Wednesday, February 11, 2026
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डॉ. सरोजिनी प्रीतम की व्यंग्य कथा – प्रवचन

सूरजमुखी ने देखा था जब से घर में दावत हुई थी पति का चैन हराम हो गया था नींद की गोली खाने के बाद भी करवट पर करवट बदलते रहे… फिर चहलकदमी करने लगे… मन डोल रहा था, शरीर चल रहा था। 
सूरजमुखी ने उनके मस्तिष्क में बसी सोंधी गंध को बाहर निकालने के लिए अपने प्रवचन आरम्भ किये, बल्कि उसके भी पहले एक बैठक में वह पति की मनोदशा का सम्पूर्ण विवरण जानकर उन मनोभावनाओं का विश्लेषण कर ले। पकौड़े, पराठे, नमकीन, स्वादिष्ट कचौड़ी आदि न खाते समय उनकी मानसिक दशा क्या थी? क्या उन्हें मन ही मन इन सबके वितृष्णा-सी हुई थी अथवा उन्होंने स्वयं को धिक्कार कर दावत से वंचित होने का अनुभव किया था। वंचित होकर भी वंचित न होने की स्थितियाँ भी तो होती हैं।
उसने नज़रों से पति को टटोला तो पति ने गुस्से से पलटकर देखा। पत्नी ने नज़रों से कहा, “गुस्सा थूक दो।” उन्होंने फिर देखा, जैसे कह रहे हों “थूक दो क्या होता है? एक, दो, तीन करने के लिए केवल दो का प्रयोग ही क्यों?”
नज़रों की इसी नोंक-झोंक से सूरजमुखी ने अपना पीला पल्ला डुलाते हुए, पति का कबीर-रहीम आदि का दोहा-प्रेम जागृत करते हुए, अपना हिन्दी ज्ञान बघारना शुरू किया तथा बोली, “पकौड़ा, कचौड़ी, पराठा का मोह व्यर्थ है। तली चीज की ओर आँख उठाकर भी मत देखो प्रिय! इन्द्रियाँ भटकती हैं, भटके हुए को राह पर लाना बहुत कठिन है। हे प्रिय,! आपने तो हमेशा खाने की चीज़ों पर अपना अधिक ही यानी आधे से अधिक खा लेने का अटल निर्णय कायम रखा।” 
“तुम्हें बिना तली सब्जी न भायी। गोभी के गुच्छे,आलू के कटावदार छल्ले परांठों,पकौड़ों की भरमार और गैस के विकार का शिकार होकर भी तुमने अपनेको, खाने पर टूट पड़ने से न रोका। मेरे लाख मना करने पर दही-बड़े, भेलपूरी सब जैसे  तुम्हें ऐसा लगाव था कि लगता था तुम चिकनी-चुपड़ी प्रवृत्ति को रोक न पाओगे। मेरे बार-बार मना करने पर भी तुमने खाने-पीने के प्रति लापरवाही दिखाई, जैसी मेरे प्रति दिखाते रहे हो, तो तुम्हारे शरीर ने ही प्रतिक्रिया शुरू कर दी। वही जब बगावत पर उतर आये, सारे मनाही के अस्त्र-शस्त्र धराशायी हो गये।”
“धन्य है तुम्हारी यह प्रतिक्रिया जो हर अवांछित तत्व के प्रति अपना रोष, भिन्न रोगों का रूप धारण कर के, भयभीत करने के, परहेज के तौर-तरीके अपनाता है। हर लापरवाही को भीषण और भीषण चेतावनी दे देकर खतरे की ऐसी घंटी बजाता है कि फिर वह खतरा भी एक तलवार का रूप धारण कर लेता है। अब तुम्हारे इस रक्तचाप की तलवार तुम्हारे सिर पर कच्चे धागे से बँधी हमेशा लटकी रहेगी। अतः अब जरा-सी भी असवाधानी कई रंग दिखा सकती है।”
“हे प्रिय, खाना-पीना बहुत ही तुच्छ है और वह त्याज्य है। जो त्याज्य है उसे ग्रहण ही क्यों करें? क्योंकि उसे ग्रहण करते ही तुम्हें ग्रहण लग जायेगा। जब तक मन में ऐसी भावना घर न कर जाये कि वह अवांछनीय है, त्याज्य है… तब तक हमारा मोह बना रहता है। कबीरदास हों, रहीम जी हों, या अन्य कोई भी महान दोहा, छप्पय, कुंडलियाँ लिखने वाला, सबके सब नदी के किनारे बैठ कर साधना करते थे। सत्तू का भोजन, अंकुरित दालें और बकरी के दूध पर अपना गुजारा करके देश को स्वस्थ साहित्य प्रदान कर गये।”
