शैली फिर उसी गहरे रंग के पत्ते को देखे जा रही थी एकटक। विराज के जाने के बाद से पिछले आठ दिनों में यही वह फ्रेम है जिसपर नज़रे टिक पाती हैं उसकी। देखा जाए तो शैली के पर इस समय न जाने कितने सारे दुखों का उधार चढ़ा हुआ है। यह उसे चुनना है कि किस दुख को अभी महसूस करे और …।
मम्मी समझती है लेकिन उतना तो फिर भी नहीं जितना विराज समझता था। कभी कभी शैली को लगता है कि शायद विराज उसे उसके जन्म से जानता है। कहीं देख भर लेने, हाव भाव में होते बदलावों से भी कैसे मन पढ़ लेता था! क्या ये योग्यता काफी नही थी उसे अपने साथ रखकर जीवन बिता देने के लिए? शैली ने कितनी गहराई से मम्मी की आंखों में झांककर पूछा था उस दिन।
मम्मी भी विराज के न रहने पर किस तरीके से दुख जता सकती है! उन्होंने तो नाम ही दस दिन पहले सुना। शैली चुनने में गलती नही करेगी, ये विश्वास तो था उन्हें। लेकिन इस लड़के का तो कोई ज़िक्र भी नही हुआ कभी।
“देखो बेटा अचानक तुमने सब तय कर लिया और”
“नही मम्मी, ये सब अचानक नही हुआ था। वो आपने मिन्नी चाची के दिखाए हुए लड़के को लेकर बात करनी शुरु की थी, तब तक मन में कुछ नही था।”
“फिर ये एकदम से”
“सब कुछ तो अच्छा था उस लड़के में, लेकिन मन मान ही नही रहा था। और जब मैने अपने आप को टटोलकर देखा, तब सरल सा उत्तर था कि चूंकि ये लड़का विराज तो है ही नही। इसलिए फिर…”
शैली ने एक करुण सी दृष्टि मम्मी पर डाली थी। अपने मन को ही जान लेने में भी उसे मम्मी की मदद चाहिए थी शायद। लेकिन बाकी सारी बातों में वात्सल्य रस घोलती मम्मी, इस मामले में कैसी अजनबी सी होने लगी थी। वे भी तो ऎसा कुछ पहली बार ही महसूस कर रही थी। क्या प्रतिक्रिया देनी चाहिए, सूझा ही नही होगा।
शैली को याद आया, कैसे उसकी मौसी, सोनी दीदी की शादी के लिए हर वक्त जल्दी मचाती रहती थी। जब शादी तय हुई, तब सबको लगा कि शायद मौसी के लिए जीवन का सबसे खुशनुमा दिन होगा, लेकिन वे तो ऎसी चुप्पी लगा गई जैसे कोई अनहोनी हो गई हो। पूछने पर मम्मी ने बताया भी तो था, कैसे खुशी मना लेगी दीदी अब, बेटी ब्याहना तो कर्तव्य होता है, तय हो जाने पर खुश होने का मतलब है बिटिया जाने पर भी मां को कोई फर्क नही पड़ रहा है।
ये ऎसे उलझाव वाले भाव शैली को कभी भी समझ में नही आते थे। तभी तो, जब विराज ने उसे ये गहरे रंग के पत्तों वाली फ्रेम उपहार में दी थी, उसकी सोच के एक बारीक से धागे को ही तो पकड़ पाई थी शैली।
“सब कुछ तो गहरा ही हो जाता है अंत में शैली!”
विराज ने कहा था और शैली चौंक गई थी। कहां तो वह अपने रुप रंग को लेकर सचेत होने और बहाने से पास आने के क्रिया कलापों को ही सब कुछ मान बैठी थी और ये अचानक से दार्शनिक स्वाद वाला वाक्य उसे हिला गया था।
“हम सभी… हमारी सोच भी तो..”
विराज कहता चला,
“आदत पड़ना किसी रंग का गहरा होना ही तो है ना! मैं चाहता हूं कि हम एक दूसरे के लिए इन गहरे पत्तों से ही हो जाएं! क्या कहती हो?”
