प्राननाथ,
तुम्हारे बिना अब अच्छा नहीं लगता है। तुम जल्दी आ जाओ। लोग यह समझने लगे हैं कि आपने मुझे छोड़ दिया है। आकर इनके संशय को दूर कर दीजिए। आप नहीं जानते हैं कि ऐसी औरत की इज्जत समाज में कितनी घट जाती है। अकेली औरत को तो गैल की खपरियाँ भी बातें करती हैं। मनचले भौंरा से मड़राने लगते हैं।
इन मनचलों ने मुझे परेशान कर रखा है। मैं इनसे बचने की कोशिश करती हूँ पर ये ढीठ मानते ही नहीं हैं। मैं दुखी हूँ।
प्राननाथ, मैं तुम्हें क्या बताऊँ ? गब्बे ने मेरे साथ कितनी बदतमीजी की है, मैं ही जानती हूँ। परसों एक ऐसी वारदात हो गई, जिसमें मुझे हस्तक्षेप करना पड़ा। लड़कियों के साथ मैं कालेज से लौट रही थी। रास्ते में गब्बे मिल गया। वह फब्तियाँ कसने लगा। हमने उसको नजरअंदाज करके बला टालनी चाही कि जवाब न देंगे, तो अपने आप चुप हो जाएगा। चुप होना तो दूर, उल्टा उसने एक लड़की का हाथ पकड़ लिया। लड़की भय से पीली पड़ गई। मुझसे देखा न गया। मैंने कहा, “उसका हाथ छोड़।” वह काहे को छोड़ने वाला था। मैंने धक्का देकर लड़की का हाथ छुड़ा लिया।
गुस्से में वह उसे छोड़ मेरी ओर बढ़ने लगा। मैं घबरा गई। छुट्टा साँड का क्या ठिकाना ? मैंने झट से ईंट का अद्धा उठाकर उसे चेताया, “आगे बढ़ा तो दही-सा फैला दूँगी।” राम कहाव, उस पर मेरी धमकी का असर हो गया।
प्राननाथ, अगर मेरी तरफ बढ़ता तो मैं उसकी खोपड़ी में टोंका कर देती। फिर भी न मानता, तो जैसे में मानता, वैसे में मनवा लेती। सारी गर्मी उतार देती।
झगड़ा किस बात पर हुआ, इसे जानने के लिए लोग इकट्ठे हो गए। सुन-समझकर भी उन्होंने कोई बात न की। कोई यही कह देता कि रे गब्बे ! तू गलत कर रहा है। मैं बताऊँ प्राननाथ, भले लोग किसी के लड़ाई-झगड़े में नहीं पड़ते हैं। वे साजी देह में फोड़ा मोल नहीं लेते। वह लड़की न तो उनके परिवार की थी और न रिश्तेदार। कोई चलते-पुर्जा आदमी होता, तो गब्बे की कान-कुच्ची कर देता।
मेरे बीच में आ जाने से वह क्रोध में फूंस रहा था। साँप शिकार के गायरे पर हो तभी कोई बिघन डाल दे, तो वह उसी पर टूट पड़ता है। ऐसे ही वह मुझ पर टूट पड़ा था। वह गुर्राकर बोला, “तू ज्यादा मुखियान बनी फिरती है, तुझे देख लूँगा।” मैंने भी कह दिया कि जा तुझे जो सूझे सो कर लेना, मैं खसुओं से डरने वाली नहीं हूँ।
‘खसुआ’ वाली बात उसे बहुत बुरी लगी। तड़ंग मर्द के लिए इससे बड़ी गाली नहीं हो सकती है। जीभ में आग लगे, गुस्सा में मैंने बोल तो दिया था किन्तु इसके अर्थ गाम्भीर्य पर ध्यान न दिया। आम गालियों की तरह मैंने इसे भी प्रयोग कर दिया था। प्रयोग कर दिया, तो कर दिया लेकिन सुकून तो मिल गया था।
