सरहदों का सन्नाटा (कहानी)
- सुधा जुगरान
कियारा अस्पताल में आईसीयू के बाहर बैठी एकटक उस भिड़े दरवाजे को देख रही थी, जिसके अंदर उसके पापा जीवन की आखिरी सांस का इंतजार कर रहे थे। उसकी डबडबाई आंखें अब बेबस हो बरसने लगी थीं। पापा वेंटिलेटर पर थे। उन्हें जबरदस्त हार्ट अटैक पड़ा था। वे पिछले कुछ वर्षों से दिल की बीमारी से पीड़ित थे। वह खुद तो मुंबई में रहती है। शौनक व उसके विवाह को लगभग 10 वर्ष हो चुके हैं। दोनों की बढ़िया नौकरी थी। मुंबई में अपना फ्लैट था। मम्मी-पापा कानपुर में रहते थे। यहां पर उनका काफी बड़ा घर था। वह अपने मम्मी-पापा की इकलौती बेटी है। शौनक की एक बड़ी बहन है। अपनी नौकरी की व्यस्तता में उसे कानपुर आने का समय कम ही मिल पाता है। शौनक का घर लखनऊ में है वह भी अपने घर कम ही जा पाता है।
आईसीयू के भिड़े दरवाजे पर तटस्थता से चिपकी उसकी नजरें एकाएक हिल गईं और सोच की धारा में व्यवधान सा पड़ गया। नजरे हिलीं तो सामने कैंटीन का बोर्ड दिखा, जहां से नीचे कैंटीन के लिए सीढ़ियां चली गई थीं। उसे याद आया उसने सुबह से कुछ खाया नहीं है। वह आज सुबह की फ्लाइट से मुंबई से आई थी। आते ही उसने मम्मी को घर आराम करने भेज दियाथा। मम्मी पिछले 2-3 वर्षों से पापा को अकेले ही संभाल रही थी। कैंटीन के बोर्ड पर खाने की चीजों के नाम लिखे थे। लेकिन वह उठ कर नीचे कैटीन तक नहीं जा सकती थी। आईसीयू का दरवाजा जबतब खुल कर सुरसा के मुंह जैसा हो जाता। डॉ. ने पापा के चले जाने की लगभग पूरी संभावना व्यक्त कर दी थी लेकिन जाते हुए इंसान को उसकी मृत्यु की इंतजारी में छोड़ा तो नहीं जा सकता न। आईसीयू से एक अटैंडेट निकलता और उसके हाथ में दवाइयों व इंजेक्शनों की लिस्ट पकड़ा देता और वह हर बार 10-20 हजार की दवाइयां व इंजेक्शनों का पैकेट कैमिस्ट से, जो कि अस्पताल के अंदर ही था‘ लाकर अटैंडेंट को दे देती।
इसलिए उसने कैंटीन जाकर कुछ खाने का विचार त्याग दिया। अब उसकी नजरें बहक कर खंबे के पार रखे बड़े-बड़े कूड़ेदानों पर चली गईं। एक पीला व नीला डस्टबिन, अलग-अलग तरह के कूड़े के लिए रखे थे। कर्मचारी आईसीयू का वेस्ट थोड़ी-थोड़ी देर में लाकर उन डिब्बों में डालता रहता। उसने दृष्टि घुमाई।दाईं तरफ अग्निशमक का बोर्ड लगा था। जिस पर कुछ आवश्यक निर्देंष लिखे थे। थोड़ा और बाईं तरफ हार्ट अटैक से संबधित निर्देश लिखे थे। कुछ चित्र भी बने थे। उससे देखा न गया उसने दृष्टि घुमा आंखें बंद कर पीछे सिर टिका दिया।
दो दिन पहले पापा की तबीयत अचानक ज्यादा बिगड़ गई। मम्मी ने तुरंत ही उसे व चाचा, बुआ को खबर कर दी थी। चाचा तो कल ही पहुंच गए थे। बुआ लोकल रहती हैं, इसलिए वे भी तुरंत ही आ गईं थीं। पर वह तो जॉब करती थी। इसलिए छुट्टी व घर का इंतजाम कर आज पहुंच पाई। शौनक ऑफिशियल टुअर पर था। उसकी सोच में इस समय कई सोचें गड्मड् हो रही थी। पापा के जाने के बाद के परिदृश्य में उसके मन के कई तंतु अलग-अलग स्तर पर एक-दूसरे से बुरी तरह उलझे हुए थे।
”तब से ऐसे ही बैठी है” मम्मी उसका सिर सहलाते हुए बगल में बैठ गईं। उसने चौंक कर आंखें खोल दीं।
”अरे आप कब आईं..?”
