उम्र की तरह ही रात भी आधी से ज़्यादा बीत चुकी है पर आँखों में लम्हा भर नींद आज भी नहीं है। जबसे बड़े को ट्रेनिंग के लिए विदा की है। तब से उसे हर पल बेटे की चिंता लगी है। हालांकि वर्षों बाद मन के अँधेरे कोने में उज़ाले की एक किरण फ़ूटी है। एक उच्छ्वास के साथ करवट बदलते ही उसका बेलगाम मन अतीत के अरण्य में भटकने लगा है। * समय से बड़ा कोई दूसरा मरहम नहीं होता। तुषार के जाने के बाद वह किस क़दर अकेली पड़ गयी थी! दिन तो किसी तरह बीत जाता पर जैसे ही रात के नौ बजते, लगता कि तुषार आ रहे होंगे। कई बार तो वह गेट खोल कर खड़ी भी हो जाती, फिर भीगी आँखें और खाली मन लिए वापस लौट आती।
“मम्मा…! पापा कहाँ चले गए? पापा कब तक आयेगें?” बिस्तर पर लेटते ही हर रात बच्चे यही प्रश्न दोहराते रहते। वह उन्हें छाती से लगा कर चुपचाप अँधेरे में आँसू बहाती रहती।
वह जानती थी कि तुषार के बिना जीवन की डगर बहुत कठिन है। अकेले वह कैसे चल सकेगी! कंपनी में काम करते हुए बहुत-सी आवश्यकताओं को दरकिनार कर तुषार ने एक छोटा सा घर बनवा लिया था। उसने वहाँ जाने का निर्णय कर लिया। उन लोगों के बीच अब एक पल भी नहीं रहना चाहती थी, जिन्होंने अपने स्वार्थ के लिए उसका जीवन ही उजाड़ दिया था। अपने घर में आने के बाद उसके सामने ढेरों समस्याएँ मुँह बाए खड़ी थीं। उसके ज्वाइंट अकाउंट में जो रकम पड़ी थी, वह भी ख़त्म हो रही रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि करे तो क्या करे! बहुत सोच विचार कर उसने पढ़ाने का निर्णय लिया। कुछ प्रयास के बाद एक छोटे से स्कूल में जॉब मिल गयी। फ़िर धीरे-धीरे स्कूल और आस-पास के बच्चे पढ़ने के लिए घर भी आने लगे थे। दिन-रात गुजरते रहे। घर आ कर पढ़ने वाले बच्चों की संख्या में वृद्धि होती रही। और देखते ही देखते वर्षों बीत गए। पर लगता है जैसे कल की ही बात हो जब तुषार मझधार में छोड़ कर चल दिए…!
रुलाई फूट पड़ी थी। उसने जल्दी से अपना मुँह दबा लिया। कहीं छोटा बेटा जाग न जाय! आँखें चुपचाप बरसती रहीं। इस गाढ़े अंधकार में भी उसे अतीत के वे काले पन्ने साफ़-साफ़ नज़र आ रहे थे, जब कुछ प्राइवेट सेविंग कंपनियाँ अपना पाँव पसार रही थीं। जल्दी दोगुना होने की लालच में लोग अपनी रकम भी ख़ूब जमा कर रहे थे। उस समय ऐसी ही एक कंपनी में द्वारिका प्रसाद, यानी कि तुषार के पिता बड़े अधिकारी थे और लक्ष्मी हाथ गोड़ धो कर घर में बैठी थीं। अपना कालोनी का घर छोड़ कर वे बड़े से किराए के बंगले में आ गए थे। उन्होंने घर के भीतर से ले कर बाहर तक सारी सुविधाएँ जोड़ ली थी। तुषार अभी पढ़ ही रहे थे कि ब्याह हो गया था। जैसा कि घर के लोग बताते थे कि तुषार का मन पढ़ाई में कम ही लगता था। विवाह के बाद तो वे बिलकुल ही लापरवाह हो गए थे। पिता आए दिन शहर से बाहर होते और वह कॉलेज़ छोड़ मित्रों संग सिनेमाहाल में। देखते ही देखते सात-आठ वर्ष बीत गये। इस बीच तुषार दो बच्चों के पिता बन गए थे; पर उनके माथे पर शिकन न