अपमानित होकर वह भुनभुनाकर चला गया। उस लड़की की बहुत बेइज्जती हो गई थी। वह रो रही थी। मैंने उसे समझाया कि रो मत, हमने विरोध करके अच्छा किया। विरोध न करते, तो उसके हौसले और बढ़ जाते। चुप्पी किसी समस्या का समाधान नहीं। मेरे समझाने से लड़की सहज हो गई थी।
प्राननाथ, फिर वह कालेज के आस-पास दिखाई न दिया। अक्ल ठिकाने आ गई थी। किसी की लड़की-बिटिया पर बुरी नजर डालना हँसी-खेल थोड़े है।
प्राननाथ, जो मैं समझ रही थी, वह गलत था। सोचा था कि सुधर गया है पर वह सुधरा नहीं था। मैं कल शाम को खेत में चारा काट रही थी कि गब्बे और खलक सींग ने मुझे दबोच लिया। अचानक के हमले से मैं हक्की-बक्की रह गई। मैं पहले से देख लेती, तो होशियार हो जाती। मैं उनकी पकड़ में दबी हिरनी-सी फड़फड़ा रही थी। मुझे एक तरकीब सूझ गई; मैंने शोर मचाना शुरू कर दिया। मेरे चिल्लाने से वे घबड़ाए, जिससे उनकी पकड़ ढीली हो गई। मैंने फुर्ती के साथ हँसिया गब्बे पर दे मारा। उसने बचाव में अपना हाथ आगे कर दिया, जिससे वह बच गया। वह संभलता-संभलता तब तक मैं खेत से बाहर निकल भागी थी। उसने फिर झपट्टा मारा, जिससे मेरी धोती का छोर उसके हाथ में आ गया। मेरे भागने से धोती छूटती चली गई। खलक सींग अंगछाटा दौड़कर मेरे सामने आ गया। मैंने उस पर भी वार कर दिया। वार उसके हाथ में पड़ते ही भल्ल से खून बह निकला। वह पीड़ा से कराह उठा। मैं आगे बढ़ती, इससे पहले गब्बे सामने आ गया। उसने मुझे पकड़कर अपनी ओर खींच लिया। मैं संभल न पाई और उसकी ओर खिंचती चली गई। उसने पूरी ताकत से मुझे जमीन पर पटक दिया। मेरे मुँह से हिच्च की आवाज निकल गई। मेरे हाथ में कंटीला झाकर आ गया। उस झाकर को मैंने उसके मुँह पर दे मारा। काँटों से उसका मुँह नुच गया था। मैं रुकी नहीं, बराबर उस पर वार करती रही। चिल्लाना मैंने बन्द न किया था। आस-पास खेतों में
काम कर रहे लोग मेरी आवाज सुनकर दौड़े चले आए। लोगों को अपनी ओर आता देख, वे भाग खड़े हुए।
प्राननाथ, इज्जत तो बच गई लेकिन अपमान बहुत हो गया। मेरी पीठ छिल गई थी। घर आकर मैं रोती रही और हल्दी-चूना का लेप पीठ पर लगाती रही।
मैंने परधान जी को उसकी सारी हरकत बता दी। उन्होंने मुझे रिपोर्ट लिखाने की सलाह दी। मैंने सोचा कि इस गुंडे की अक्ल ठिकाने लगानी है। मैं दोनों के नाम रिपोर्ट लिखा आई। थानेदार रिपोर्ट नहीं लिख रहा था। वह मामले को रफा-दफा करना चाहता था। सुना है, उसका बाप थानेदार की जेब गरम कर आया था। मुझे कह रहा था कि रमकल्लो रिपोर्ट न लिखा, तू अकेली है। लौंडा औंधी खोपड़ी का है, तुझे कुछ कर-धर न दे। बताव ले, बाप, बेटे के लिए ऐसी बातें कर रहा था।
