Tuesday, March 10, 2026
होमकहानीरिंकल शर्मा की कहानी - प्यारा-सा ठग

रिंकल शर्मा की कहानी – प्यारा-सा ठग

गर्मी की दोपहर भी बड़ी आलस भरी हुई होती है। सारे काम से निपटकर ज़रा आँख लगी ही थी कि दरवाज़े पर दस्तक हुई। पहले सोचा अनसुना कर दूँ, लेकिन फिर सोचा कि ना जाने कौन होगा इस समय? अनमने मन से उठकर दरवाज़ा खोला। सामने एक नौजवान लड़का खड़ा हुआ था। लम्बा कद, गोरा रंग, बड़ी-बड़ी कटीली आँखें, साफ़-सुथरी आसमानी रंग की शर्ट और काली पैंट पहने हुए और  हाथ में एक फोल्डर पकड़े हुए था। लेकिन माथे पर पसीने की बूँदें साफ़ नज़र आ रही थी। मुझे देखकर उसने बड़ी ही शिष्टता के साथ अभिवादन किया तो मैंने भी औपचारिकतावश अपनी गर्दन हिला दी। 
“किससे मिलना है?” – मैंने पूछा। 
वह बोला – ‘जी, मेरा नाम अभिनव है। मैं नगर निगम के दफ्तर से आया हूँ। मुझे मिस्टर शर्मा से मिलना है’। 
‘लेकिन वो तो अभी घर पर नहीं हैं। आप शाम को या फिर कल सुबह आ कर मिल सकते हैं’ – मैंने कहा। 
मेरी बात सुनकर उसने एक क्षण सोचा और फिर अपने माथे से पसीना पोंछते हुए वह बोला ‘ओह्ह! जी देखिये, बहुत ज़रूरी काम है। क्या मैं अंदर आ सकता हूँ? अंदर आकर आपको सब बात बताता हूँ’ – 
किसी अनजान को घर के अन्दर बुलाने की सोचकर ही  मुझे थोड़ी घबराहट हुई, लेकिन पता नहीं क्यों जब नज़र उसके चेहरे पर पड़ी, तो सहसा मुँह से “हाँ” निकल गया।  
‘अच्छा ठीक है, अंदर आ जाओ’  
वो अंदर आकर सोफे पर बैठ गया। 
‘जी मैडम, एक गिलास पानी मिलेगा?’ 
उफ़! मैं भी कैसी भुलक्कड़ हूँ? घर आये मेहमान को पानी के लिए भी नहीं पूछा, अभी लायी’ – कहकर  मैं पानी लेने चली गयी। हाथ में पानी का गिलास लिए मैं ड्राइंग रूम आयी तो देखा, वो कमरे मे  दीवार पर टंगी एक पेंटिंग को बड़े ही गौर से देख रहा था। जैसे ही मेरे कदमों की आहट सुनी, तो थोड़ा सहम गया।  
मैंने पानी का गिलास उसकी ओर बढाया तो पूछ  बैठा-
 ‘मैम ये पेंटिंग आपने बनायीं है?’ 
मैंने “हाँ” में अपना सर हिला दिया। 
‘आप ही की तरह बहुत ख़ूबसूरत है.  मैम, आपको तो अपनी पेंटिंग की एग्ज़ीबिशन लगानी चाहिये. सच! बहुत ही सुन्दर पेंटिंग हैं’’ 
‘थैंक यू! बस, ऐसे ही शौक है इसीलिए कुछ-न-कुछ बना देती हूँ’. लेकिन आप बताइए क्या काम था राजीव से ’   
‘मैम, दरअसल मुझे शर्माजी ने बहुत दिनों से एक लड़के की नौकरी  के लिए बोला हुआ था। आपके यहाँ शायद कोई लड़का है, जिसे नौकरी  की ज़रूरत है. ‘मैम, हमारे ऑफिस में एक पोस्ट खाली है। लेकिन आज उसके रजिस्ट्रेशन के लिए आखिरी  दिन है। अगर आज चार बजे तक फॉर्म नहीं भरा गया तो नौकरी हाथ से निकल जाएगी’।
उसकी बात सुनकर मैं समझ गयी की हो न हो ये सुनील  के लिए  नौकरी की बात कर रहा है. दरअसल  एक महीने से राजीव का चचेरा भाई सुनील हमारे साथ ही रह रहा था , और जॉब भी ढूंढ रहा है। लेकिन फिर भी मैंने यूँ ही कहा – 
‘जॉब! लेकिन राजीव ने तो मुझे ऐसा कुछ भी नहीं बताया।‘   
‘नहीं बताया (चौंकते हुए) लेकिन वो तो पिछले एक महीने से लगातार मुझसे कह रहे थे। मैं  सुबह से मि. शर्मा को कॉल कर रहा हूँ, लेकिन उन्होंने मेरा फ़ोन नहीं  उठाया. शायद वो बिजी होंगे’,  क्या उन्होंने आपको कुछ भी नहीं बताया?’ 