थी। * बीते वर्षों में कई और सेविंग कंपनियाँ आ जाने से द्वारका प्रसाद की कंपनी, जो शीर्ष पर थी; वह धरातल की ओर लौटने लगी और जब कर्मचारियों के इंसेंटिव रुकने लगे तब उन्होंने हड़ताल कर दी। हड़ताल के बाद कंपनी ने कड़ा रुख अपनाया तो कुछ लोग जो अपनी सरकारी नौकरी को महीने में हफ़्ता-दस दिन हाजिरी की ऑक्सीजन से ज़िंदा रखे थे, वे अपनी नौकरी पर डट गए। पर पत्नी के नाम से आने वाले इंसेंटिव और कमीशन की आनंदबाई ने जैसे द्वारका प्रसाद का विवेक ही हर लिया था और वे लिखित में नौकरी को इस्तीफ़ा दे आए थे। सो ठन-ठन गोपाल हो कर घर बैठ गए। धन की आमद के साथ दिखावे की प्रवृत्ति भी आ ही जाती है। सो सबके मन के साथ खर्चे भी बढ़े थे। अब उन बढ़े खर्चों को समेटना उनके लिए कठिन हो रहा था। जैसे-जैसे दिन बीत रहे थे, बंगले का किराया और ड्राइवर की सैलरी भारी पड़ रही थी। अब वे लौट कर कॉलोनी में जाते तो लोग क्या कहते? यही सोच कर शहर के बाहर पड़ा प्लाट आधा बनवा कर रहने लगे। देखते ही देखते गाड़ी भी बिक गयी और बचाखुचा धन बेटी के विवाह में चुक गया।
अब तो उन्हें अपने बेटे का परिवार भी भारी लगने लगा था। जब आमदनी का श्रोत ही सूख गया हो तो भारी लगना स्वाभाविक भी था। परिवारदार बेरोज़गार बेटा किस पिता को भाता है भला! उनका व्यवहार अपने दूसरे बेटों की अपेक्षा तुषार के प्रति रूखा होता चला गया। अब बात-बात पर तुषार के निठल्लेपन की तानाकशी के छींटे उसपर भी पड़ने लगे थे। जिससे तुषार को हो न हो, उसके भीतर हीन भावना घर करने लगी थी। जब वह अपनी थाली परोस कर बैठती तब निवाला गले के नीचे न उतरता। लगता कि इन रोटियों में तुषार का श्रम शामिल नहीं है। फिर अगले ही पल ये सोच कर अपने को तसल्ली दे लेती कि जो दिन-रात वह सबके पीछे चकरघिन्नी-सी नाचती रहती है, क्या वह श्रम नहीं है? नौबत यहाँ तक आ पहुँची कि द्वारिका प्रसाद ने तुषार से साफ़-साफ़ कह दिया, “भोजन के सिवा अपना बाकी का खर्च तुम स्वयं देखो।” अब तुषार के माथे पर बल पड़ा। मन लगाकर पढ़ाई तो की नहीं थी, हाँ, मैथ और साइंस अच्छी थी तो एक मित्र के जरिए कुछ ट्यूशन मिल गए और शुरू हुई साइकिल दौड़। जब-तब कार की स्टीयरिंग थामने वाली हथेलियाँ अब सायकिल की हैंडिल पर कस गयी थीं। पिता ने जैसे ही गोद से उतारा, तुषार लड़खड़ते हुए ही सही, धीरे-धीरे खड़े हो रहे थे। बच्चों के लिए आवश्यकता भर कमाने भी लगे थे कि एक रात तुषार के लौटते ही घर खर्च के नाम पर पिता-पुत्र में ठन गयी। “कुछ और ट्यूशन मिलते ही घर खर्च देने लगूँगा पर अभी संभव नहीं।“ “तो कल से तुम्हारी रसोई अलग। यहाँ मैंने धर्मशाला नहीं खोल रखा है।” पिता की बात सुनते ही तुषार क्रोध से भरे हुए उसे रसोई से खींच कर कमरे में ले आए और दरवाजा बंद कर लिए। बच्चे सहम कर उससे चिपक गए। उसने थपकी दे कर उन्हें सुला दिया पर उसकी आँखों की नीद उड़ चुकी थी। उसके भीतर दुःख, क्रोध, अपमान सब एक साथ घुमड़ उठे थे। जागती आँखों की रातें अक्सर लंबी हो जाती हैं। फिर भी सुबह तो होती ही है। उस दिन भी आँगन उजास से भर उठा था।