल जी, आपका सशक्त लेखन रमकल्लो का पथ प्रदर्शक बना। आप और आपकी लेखनी दोनों को प्रणाम। बधाई व शुभकामनाएं स्वीकार करें।

    -शन्नो अग्रवाल

    • आदरणीया शन्नो अग्रवाल जी, आपने पाती के हर कोण पर अपनी विस्तृत टिप्पणी की है। रमकल्लो से आप जिस तरह से जुड़ी हैं, एक लेखक के लिए इससे बड़ी बात क्या हो सकती है। अंत की ये काव्यमयी पंक्तियां दिल को छू लेने वाली हैं।
      बढ़िया टिप्पणी के लिए आपका बहुत-बहुत आभार शन्नो जी

  2. वासुदेव छंद
    लगा हुआ मन, पढ़ने में ।
    नूतन कल निज, गढ़ने में ।।
    पढ़ती है नित, रमकल्लो ।
    लगा लगा चित, रमकल्लो ।।
    नित चिल्लर सर, रहे पढ़ा ।
    समझाते सब, बढ़ा चढ़ा ।।
    रत्नाकर अरु,नागमती।
    नारी जीवन, भाव सती ।।
    आग लगाकर,तोते ने ।
    दूभर कर दिन, तोते ने ।।
    विरह कथन सुन,रमकल्लो ।
    तड़प उठी मन,रमकल्लो ।।

    ठाकुर दास शर्मा

    • आदरणीय ठाकुर दास जी, आपकी रचनाधर्मिता दिल को छू जाती है। रमकल्लो कविता में भी निहाल हो रही है। आपकी टिप्पणी में जो स्नेह है वह रोम-रोम पुलकित कर रहा है।
      टिप्पणी के लिए आपका बहुत-बहुत आभार सर

  3. प्यारी बिटिया राम कल्लो,
    जुग जुग जियौ ,
    तोहार यह बेर कै चिट्ठी पढ़ि के तो हमार करेजा मुंहे में आइ गवा! हम समझि गए कि नागवती कै किस्सा तुम का आपन किस्सा लाग है, यही से तोहरे ऊपर वहि का एतना असर पड़ा है कि तूं अपनी चिट्ठी में पूरा किस्सा अपने प्राणनाथ का लिख दिहे हौ!
    धीर धरे रह्यौ बिटिया, कबौ तो राम जी कें तोहार सुधि आयी और तोहरे प्राणनाथ से तोहर मिलन होई।

    खूब मन लगाइ के पढ़्यो बिटिया रानी। यहि से तोहार समय भी बढ़िया से कटी और हिम्मतियौ भी आए।
    वैसे तोहरी हिम्मत का पता तो हमैं यहि से चलि गा कि तूं गब्बा जैसन सोहदन से निबटै का मन बनाय लिए हौ।

    जौन तूं पढ़ै-लिखै का ठाने हौ वहि इच्छा का राम जी पूरा करैं! हम तौ इहै आसिरबाद तोहका देबै।

    बाकी पढ़ै लिखै के साथे अपने खाय पियै का भी ध्यान राख्यो।

    आसिरबाद के साथे,
    तोहरी
    बड़की

    • आदरणीया सरोजिनी पाण्डेय जी, आपकी टिप्पणी पढ़कर अच्छा लगा । रमकल्लो के लिए आपकी समझावन और आत्मीयता दिल को छू गई ।
      इस भावनात्मक टिप्पणी के लिए आपका बहुत-बहुत आभार सरोजिनी जी

  4. तुमाई पाती पढ़खे पत्तो चलो कि रमकल्लो , तुमाई पढ़ाई लिखाई खूब अच्छी चल रई,
    चलो भोतई अच्छी बात है,,
    जोन राजा रतन सेन जो पराई जनी पद्मावती के पीछे अपनी पत्नी नागमती को भूलाए दे रहो ,ओर जा दुख से नागमती की
    का हालत हो रही ,बिरहा की अग्नि में जल रही नग़मती की कथा तुम्हु को नीकी लग रइ हुईये ,काय से कि तुमाये प्राणनाथ सो तुमसे दूर हैंग,
    हमे तो जो समझ नई आ रओ का कमाई कर रव , कौनऊ फैक्ट्री में लगो ,की बेलदारी ,मिस्त्री गिरी कर रव,कछु तो लखन लला से पत्तो लगाओ ,कऊ ,रत्नसेन घाई , कौन ऊ पदमावती के पीछे तो नई डरो, है, काय से कि आजकल जमानों भोताई खराब चल र ओ
    आज तक बाने तु माई एकऊ पाती को जवाब नई दव
    बस जई से तनक चिंता सी हो जात
    वैसे तुमाय पढ़बे से ,अच्छे अच्छे ठिकाने लग जाने
    चलो चिंता जिन करियों राम सब ठीकई करहे
    अपओ ध्यान धारियों

    • आदरणीया कुंती जी, आपने तो रमकल्लो की बोली बानी में रमकल्लो खों खूबई सीक दै दई। और बा सीक डब्बा (टिप्पणी वाले ख़ाना) में डाल दई।
      रमकल्लो ऐसे सनेह खों तरस गई ती। अब आप लोगन के सनेह सैं बा खुस है।
      आदरणीय तेजेन्द्र सर जी ने ओखैं अंतरराष्ट्रीय मंच जो दै दओ।
      आपखों औ तेजेन्द्र सर जी खों भौत-भौत धन्यवाद

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