”अभी…” वे सिल्वर फॉयल से सैंडविच निकालते हुए बोलीं, “तूने कुछ खाया भी नहीं होगा। मुझे पता है”
उसने मम्मी की आंखों में झांका। हमेशा चमकने वाली मम्मी की आंखों की चमक उदास थी। जब कि वे सरलता से घबराने वाली शख्सियत नहीं थीं पर….
“ले खाले..” मम्मी ने उसकी तरफ सैंडविच बढ़ा दिया।
“बिल्कुल भी इच्छा नहीं है मम्मी…” उसकी आंखें फिर छलक गईं।
“पगली…न खाने से क्या होगा?” बोलते हुए मम्मी भी कुछ बिखर गई थीं। उसने सैंडविच पकड़ लिया, “अच्छा आप भी खा लो” दोनों अपने सैंडविच कुतरने लगीं।
“कितना दर्दभरा होता है न अपने सबसे प्रिय इंसान के जाने का इंतजार करना” भरी आवाज में मम्मी बोलीं तो उसने सैंडविच एकतरफ रख उनका हाथ पकड़ लिया।
“मम्मी…” उसने कुछ बोलना चाहा पर शब्द नहीं मिले।
“जानती है कियारा…पिछले तीन साल से मैं इन स्थिति-परिस्थितियों से दो-चार हो रही हूं। हालांकि यह कोई अनोखी बात नहीं है जो सिर्फ मेरे साथ ही हो रही है। एक उम्र के बाद इस दौर से सभी को गुजरना पड़ता है”
“यह तो है मम्मी…” उसे जैसे बोलने के लिए शब्द मिल गए, “लेकिन जिसका अपना जाता है, उसके लिए तो अनोखी ही है न”
“कभी न कभी पति-पत्नी में से एक तो जाता ही है” वे भराई आवाज को संभाल कर बोलीं, ”जब हम युवा होते हैं। हमारे शरीर के हैप्पी हार्मोन्स का लेवल अपने शिखर पर होता है तब हमें जिंदगी बहुत हसीन लगती है। किसी प्रकार का भय मन में व्याप्त नहीं होता। किसी बात से घबराहट नहीं होती। हमारे दिल-दिमाग बहुत सारी संभावनाओं से भरे होते हैं। तब हम न कभी इस स्थिति के बारे में सोचते हैं और न वृद्धावस्था के बारे में। किसी प्रकार की कोई आशंका सिर नहीं उठाती। कभी नहीं सोचते हैं कि हम भी कभी बूढ़े होंगे। अशक्त हो जाएंगे। अकेले हो जाएंगे”
“आप ऐसी बात क्यों कर रही हैं मम्मी…आप क्यों अकेली होंगी। आपकी बेटी आपके साथ है। बुआ-चाचा आपको इतना मानते हैं। आपके फोन करते ही वे एकदम आ गए। चाची भी आने को तैयार बैठी हैं”
“वही तो बेटा…सोच रही थी, अगर कहीं मैं अकेली होती तो क्या होता? मेरी संतान भी न होती और तेरे पापा के भाई-बहन भी न होते तो इस समय मेरे साथ कौन होता? इस उम्र तक तो मित्र भी इस लायक नहीं होते जो तुम्हारी बहुत अधिक मदद कर सकें। तुम्हें इमोशनल सपोर्ट दे सके। धन की कमी भले ही न हो लेकिन मन की कमी तो हो जाती है न, यह सब मुझे कौन देता?”
