सुबह राधिका के लिए नहीं होती थी, सुबह तो उसके पति शेखर के लिए होती थी। दिन निकलता, राधिका बिस्तर पर पड़ी रहती। उसे उठने की कोई जल्दी नहीं रहती थी। उसके पास पूरे दिन का समय था, लेकिन समय में उसकी कोई जगह नहीं थी। वह चाहे तो दिनभर काम करती रह सकती थी, चाहे तो दिन भर खाली रह सकती थी। लेकिन उसने मन के खालीपन से ज्यादा दिन के खालीपन को चुना था। यह जगह जिसे वह अब तक घर नहीं मान पा रही थी, करने को काम बहुत था, लेकिन उसे करने वाला कोई नहीं था। जब से वह इस घर में आई थी, हर काम पर उसका ही नाम लिखा रहता था। जो काम इस घर में पहले कभी नहीं होता रहा था, उस काम पर भी।
खिड़की से धूप आती थी लेकिन वह जमीन पर नहीं पड़ती थी। धूप का एक टुकड़ा दीवार पर टिक कर रह जाता था। दीवार ने जैसे उस धूप के टुकड़े को समेट लिया था। वह चाहती थी, घर की बिखरी चीजों के बीच कोई उसे भी समेट ले ऐसे ही। वरना क्या पता एक दिन वह भी ढल जाए उस टुकड़े की तरह। वह बिस्तर पर पड़े-पड़े अपने पति शेखर को देखती रहती। धीरे-धीरे उनके काम गिनती, पहले मंजन, फिर शेविंग, फिर नहाना, बाल सुखाना, तौलियां नीचे फेंक देना, कम से कम पांच कपड़े निकाल कर एक पहनना और बाकी वहीं छोड़ देना।
पहले के दिन होते, तो राधिका के पति शेखर दफ्तर जाते वक्त बोलते, ये देख लेना जरा। जरा की कोई परिभाषा होती, तो वह जरूर देख लेती। दरवाजा बंद करते हुए उनका आखिरी वाक्य होता, आज रात कुछ हल्का बना लेना। हल्का का मतलब नमक कम या तेल कम या मसाले कम, यह पूछने की जरूरत नहीं थी। हल्का का मतलब कुछ भी हो सकता था। जिस बात का मतलब ही न हो उसे पूछ कर समय क्यों गंवाना। इसलिए उसने पूछना छोड़ दिया और करना भी।
राधिका किसी बात का जवाब नहीं देती थी। जवाब देना भी उसे एक अतिरिक्त काम की तरह लगता था। उसने इस अतिरिक्त काम से बचने के लिए एक नौकरी कर ली थी। पहले नौकरी न थी, तो घर का हर काम उसका था। अब नौकरी भी थी और घर का हर काम भी। नौकरी उसका काम था, जो उसे ही करना था। घर के काम भी उसके ही थे। अंतर यह था कि अब वह तय कर सकती थी कि पहले उसे करना चाहिए अपना चुना हुआ काम या जिस काम के लिए उसे चुना गया है, वह काम।
वह दिन बदलने की आस रखती मगर आस से कोई आस न रखती थी। घर का एक ढर्रा था, जिस पर वह नटनी की तरह चलती थी। हर पहला त्योहार उसके लिए एक काम ही था। उत्सव घर के लोगों के लिए थे, उसके लिए नहीं। हर त्योहार की अनिवार्य शर्त सफाई के बीच एक दिन राधिका ने घर की सबसे पुरानी अलमारी खोली। उसमें रखे कपड़ों में पुराने समय की हल्की गंध समाई हुई थी। कुछ किताबें थीं, जिनके पन्ने मुरझा गए थे, लेकिन हर्फ ताजा थे। दराज में एक खत रखा था। खत पर कोई तारीख नहीं थी। लगता था, लिखने वाले का तारीख से वास्ता टूट सा गया था।
उसने पीले पड़ गए उन पन्नों को गौर से पढ़ा, ‘‘मैं काम करना चाहती हूं, लेकिन घर की दीवारें बहुत भारी हैं। इन्हें खिसकाना मेरे वश में नहीं। मैं बस इतना चाहती हूं कि इस दीवार में एक दरवाजा खुल जाए। लेकिन दरवाजा है कि खुलता नहीं है।’’
राधिका ने खत वापस किताब में रख दिया।
अगले दिन उसने शेखर से पूछा, अगर मैं घर का काम न करूं, तो क्या होगा?
