Wednesday, February 11, 2026
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लखनलाल पाल की कलम से – रमकल्लो की पाती : माहौल बदल रहा है (भाग – 17)

प्राननाथ
चरन स्पर्श।
मैं यहाँ कुशल से हूँ। आशा करती हूँ कि आप भी कुशलपूर्वक होंगे। क्या बताऊँ प्राननाथ, आजकल गाँव का माहौल खराब होता जा रहा है। दरबा दारू पीकर नंगनाच करते हैं। किसी को सहन होता है, किसी को नहीं। कल शराबी गालियाँ बकते हुए परधान जी के द्वारे आ गये थे। छूटते ही परधान जी को अब्बे-तब्बे करने लगे।
परधान जी कहाँ सहन करने वाले थे, वे लट्ठ लेकर उन्हें मारने दौड़े। वह तो सायत-घरी साजी थी, सो वे बच गए। कुछ भले लोगों ने परधान जी को रोक दिया वरना दरबा बिना पिटे न जाते। लुंगाड़े बढ़े गाँव में। बरगए करत-धरत कछु नहियाँ, बाप की कमाई पीकर उड़ा रहे हैं। उन्हें तो तुम जानते होगे। अरे वही रमसाई कक्का का बड़ा लड़का गब्बे और कढ़ोरे दादा का बिना बनाओ सो सपूत खलकसींग। ये दारू पीकर बहन-बेटियों पर बुरी  नजर डालते हैं। इन शराबियों का क्या ठिकाना, सब कोई अपनी इज्जत को डरता है। इन्हें किसी की इज्जत-बिज्जत से क्या लेना-देना। नाटपरे गर्राने फिरत।
आदमी बीच में न आते, तो इनका सुधार हो जाता। उन्होंने परधान जी को रोक दिया था, नहीं तो वे वहीं गत कर देते। कुट-पिट जाते, तो सारा नशा उतर जाता और दोबारा कभी पीने का मन न करते। अगर पीते भी तो घर से बाहर न निकलते।
पिएँ के बाद वे सता-पताल की हाँकत। दबंगई ऐसे दिखात जैसे भूमंडल को लातों से रोंद लिया हो। जिन्दगी में चाहे मरी चुखरिया न मार पाई हो, पर बहादुरी शेर मारवे वाली दिखात।
गब्बे शरीर से बलिष्ठ हो गया है। वह उसी की गर्मी दिखा रहा है। दारू सुरककर दिन भर गलियों में घूमता है और जिस-तिस को गरियाता रहता है। लोग उससे उलझना नहीं चाहते हैं कि काहे को रार बढ़ाई जाए। वह तो सरतारौ भइया है। आदमी को घर के बारह काम देखने हैं। इससे लड़ाई लड़े कि अपना काम देखे।
न वह बाप की आन-मरजाद करत और न किसी को सेंटता है। ऐसे कपूतों से तो बाप भी डरते हैं। ज्यादा कहने से हाथ ही न छोड़ दे, इसी से बाप दूर रहता है।
कए का है? मरेंगे। ज्यादा अत्त धरेंगे, तो ऊपर को गोड़े उठाएँ सोइ चले जाएँगे। लोग कितना सहन करेंगे? कोई न कोई उसे लड़ने को मिल जाएगा।
प्राननाथ, बहू-बेटियाँ उसके सामने जाने से डरती है। उन्हें ऐसे देखता है, जैसे सैंघौ सुटक जाएगा। न जाने कितनी तो फब्तियाँ कसता है। बताव ले, ऐसा करके क्या मिल जाता है इसे ? कोई कहाँ तक बर्दाश्त करेगा?
क्या-क्या बताऊँ प्राननाथ तुम्हें। उसने एक दिन हरबी की मौड़ी सरोजी को पकड़ लिया था। तुम्हें बताया नहीं था मैंने? … शायद… नहीं…। एक रात वह हरबी के घर में घुस गया था। वह तो कहो मौड़ी सरोजी चिल्ला पड़ी, नहीं तो जाने क्या हो जाता ? हरबी ने उसके झपटकर बाल पकड़ लिए थे। हट्टा-कट्टा है गब्बे, सो छुड़ाकर भाग खड़ा हुआ।