कियारा के अंदर एकाएक तप्त रेगिस्तान उग आया। उसके विवाह को 10 साल हो रहे थे। विवाह के समय वह 25 की और शौनक 27 का था। दोनों तरफ के पेरेंट्स परिवार बढ़ाने के लिए बोलते रहे। उन्होंने सीधे-सीधे कभी ना नहीं किया लेकिन सुना भी नहीं। धीरे-धीरे सभी समझ ही गए थे कि कियारा बच्चा पैदा करने के लिए तैयार नहीं है। पापा अक्सर बोलते थे, जब वे नाना बनेंगे तो वह दिन बहुत स्पेशल होगा और वे बहुत कुछ स्पेशल करेंगे।
उसके अंतस में एक दर्द-भरी हुक सी उठी। पापा की इच्छा वह पूरी नहीं कर पाई और न कभी उसके दिल में पूरी करने का खयाल ही आया, क्योंकि पापा की इच्छा इतनी छोटी नहीं थी।
“आपके पास तो सब हैं न मम्मी…फिर आप यह सब क्यों सोच रही हैं। बस पापा को जाने से रोकना मेरे बस में नहीं है, इसके अलावा आपको कोई कष्ट नहीं होने दूंगी कभी…” भावुक हो उसने मम्मी को अपने बाहुपाश में भर लिया।
मम्मी वैसी ही अविचल बैठी रहीं। उनके बदन की सरसराहट से उसे उनका निशब्द रुदन महसूस हो रहा था। तभी आईसीयू का दरवाजा खुला। अटैंडेंट को आते देख वह मम्मी को छोड़ कर अपनी जगह पर खड़ी हो गई। संभवतः दवाइयां मंगवाने के लिए आया होगा। लेकिन अटैंडेंट उसके पास आकर गमगीन सा थम गया। उसने अपनी प्रश्नवाचक नजरें उसके चेहरे पर जमा दीं।
“आपके पेशेंट नहीं रहे…डॉ. साहब आपको अंदर बुला रहे हैं”
“क्या…?” वह अभी कुछ समझ पाती कि मम्मी रोती हुई आईसीयू के अंदर भाग गईं। वह भी पीछे-पीछे दौडी। अंदर डॉ. राजीव खड़े थे जो इतने दिनों से पापा को अटैंड कर रहे थे। मम्मी, पापा के ऊपर झुकी रो रही थीं।
पापा की खुली आंखें देख उसका ह्रदय निचुड़ गया। कैसी घड़ी थी। इस क्षण का पता होते हुए भी विदाई का यह पल कैसा खाली व भारी कर देता है मन को। इंसान अचानक जीवन के प्रति विश्वास-अविश्वास की दम-घोंटू गर्त से भर कर धुआं-धुआं सा हो जाता है।
डॉ ने धीरे से पापा की आंखें बंद कर दी। वह मम्मी को पकड़ कर बाहर ले आई। उसे अपने आंसू पोंछने का भी समय नहीं था। उसे सब को खबर करना था। अस्पताल का जितना भी ड्यू था वह सब पूरा करना था। डेड बॉडी को घर ले जाने के लिए एंबूलेंस के लिए कहना था। घर में इससे पहले सारी व्यवस्थाएं करानी थी।
उसने चाचा व बुआ को खबर की। बुआ लोकल ही रहती थी। चाचा, बुआ के घर पर ठहरे थे। चाचा-बुआ को फोन कर उसने मम्मी के एकमात्र भाई को चंडीगढ फोन किया। उन्होंने भी अविलंब चलने की बात कही। मम्मी घायल सी कुर्सी पर लुढ़क गईं थीं। वह मम्मी के पास बैठ कर उन्हें सहलाने लगी।
“हिम्मत करो मम्मी…आप इतनी कमजोर हो जाएंगी तो मैं अकेली क्या करूंगी। शौनक को मैसेज कर दिया है पर लंदन से वापस आने में उसे समय लग जाएगा। संभालना तो हमें ही है सब कुछ” मम्मी ने उसकी तरफ हारी हुई नजरों से देखा। उनकी आंखों की टीस उसे अंदर तक बींध गई थी। तभी सामने से चाचा आते हुए दिखे। उनको देख कर उसकी आंखों में भरोसे की नमी आ गई।
आते ही उन्होंने उसे गले लगा लिया। न चाहते हुए भी वह फफक पड़ी। उससे अलग होकर चाचा ने मम्मी के सिर पर हाथ फेरा और उनका हाथ पकड़ कर उनकी बगल में बैठ गए। भाई जैसे देवर का भरोसा पाकर मम्मी भी बिलख पड़ीं।
“हौसला रखो भाभी…भैया का साथ इतना ही था। हम सब हैं न… और फिर आपके बच्चे हैं, कभी अकेला नहीं होने देंगे आपको..” कितना विश्वास व हिम्मत थी उन शब्दों में… जो मम्मी के अंदर निश्चित ही आशा का संचार कर रहे होगें। वह खुद भी कहां अछूती रही। चाचा के आते ही लगा था वह अकेली नहीं है। लेकिन क्या इस पल का ये भरोसा मम्मी को बिना मेहनत किए ही मिल गया? इन रिश्तों को संजोने के लिए मम्मी ने जीवन पर्यंत इनमें खाद पानी डाला होगा। बिना मेहनत किए तो न लहराए होंगे ये संबंध। मम्मी भी अगर उसी की तरह बच्चा पैदा करने से इन्कार कर देती तो क्या उनकी बेटी इस मुश्किल घड़ी में उनके साथ होती?