शेखर ने अखबार सिर उठाया, मतलब?
मतलब अगर मैं बिल्कुल न करूं। न झाड़ू, न बर्तन, न खाना। कुछ भी नहीं।
शेखर ने सोचा। फिर अख़बार को मोड़कर मेज पर रख दिया। फिर धीरे से कहा, करना तो पड़ेगा।
किसे?
किसी को तो करना ही पड़ेगा।
तो फिर मुझे ही क्यों
शेखर ने कोई जवाब नहीं दिया और बाहर निकल गया।
राधिका टकटकी बांधे घर के एक कमरे के बंद दरवाजे को देख रही थी। रोज की तरह उस पर धूल नहीं थी। वह दरवाजे तक गई, हल्के से उसे छुआ। लकड़ी ठंडी थी। उसने हैंडल पकड़ा और उसे खोलने के लिए घुमाने ही वाली थी कि शेखर चीखा, उसे रहने दो, खोलने की कोई जरूरत नहीं है।
ये दरवाजा खुलता क्यों नहीं? राधिका ने पूछा।
पुरानी हो गया है, कबाड़ रहता है इसमें इसलिए बंद रहता है।
किसने बंद किया?
किसी ने नहीं। बस, बंद रहता है। शेखर ने झल्ला कर कहा।
राधिका सोचने लगी कि दरवाज़ा यूं ही अपने आप कैसे बंद रह सकता है?
दरवाजा तो नहीं खुला लेकिन उस दिन से राधिका ने एक काम यह किया कि उस दिन घर का कोई काम नहीं किया। बर्तन सिंक में पड़े रहे। फर्श पर हल्की धूल दिखने लगी। गैस पर कोई बर्तन नहीं चढ़ा। सुबह से दोपहर और दोपहर से शाम हो गई लेकिन वह नहीं उठी।
शेखर आया। उसने दरवाजा खोला, जूते उतारे, हाथ धोने बाथरूम गया, बाहर आकर पानी पिया, फिर अचानक बोला, आज खाना नहीं बना?
नहीं, राधिका ने कहा।
क्यों?
बस यूं ही।
शेखर ने कुछ देर देखा। फिर मोबाइल निकाला। किसी को फोन किया।
हां, दो थाली भेज देना। एक नॉनवेज, एक वेज। हां, जल्दी।
राधिका ने देखा, खाना बिना बनाए भी आ सकता है।
लेकिन यह पहली रात थी। पहली रातें अक्सर अस्थायी होती हैं।
वह न सपना देखना चाहती थी और न जागना। उसकी आंखों के कोटर में नींद सूद ही नहीं वसूल पा रही थी, मूलधन की कौन कहे।
पता नहीं कैसे उस रात राधिका ने एक सपना देखा।
वह दरवाजा खुल गया था। बाहर तेज रोशनी थी। लेकिन जब वह बाहर निकली, तो देखा कि वह फिर अंदर ही थी।
एक समय में दो जगह होना कैसा होता है?
जब वह सुबह उठी, तो देखा शेखर तैयार हो रहा था। उसने पूछा, आज भी नहीं बनाओगी?
राधिका ने इनकार में सिर हिलाया।
शेखर ने फिर मोबाइल उठाया।
फिर से दो थाली आ गईं।
शाम हुई। शेखर फिर घर आया।
इस बार उसने कुछ नहीं पूछा।
मोबाइल निकाला और सीधे दो थाली मंगवा लीं।
तीसरी रात शेखर ने बहुत प्यार से पूछा, तुमने खाना बनाना क्यों छोड़ दिया?