हरबी जिज्जी ने शोर मचाया तो गाँव का आदमी जाग गया । सबेरे पंचायत बैठी रही। पंचों ने उसे बुलाया था पर वह आया क्या? बाप ने अपने सिर की पगड़ी उतारकर हरबी के पैरों पर रख दी थी कि हरबी अबकी बार माफ कर दे। वह दोबारा ऐसा कृत्य न करेगा। एक तो मखना का लड़का कलुआ ही बहुत था, अब यह पैदा हो गया। बेचारी क्या करती? रोज-रोज के अपमान से अच्छा था कि ससुराल चली जाए। इसी से मेरे समझाने पर वह मान गई थी और लड़के के साथ रहने को राजी हो गई थी।
परधान जी ने हरबी से कह दिया था कि तू रिपोर्ट कर दे, मैं तेरे साथ हूँ। बेचारी हरबी डर गई थी, वह रार नहीं बढ़ाना चाहती थी। वह तो इतना चाहती थी कि बूढ़े-बुजुर्ग उसे समझा दें कि मेरी लड़की पर बुरी नजर न डालें।
प्राननाथ, गब्बे की बिघना (भेड़िया) जैसी हेराई है। जैसे पुष्ट बकरी को देखकर बिघना की आँखें चमक जात, वैसे ही लड़कियों को देखकर उसकी आँखें चमक उठती।
वह बहुत ढीठ है। रास्ते में आते-जाते मुझे भी घूरता रहता है। काफी दूर तक पछयाता भी है। एक दिन कह रहा था, “भौजी, भैया तो है नहीं, मेरे साथ आ जा।” प्राननाथ मुझे गुस्सा ही आ गया। मैंने कहा कि रे! तेरे ऊपर मैं पेशाब न करूँगी। उसने
बहुत आँखें तरेरी। खूब तरेरत रहे, मेरा क्या बिगाड़ लेगा। जवानी की गरमी बताउत। ऐसी गरमी वाले बहुत देख लिए। रमकल्लो को बहकाने की सोचता है।
दिन भर उसका यही एक काम है, शराब पीकर लड़कियों को छेड़ना। लड़कियाँ भी तो छुई मुई बनी रहत। दें कान के नीचे एक रहपट तो अपने आप दिमाग ठीक हो जाएगा। डर को जितना ज्यादा तवज्जो दोगे, वह उतना ही हावी हो जाता है। विरोध से कई समस्याएँ अपने आप हल हो जाती हैं।
गब्बे चालाक बहुत है। चलते पुरजा लोगों की बेटियों से नहीं बोलता है। उन्हें कुछ कहेगा, तो वे लात धर के जीभ न काढ़ लेंगे। जो उसका कुछ न बिगाड़ सके, उन्हीं पर गुंडई दिखाता है। शराब पीकर भी होश रहता है कि सबल को कुछ मत कहो। कहा, तो वे सारी शराब उतार देंगे।
प्राननाथ गाँव में सब ऐसे ही चल रहा है। जो कुछ होता है, मैं तुम्हें बता देती हूँ। बताना मेरा फर्ज है। आप मेरे बारे में क्या सोचते हो, आप ही जानो।
आपकी
रमकल्लो
लखनलाल पाल 
जन्मतिथि- 2 जुलाई सन 1968 
जन्म स्थान- ग्राम व पोस्ट इटैलिया बाजा जिला हमीरपुर उत्तर प्रदेश 
शिक्षा – b.sc गणित M.A हिंदी b.ed पीएच-डी हिंदी 
प्रकाशित रचनाएं- हंस, कथादेश, कथाक्रम ,लमही ,युद्धरत आम आदमी, सृजन समीक्षा, पुरवाई आदि में कहानियां प्रकाशित। 
सम्प्रति – रमकल्लो की पाती उपन्यास धारावाहिक रूप से पुरवाई पत्रिका में प्रकाशित 
प्रकाशित पुस्तकें – बाड़ा ऋतदान, रमकल्लो की पाती (उपन्यास) पंच बिरादरी , कोरोना लॉकडाउन और लड़की (कहानी संग्रह )
 वर्तमान पता- कृष्णाधाम के आगे नया रामनगर उरई जिला जालौन उत्तर प्रदेश 28 5 001 
ई-मेल – [email protected]