पर उसके मन में अंधकार ही अंधकार था।उठ कर धीरे से कमरे का दरवाजा खोली तो सासू माँ को रसोई में गुनगुनाते देख कर उसे विश्वास नहीं हो रहा था। लग रहा था जैसे वह कोई बुरा स्वप्न देख रही हो। वह टुकुर-टुकुर ताकती रही। ‘बेटे से नाराज़गी थी भी तो मैंने या मेरे बच्चों ने क्या बिगाड़ा था? हाथों की मेंहदी भी तो नहीं छूटी थी कि सहायिका की छुट्टी कर रसोई का द्वार दिखा दिया था सासू माँ ने। तब से आज तक वह जी-जान से सबकी सेवा टहल में लगी रही। और आज सासू माँ ने भी पलट कर नहीं देखा था। सोच-सोच कर उसका दिल टूक-टूक हो रहा था। तभी तुषार ने उसके कंधे पर हाथ रखा। उसने गुस्से से उनका हाथ झटक दिया। उसे सिसकता छोड़ तुषार चुपचाप साइकिल लेकर निकल गए। जब लौटे तब रसोई के लिए कुछ जरूरी सामान और थोड़ा बहुत राशन लेकर। वह कमरे के एक कोने को रसोई के लिए तैयार करने में जुट गयी। उस दिन से साल-दर-साल तुषार की साइकिल का पहिया यूँ ही घूमता रहा। * जिंदगी ने करवट बदली और एक रात तुषार खिले-खिले-से घर लौटे। उन्हें देख कर उसके मन की बगिया भी खिल उठी। “आज तो चेहरे पर चाँद खिला है? क्या बात हैं! मैं भी तो जानूँ।” खाने पर तुषार को छेड़ते हुए वह बोली। “एक नई सेविंग कंपनी आयी है इला, उसी को ज्वाइन करने की सोच रहा हूँ।” तुषार बाँसुरी-से बज उठे थे। “कौन सी कंपनी!” तुषार ने उसके चेहरे का उड़ा हुआ रंग देख कर उसे सारी बातें समझाईं। “नहीं तुषार! मैं आपको ये नहीं करने दूँगी। हम गुज़र कर लेंगे। ये कंपनियाँ छलना होती हैं तुषार! जो है, वह भी अपने साथ बटोर कर ले जाती हैं। अपने पिता को देख कर भी नहीं सीखे आप!” वह तुषार को समझाती रही; पर तुषार कहाँ मानने वाले थे। “पागल हो तुम!” कह कर उसकी बात खारिज कर दिए और कुछ ही दिनों में कंपनी ज्वाइन भी कर लिए। उनके अच्छे बात-व्यवहार से धीरे-धीरे एक अच्छी-खासी टीम खड़ी हो गयी। जिसमें ज्यादातर इटावा, जालौन, भिंड, मुरैना वाले उनके मित्र जुड़ गए थे और उन्होंने अपने मित्र, रिश्तेदारों को जोड़ लिया था। धीरे-धीरे काम चल निकला। कंपनी तुषार के कलेक्शन को देखते हुए उन्हें एक बड़ा पद देने की तैयारी में जुटी थी। जब तुषार ने ये खबर उसे दी, तब उसकी आँखों में सतरंगी स्वप्न तैर गए थे। समय के साथ तुषार के पिता की पेंशन बन जाने से उनकी स्थिति भी सुधरी थी परंतु तुषार की बढ़ती आय को देख कर वे हतप्रभ थे और उनसे जुड़ने के प्रयास में लगे थे। तुषार के देर रात आने पर उसके पहुँचने से पहले ही गेट खोल देते। “तुषार! अपने स्वास्थ्य का भी ख्याल रखा करो। इतना काम करोगे तो सेहद पर असर पड़ेगा बेटा!” वे तुषार को दुलार से डपटते। वह देख रही थी कि पिता के स्नेह की गगरी तुषार पर छलक रही थी। तुषार भी उस स्नेह से सिक्त होते जा रहे थे। होते भी क्यूँ न! बरसों से पिता की उपेक्षा के शिकार उनके स्नेह को तरसे थे। माँ तो पति की ऐसी अनुगामिनी थीं