राधिका ने कुछ नहीं कहा, बस करवट बदल ली।
शेखर कुछ नहीं बोला। उसने भी करवट बदल ली।
राधिका ने देखा आज दरवाजा पहले से ज्यादा और देर तक हिला।
घर की चीजें बदलने लगीं।
करने का असर तो उसने इस घर में देखा नहीं लेकिन न करने का असर अब घर में दिखने लगा था। कोने में पड़ी झाड़ू पर धूल जम गई थी। एक मकड़ी ने उसके पास ही जाला बुन लिया था। घर जैसे सफाई के इंतजार में खुद ही किसी मकड़जाल में फंसता जा रहा था। शेखर की ताई कहती थीं, घर में रहने वाली औरत को घर के सपने ही देखने चाहिए। राधिका कहना चाहती थी कि वह जब सोएगी, सपने तब ही देख पाएगी।
रसोई में सब्जियां सड़ने लगीं, क्योंकि अब वे पकाई नहीं जाती थीं। मसालों के डिब्बे बंद रहने लगे। बर्तन वहीं पड़े रहते, जब तक शेखर उन्हें धो न देता।
शेखर ने एक दिन पूछा, झाड़ू भी नहीं लगाओगी?
राधिका ने कहा, नहीं।
शेखर ने देखा फर्श पर धूल थी।
अगले दिन, धूल थोड़ी और बढ़ गई।
तीसरे दिन, शेखर ने मोबाइल निकाला।
एक सफाईवाली भेज सकते हो?
सफाईवाली आ गई। उसने कमर में दुपट्टा बांध कर झाड़ू लगाई। बाल्टी भर-भर कर पानी डाल कर फर्श धोया। घर साफ हो गया। राधिका का मन भी। राधिका ने देखा कि घर बिना उसके भी साफ हो सकता है।
उसने सुना शेखर सफाईवाली को कह रहा था, अब से रोज आना समझीं।
शेखर ने एक दिन कहा, कपड़े धोने वाली भी रख लें?
राधिका ने कहा, रख लो।
अब रोज कपड़े भी धुलने लगे।
फिर एक दिन शेखर ने कहा, रोज-रोज बाहर का खाना ठीक नहीं, एक खाना बनाने वाली भी रख लें?
राधिका ने कहा, रख लो।
अब घर में सब हो रहा था। बिना राधिका के। राधिका की मौजूदगी में ही।
दरवाज़ा थोड़ा और हिला।
राधिका ने फिर दरवाजे को छुआ।
वह थोड़ा और हिला।
लेकिन अभी भी पूरी तरह खुला नहीं था।
राधिका अब ज्यादातर समय कमरे में बैठी रहती। दरवाजे को देखती, खिड़की से बाहर देखती, फिर एक किताब खोलकर पढ़ने लगती। शेखर के दफ्तर जाने के बाद घर में पूरा दिन खामोशी रहती। यह वही घर था, जहां पहले दिनभर काम चलता रहता था। चीज़ें हटतीं, साफ़ होतीं, बनतीं, सधतीं। अब घर में चीजे स्थिर थीं।
वह स्थिरता धीरे-धीरे फैल रही थी।
एक दिन दोपहर में जब राधिका चुपचाप बैठी थी, उसे लगा कि दरवाजे के पीछे से कोई आवाज आई।
हल्की सरसराहट।
वह चौंक गई।
घर में और कोई नहीं था। शेखर दफ्तर में था। खाना बनाने वाली, सफाई वाली काम करके जा चुकी थीं। फिर यह आवाज कहां से आई?
उसने दरवाजे की ओर देखा।
दरवाजा वैसे ही था, बंद।
राधिका ने धीरे से हैंडल घुमाया।
इस बार दरवाजा पहले से ज़्यादा हिला।
शेखर घर लौटा, उसने दोनों के लिए थालियां परोसीं। खाना खाते हुए उसने पूछा, अब घर में तुम्हें कुछ करना ही नहीं पड़ता। अच्छा लग रहा होगा?