कियारा के अंदर एक बार फिर अनेकों सवालों का बवंडर उठ खड़ा हुआ। लेकिन इस वक्त वह उन सवालों को संतुष्ट करने की स्थिति में नहीं थी। उसने चाचा को मम्मी को घर छोड़ने के लिए कहा और बुआ को घर पहुंचने व व्यवस्था करने के लिए कहा।
“चाचाजी आप मम्मी को घर छोड़ कर बुआ को सबकुछ समझा कर वापस आ जाइए। साथ ही सभी रिश्तेदारों को भी फोन कर दीजिए। मैं तब तक अस्पताल के सारे बिल्स क्लियर करती हूं”
मम्मी उसे अकेला नहीं छोड़ना चाहती थीं। इसलिए मुश्किल से ही गईं। थोड़ी देर में चाचा, मम्मी को छोड़ कर वापस आ गए। जब तक वह चाचा के साथ पापा को एंबूलेंस से लेकर घर पहुंची। सारी व्यवस्था हो चुकी थी। बुआ और फूफा जी व उनके बच्चों ने सब कुछ अपने हाथ में ले लिया था। रिश्तेदारों से घर भर गया था।
वह काफी समय से मुंबई में थी। इसलिए स्थानीय होने के कारण बुआ का परिवार ही सारी व्यवस्थाएं करने पर लगा था। उसे तो बस आर्थिक रूप से करना था। टाइम काफी हो गया था। इसलिए शवयात्रा कल प्रातः के लिए निश्चित की गई। इसलिए शव को सुरक्षित रखने के सारे इंतजा़म कर दिए गए।
घर में आने वाले दूर पार के रिश्तेदारों के साथ मम्मी-पापा के फर्स्ट कजिन, सेकेंड कजिन के परिवारों का भी जमघट लग गया था। सब लोग इस समय एकजुट हो गए थे। उसने देखा मम्मी एक बार किसी के गले लग कर आंसू बहाती फिर पूरा घटनाक्रम लगभग दोबारा सुनातीं। इसी सुनाने व मिलने में उनके आंसुओं की रफ्तार भी कम होती जा रही थी। जब तक मामा नहीं पहुंच गए तब तक मम्मी, पापा के तबीयत खराब होने से लेकर अस्पताल पहुंचाने व मृत्यु तक का घटनाक्रम कई बार सुना चुकी थीं और सब बार-बार पूछते भी थे। सभी डीटेल से सबकुछ जानना भी चाहते थे। आरंभ में उसे यह प्रक्रिया बहुत कष्टदायक लग रही थी लेकिन धीरे-धीरे उसने मम्मी व खुद में भी एक परिवर्तन महसूस किया। वे दोनों पापा के जाने के दर्द की स्वीकार्यता के दौर से गुजर रहे थे। पीड़ा के आदान-प्रदान के कारण पीड़ा की तीव्रता भी कुछ कम हो रही थी।
हालांकि वह और मम्मी अच्छी तरह जानते थे कि संबधों की यह भीड़ बस कुछ ही दिनों की है। वास्तविक दुख उन्हीं दोनों का है। लेकिन फिर भी इस वक्त सबका साथ होना बहुत ढाढस दे रहा था। सुबह से शाम तक आने वाले लोग सड़क की भीड़ से जूझते हुए, वक्त निकाल कर उन तक पहुंच रहे थे।
शौनक भी लंदन से पहुंच गया था। शौनक के परिवार के लोग, मामा का परिवार सभी पहुंच गए थे। कियारा इकलौती बेटी थी इसलिए सारे विधि-विधान के कार्य उसे ही करने थे। उसे नहीं पता था कि इतने सारे इंतजा़म कैसे हो रहे हैं? कौन कर रहा है? पापा की बड़ी फोटो जो एकतरफ पूजा स्थल बना कर लगा दी गई थी। वहीं पास में कियारा शिद्वत से बैठी सोच रही थी। आखिर कहां छिपे रहते हैं ये सब अपने पराए, जो