कि वे जो भी कहते, वही उनके लिए ब्रह्म वाक्य था। क्या मज़ाल कि पतिधर्म के आगे तुषार के लिए उनकी ममता बूँद भर भी छलक जाए! परन्तु जैसे ही पति का स्नेह छलका, माँ का आँचल भी भीगने लगा। अब तो सुबह की चाय पर तुषार बुला लिए जाते और पिता-पुत्र एक साथ बैठ कर चाय पीते। जब-तब माँ के हाथों का तगड़ा जलपान तुषार को दोपहर के खाने से दूर कर देता। अब रात के खाने पर ही वे दोनों साथ होते और उसके बाद या तो तुषार कंपनी की फाइलों में सिर गड़ा लेते या थके होने के कारण सो जाते। अब तो पिता आते-जाते तुषार-तुषार-तुषार की माला-सी जप रहे थे। खून के रिश्तों में एक चुम्बकीय आकर्षण होता है। उनमें कितनी भी दूरियाँ क्यूँ न आ जाएँ; परंतु यदि एक भी समीप आना चाहे, तो दूसरा स्वतः ही खिंचा चला आता है। “तुषार…! ये आपका सगापा मुझे न जाने क्यूँ बहुत खटक रहा है।” रहा न गया तो एक रात वह खिसिया पड़ी थी। “मना तो करता हूँ इला! पर वे नहीं मानते तो क्या करूँ? तुम्हीं बताओ।” तुषार ने मनुहार करते हुए उसे बाँहों में भर लिया था। “अच्छा-अच्छा अब रहने भी दो। चलो खाना ठण्डा हो रहा है।“ “जानती हो इला! पापा मेरी कंपनी में आना चाहते हैं।” “क्यों?” उसके मुँह से अनायास ही निकल पड़ा। “क्यों का क्या मतलब? खाली बैठे हैं। कुछ करना चाहते हैं। वैसे एमडी मुझसे खुश है। अबकी हेड ऑफिस गया तो उनके बारे में बात करूँगा।” सुन कर उसके दिल में फाँस-सी चुभ गयी। निवाला गले में ही फँस गया। किसी तरह पानी के सहारे उसे पेट में उतारा। बीते वर्षों में वह सबकी फ़ितरत पहचान गयी थी। नहीं चाहती थी कि तुषार अपनी कंपनी में पिता की सिफ़ारिश करें। दबे शब्दों में विरोध जताई, तो तुषार उखड़ गए। “तुम अपने काम से काम रखो, मुझे मालूम है कि क्या करना है।” तुषार का जवाब सुन कर लगा कि अभी रो पड़ेगी। डाबडबाई आँखे लिए चुपचाप थाली उठा कर चली गयी। * उस दिन वह हेडऑफिस के लिए तुषार को जाते हुए देखती रही। उसका मन न जाने क्यूँ उथल-पुथल हो रहा था। “तुषार क्यूँ नहीं समझते कि आँखों से टपका आँसू कभी आँखों में नहीं लौटता। उनसे इतना ही प्रेम था तो उनकी यूँ लानत-मलानत न हुयी होती। माना कि समय कठिन था; पर क्या हमारे बच्चों के मुँह से रोटी छीनना ही एक रास्ता था!” दिन भर उसका मन अनमना-सा रहा। रात लगभग दस बजे गेट खटका। वह कमरे का दरवाजा खोल कर बाहर निकलने को हुयी कि गेट खुल चुका था और तुषार अपने पिता के साथ उनके कमरे की ओर बढ़ गए थे। उसने धीरे से दरवाजा बंद कर लिया। उधर झरने-सी फूटती आवाजें उसके कानों में सुइयाँ चुभो रही थीं। वह चुपचाप बच्चों के पास लेट गयी। आँखों से आँसू बह चले थे। रसोई में बर्तनों के खटकने की आवाज़ें बता रही थीं कि बेटे के लिए थाली परोसी जा रही थी। थोड़ी देर बाद तुषार कमरे में आये। “इला! सो गयी क्या?” बोलते हुए तुषार ने स्विच ऑन कर दिया। “हाँ, झपकी लग गयी थी। आप चेंज करो तब तक मैं खाना लगाती हूँ?” कहती हुयी नींद में होने का स्वांग रचती वह उठ बैठी थी। “तुम परेशान मत हो। बहुत थका हूँ, सोऊँगा।” कह कर तुषार ने कपड़े बदले और स्विच ऑफ़ कर लेट गए। “ये क्यों नहीं कहते कि माँ के हाथ का बना खा आये हो। इस लिए पेट भरा है।” सोच कर उसका जी जल उठा था। “क्या हुआ वहाँ? मुझे बताने की कोई जरूरत नहीं है क्या?” जब तुषार कुछ बोले बिना ही करवट बदल लिए तो उससे रहा न गया। “कंपनी ने पापा का पिछला रिकार्ड देख कर मेरी सिफारिश स्वीकार कर ली है। सारे कागज़ तैयार हैं। बस कुछ सिग्नेचर होने हैं उसके लिए पापा को जाना पड़ेगा।” सुन कर उसके कानों में विस्फोट-सा हुआ। “और आप ? मेरा मतलब आप का प्रमोशन कर रही थी कंपनी। उसका क्या हुआ?” “रीजनल मैनेजर कोई एक ही बन सकता था इला!” “तो आपने उनकी वाली कर ही दी! अब हमारे व हमारे बच्चों के भविष्य का क्या!” क्रोध और छटपटाहट में उसकी आवाज़ काँप गयी थी। “तुम्हें कोई परेशानी है?” तुषार भड़क गए थे। वह अपना मुँह दबाए सिसक पड़ी। मन किया कि अभी बच्चों को जगा कर उनके साथ घर से निकल जाए। तुषार भी आज उन्हीं लोगों की भाषा बोल रहे थे, जिन लोगोंने कभी उन्हें दूध की मक्खी-सा निकाल फैंका था। उसकी नींद एक बार फिर उड़ चुकी थी। न जाने क्यूँ उसे लग रहा था कि ये ठीक नहीं हुआ। तुषार बच्चों के हिस्से की खुशियाँ पिता को समर्पित कर आये थे। और वह दूर खड़ी देखने के सिवा कुछ नहीं कर पा रही थी। उसे बचपन में पढ़ी लोमड़ी और कौव्वे की कहानी याद आ रही थी। देखते ही देखते घर के अगले भाग में कंपनी का रीज़नल ऑफिस बन कर तैयार हो गया और एक मोटी रकम भी किराए के रूप में मिलने लगी। ऑफ़िस खुलने लगा और अफ़सर की कुर्सी पर बैठते ही धीरे-धीरे पिता में अफ़सरी ठसक वापस लौटने लगी। * ‘किस्मत से ज्यादा कभी किसी को कुछ मिला है, जो मुझे मिलेगा!’ यही सोच कर अपने मन को तोष धरा लिया था उसने और जिंदगी एक बार फिर चल पड़ी थी; पर न जाने क्यों इधर कुछ दिनों से तुषार हर समय परेशान-से दिख रहे थे। बात-बात पर झुंझला रहे थे। वह कुछ बोलती तो गुस्से से चीख पड़ते। उसे लगा कि अब पिता से अटेंशन मिलनी कम हो गयी है और माँ का आँचल भी सूखता जा रहा है, इस लिए खिसिआए हैं। उसे तो पहले से पता था; पर तुषार की आँखों पर ही पट्टी बँध गयी थी। उसने लाख समझाया, पर वे उसकी सुनते ही कब थे! वह कमरे में बैठी सोच ही रही थी कि ऑफिस से आतीं तेज़ आवाजों नें उसे चौंका दिया। वह झट से बाहर निकल आयी। ऑफिस के भीतरी द्वार पर उसकी सासू माँ और दोनों देवर खड़े थे। वह भी जा कर उनके पीछे खड़ी हो गयी। भीतर पिता-पुत्र में वाक्-युद्ध छिड़ा था। किसी अनिष्ट की आशंका से उसका दिल धड़क उठा। तभी तुषार धड़धड़ाते हुए कमरे में गए और कुछ फाइलें ला कर पिता के सामने मेज पर पटक दिए। फिर वापस कमरे में आ कर फूट-फूट कर रो पड़े। वह भाग कर पानी ले आयी पर तुषार ने उसकी ओर देखा तक नहीं। उसका दिल बैठा जा रहा था। जरूर कोई बड़ी बात हुयी है नहीं तो तुषार यूँ बच्चों की तरह न बिलखते। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। वह उनकी पीठ सहलाती रही। रो लेने के बाद तुषार कुछ शांत हुए तो उसने पानी का गिलास उनकी ओर बढ़ा दिया। “पानी पीजिये तुषार! आखिर क्या हो गया जो आप इस तरह…!” उसकी भी आँखें छलक पड़ी थीं। “कुछ नहीं बचा इला! सब चला गया।” दो घूँट पानी पी कर गिलास उसे थमाते हुए बोले तुषार और बेड पर निढाल हो गए। “क्या नहीं बचा तुषार?” लगभग चीख-सी पड़ी वह। “मेरी पूरी टीम हाथ से निकल गयी। मैं फिर से रास्ते पर आ गया इला!” उसके हाथ से गिलास छूट कर झन्न से गिर पड़ा। कमरे में पानी फ़ैल गया। आँखों के आगे अंधेरा छा गया। वह दीवार का सहारा ले कर वहीं बेड पर बैठ गयी। “मैंने तो पहले ही कहा था तुषार!” उसकी आवाज़ गले में रुंध गयी थी। “मुझे क्या पता था इला, कि पापा मेरे साथ छल करेंगे!” तुषार लुटे-पिटे से पड़े थे। * वही ‘ढाक के तीन पात !’ तुषार जहाँ से चले थे वहीं फिर से आ खड़े हुए थे। अब पिता-पुत्र में आये दिन टीम को ले कर बहस आरम्भ हो जाती। समय के साथ बहस इतनी बढ़ी कि कंपनी के हेड ऑफिस तक पहुँच गयी। फिर एक दिन सभी लोग कंपनी में तलब किए गए। वाद-विवाद हुआ। कंपनी भी जानती थी कि टीम तुषार ने खड़ी की थी। अपने अधिकारों का प्रयोग कर पिता ने पूरी टीम हथिया ली थी और पदोन्नत्ति और ज्यादा कमीशन की लालच में टीम भी उन्हीं से जा मिली थी। गुस्से और निराशा में तुषार ने कंपनी छोड़ने को कह दिया। पर तुषार के पिछले रिकार्ड को देखते हुए कंपनी के अफसरों ने उन्हें समझा-बुझा कर अपना अकाउंटेंट बना लिया। आखिर कंपनी को तो हर हाल में अपना ही मुनाफ़ा देखना था। गृहस्थी की जो गाड़ी चल पड़ी थी, फिर से हिचकोले खाने लगी। तुषार को ठीक-ठाक कमीशन मिलने लगा था। एकाएक सब बंद हो गया। हाँ, कंपनी एक सैलरी देने लगी। तुषार दिन भर ट्यूशन करते और रात भर बैठ कर हिसाब-किताब देखते। वह रात में उठ कर चाय बनाकर तुषार को थमा देती; पर काम की अधिकता के कारण उन्हें उसकी सुध तक न रहती।
आमदनी का स्रोत बढ़ा, तो फिर से एक बार हाथ बढ़ा कर आकाश छूने लगे थे द्वारिका प्रसाद। और तुषार! कपड़ों के नाम पर वही उसके हाथ का बुना स्वेटर, मफ़लर और दास्ताने। अपनी हीरो सायकिल की हवा या पंचर सुधरवाना ही उनके व्यक्तिगत खर्च में शुमार था। भाग्य में सुख न हो, तो कहाँ से मिले! उनकी सारी मेहनत पर पानी फिर गया था। अपमानित महसूस कर रहे थे खुद को। उनके जूनियर आगे बढ़ गए थे और वे मात्र कंपनी के नौकर बन कर रह गए थे। और इनसब के जिम्मेदार उनके पिता थे। इस बात ने उन्हें बहुत आहत किया था। अब पिता-पुत्र में ऑफ़िस के हिसाब-किताब के सिवा कोई बातचीत नहीं थी। धीरे-धीरे दो वर्ष बीत गए। नई गाड़ी आ गयी।