राधिका मुस्कराई।
फिर अब दिनभर क्या करती हो?
सोचती हूं, राधिका ने कहा।
क्या?
यही कि घर में अब मेरे लिए क्या बचा है?
शेखर हंस पड़ा। अजीब सवाल है। यह घर तुम्हारा ही तो है!
राधिका ने पूछा, सचमुच? पहले जब दिनभर काम करती थी, तब तो नहीं था। अब जब कुछ नहीं करती, तब घर मेरा कैसे हो गया। करने की जरूरत और न करने की सुविधा के बीच इतना फासला होता है। जो चीज मेरे बिना चल सकती है, उसमें मेरी कितने दिन उपयोगिता रहेगी?
शेखर ने तत्काल कोई जवाब नहीं दिया। बस कौर मुंह में चुभलाता रहा। फिर संभल करो बोला, अगर तुम सोचती हो कि घर के कामों में तुम्हारी कोई जरूरत नहीं रही, तो तुम कुछ और कर सकती हो। कोई हॉबी वगैरह?
मैं लिखना चाहती हूं। राधिका ने सधे अंदाज में कहा।
क्या? शेखर ने संदिग्ध होकर पूछा।
एक अधूरी कहानी।
कौन सी, शेखर ने सशंकित होकर पूछा।
एक लड़की की, जो लिखने से प्रेम करती है। खूब अच्छा लिखती है…फिर उसकी शादी हो जाती है।
फिर? शेखर ने पानी के साथ कौर गटका।
उसे काम करना पसंद तो होता है पर लिखने के समय नहीं। फिर उसका पति उसे मायके छोड़ जाता है। वापस। काम न कर सकने वाली बहू को कौन निभाएगा। घर पर मां-बाप और भाई भी उसे ताने मारते हैं। लिखने के लिए ससुराल कौन छोड़ देता है।
फिर? शेखर की आंखों में अजीब सा भय उतर आया।
फिर वो कहीं गुम जाती है। पता नहीं कहां। लेकिन उसकी कुछ चीजें रह जाती हैं। कहीं-कहीं ठिठकी हुई।
कहां?
शायद किसी बंद कमरे के दरवाजे के पीछे, किसी बंद अलमारी में जो खुलती नहीं। जैसे अपने यहां है एक ऐसी अलमारी है, एक दरवाजा है, जो नहीं खुलते।
शेखर ने मुंह बिचकाया। अरे, दोनों ही चीजें पुरानी हैं। साल हुए बंद पड़े हैं। कभी जरूरत ही नहीं पड़ी, तो नहीं खोली अलमारी, नहीं खोला कमरा।
तुमने कभी कोशिश की?
नहीं।
इस सवाल-जवाब का असर यह हुआ कि अलमारी दो मजदूरों की मदद से स्टोर रूम में सरका दी गई, जहां राधिका की इस पर नजर न पड़े। शेखर को पता ही नहीं चला कि राधिका इस अलमारी को देखती नहीं इसे महसूस करती है।
एक रात फिर राधिका को आवाजे सुनाई दीं।
पहले हल्की सरसराहट।
फिर धीमी खटखटाहट।
फिर एकदम ख़ामोशी।
राधिका ने उठकर दरवाजे को छुआ। इस बार दरवाज़ा थोड़ा और हिला। उसने हैंडल पर जोर डाला। दरवाजा हल्की चरमराहट के साथ खुल गया। उसने कमरे के अंदर झांका। अंदर अंधेरा था। गहरी ख़ामोशी थी।
फिर एक हल्की, बहुत पुरानी खुशबू आई, जैसे किसी पुराने समय की याद हवा में घुली हो।
राधिका ने कदम आगे बढ़ाया।
राधिका ने दरवाज़े के पार झांका। अंधेरे में कुछ आकार थे, धुंधले, स्थिर, लेकिन परिचित। उसने स्विच ढूंढने के लिए हाथ बढ़ाया, खट की आवाज के साथ स्विच दबा और रोशनी बिखर गई।
स्टोररूम में बहुत कुछ रखा था, लेकिन कुछ भी फालतू नहीं लग रहा था। हर चीज किसी न किसी समय के साथ जुड़ी थी। कोने में एक पुराना लकड़ी का संदूक था। कपड़ों के ढेर के बीच एक तानपुरा, जिस पर धूल की परत जमी थी। एक कोने में पुराने बर्तन रखे थे। एक जगह कुछ किताबें थीं, जो इतनी पुरानी थीं कि उनके पन्ने पीले हो गए थे।
राधिका धीरे-धीरे अंदर बढ़ी।
एक संदूक और एक पुरानी डायरी
उसने लकड़ी के संदूक का ढक्कन उठाया।
अंदर पुरानी साड़ियां, कुछ फोटो एलबम, नीचे एक कपड़े में लिपटी हुई डायरी थी।
डायरी बहुत हल्की थी।
राधिका ने उसे खोला।
पहला पन्ना खाली था। दूसरा भी। तीसरे पर हल्की नीली स्याही से कुछ लिखा था, “जब घर में सब सो जाते हैं, तब मैं इस दरवाज़े के पार देखती हूं। ‘‘यह घर मेरा है, लेकिन मैं इस घर में नहीं हूं।’’
राधिका ठिठक गई।
यह किसने लिखा था?
डायरी के अगले कुछ पन्ने भी इसी तरह के छोटे-छोटे वाक्यों से भरे थे।
‘‘हर चीज अपनी जगह पर रखी है, लेकिन मैं कहां रखी हूं?’’
‘‘सुबह से रात तक सब कुछ चलता रहता है, लेकिन मैं कब रुकती हूं?’’
राधिका ने सोचा, यह किसका लिखा हो सकता है? डायरी में सूखे फूलों, पुराने कागजों और धूल में मिली हुई यादें थीं।
राधिका ने महसूस किया कि यह जगह, यह अलमारी, यह स्टोर रूम यह डायरी, सब कहीं न कहीं उसी सवाल से जुड़े थे जो उसने शेखर से पूछा था, घर में अब मेरे लिए क्या बचा है?
यह सवाल उसने पहली बार नहीं पूछा था।
यह सवाल उससे पहले भी कोई और पूछ चुका था।
रात को जब शेखर आया, तो राधिका ने पूछा, यह स्टोररूम पहले क्या था?
शेखर ने अचरज से देखा, क्यों?
बस यूं ही।
राधिका ने जैसे जिद पकड़ ली। शेखर ने कहा, बहुत साल पहले, जब मैं छोटा था, तो यह मां का कमरा था।
फिर?
फिर जब मां बीमार पड़ गईं, तो यह कमरा धीरे-धीरे स्टोररूम बन गया। वह पता नहीं क्या-क्या चीजें जमा करने लगी थीं। बाद में जब वह नहीं रहीं, तो इस कमरे को बंद कर दिया।
क्यों?
इसलिए कि इसे कभी खोलने की जरूरत न पड़े, राधिका की आवाज कांप गई। या शायद इसे खोलने की हिम्मत नहीं हुई?
शेखर सिर झुका चला गया।
रात को राधिका ने फिर से डायरी खोली।
आख़िरी पन्ने पर कुछ पंक्तियां लिखी थीं,
“अगर मैं यह दरवाज़ा खोल दूं, तो क्या मैं इस घर में लौट पाऊंगी?’’
राधिका ने पहली बार महसूस किया कि यह घर उसके होने और न होने के बीच एक जगह थी। शायद यह घर उसकी सास के लिए भी ऐसा ही था। शायद शेखर की पहली पत्नी के लिए भी। शायद घर हर उस औरत के लिए ऐसा ही होता है, जिसने घर को अपना समझा, लेकिन कभी यह सवाल नहीं पूछा कि ‘‘क्या घर भी उसे अपना समझता है?’’