न जाने क्यों, उसके शब्द मुझे भीतर तक चीर गए। सच तो यही है कि राजीव को फुरसत ही कहाँ मुझसे कुछ कहने या सुनने की, जो वो फ़ोन उठाये। अब कल ही की तो बात है, ऑफिस टाइम पर एक फ़ोन क्या कर लिया मैंने, कि घर आकर तूफ़ान खड़ा कर दिया। कहने लगे, ‘मीटिंग थी बहुत ज़रूरी और तुमने फ़ोन खटखटा दिया उसी समय। तुम तो सारा दिन घर बैठी रहती हो, बाहर जाओ तो पता लगे कि कितना मुश्किल है पैसे कमाना’। 
‘हम्म! मीटिंग…किस मीटिंग में बिजी होंगे, अच्छे से जानती हूँ। आठ साल से सब जानती हूँ, मगर ना जाने क्यूँ  चुप हूँ? हर रोज़ तुम्हारे कपड़ों में  से किसी और की खुशबू आती है, लेकिन फिर भी मौन हूँ? ऑफिस टूर का बहाना करके हर दूसरे दिन तुम्हारा उस औरत के साथ जाना, सब जानती हूँ, मगर फिर भी अनजान बनी रहती हूँ। सिर्फ़  इस उम्मीद पर कि  एक ना एक दिन तुम मेरे पास फिर से लौट आओगे. राजीव, तुमने ही तो  कहा था न कि शादी के बाद एक घर संभालेगा और दूसरा बाहर काम करेगा इसीलिए  मैंने अपनी अच्छी खासी नौकरी छोड़ दी और आज तुम मुझे कमाने का उलाहना दे रहे हो’ – इतना कहते ही  मेरी आखों से आंसू बहने लगे। 
‘लो जी अब हो गया ड्रामा शुरू, बात-बात पर तुम औरतें बस रोने बैठ जाती हो’- कहते हुए राजीव बाहर निकल गए।  
“मैम…..मैम….कहाँ खो गयीं आप?” -उसकी  आवाज़ मेरे कानों पड़ी जिससे मेरी तन्द्रा भंग हुई- 
“हम्म नहीं, कहीं नहीं, हाँ! तो क्या कह रहे थे आप?”  
‘जी वो  आज आखिरी दिन है….’  
 ‘अच्छा! तो इसके लिए क्या करना होगा?’- मैंने पूछा।  
‘जी, उस लड़के को,  मेरे साथ, अपने सारे डाक्यूमेंट्स की कॉपी और 5000 रु लेकर चलना होगा। वहां रजिस्ट्रेशन फॉर्म भरकर जमा करना है। फिर बाद में इंटरव्यू का लेटर आ जायेगा,तब इंटरव्यू देना है’।  
‘लेकिन अब ये कैसे मुमकिन है? राजीव तो ऑफिस गए हुए हैं, और वो लड़का, सुनील  भी कहीं और  इंटरव्यू के लिए गया हुआ है’ – मैंने कहा।   
‘तो मैम, आप चाहें तो आप भी  मेरे साथ चल सकती हैं। आप फॉर्म जमा करा दीजियेगा, बाकी औपचारिकतायें  बाद में पूरी हो जाएँगी।‘  
मैं असमंजसता  में पड़ गयी।  क्या किसी अज़नबी पर इतना भरोसा करना ठीक होगा? तभी दिमाग में आया क्यूँ न राजीव को फ़ोन करूँ? पर न जाने क्यों हाथ रुक गए? वैसे भी अगर करती भी तो कौन-सा  राजीव फ़ोन उठाते? बड़ी उलझन थी लेकिन सुनील  का ख्याल आते ही सोचा कहीं  ऐसा ना हो कि एक अच्छा मौका हाथ से चला जाये। कितनी उम्मीदें लेकर आया है सुनील इस शहर में । इसी उलझन के बीच मेरी नज़रें  उस नौजवान पर जा टिकी, जो कभी घड़ी की ओर देख रहा था तो कभी दीवार पर टंगी पेंटिंग को।  
-उफ़ ! कितनी मासूमियत है इसके चेहरे पर, ये भला झूठ  कैसे बोल  सकता है। ना जाएं क्यों कुछ तो ऐसा है इसके अंदर जो मुझे अपनी ओर आकर्षित किये जा रहा है। 
 ‘मैम! क्या सोचा आपने? अच्छा रहने दीजिये, मैं चलता हूँ। ऐसे मौके तो फिर भी आते रहेंगे’। उसका चलने की बात कहना मेरे दिल को हिला गया। मन ने ठान लिया कि उसके साथ जाना है।
 ‘रुकिए! मैं चलती हूँ आपके साथ। बस अभी दो मिनिट में आयी’। 
मेरी बात सुनकर उसके चेहरे पर एक  मुस्कान बिखर गयी- 
‘जी बहुत अच्छा, आप साथ चलकर खुद सारी औपचारिकताएं पूरी कीजियेगा जिससे आपको भरोसा रहेगा।‘ 
‘भरोसे की बात कह कर मुझे शर्मिंदा न कीजिये प्लीज’ -कहकर मैं अंदर चली गयी। अलमारी में रखे कपड़ों में, सहसा ही हाथ, उस गुलाबी साड़ी पर जाकर रुका, जो राजीव ने मुझे, मेरी पहली सालगिरह पर गिफ्ट की थी। मैंने झटपट से कपडे बदलकर, पर्स में पैसे तथा ज़रूरी कागजात रखे और  बIहर आने से पहले आईने में खुद को निहारा. पता नहीं क्यों आज बहुत दिनों बाद,  खुद पर ही प्यार आ रहा था। तैयार होकर मैं बाहर आ गयी।
चलें ?