मैंने थानेदार से साफ कह दिया था कि आप रिपोर्ट नहीं लिखोगे, तो मैं ऊपर चली जाऊँगी। वहाँ नहीं सुनेंगे, तो कोर्ट जाऊँगी। प्राननाथ, कोर्ट का नाम सुनकर थानेदार मुझे घूरने लगा। धमकी काम कर गई, उसने बेमन से रिपोर्ट लिख ली। परधान जी का भी दबाव था। वे न होते, तो मुझे कोर्ट जाना पड़ता। कोर्ट में समय लगता। मैं अपना अपमान और गुस्सा कब तक सिर पर लादे रहती। कल उसे पुलिस पकड़ ले गई है।
यह घटना अखबार में भी छप गई थी। मेरे काल्पनिक नाम से पत्रकारों ने खबर छापी थी, “चारा काट रही महिला कुसुम (काल्पनिक नाम) को दो गुंडों ने दबोचा, महिला उनके चंगुल से भागने में सफल रही।”
मुझ पर केस वापस लेने का दबाव डाला जा रहा है। गब्बे का बाप रोज देहरी खूँद रहा है। बाप को भी शरम नहियाँ कि अपराधी बेटे को क्यों बचा रहा है? इसकी बहू को कोई पकड़ लेता तो ये केस वापस ले लेता ?
मैं केस वापस नहीं लूँगी और न किसी के दबाव में आऊँगी। मैं क्यों किसी से दबूँ? कोई सुटक न लेगा? रोज-रोज के मरने से अच्छा है, उसका डटकर सामना करना। गब्बे मुझे मामूली औरत न समझे। मुझे कुछ कर दिया, तो सूखा न बचेगा। मैं एस. पी. को प्रार्थना पत्र दे आई हूँ कि मुझे कुछ होता है, तो गब्बे को इसका जिम्मेदार
माना जाए।
प्राननाथ, अकेले संघर्ष करना कठिन है। रोने के लिए भी कंधे की जरूरत पड़ती है। मेरे पास वह भी नहीं है। आपका सहारा था पर आप भी…। ऐसा पैसा किस काम का, जिसमें आदमी को सुख प्राप्त न हो। तुम वहाँ पैसा कमाओ, यहाँ चाहे जो होता रहे। तुम्हें इससे क्या? ये निष्ठुरता तुम्हें शोभा नहीं देती।
चिट्ठी मिलते ही लौट आना।
आपके इन्तजार में
आपकी ही
रमकल्लो
बिटिया रमकल्लो,
तोहर यह बेर की पाती पढ़ि के तो हमार करेजा अइसन फटा है कि ‘खुस रहौ’ कहै का भी मन नाहीं करि रहा है, चिट्ठी लिखै की के कहै।
हम जौन बात से डेरात रहेन औ बेर -बेर तोहका चेतावत रहेन, उहै अनहोनी तोहरे साथे घटि गै बच्ची!
तूं जौन अब ले किहे हौ तौन ठीकै बाय, लेकिन बिटिया यह कोट-कचहरी कै झंझट झेलै बदे का पोढ़ करेजा और पइसा चाहीं।
परधान जी तोहरी ओर खड़ा ह्वैगे हैं ,ई बाति तौ नीक है, लेकिन बिट्टी याद राख्यो इ उहै प्रधान जी हैं जौन एक बेर तोहरी ओर से आपन ईमान नसाय चुके हैं।
रमकल्लो, ई बात गांठ बांधे रह्यौ कि अकेल ,नीबर मेहरारू बदे इ दुनियां कब्बो नीक नाहीं रही है, न कब्बों होई, ।अपने पैरुख के छोड़ि के केहू के बाति पर जल्दी बिसवास न किहौ। इ घोर कलजुग है बेटी,कौनो सतजुग नाहीं कि किसुन जी द्रोपदी कै लाज बचावै आइ जइहैं।
अउर कुछ न होय तौ बिटिया,,इहां कै खेती -पाती अधिया-बटैइया पर देइ के तुहूं अपने प्राननाथ के लगे चली जाव ।
तोहरी पाती पढ़ै के बाद तो हमार हिम्मत नाहीं होत रही कि तोहके चिट्ठी लिखीं, लेकिन फिर सोचेन कि चलौ हिम्मत करी, चिट्ठी भेजब तौ बिटिया कै मन फेर तौ होई कुछ देर बदे!!