खुशी व गम के मौकों पर प्रकट हो जाते हैं। परिवार व पारिवारिक रिश्ते हमारी संस्कृति की पहचान है तो क्या उसका बच्चे को जन्म न देने का निर्णय गलत है? उस जैसे अनेकों युवा जो विवाह न करने या बच्चों को जन्म न देने का निर्णय लेकर इस पवित्र विरासत के आगाज को बिना कारण ठुकरा रहे हैं। प्रकृति के विरुद्ध मोर्चा संभालने में व्यस्त उसकी पीढ़ी यह नहीं सोच पा रही है कि बहती जलधारा पर यदि बांध बना दिया जाए तो विद्युत पैदा की जाती है लेकिन यदि रोक लगा दी जाए तो भविष्य में कभी न कभी प्रलय का आना निश्चित ही रहता है।
तभी मम्मी उसकी बगल में आकर बैठ गईं, “क्या सोच रही है?”
“सोच रही थी मम्मी, कितने लोग हैं जो मन या बेमन से हमारे दुख में आज कम से कम शरीक तो हो रहे हैं। कितने रिश्तेदार हैं और रिश्तेदारों के रिश्तेदार हैं। मेरी शादी में रहे होंगे, शायद, पर मैंने कभी जाना नहीं ”
“हां, यह तो है” मम्मी पल भर रुक कर बोलीं, “जैसे ज्योत से ज्योत जलती है। युवा पीढ़ी रिश्ते और रिश्तेदारों को नकार रही है। यहां तक कि अपना परिवार भी नहीं बनाना चाह रही है। लेकिन यह एक ऐसा रास्ता है कियारा, जहां एकला चलो रे की रीत काम नहीं करती”
कियारा ने कोई जवाब नही दिया। अपने में गुम सोच रही थी। मम्मी का सहारा मैं हूं। मैं हूं तो ही शौनक है। जब पापा को पहली बार हार्ट अटैक पड़ा था तो दोनों आए थे। मम्मी ओएनजीसी से डाइरेक्टर के पद से रिटायर्ड हैं। नौकरी में व्यस्त मम्मी ने भी यदि उसको जन्म देने के बारे में न सोचा होता तो आज न उनके पास कियारा होती और न शौनक। शौनक के मम्मी-पापा की जरूरत पर भी वे दोनों पहुंच ही जाते हैं। चाहे कितने भी व्यस्त हो। शौनक की बहन भी खयाल रखती है।
आज की जैसी परिस्थितियों के बारे में न भी सोचें तो भी उम्र बढ़ने के साथ उनकी जिंदगी में कितना अकेलापन हो जाएगा। हालांकि उनकी युवा पीढ़ी के पास विवाह न करने, बच्चे न करने के हजारों तर्क हैं। उनकी नजर में पिछली पीढ़ी के लोग आवश्यकता से अधिक इमोशनल थे। लेकिन कुछ स्थिति-परिस्थितियां, मनोभाव ऐसे होते हैं जिनके सामने ऐसे तर्क अपना वजूद खत्म कर देते हैं।
मम्मी उसके तर्कों पर कहती हैं, ‘हमारी तो सैंडविच जेनरेशन है कियारा। न अपने संस्कारों को छोड़ पाते हैं और न अपने संवेदनाओं व भावनाओं को। तुम्हारी पीढ़ी के साथ आखिर कितना तो मशीनी बनाएं खुद को। तूने शादी कर ली, मेरी कई फ्रेंड्स इसी को संतुष्टि की बात मानती हैं। उनके बच्चे शादियों के लिए भी तैयार नहीं हो रहे। जो शादी कर रहे हैं, उन में से कई निभा नहीं पा रहे हैं। परिवार नाम की चीज समाप्ति के कगार पर है‘
“क्या सोच रही है इतनी देर से? किस सोच में गुम है बेटा?” मम्मी उसका सिर सहलाते हुए बोली।