‘जी चलिए’
बाहर निकल कर हम सीधे बस-स्टॉप पर पहुँच गए। जैसे ही बस आयी, उसने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे बस में चढ़ने में मदद की। बस में भीड़ होने की वज़ह से कोई भी सीट खाली नहीं थी. मैं बस में एक तरफ खड़ी हो गयी, वो भी मेरे साथ ही खड़ा था। मेरे एक हाथ में पर्स था और दुसरे हाथ से मैंने बस का हैंडल पकड़ा हुआ था. बस की खिड़की से तेज़ हवा आ रही थी, जिसकी वज़ह से मेरे बालों की एक लट, मेरे चेहरे पर आ रही थी  जो मुझे बार-बार परेशान कर रही थी। मेरी परेशानी को शायद उसने भांप लिया। उसने, अपने हाथ से मेरी लट को मेरे कानों के पीछे किया। उसके हाथों की उस छूअन से मेरे पूरे शरीर में तरंगें सी उठ गयीं।  उसके जिस्म से आती भीनी-भीनी सी खुशबू को मैं महसूस करने लगी। वो खिड़की से बाहर की ओर देख रहा था लेकिन मैं, चोर नज़रों से बार-बार उसके चेहरे को निहार रही थी। हवा के झोंकों से उसके भी  बाल हवा में उड़ रहे थे जिन्हें वो बड़े ही सलीके से अपने हाथ से सँवार लेता था.  ना जाने क्या बात थी उसमें , पर कुछ तो थी जो रूह को एक अजीब-सा सुकून दे रही थी। ना जाने क्यों उसका साथ बहुत अच्छा लग रहा था।  मन कर रहा था कि ये सफर यूँ ही चलता रहे। तभी बस रुकी और वो बोला-  
‘मैम, चलिए हमारा स्टॉप आ गया’ 
बस से उतरकर हम सीधे नगर-निगम के दफ़्तर जा पहुंचे।  
‘मैम, आप यहीं रुकिए! मैं फॉर्म लेकर आता हूँ’ -कह कर वो चला गया। 
करीब 5 मिनट बाद हाथ में  एक कागज लिए वापस आया और मेरी तारफ़ बढाते हुए बोला– ‘लीजिये मैम, आप ये फॉर्म भर  दीजिये.  लेकिन मैम, समय बहुत कम बचा है, अगर आप कहें, तो जब तक आप ये फॉर्म भरेंगी, तब तक मैं रजिस्ट्रेशन फीस जमा करा देता हूँ?’  
‘हाँ-हाँ, क्यों नहीं। ये लीजिये पैसे’ – मैंने झट से 5,000 रू निकालकर उसकी ओर बढ़ा दिए। 
पैसे हाथ में लेते हुए उसने गौर से मेरी तरफ देखा, फिर कुछ सोचकर, चला गया। मैं फॉर्म भरने में व्यस्त हो गयी। फॉर्म भरने के बाद मैं उसका इंतज़ार करने लगी. बहुत देर हो गयी तो  मेरी नज़रें चारों तरफ उसे ढूंढने लगी। लेकिन, वो कहीं भी दिखाई नहीं दिया। घडी में देखा तो पांच बजने ही वाले थे . सरकारी दफ्तर में लोग पांच बजे से ही घड़ी की ओर देखना शुरू कर देते है। मैं  उठकर, सामने बने ऑफिस के अंदर गयी। एक साहब अपनी कुर्सी पर मजे से बैठे हुए थे। मैंने उनके पास जाकर पूछा – 
‘जी, यहाँ जो अभिनव कIम करते है, वो कहाँ मिलेंगे?’ 