रमकल्लो बिटिया ,हिम्मत न छोड़ेयौ,भगवान जी तुहै हिम्मत दिहे रहै हम इहै दिन रात मनाइत है।
जौने दिन तोहार अपने प्राननाथ से भेंट ह्वै जाइ वहि दिन हम हनुमानजी के मंंदिर मा़ं सवा सेर लड्डू कै परसाद चढ़ाइब।
संभरि के रह्यौ बिटिया, रात बिरात कहूं बाहर ना निकर्यो, जाय कै जरूरत होय तो केहूके साथे ले लिहौ ,भला!
सिरी राम जी सदा सहाय रहैं।
तोहार
बड़की।
आदरणीया सरोजिनी पाण्डेय जी, रमकल्लो के प्रति आपका इतना भावनात्मक लगाव देखकर मैं डर जाता हूं। उसकी तकलीफ़ में आप परेशान हो जाती हैं। मुझे ये फील होने लगा है कि मैंने किस तरह का करेक्टर रचा है कि आप सब लोग उसके साथ इतने आत्मीय हो गए।
रचना का अंत कैसा होगा? यह तो समय के गर्भ में है। पर जो रच दिया है अब मिटाना उसके विधाता के भी वश में नहीं है। सुखांत भी रचा हो सकता है, दुखांत भी रच दिया होगा। पर रमकल्लो का संघर्ष उसे किस नतीजे पर पहुंचाएगा, देखना शेष है।
आपने इतनी भावुक टिप्पणी लिखी है कि मेरी आंखें नम हो गई है।
आदरणीया सरोजिनी जी आपको किन शब्दों में आभार व्यक्त करूं! मेरे पास शब्द नहीं है।
आपके लिए बस यही
ये रमकल्लो का धैर्य है कि इतने अनुत्तरित पत्रों के बाद भी वह अपने प्राणनाथ से ये अपेक्षा रखती है कि वह उसकी चिट्ठियों या परेशानियों पर कोई ध्यान देगा? पता नहीं वह ख़ुद मुसीबत में है या फिर उसके लिए रमकल्लो बीता हुआ कल है…
जो दुर्घटना रमकल्लो के साथ हुई वह तो आये दिन का किस्सा है, क्या गांव क्या शहर क्या मेट्रोपोलिस। जाने क्यों भारतीय पुरुषों की महिलाओं के प्रति ऐसी विकृत मानसिकता है? सभी की कामेच्छा इतनी अप्रतिबद्ध क्यों? संस्कार इतने घृणित कैसे? यह अपने में गहरा और देशव्यापी विश्लेषण करने का मुद्दा है।
प्रत्येक नए अंक की पाती की तीव्र प्रतीक्षा रहती है कि शायद अबकी दफा रमकल्लो को उसके प्राणनाथ का उत्तर मिले या वह स्वयं आए। काश रमकल्लो की समस्याओं का हल मिल सके।
आदरणीया शैली जी, ये बात सही है कि हमारे समाज में ऐसी घटनाएं आए दिन होती रहती हैं। यह कुत्सित मानसिकता समाज के भीतर तक है। इसी मानसिकता को मैंने अपने पात्र के माध्यम से व्यक्त किया है।
पाती में आपको समाज का सच दिखा, यह टिप्पणी मेरा मनोबल बढ़ाने वाली है। बढ़िया टिप्पणी के लिए आपका बहुत-बहुत आभार शैली जी।
अब तो भज्जआ हड्डई हो गई, जोंन बात खो हम सोचत रत ते
कि जा रमकल्लो जवानजुवान अकेली गांव में डरी, कउ कछु अनोनी न हो जाबे,,,,,ओ देखो बोई बात हो गई।
गब्बे ने अपनी औखात बताई याई दई।
बो तो काओ तुमने शिक्षा रूपी शेरनी।को दूध चख लओ है
जासे तुमाई हिम्मत बढ़ गईं हैं
सो तुम डरात नईया,ओर डरे से होने का हेगो
डरियो जिन रमकल्लो
डर गई तो जान लियो मर गई
झूटन के पैर न ई होत समझी,हिम्मत से काम लेने आय,
बेसे रपोट तुमने डार दइयई है
ओर सुनियो रमकल्लो जीके मन में चोर। होत है बो खुदई अपन खो डरात हेगो ।
थोरी हुसियारी रहियो,रात बिरात काउ खो पार लियो घर में
पुलिस से तो सारे डरा गय हुईये
हो सकतई तुमाय प्राणनाथ चले आबे,
ओखरिया में मूड दे दओ तो अब डराब नई
जो हो है सो देख हैं, प्रधान संग दे रओ है
आगे की आगे से ,
अपओ ध्यान राखीयो
राम भली करें
आदरणीया कुंती जी, आपने रमकल्लो पर जो अपनत्व भरे शब्द कहे है, वे सीधे हृदय को छू जाते हैं। आपने शिक्षा के महत्व पर जो लाइन कोट की है वह लाजवाब है।
इतनी सुन्दर टिप्पणी के लिए आपका हृदय से आभार कुंती जी।
आदरणीय सर जी!
इस बार रमकल्लो की पाती पढ़ कर बहुत तकलीफ हुई।
पाती में जिस संशय की रमकल्लो ने बात की, जाहिर है कि उसकी जगह कोई भी होता तो उसका हाल भी यही होता।
इतने लंबे समय तक अगर पति घर नहीं आता तो बातें बहुत बनाई जा सकती हैं। दिन-महीने की बात नहीं है ,यह वर्ष की बात भी नहीं है, वर्षों की बात है।
संशय होना तो स्वाभाविक है, लोग यही सोचते होंगे कि इसको छोड़ दिया है और शहर में दूसरी कर ली होगी।
लेकिन रमकल्लो की हिम्मत की दाद देते हैं कि उसकी सहेली का हाथ पकड़ने वाले को उसने धक्का देकर दूर किया।उसने निडरता से सामना किया।यह अंक लड़कियों के लिए प्रेरणा के तौर पर है कि स्थितियाँ अगर बिगड़ें तो हमें डरने की बजाय उसका डट कर सामना करना चाहिये।
संकटपूर्ण स्थिति में प्रत्युत्पन्नमति बहुत काम करती है।यह सजगता जरूरी है।
खेत वाली घटना बहुत संगीन रही। रमकल्लो से इतनी संवेदनाएँ जुड़ गई हैं कि पढ़ते हुए एक घबराहट सी अंदर तक तैर गई।
इस अंक में रमकल्लो की हिम्मत को दाद देनी चाहिये ।लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं है अब तो प्राणनाथ को आ ही जाना चाहिये। अब अति हो गई है। यह प्राणनाथ के स्वाभिमान को चुनौती देने वाला अंक हैं।
लोक बोली का प्रयोग रचना को जीवन्त कर देता है।
अगले अंक का इंतजार बेसब्री से रहेगा।
इस बेहतरीन श्रृंखला के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।
आदरणीया नीलिमा करैया जी, आपका रमकल्लो से इस तरह जुड़ना मेरे लेखन को सार्थकता प्रदान करता है।
आपका बहुत-बहुत आभार नीलिमा करैया जी