छोटे भाई का ब्याह तय हो गया। घर में रंग-रोगन होने लगा। गहने-कपड़े खरीदे जाने लगे कि इसी बीच कुछ सेविंग कंपनियों की भागने की सुगबुगाहट सुनाई देने लगी जो समय के साथ लगभग प्रतिदिन अखबारों में छपने लगी थी। लोग आत्महत्या कर रहे थे। आए दिन यह खबरें सुन-सुन कर उसका दिल डर रहा था। * इधर पिछले कुछ महीनों से कंपनी ने तुषार को सैलरी नहीं दी थी। बच्चों की फीस के साथ और भी कई देनदारियाँ हो गयी थीं। कंपनी हर बार अगले महीने पर टाल रही थी। अब लग रहा था कि इस महीने सैलरी हाथ आ जाएगी तो सब ठीक हो जाएगा; पर जिंदगी ने एक और घाव देने की तैयारी कर रखी थी। न जाने कैसे तुषार को कंपनी के भागने की खबर मिली। सुन कर वे हेडऑफिस के लिए भागे। खबर पक्की थी। तुषार ठगे-से लौटे। चेहरा देख कर ही वह समझ गयी थी फिर भी पूछ ली, “क्या हुआ?” “वही, जिसका डर था।” “मतलब कि कंपनी भा…!” उसका मुँह खुला का खुला रह गया। “हाँ इला, कंपनी भाग गयी।” कह कर तुषार दोनों हाथों से अपना सिर थाम कर बैठ गए। “तभी पापा जी दो दिन से नहीं दिख रहे हैं !” चौंक कर उसकी तरफ देखा तुषार ने। अब उन्हें भी ध्यान आया कि दो दिन से ऑफिस नहीं खुला था। और एक झटके से उठ कर वे माँ को आवाज देते हुए उनके कमरे में पहुँच गए। पीछे वह भी थी। “पापा कहाँ गए?” बेटे को अचानक अपने सामने खड़ा पा एकाएक वे कुछ बोल न सकीं। “बोलती क्यूँ नहीं आप? कहाँ गए पापा? उन्हें मालूम था कि कंपनी भाग गयी और उन्होंने मुझे कानोंकान खबर भी नहीं होने दी!” “तो मुझपर क्यों चीख रहे हो? अपने पिता से पूछो जा कर।” कह कर तुषार को उपेक्षित छोड़ वे रसोई की ओर बढ़ गयीं। तुषार अपने होश खो बैठे थे। माँ के पीछे रसोई में आ गए, “सच बताना माँ! मुझे जन्म दी हो या कहीं कूड़े के ढेर से उठा लायी हो?” कहते-कहते बेबसी से तुषार की आँखें छलक पड़ीं। उसका कलेजा चाक हो गया पर माँ के मुँह से भी बोल न फूटे। बेटे का चेहरा देखती रह गयीं। वह तुषार का हाथ पकड़ कर कमरे में ले आयी।
“इला, मैं कहीं का न रहा! जी करता है कुछ खा कर सो रहूँ।” उसके कंधे पर सिर रख फ़फ़क पड़े तुषार।
“ऐसा ख़याल भी मन में मत लाइएगा तुषार! कंपनी के आने से पहले भी तो हम जी रहे थे न!” कहते हुए उसके पेट में भी गोले उठ रहे थे पर रो कर तुषार को और कमजोर नहीं करना चाहती थी। वह तुषार की पीठ सहलाती रही और तुषार हिलक-हिलक कर रोते रहे। * उस समय डकैतों का आतंक था। अपहरण, हत्या और फिरौती की घटनाएँ आये दिन घटित हो रही थीं। इटावा, भिंड, मुरैना का नाम सुनते ही शरीर में सिहरन दौड़ जाती थी और तुषार की टीम में लगभग सारे लोग उधर के ही थे जो बाद में पिता से जुड़ गए थे। इन्हीं लोगों ने अब ऑफिस को घेरना शुरू कर दिया था। पिता तो घर पर थे नहीं; तुषार मिल जाते। ट्यूशन ही आय का स्रोत थाइस लिए तुषार छुप कर कहीं बैठ नहीं सकते थे। कई बार तुषार नें उन लोगों को समझा बुझा कर वापस किया था; पर पिता किसी भी कीमत पर घर आने को तैयार नहीं हुए। जब लोगों को द्वारिका प्रसाद नहीं मिले तब उनका रोष बढ़ा और निशाने पर तुषार आ गए। फिर तो अगला-पिछला सब उन्हीं पर टूट पड़ा। दोनों हर पल दहशत के साए में जी रहे थे। बच्चों के साथ कोई अनहोनी न हो जाय, इस लिए तुषार उन्हें स्कूल छोड़ने और लेने जाते। अब धमकियों ने जोर पकड़ लिया था। वे लोग घर पर आकर धमका रहे थे; पर इनसब बातों का बाकी परिवार पर कोई असर नहीं था। उस रात तुषार खाने पर बैठे ही थे कि गेट खटक गया। उसके प्राण हालत में आ फँसे। दोनों ने सहम कर एक दूसरे को देखा। तब तक फिर से गेट खटका। तुषार ने रोटी का टुकड़ा थाली में रख दिया और उठकर गेट की ओर बढ़ गए। पीछे-पीछे इला; पर घर से और कोई नहीं निकला।