जब वह सोकर उठी तो उसके सिरहाने दो चमकते पेन और दफ्ती में नत्थी बहुत सारे कागज रखे हुए थे।
पिछले कई दिनों से उदासीन सी राधिका ने स्टोररूम की सफाई शुरू की।
शेखर ने देखा और पूछा, अब यह सब क्यों कर रही हो?
राधिका ने जवाब नहीं दिया।
उसने संदूक से साड़ियां निकालकर तह लगाईं। फोटो निकालकर, झाड़कर करीने से रखे। तानपुरे की धूल पोंछी। पुराने बर्तनों को साफ करने की ताकीद दी।
फिर उसने स्टोररूम की दीवारों को गौर से देखा।
कमरा जीता-जागता घर का हिस्सा लग रहा था।
शेखर ने दबी आवाज में सिर्फ इतना ही कहा, सफाईवाली को बोल दो, वह कर देगी।
राधिका ने सिर हिला दिया। नहीं, मैं खुद करूंगी।
पुराने घर में एक नई जगह बन रही थी। तीन दिन लगे स्टोररूम पूरी तरह से साफ हो गया। अब यह स्टोररूम नहीं था। यह एक कमरा था। एक नया कमरा, जो हमेशा से घर में था, लेकिन कभी था ही नहीं।
राधिका ने वहां एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी रखी, जो वह बरामदे से खिसका कर लाई थी। डायरी उसने मेज पर रख दी। खिड़की से परदा हटाया ताकि रोशनी अंदर आ सके। अब यहां बैठकर वह सोच सकती थी।
अब यह घर का एक ऐसा कोना था, जो पूरी तरह उसका था।
शाम को जब शेखर आया, तो उसने स्टोररूम का दरवाजा खुला देखा।
उसने अंदर झांका।
शेखर कुछ पूछता उससे पहले ही राधिका ने कहा, यह मेरा कमरा है।
तुम्हारा कमरा मेरे साथ नहीं है?
नहीं, राधिका ने तत्काल जवाब दिया।
क्यों?
क्योंकि घर में रहने का मतलब सिर्फ खाना बनाना और सफाई करना नहीं होता।
शेखर चुप रहा।
घर का हिसाब बदल रहा था, उसके साथ ही घर का गणित भी। अब यह नहीं था कि सफाईवाली कब आएगी और बर्तन कौन धोएगा। अब यह था कि घर में कौन रहेगा, और कैसे रहेगा।
पहले घर में उसकी भूमिका निश्चित थी। जो दिखती थी, वही थी। अब जो दिखता था, वह था नहीं, और जो था, वह धीरे-धीरे दिखने लगा था। अब वह घर में सिर्फ थी नहीं, अब वह घर में अपने लिए भी थी।
एक रात उसे फिर सपना आया।
इस बार कमरे का दरवाजा पूरी तरह खुला हुआ था।
बाहर अंधेरा नहीं था।
अब वहां हल्की रोशनी थी।
वह बाहर निकली और उसने देखा, वह कहीं गई नहीं थी।
वह वहीं थी।
जहां से उसने शुरुआत की थी।
लेकिन इस बार सब कुछ नया था।
घर में एक कमरा था, जो खुल चुका था।
आकांक्षा जी!
आपकी कहानी लेखन की शैली बिल्कुल अलग है। हमें ऐसा याद आ रहा कि यह शायद हमने आपकी दूसरी कहानी पढ़ी। पहली कहानी में भी शैली इसी तरह की महसूस हुई थी। बहुत ठहर के और आराम से पढ़ना पड़ता है आपकी कहानी को और बल्कि दो बार!