शैली हतप्रभ थी। हम दोनों गहरे पत्ते! क्या अर्थ छुपा है इन शब्दों में, रंगों में, बातों में! कुछ समझ पाती, इससे पहले ही विराज जाता हुआ दिखाई दिया था।
वो उसका जाना आखरी बार का था। ठंड़ की हल्की पीली धूप ने उसके जाने के चारो ओर सुनहरी फ्रेम सी जड़ दी थी। देखती रह गई थी शैली उसे। और अब तो वह भी संभव नही है।
कितने चाव से उसी दिन घर पर विराज की बात की थी उसने। उसके ऑफिस में आना जाना है शैली का अपने काम के सिलसिले में। दो तीन मुलाकातों के बाद ही एक रिश्ता सा बन गया है दोनों में। जान पहचान से ऊपर, दोस्ती के समानांतर और कुछ कुछ से बहुत कुछ के बीच वाला।
मम्मी कुछ बोल नही पाई थी। पापा ने ज्यादा महत्व दिया नही था उसकी बात को लेकिन गंभीर हो गए थे। मम्मी ने मिन्नी चाची को फोन कर झूठ कह दिया था कि शायद शैली को लंबे समय के लिए प्रमोशन लेकर बाहर जाना पड़े, इसलिए लड़के को रोकना सही नही। तब भी शैली समझ नही पाई थी कि खुश होना है या नही।
मम्मी पापा कुछ बात करते रहते थे कमरे में, वहां से बहकर आती हवा में थोड़ी सीलन ज़रुर थी जिसके आसवन से शैली ये पता कर पाई थी कि पापा को विराज का अकेला होना खल रहा था। परिवार में कोई भी ऎसा नही था जिसे वो अपना कहकर सामने रख पाता। और शैली को लग रहा था कि यही वो कारण है जिसके चलते विराज जैसे लड़के को अकेला रखा भी नही जाना चाहिए ज्यादा समय तक। लेकिन ये उसकी भावनाओं के ज्वार वाले तर्क थे। मम्मी पापा दुनियादारी के रास्ते पर कर्तव्यों की सच्चाई का निचोड़ चाहते थे।
लेकिन कुछ बात बन पाती, इसके पहले ही सड़क हादसे में विराज के न रहने की खबर आई।
इतना कच्चा कच्चा सा संसार… कि सोचना भी शुरु करने का माहौल बनाना नसीब न हो और सब कुछ खत्म! शैली सोचती जा रही थी, रुक ही जाती दो दिन तो क्या हो जाता। नही बताना था मम्मी को विराज के बारे में। अब जीवन भर के लिए उसका नाम तो चस्पा रहेगा ही उनकी ओर से शैली पर। लेकिन क्या इतना ही हल्का सा था उसका नाता विराज से, कि अब उसके न रहने पर, अपने साथ नाम जोड़े जाने की चिंता ज्यादा है?
मम्मी समझ नही पा रही है कि वे शैली को क्या कहकर सांत्वना दें। शैली खुलकर न तो दुखी हो पा रही है न ही सामान्य रहती है। उस विराज के लिए मम्मी ने भी सोग ले रखा है जिसे उन्होंने कभी देखा तक नही। सिर्फ इस संभावना के पता भर चलने से, कि कभी वह इस घर का बहुत कुछ हो सकने की क्षमता रखता था। चाहती तो मम्मी भी थी उस दिन, कि शैली से कहे विराज की कोई फोटो हो तो दिखाओ। जल्दबाजी हो जाएगी सोचकर चुप्पी ओढ़ ली थी उन्होंने, लेकिन अब..