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11 टिप्पणी

  1. इस पाती में रमकल्लो की पीड़ा, और साहस झलकता है ।
    इसमें एक गांव की स्त्री की व्यथा तथा उसका प्रतिरोध पढ़ने वाले को खींचता है। गांव का जीवन इसमें साकार हो उठा है। अच्छी रचना के लिए बधाई आपको।

  2. वाह वाह वाह!! तेजेंद्र की हार्दिक धन्यवाद तेजेंद्र की हार्दिक धन्यवाद इतना सुस्पष्ट, सुदृढ़, साहसिक (या किदुस्साहसिक ?) संपादकीय लिखने के लिए। अमेरिका के बारे में भौगोलिक और संस्कृत जानकारियां तो लेखो, निबंधों और मानचित्रों से मिलती रहती हैं परंतु सद्य राजनैतिक, आर्थिक जानकारी तो आपके इस संपादकीय ने दी ।
    आंखें खुल गई इस चौपट राजा की बुद्धि और विवेक की जानकारी पाकर!
    मोदी जी के प्रति किए गए ट्रंप के व्यवहार से तो ‘मूर्ख मित्र से बुद्धिमान शत्रु ही उत्तम है’ यह कहावत पूर्ण रूप से चरितार्थ हुई है!
    बधाइयां और धन्यवाद स्वीकार करें।

  3. अबे हमने तुमाई पाती पढ़ी, रम कल्लो ,जो का दतों तुमाय गांव में
    पेले बो कलुआ तो हतोई,अब जो गब्बे ओर कढ़ौरे कक्का को
    खिलक सिंह ,ओर का के रई कि हरबी जीजी की मोडी को पकड़ लओ तो ?
    बो तो अच्छी रई तुमने समझा बुझा के मोडी को ससरारे भेज दईं
    अब तुमे का बताएं हमे मोहल्ला में सोई एसोइ एक नस मिटो हतो
    लुगाइयां को सनजा बिरिया कड़बो दूभर करेतो, मोहल्ला के कुम्हार के दो आदमी ,गट्टा ,ओर बीरन को शाम के 5बजेइ बुला के दारू मंगवाने पीने ओर पीबाने ,ओर आऊत जाऊत जानियन को घूरने, और अंट शनट बकने
    रोजाई को काम हो गओ थो
    एक दिन गट्टा की जनी ने गट्टा खो घर से कड़न नई दव ,

    अब बो नासमिटो ,बब्बर कतई बासे , बानो खूब तो बाप मताई की जमीन जायदाद हेगी ,पूरे गांव को कर्जा दे देकर सबसे गुलामी करवाउत ,

    जब गट्टा बब्बर नो नहीं पोचो तो बब्बर गट्टा के घर में घुस गओ
    ओर एक झापड़ गट्टा खो घाल दाव गट्टा तो मूड नीचे करके रे गओ,लेकिन गट्टा की लुगाई अपने आदमी की जो हालत देख नई पाई
    बाने आव देखो ना ताव बब्बर को धक्का देके नेचे गिरा दव फिर तो गट्टा की जनी और छोटे भैया की बहू ,मोदी मोड़ा ,दे तेरी की दे तेरे की खूब मार धरी ,कूटो पितो घर से भगो,

    बैंक बाद दोई बहूअन ने अपने कपड़ा फारे और रातई में थाने में रपोट डार दाई ,जाने रात में गुंडान के संगे घर में घुस आओ तो ओर हम जानियान को परेशान करो
    बो दिन हे के आज को दिन
    बब्बर सिदो घर जाऊत ,

    के बे को मतलब जो ई हेगो कि हमे तोपे पुरो बिस्वास हे , तोये कोई गुंडा परेशान नई कर सकत ,
    ते चार नई घाल पे तो दो सोई घाल दे हे ,साबरी जानत हैं कि रम कल्लो पढ़ी लिखी है ,कोर्ट कचहरी नपवा दे हे
    सो तुम आराम से राव ,ओर तुमओ बो प्राणनाथ कबे आ राव
    ऐसी कौन सी कमाई में लगो ?
    सांची काय बोऊ जानत हमाई लुगाई सी काऊ की लुगाई नैया
    पढ़ी लिखी दबंग है ,अकेले निपटने की हिम्मत रखत
    चलो रख रय ,आज हमे भजनन में जानें ,आपो ध्यान रखियो

    • आदरणीया कुंती जी, आपने हकीकत घटना को इस पाती जोड़कर इसकी विश्वसनीयता पर एक तरह से मुहर लगा दी है। रमकल्लो के प्रति आपने जो चिंता व्यक्त की है वह आपकी सहृदयता को दर्शा रहा है। आपकी यह चिंता बता रही है कि आप रमकल्लो से बहुत अधिक जुड़ गई है।
      रमकल्लो के प्राननाथ को जो उलहना आपने दिया है वह बहुत बढ़िया है। इतनी नोनी टिप्पणी के लिए आपका बहुत-बहुत आभार कुंती जी।