स्वस्थ तन में ही तो स्वस्थ विचारों का वास होता है। सोचो तो, आपके मन-मस्तिष्क पर हमेशा हलवाई, होटलों के भोजन हावी रहे। हर उसांस में परांठे और कचौड़ी समाए रहे, हर बात चुपचाप अपनी छाप छोड़ गई; इस छाप के चिन्ह यों छूटते चले गये कि मन इनका गुलाम होने लगे। ऊँचे विचार और उच्च रक्तचाप एक दूसरे से विपरीत हैं। मन को मार लो, इस मुख को रोकना कठिन है क्योंकि यह मुख मुख्यता, हर रोग का, जनम के समय की प्रसव पीड़ा का-सा ही अनुभव देते हुए शरीर में पनपता है – और अब तो प्रायः यह जानलेवा हो रहा है, ऐसा लगता है। अतः इस सारी पीड़ा की प्रक्रिया से मुक्ति का एक ही मंत्र है- मन को जीत लो… इन्द्रियों को वश में कर लो… मैं मैं न रहे। जो भी खाने को मन करे, उसे ही त्यागो। मैं तुम्हारे सामने लच्छेदार परांठें रखूँ तो तुम सूखी रोटी के लिए माँग करो। सम्मुख दावत देखकर भी ठंडी उंसास लेकर दो-तीन गिलास गर्म पानी पी जाओ। यही सोच लो- 
तली कचौड़ी यों कहे, रे तू क्यों खावे-मोहि।
इक दिन ऐसा आयेगा मैं खाऊँगी तोहि ।।
यह सब है, रोगजन्य-
“चिकनी-चुपड़ी देखकर,
मत टपकाओ लार।
तली चीज को मानिए 
जैसे इक तलवार 
नमक और घी त्याग दो
डॉक्टर कहे पुकार ।।।
“तुमने आज तक मन की पुकार न सुनी, डॉक्टर की पुकार तो सुननी ही पड़ी। क्योंकि डॉक्टर की पुकार, उसके रोग का यह विवरण, यह ताप-पित्त का चार्ट, यह खून ही की जांच से प्राप्त सारी रिपोर्ट देख-देखकर मेरा मन भारी हो रहा है। छोटी-सी शीशी में लिया गया वह खून इतनी सारी जांच का परिणाम दे देगा। शरीर के साथ आजतक कितने अन्याय हुए, सारी रपट दे देगा, ज्ञात न था। इतनी जल्दी जांच की रपट, एक-एक हरकत का ब्यौरा कोलोस्ट्राल, हेमोग्लोबिन वगैरा वगैरा- तेरह चौदह रिर्पोट मिल जाना आश्चर्यजनक है जी! जांच-पड़ताल, रिपोर्ट और उसका निदान सुनवाई कितनी जल्दी हो जा जाती है, फैसले कितनी जल्दी हो गये आपके मामले की सुनवाई हो गई!”
निष्कर्ष निकाल दिये, ब्लड-प्रेशर/शुगर हाई/ बाकी कुछ भी नार्मल नहीं/ ये लक्षण, विवाह से पूर्व आपको देखते ही भांप लिये थे किन्तु आप ने नहीं माना, साथ ही प्रत्यक्षतः मैं सब कुछ को सत्यापित भी कर सकती थी। अब मेरी मानो
आप न नमक को मुंह लगाओ न नमकीन ! मुस्कान !! अलोनी-सलोनी की ओर ताक झाँक करो, न ही किसी को देखो/ अभी तो मैं तुम्हें सिर्फ नमक के परहेज पर प्रवचन दे रही ही हूँ। मन में सोच लो-
“फीका-फीका नीरस-नीरस नीरस जीवन जीना होगा, 
मन मोड़ लिया मन मार लिया। यह टूटा दिल सीना होगा। 
सीने में अपने दर्द छुपाये, खा लो जो भी — सम्मुख आये/”
आपको याद है कबीर ने भी कहा था ‘फूले-फूले चुन लिये। हो सकता है उनका अभिप्राय फूले-फूले हुए स्थूलकाय लोगों से ही हो। ये भी हो सकता है कि, काल महोदय को भी ब्लड-प्रैशर रहता हो तभी कबीर दास जी ने लिखा-
“चना चबेना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद…”
वे नहीं जानते होंगे कि जिस प्राणी को वे लाने आये उसकी आत्मा तक नमक से सनी है। क्योंकि नमक ने मसालों में अपना सर्वोच्च स्थान बना लिया है और किसी को नमकहराम, जले पर नमक छिड़कना, तले पर नमक ही नमक को, सर्वत्र चर्चा के योग्य बनाकर रक्त आंदोलित होने लगता है तो इसके लिए सत्याग्रह कैसा… क्यों हुआ यह सब… आज सहसा मन नमक को छूकर इसके नमकीन खारेपन से खारा-सा हो रहा है। प्रण करो नमक न लोगे। लगातार प्रवचन सुनकर सूरज चन्द जी यानि सूरजमुखी के पति तैश में आ गये। उन्होंने जैसे उसके समर्थन में हाथ उठाये और नमक न लेने की प्रतिज्ञा की। वातावरण में पंक्तियाँ गूंज-सी रही थीं। हर नमकीन बात भी नमकहीन ही हो।
“नमक विहीन करौं मही, भुज उठाय प्रण कीन्ह,
रे मनवा अब छाँड़ दे, जो भी है नमकीन।”

डॉ. सरोजिनी प्रीतम
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