पापा के मन का पिता बिटिया के लिए ही खुश है और बिटिया के लिए ही दुखी भी। पिछले कुछ दिनों में ऑफिस से छोड़ने लाने के दौरान किसी लड़के के साथ देखा था शैली को। बिखरे बाल और गहरे से कपड़ों में औलिया किस्म का वह नौजवान उन्हें बहुत अच्छा तो नही ही लगा था। वही विराज होगा अगर तो, फिर ठीक ही हुआ। लेकिन शैली का सूखा सा चेहरा चैन भी नही लेने दे रहा है।
तीनों अपने अपने द्वीपों पर बैठे हुए चारों ओर से झंझावात का सामना कर रहे हैं। संवाद का सेतु बन ही नहीं पा रहा है। ये कैसी अजीब सी विपदा है। अच्छा हो अगर शैली खुलकर रो ले। बहा दे उस विराज को अपने आंसुओं से, अपने जीवन से। मम्मी का मन जाने कहां कहां जाकर लौट आया था।
हफ्ते भर से ज्यादा हो गया था अब। जो कभी घर नही आया, वो अब कहीं न होकर भी घर भर में ऎसे पसरा था, कि घर के सभी आईना देखने से भी कतराने लगे थे।
शैली ने आज एक बार फिर वह गहरे पत्तों वाली फ्रेम उठाकर सामने रखी है। उसे लगता है कि इसमें से धूसर वाला पत्ता विराज है और भूरा वाला पत्ता वो स्वयं। दोनों एक फ्रेम में साथ हैं। दोनों को एक दूसरे की आदत हो गई है गहरी वाली।
उसे ये भी लगता है कि विराज का कुछ रिश्ता इस घर से भी होगा, तभी तो एक पत्ता बनकर यहां आ गया है। और थोड़ा थोड़ा वह मम्मी पापा के मन में भी है, भले ही किसी भी रुप में हो। सब कुछ सही चलता होता, तो कभी विराज आता यहां, आवभगत होती उसकी और शैली सचमुच उसके साथ एक फ्रेम में रहकर जी पाती। लेकिन ये गहरी वाली आदत भाप बन गई।
ऎसे निर्वात में तो जीना सही नही है। धूप में विराज के जाने को याद करते हुए जब शैली एक लंबी सांस लेने को होती है तो कुछ अटक जाता है मन में। एक कोहरा सा घर में भी छा गया है। मम्मी पापा उसका ध्यान रख रहे हैं, साथ साथ रह रहे हैं! और वो कहीं अकेली सी निकल पड़ी है, एक असंभव को खोजने के लिए।
दूसरे कमरे से शैली को दबी आवाज में मम्मी की फोन पर बातचीत सुनाई दे रही है। वे किसी को धन्यवाद कह रही है, शैली की बीमारी का बहाना बना रही है। यह दो तीन बार हो गया और तब शैली का ध्यान पत्तों से हटकर कैलेन्डर पर गया। ये दिन वो कैसे भूल गई है? मम्मी पापा की शादी का दिन है आज। वो अपने दुशाले के लिए कपास बीनते एक अनकहे तूफान में खो गई और उसे सींचने वाले कितने सूखे से खड़े हैं आज!
शैली की आंखें बरसने लगी, पूरे आठ दिनों के बाद। और आज भी उसे पता नही है कि ये जो बरस रहा है उसमें विराज कितना है और मम्मी पापा का खास दिन भूल जाने की ग्लानि कितनी। हमेशा ऎसा ही क्यों होता है उसके साथ! क्या कुछ भी केवल उसका नही रह जाने वाला है कभी? कोई संवेदना भी अपने विशुद्ध स्वरुप में उसे नही छू सकती है क्या?
विराज, अब मैं गहरा रंग दे रही हूं अपनी आदत को। हां, तुम्हारा होना भी और तुम्हारा जाना भी, ये दोनों आदतें ही तो हैं। इस फ्रेम में से मुझे निकलना होगा विराज। ये धूसर पत्ता तुम्हारा होना है, जिसकी आदत है मुझे, और ये भूरा पत्ता तुम्हारा जाना है, जिसकी आदत करने की कठोरता मुझे दिखानी होगी। टूट रही हूं ये करते हुए लेकिन फिर से जुड़ने के लिए एक बार पूरी तरह से टूट ही जाना होगा। शैली फ्रेम को गले लगाकर विराज को बिदाई देने की घृष्टता कर ही बैठी थी।
एक लहर के वशीभूत होकर शैली ने गहरे पत्तों वाली वह फ्रेम, अपनी अलमारी में रख दी है, लपेट दिया है उसे उस खास लाल साड़ी में, जो दादी ने अपनी निशानी के बतौर उसे दी है। ऎसा लगा, जैसे दादी ने गोद ले लिया है विराज को, क्षमा कर दिया है शैली को!
इन प्रतीकों की बैसाखियां ही उसे इस उमस भरे कोहरे से बाहर निकाल सकती है। उसे इस धुंध भरे समय में, दादी की लाल साड़ी का सहारा बड़ा अनमोल लगा। अब धूसर और भूरे के साथ लाल रंग भी जुड़ गया था फ्रेम में और तस्वीर पूरी हो गई थी।
इतने दिनों बाद शैली ने कमरे का दरवाजा पूरा खोला था, ताजी हवा को अंदर आने दिया था। हल्के से मुस्कुराई भी थी। सामने पापा का दिया गुलदस्ता थामे बुत सी खड़ी मम्मी उसे देखे जा रही थी। शैली ने पता नही क्यों, गुलदस्ते से एक हरा पत्ता तोड़ा और मम्मी के बालों में खोंस दिया। आज से उसने अपनी आदतों के रंग को बदल लिया था।