गेट खोलते ही एक धीमी पर कड़क आवाज़ कानों के पर्दे से टकराई, “इधर आओ।” उसकी रीढ़ में सिहरन दौड़ गयी। तुषार उस व्यक्ति के साथ आगे बढ़े ही थे कि वह पीछे से चीख़ पड़ी, “कहाँ ले जा रहे हो इन्हें?” तुषार ने घूम कर अपने होंठों पर उँगली रख कर उसे चुप रहने को कहा और आगे बढ़ गए। पीछे वह भी निकल आयी और सड़क किनारे सरकारी नल के पास खड़ी हो गई। वह तुषार को ले कर चौराहे पर खड़ी वैन की ओर बढ़ गया जहाँ पहले से ही दो-तीन लोग खड़े थे। वह थरथर काँप रही थी। जनवरी माह की सर्द रात थी। सभी के दरवाजे बंद थे। घर से हमेशा की तरह आज भी कोई नहीं निकला था। तुषार देर तक उनलोगों से बातें करते रहे। वह खड़ी देवता पीतर मना रही थी। आराम से बातें होते देख उसके मन में आस बँधी। उसे लगा कि अभी सब लोग चले जायेंगे और तुषार लौट आयेंगें कि तभी अचानक न जाने क्या हुआ कि उन लोगों ने तुषार को वैन में धकेल दिया। पलक झपकते ही सारे वैन में समा गए और वैन कब छू मंतर हो गयी, पता ही नहीं चला। क्षण मात्र में ही सबकुछ हो गया था। डर से उसकी घिग्घी बँध गयी। जिह्वा तालू से जा लगी। मुँह से बोल ही न फूटा। वह कब तक जड़ खड़ी रही, उसे कुछ पता नहीं।
“क्या हुआ भाभी! इतनी रात में आप यहाँ क्यों खड़ी हैं ?” बाल्टी खटकने के साथ ये आवाज़ सुन कर उसे लगा कि वह अभी जीवित है। देखा तो मोहल्ले का ही एक लड़का था जो पानी भरने आया था|
“वे लोग भैया को उठा ले गए। उन्हें बचा लो, बचा लो उन्हें !” वह बिलख कर रो पड़ी। * “माँ, क्या हुआ माँ !”
“भैया को बचा लो, वे लोग ले गए उन्हें।”
“माँ…माँ !”
आवाज़ सुन कर वह अचकचा कर उठ बैठी है। चेहरा आँसुओं से तर है।
“भैया ठीक हैं माँ! वे तो पहुँच भी गए। अभी उनका मैसेज आया है। मुझे लगा आप सो रही हैं तो नहीं जगाया। कोई बुरा सपना देखा होगा आपने।” छोटा बेटा उसे झकझोरते हुए बोले जा रहा है।
भोर का उजाला चुपके से खिड़की के रास्ते कमरे में उतर आया है और सामने ही शोकेस के भीतर रखे तुषार के चित्र को वह सूनी आँखों से एक टक्क देखे जा रही है।
आपको शायद पहली बार पढ़ रहे हैं।
माता-पिता ऐसे ही भी होते हैं!!!! कहानी पढ़कर बहुत दुख हुआ।
विश्वास नहीं होता की माता-पिता ऐसे भी हो सकते हैं।
बेहद मार्मिक कहानी है आपकी।
किसी भी काम में हाथ बेहद सोच समझ कर डालना चाहिये।
मीना जी!
आपको शायद पहली बार पढ़ रहे हैं।
माता-पिता ऐसे ही भी होते हैं!!!! कहानी पढ़कर बहुत दुख हुआ।
विश्वास नहीं होता की माता-पिता ऐसे भी हो सकते हैं।
बेहद मार्मिक कहानी है आपकी।
किसी भी काम में हाथ बेहद सोच समझ कर डालना चाहिये।