उन साहब ने मुझे ऊपर से नीचे तक ऐसे देखा जैसे मैंने कोई बहुत ही अजीब प्रश्न किया हो, अपने मुंह में दबे पान की पीक को सँभालते हुए बोले – ‘कौन अभिनव, मैडम जी? यहाँ तो इस नाम का कोई आदमी नहीं है।‘  
‘कोई नहीं है? ऐसा कैसे हो सकता है? अभी तो मेरे साथ आये है। यहाँ क्लर्क की नौकरी निकली हुई है, उसी के आवेदन के लिए उन्होंने मुझे ये फॉर्म दिया और वो खुद रजिस्ट्रेशन फीस जमा करने इधर आये थे’ -परेशानी और घबराहट मेरे चेहरे पर साफ़ झलक रही थी, जो कि शायद उन साहब ने भी बड़ी आसानी से पढ़ ली थी। 
‘देखिये, मैडम जी, 25 सालों  से मैं यहाँ काम कर रहा हूँ। यहाँ अभिनव  नाम का कोई भी शख्स काम नही करता है। और रही बात नौकरी की, तो पिछले दो साल से यहाँ कोई वेकन्सी नहीं आयी है’। 
‘लेकिन’ -इससे ज़्यादा शब्द मेरे मुँह से निकले ही नहीं
‘देखिये मैडम जी, बुरा मत मानिये, पर लगता है, कोई आपको ठग कर चला  गया है। यहाँ आप जैसे बहुत लोग आते हैं, जो इस तरह की ठगी का शिकार होते हैं। हमको तो ये समझ नहीं आता कि  आप जैसे पढ़े- लिखे लोग कैसे इन ठगों की बातों में आ जाते हैं?’ 
वो साहब बोलते रहे लेकिन मुझे उनके शब्द धीरे-धीरे सुनाई देने बंद हो गए। मैं बेजान-सी, थके हुए से कदमों से वापस घर के लिए चली पड़ी थी। पूरा रास्ता कब बीत गया पता ही नहीं चला। सारे रास्ते  मन यहीं सोचता रहा कि क्या वाकई वो ठग था? क्या सचमुच उसने मुझे धोखा दिया? वो मासूम-सा चेहरा, वो चमकती-सी आँखें और वो मीठी-सी मुस्कान, क्या सब छलावा था? अगर वो एक ठग था तो उसे मेरे घर के बारे में इतना सब कैसे पता? नहीं-नहीं वो ठग कैसे हो सकता है? इन्हीं सब उलझनों में उलझी हुई, मैं घर के पास कब आ गयी पता ही नहीं चला। तभी पीछे से एक कर्कश सी आवाज़ कानों में पड़ी – ‘राधिका..राधिका’  पीछे मुड़ कर देखा तो, मिसेज गुप्ता आवाज़ दे रही थीं।  
‘राधिका, आज एक नौजवान लड़का आया था, बोला कि यहाँ कोई वर्माजी रहते हैं, उन्हें नौकरी की ज़रूरत है। मैंने कहा कि वर्माजी तो यहाँ कोई नहीं रहते लेकिन हाँ, यहाँ पास ही में, दो मकान छोड़कर एक  राजीव शर्माजी रहते है, लेकिन उनकी तो अच्छी- खासी नौकरी है उन्हें भला नौकरी की क्या ज़रूरत?  लेकिन हाँ उनके यहाँ एक लड़का आया हुआ है शायद वो नौकरी ढूंढ रहा है। फिर मैंने उसे बता दिया कि वो तुमसे जाकर मिल ले। और वो तुम्हारे घर की तरफ चला गया। तुमसे मिला क्या? नौकरी की बात हुई क्या?’ 
मिसेज गुप्ता अपने सवालों की झड़ी लगाए हुई थी, लेकिन मेरी समझ में अब सब आ चुका था I मैं मुस्कुराते हुए आगे बड़ गयी। और मन -ही-मन  सोचने लगी कि  आखिर उसने ठगा क्या ? पैसे? या शायद उससे भी ज्यादा कुछ और? मन में ये सवाल  उठते रहते हैं मगर फिर भी ना जाने क्यों आज भी भीड़ में नज़रें उस ठग को ढूंढती हैं? काश! वो एक बार फिर मिल जाये, वो ठग, वो प्यारा-सा ठग।
RELATED ARTICLES

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest