16 सितम्बर 2025 की शाम लन्दन के हिन्दी प्रेमियों के लिये एक विशिष्ट शाम थी जब हिन्दी शिक्षा परिषद, लन्दन, कथा यूके एवं भारतीय उच्चायोग ने मिल कर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर को याद किया।

दर्शकों से भरे सभागार में, कार्यक्रम के सूत्रधार तेजेन्द्र शर्मा एम.बी.ई. ने रामधारी सिंह दिनकर के व्यक्तित्व के बारे में बताते हुए नेहरू सेन्टर के उप—निदेशक श्री राकेश कुमार को अतिथियों का स्वागत करने के लिये आमंत्रित किया।
श्री राकेश कुमार ने सभागार में उपस्थित अतिथियों का नेहरू सेन्टर की ओर से स्वागत किया और रामधारी सिंह दिनकर जी के कवि रूप का परिचय भी दिया। उन्होंने सूचित भी किया कि अतिथियों में रामधारी सिंह दिनकर जी की प्रपौत्री कुमारी उदयंति दिनकर भी मौजूद हैं। उन्होंने दिनकर जी की वर्तमान समय में प्रासंगकिता को भी रेखांकित किया।

कार्यक्रम की विशिष्ट अतिथि भारतीय उच्चायोग की हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी डॉ. अनुराधा पांडेय ने कार्यक्रम के बारे में टिप्पणी करते हुए कहा कि इस आयोजन की सबसे विशेष बात यह रही कि परवीन रानी जी ने छोटे बच्चों को भी मंच पर लाकर दिनकर जी की कविताएँ प्रस्तुत करवाईं, जिसने पूरे माहौल को एक “छोटे से साहित्यिक स्वर्ग” में बदल दिया। बच्चों की सहज प्रस्तुति ने सभी दर्शकों का मन मोह लिया और यह साबित कर दिया कि दिनकर जी की कविताएँ आज भी हर पीढ़ी को प्रेरित कर रही हैं।
उनकी कविताएँ आज भी सामाजिक न्याय, राष्ट्रप्रेम और सांस्कृतिक चेतना की मशाल बनकर हमारे सामने जल रही हैं। नई पीढ़ी को उनके साहित्य से जोड़ना अत्यंत आवश्यक है — और यह प्रयास वास्तव में सराहनीय रहा। मेरे दृष्टिकोण से, रामधारी सिंह दिनकर जी केवल एक कवि नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा की आवाज़ थे।
रामधारी सिंह दिनकर की शास्त्रीय रचनाओं को लंदन के प्राथमिक स्कूलों के छात्रों से अभिनय के साथ सुनना अद्भुत अनुभव रहा जो राष्ट्र-कवि की सार्वभौम प्रासंगिकता का जीवंत प्रमाण था।

बीबीसी वर्ल्ड सर्विस रेडियो के पूर्व-संपादक श्री विजय राणा ने अपने वक्तव्य में कहा कि, “दिनकर के काव्य में ओज, क्रांति, और स्वाधीनता की चेतना अपने सर्वोच्च रूप में अभिव्यक्त होती है । उनकी कविताएँ स्वतंत्रता आंदोलन की रण-भेरी बन गयीं थीं । आज़ादी के बाद उनके काव्य में हम राष्ट्र-निर्माण, सामाजिक समता और सांस्कृतिक जागरण का अमर संदेश मिलता है। इन आदर्शों से विमुख होने वाले सत्ताधीश भी उनकी कलम के प्रकोप से नहीं बच सके।”
बीबीसी के पूर्व पत्रकार श्री शिव कांत शर्मा ने अपने वक्तव्य में कहा, “दिनकर को 1938 का वह समय भी देखना पड़ा जब अज्ञेय जी ने उन्हें मंच का कवि मानकर अपनी पत्रिका विशाल भारत में उनकी कविताओं को छापना बंद कर दिया था। लेकिन आज के युग में क्या हिंदी का कोई ऐसा कवि हुआ है जिसके घर के बाहर सैंकड़ों मील से चलकर आए कविता प्रेमी कविता सुनने की आस में धरना देकर बैठते हों?” 
“दिनकर आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि वे पौराणिक घटनाओं और पात्रों के माध्यम से सदियों के अनुभवों की कसौटी पर तराशी ऐसी बातें कह जाते हैं जो सम और विषम हर परिस्थिति पर सटीक बैठती है। वे प्रासंगिक हैं क्योंकि उनकी बातें हर वर्ग के व्यक्ति को अपनी सी लगती हैं। वे प्रासंगिक हैं क्योंकि वे गेय छंदों और खड़ी बोली में खड़ी बात करते हैं। वे प्रासंगिक हैं क्योंकि वे समाज चिंतन के साथ-साथ आत्म चिंतन भी करते चलते हैं।”
केंब्रिज विश्वविद्यालय की हिंदी परीक्षक डॉ. अरुणा अजितसरिया एम.बी.ई. ने दर्शकों से खचाखच भरे नेहरू सेंटर के सभागार में रामधारी सिंह दिनकर को याद करते हुए कुछ महत्वपूर्ण बातें कहीं। अरुणा जी के अनुसार – “दिनकर महात्मा गाँधी से प्रभावित थे, किंतु, गाँधी जी की अहिंसा की नीति को वे नकारते हैं। वे क्रांति के उपासक कवि हैं। क्रांति में हिंसा अवश्यंभावी है। इसलिए वे एक सीमा तक हिंसा को आवश्यक समझते हैं। पर यह ‘हिंसा’ हिंसा के लिए नहीं है, उसका उद्देश्य जनजागरण और पराधीनता की बेड़ियाँ तोड़ना है।”
“कवि ने हिंसा का दायित्व भी उस पर नहीं रखा है जो तलवार उठाता है, बल्कि हिंसा के लिए दोषी वह है जो दूसरों के अधिकारों को छीनता है।… दिनकर के अनुसार क्रांति और हिंसा ‘विषस्य विषमौषधम’ की भाँति उस समय की माँग थी। उनकी राष्ट्रीयता में आवेग और आवेश की प्रधानता जनमन की सोई हुई राष्ट्रीयता को जगाने के लिए आवश्यक थी।… दिनकर की गद्य रचना का चरम उत्कर्ष शोध और अनुशीलन के आधार पर मानव सभ्यता के इतिहास का चार अध्यायों में किया गया अध्ययन, ‘संस्कृति के चार अध्याय’ अपनी जड़ों का संधान करने वाले शोधार्थियों के लिए एक मूल्यवान संदर्भ ग्रंथ है।”

कार्यक्रम का सबसे अद्भुत पल रहा जब 16 वर्षीय आद्या राजवंशी ने दिनकर जी का गीत ‘धुंधली हुई दिशाएं / छाने लगा कुहांसा / कुचली हुई शिखा से / आने लगा धुआं सा’ गा कर सुनाया। ख़ास बात यह थी कि उस गीत की धुन आद्या ने स्वयं ही बनाई थी।
दिनकर जी के मित्र स्वर्गीय प्रोफ़ेसर दामोदर ठाकुर के पुत्र डॉ. मनोहर ठाकुर ने दिनकर जी से जुड़े पारिवारिक संस्मरण दर्शकों के साथ साझा किये। तो वहीं डॉ. राकेश रवि (जो कि लंदन में ही रहते हैं) ने दिनकर जी की कुछ कविताओं का पाठ किया।




दिनकर जी निश्चित रूप से भारतीय आत्मा की बेख़ौफ़ आवाज़ थे।
16 सितम्बर 2025 के कार्यक्रम के लिये लन्दन के सभी हिन्दी के प्रेमियोंं को बहुत-बहुत बधाई।
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर को याद किया जाए तो कार्यक्रम का विशिष्ट होना तो लाज़मी है। दिनकर हमारे भी बहुत प्रिय कवि हैं रश्मिरथी और कुरुक्षेत्र तो हमारी प्रिय रचनाएँ हैं।
पूरा शब्दशः पढ़ा।उसी साहित्यकार की लेखनी ताकतवर होती है जो किसी के सामने भी सत्य कहने से नहीं डरता। राज्यसभा में रहते हुए हिंदी के लिये भी दिनकर जी ने पुरजोर आवाज उठाई थी और अपनी तरफ से भरसक प्रयास भी किया।
विद्यार्थियों को दिनकर जी की कविताएँ सुनाने के लिये प्रेरित व तैयार करना काबिले तारीफ़ है। वर्तमान में जबकि बच्चे हिंदी में विशेष रुचि नहीं रखते,ऐसे में विदेश में रहकर बच्चों की कार्यक्रम में सहभागिता प्रशंसनीय है। परवीन रानी जी विशेष रूप से बधाई की पात्र है इसके लिये।
कार्यक्रम की सफलता के लिये तेजेन्द्र जी सहित सभी को बहुत-बहुत बधाई।