कहानी स्पष्ट रूप से अपनी बात नहीं कहती, उसे समझना पड़ता है। यह मनोवैज्ञानिक धरातल पर लिखी गई स्त्री के उस भाव की ओर इंगित कर रही है, जहाँ घर में वह होकर भी नहीं होती और जो घर उसका होकर भी उसका नहीं होता।
हर स्त्री के अपने भी शौक ,अपनी इच्छाएँ होती हैं।पर ससुराल में उनकी कोई अहमियत नहीं होती,मानो सिर्फ अपने घरेलू काम में जुटे रहना ही उसका काम है। पूरा घर उसका होता है लेकिन फिर भी उस घर में वह नहीं होती।
राधिका इस बात को महसूस करती है।
जब वह काम करती थी तब भी कुछ विशेष नहीं था लेकिन जब उसने काम करना बंद कर दिया।तब भी काम तो होता रहा।
इस तरह उसको यह बात समझ में आई कि बंद दरवाजे को खोलना जरूरी है।
बंद कमरा हमारी समझ से प्रतीकात्मकता में है।
तानपुरा ,किताब और डायरी इस बात का प्रतीक है कि माँ और पहली पत्नी दोनों में से कोई एक संगीत से प्रेम करती होगी और एक लेखन से। जो इस घर में रहते हुए संभव नहीं हुआ।
और अगर प्रतीकात्मकता में नहीं है तब भी अर्थ इसका वही रहेगा कि अंततः राधिका उसको खोल लेती है और उस घर में अपने वजूद को दस्तक ही नहीं देती, बल्कि स्थापित भी करती है। अब उसके घर में उसका अपना कमरा है वह भी- अलग! जहाँ बैठकर वह सोच सकती है, लिख सकती है, लेखन की अपनी रुचि को पूरा कर सकती है।
अच्छी कहानी है। बधाई आपको।
घर में अपने होने की जगह…अच्छी कहानी
इन दिनों नौकरी के सिलसिले में इतना अधिक स्क्रीन टाइम हो गया है कि पढ़ना लिखना लगभग बन्द हो गया है। चाहकर भी सक्रिय नहीं रह पाती। आकांक्षा की कहानी पुरवाई में आने की बात पता चली तो पढ़ने के लिये उत्सुक हो उठी।
वर्जिनिया वुल्फ ने ‘अपने कमरे’ की बात उठाई। अपना कमरा या एक स्त्री की व्यक्तिगत और रचनात्मक स्वतंत्रता की बात। ये बात सोचने में ही अटपटी लगती है क्योंकि एक स्त्री के लिये अपना कोना, अपना स्पेस अर्जित करना कभी भी सोच का विषय नहीं रहा। हम में से बहुत सी स्त्रियाँ हैं जिन्होंने पति और बच्चों के लिये हर सुविधा का ध्यान रखा ताकि वे अपने करियर ही नहीं अपनी अभिरुचि और सपनों की दिशा में काम करके अभीष्ट को हासिल कर सकें लेकिन स्त्रियों की रुचियाँ, अभिरुचियाँ, डिग्री और योग्यताएँ धूल खाती रहे इसकी परवाह कोई नहीं करता।
लेकिन इस कहानी की स्त्री, स्त्री की उसकी पारंपरिक और खुद को खपा देने वाली भूमिका से आगे बढ़कर सवाल करती है और हल ढूंढती है। सवाल वे जो उससे पहले की स्त्रियाँ न कर सकीं कि एक स्त्री की अपनी पहचान क्या है? वह भी लिखना चाहती है, गाना चाहती है, या अपने सपनों के अंतिम छोर को छूना चाहती है। जाहिर है उसकी इस कोशिश में परिवार या घर नामक संस्था का बुनियादी ढांचा प्रभावित होता है लेकिन नए की शुरुआत के लिये यह जरूरी भी है। जंगलगे सदियों से बन्द पारंपरिक दरवाजे एक दिन में तो नहीं खुल जाते!
इस मार्मिक कहानी के लिये बहुत बधाई आकांक्षा। शुक्रिया पुरवाई संपादक मण्डल।
बहुत शानदार कहानी है आंकाक्षा जी,आपकी कहानियां हमेशा भीड़ से अलग कुछ कह जाती हैं।ये कहानी भी न जाने कितनी तरह से इधर उधर से छूती हुई गुजरती है। स्त्री के मन को उघाड़ती हुई कहानी के लिए हार्दिक बधाई आपको!