  4. बिटिया रमकल्लो
    खुस रहो,
    यह बेर की तोहरी पाती पढ़िकै तो बेटी ,हमार जिउ कांपि गै। ई मुंह झंउसी सराब तौ पतुरिया जस, मूरख मरदन के गटई मां हाथ डारि डारि के रिझाय रही है।हम अब तक सोचत रहे कि खाली सहरन मां ही ई बीमारी है, लेकिन तुम्हरी पाती से मालूम भया कि यह तो गांवनवा मां भी व्यापि रही है। जवन मूरख मर्द यहि के झांसे मां फंसे तिनकर धन-दौलत, नाते -रिस्तेदारी, इज्जत -आबरू कुल नसाय लागत है। तुम जेतना समुझाय के औ खुलि के पाती मां सब हाल लिखे हौ ,वहि से हम जानि गए हैं कि तुम का समुझावै की कौनो जरूरत नाही है।
    लेकिन बेटी, मनमां तो हौल जरूर बइठ गा है। सम्हारि के रहस्यो बच्ची! भगवान जी सबकै रच्छा करैं।
    लेकिन बिटिया ,एक बात हम जरूर तुम का समझावेंगे कि भगवान न करै, जौ तुम्हरे साथे केहु जोर -जबरजस्ती करै की कोसिस करै तो नेटई फारि के चिल्लायौ,गरियायौ, केहु न केहु सहाय जरूर होइहै ,जैइसे द्रोपदी के खातिर किसनजी औ ग्राह के बदे नारायन सामी आए रहे। प्रभु जी सबकी रच्छा करैं।

    तोहरी
    बड़की

    • आदरणीया सरोजिनी पाण्डेय जी, आपकी भावनात्मक टिप्पणी पढ़कर मन भीग गया। आपने सचमुच एक मां का हृदय पाया है। रमकल्लो के लिए आपने जो स्नेह उड़ेला है उसको व्याख्यायित नहीं किया जा सकता है। बस महसूस किया जा सकता है।
      इतनी बढ़िया टिप्पणी के लिए मैं आपका बहुत-बहुत आभारी हूं

  5. आदरणीय लखन लाल पाल जी
    रमकल्लो की पाती पढ़कर एक संस्कृत श्लोक याद आया –

    अश्वं नैव गजं नैव व्याघ्र नैव च नैव च
    अजापुत्रं बलिं दद्यात् देवो दुर्बल घातक :

    इस संदर्भ में और कुछ लिखना पिष्टपेषण होगा । आप की पाती नए कीर्तिमान स्थापित करें इसी प्रार्थना के साथ
    बहुत प्रभावशाली और जीवंत अभिव्यक्ति
    बधाई
    प्रो. विजय महादेव गाड़े

    • आदरणीय प्रोफेसर विजय महादेव गाडे जी, आपके संदर्भ बहुत सटीक होते हैं। इस एक श्लोक ने पूरी पाती को व्याख्यायित कर दिया।
      आपकी इस टिप्पणी के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद सर

  6. महामंगला छंद
    अठकल नगण,अठकल गुरु लघु

    रमकल्लो की सुमति ,लिखती श्रेष्ठ विचार।
    दारू पीते कुमति, करते दुर्व्यवहार ।।
    संकट में हैं सुजन,बेटी बहू समाज ।
    हालत चिन्ता जनक,पैदा सी है आज ।।
    एकाकी है मगर,रमकल्लो हुशयार ।
    पाले अपने हृदय,रखती श्रेष्ठ विचार ।।
    बढ़ता जाता तमस,अन्तर दीपक जार।
    बिगड़ा महौल लखत,खुदको रखत सभार ।।
    पथ में फिसलन बहुत, गिरते है जन चीख ।
    कैसे धरना चरन,रमकल्लो से सीख ।।

  7. इस बार की रमकल्लो की पाती से गांव में दारू पीकर तमाम शराबी लोगों की हरकतों के बारे में जाना। उनकी ऊटपटांग हरकतों से लोग परेशान होते दिख रहे हैं। बहू बेटियों पर संकट मंडराता हुआ दिख रहा है। यह बड़ी चिंतनीय परिस्थिति हो गई। पर खुशी यह जानकर हुई कि वह इतनी समझदार है कि अकेले रहते हुए भी वह इस काजल की कोठरी में अपने को कालिख से बचाने में सक्षम है। किस विषम परिस्थिति में क्या करना चाहिए यह बात तो कोई नवयौवना और सतर्क रमकल्लो से सीखे। उसका अंतर्मन अब तक उसे हमेशा सही रास्ता दिखाता रहा है। रमकल्लो एक रोल मॉडल की तरह है। हर लड़की को उसकी तरह निर्भया होना चाहिए।

    लखनलाल जी, रमकल्लो की सजगता व निर्भीकता ने सबका दिल जीत लिया है। आगे भी उसे व आपके लेखन को शुभकामनाएं।

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