नारी मन के उद्गारों को उजागर करती बहुत- बहुत सुंदर कहानी । बधाई
एक स्त्री के मन के उहा पोह का सच्चा संप्रेषण ..!
पूरा जीवन एक घर को सजाने सँवारने, अपने सभी दायित्वों को निष्ठा से पूरा करने के बाद भी एक प्रश्न उसे सदा मथता है, क्या यह वास्तव में मेरा घर है।
सदियों से वह इस घर को बनाने में अपने सपनों , अपने शौक को कुचलती आई है। बंद अंधेरे कमरों में भूलती आई है।
पर अब नहीं, उसने मन के उन दरवाजों को खोला बुहारा, ताजी हवा , रौशनी को उनमें उड़ेला, बिखरने दिया, और अपने सपनों को जीते हुए, सही मायनों में उसे अपना घर बनाया।
दिल को सुकून पहुँचाता, एक उत्तम मनोवैज्ञानिक सृजन..!
बधाई आकांक्षा पारे जी, स्त्री मन की उस थाह तक पहुँचने के लिये।
शायद घर हर उस औरत के लिए ऐसा ही होता है, जिसने घर को अपना समझा, लेकिन कभी यह सवाल नहीं पूछा कि ‘‘क्या घर भी उसे अपना समझता है?’’ इस कहानी के के माध्यम से आकांक्षा जी से स्त्री मन के उस शाश्वत प्रश्न का दरवाजा खोला है, जिससे वह स्वयं ही बचती रही है । वर्जीनिया वुल्फ़ ने एक रचनात्मक कोने की माँग की थी पर आकांक्षा जी की कहानी उससे आगे बढ़कर स्पष्ट करती है कि स्त्री को घर तभी अपना लग सकता है जब उसे अपने मन का का काम करने की आज़ादी हो । घर के सारे कामों के मध्य जो सबसे ज़्यादा कुचला जाता है वह है स्त्री का मन । माँ का कमरा झाड़ने का बिम्ब स्त्री मन के उस कोने की पड़ताल है कि आखिर स्त्री का कोई घर क्यों नहीं होता या स्त्री को घर अपना क्यों नहीं लगता । आकांक्षा जी को हमेशा से पढ़ती आई हूँ, इस बार शैली में प्रयोग ने भी सुखद लगा । एक अच्छी कहानी के लिए बधाई
आकांक्षा की कहानियां मुझे कभी नई नहीं लगी हैं, बल्कि वे हमेशा से मुझे इसी दुनिया के उन पहलुओं की तरफ़ ले जाती हैं, जो सामने होते हुए भी नज़र से ओझल रहने को अभिशप्त होते हैं। ज़िंदगी के नज़रिये में विस्तार के लिए नए विषयों की नहीं, बल्कि पुराने पड़ चुके विषयों की नवीनतम प्रस्तुति ज़्यादा मायने रखती है, ठीक आकांक्षा की कहानियों की तरह। इस कहानी में आकांक्षा की नायिका जिस कमरे की तलाश करती है और उसे पा लेती है, वैसे ही स्त्री के मन का ये कोना भी तो हमेशा से ही हमारे आस-पास मौजूद रहा है, लेकिन कितने अंधेरे, कितनी धूल में अटा कि केवल अपने लिए इस कोने को तलाशती स्त्रियों की न जाने कितनी ही पीढ़ियां खप गई हैं। आकांक्षा की कहानियां मुझे ज़ाती तौर पर इसलिए भी पसंद हैं, क्योंकि वे उम्मीद जगाए रखती हैं, वहां भी, जहां उम्मीद के लिए भी उम्मीद रखना दुश्वार हो। अपने जैसी ही समर्थ-सक्षम कहानी के लिए बधाई आकांक्षा, तुम लिखो, ख़ूब लिखो…