“आप ही की बातों को सोच रही थी मम्मी। आपकी सैंडविच जेनरेशन वाली बात पर… पहले कभी इतना ध्यान नहीं गया जिन बातों पर, आज उनका अर्थ प्रत्यक्ष महसूस कर रही हूं” न चाहते हुए भी वह बोल पड़ी।
मम्मी ने उसे गहरी नजर से देखा। पल भर बाद बोलीं, “महसूस कर रही है तो एक बात और भी कहना चाहूंगी कियारा…. जैसे हमारी पीढ़ी तुम्हारे साथ अपनी संवेदनाओं व संस्कारों की सरहदों से जूझ रही है वैसे ही तुम भी जूझोगे क्योंकि जड़ें तो हमने ही पोषित की हैं न तुम्हारी, तुम भी इन सरहदों के पार एक उम्र बीत जाने के बाद खुश नहीं रह पाओगे। इस देश की आबोहवा व संस्कृति में सांस ली है तुमने, जब सब तरफ से फर्सत पा जाओगे तब बहुत कुछ कचोटने लगेगा। हमारे जैसे संतुष्टि का एक भी कारण तुम्हारे पास नहीं होगा।
हमारी पीढ़ी तो फिर भी भाग्यशाली है, क्योंकि हमारे सामने तुम हो लेकिन तुम्हारे सामने सन्नाटा होगा सिर्फ सन्नाटा। कह कर मम्मी उठ कर अपने कमरे में चली गईं।
वक्त कुछ अलग था और नाजुक जज्बात इन दिनों अपने चरम को छू रहे थे। मृत्यू व जीवन का सच मानस पटल पर शाश्वत नृत्य कर रहा था। इसलिए मम्मी की बात पर कियारा का पूरा शरीर सिहर कर पसीने से नहा गया। क्या सच ही कभी उम्र के किसी पड़ाव वह अकेली हो गई तो उसके सामने कोई कियारा या शौनक नहीं होंगे। नवनिर्माण तुम्हें और कुछ दे न दे, कहीं न कहीं भावनात्मक सुरक्षा देकर मन तो भरता ही है। बढ़ती उम्र को बच्चों के रूप में युवा जीवन का तोहफा तो देता ही है। सच तो यह है कि उसका भी मन करता है नन्हें बच्चे की किलकारी से उसका भी घर गूंज जाए। शौनक भी दाएं बाएं से अपनी इच्छा जता देता है पर वह अपने मन को तैयार नहीं कर पाती है। जल्दी सोचा नहीं और अब हिम्मत नहीं हो पाती।
लेकिन मम्मी की बातों ने आज दिलो-दिमाग में उठ रहे भावों को शब्द दे दिए थे। उनकी अगर सैंडविच जनरेशन है तो उस जनरेशन का अंतिम पड़ाव उनकी खुद की पीढ़ी है। अपनी संवेदनाओं व संस्कारों की सरहदों के पार चली भी जाएगी तो भी सरहद को देख-देख दुखी होती रहेगी। लेकिन फिर वापस नहीं आया जाएगा। क्योंकि वहां तो भंयकर सन्नाटा पसरा होगा।
तभी शौनक आकर बगल में बैठ गया, “क्या हो गया, बहुत देर से देख रहा हूं…..किस सोच में डूबी हो?”
”कुछ नहीं…” उसने खामोश निगाहों से शौनक की तरफ देखा।पलभर बाद मुस्कुरा कर बोली”सोच रही थी कि बच्चे के लिए प्लान करने के बाद मैं कुछ वक्त के लिए नौकरी छोड़ दूंगी”
“क्या?” शौनक एकाएक बुरी तरह चौंक गया, “सच में…तुम बेबी प्लान करने का सोच रही हो?”
“हां शौनक…हमारी पीढ़ी बहुत आत्मकेंद्रित हो रही है और मैं अपनी संवेदनाओं व संस्कारों की सरहदों के पार नहीं जाना चाहती। उस सन्नाटे को नहीं भुगतना चाहती” शौनक उसकी बात कुछ समझा, कुछ नहीं। बस खुश हो गया। बांहों के घेरे में उसे कसते हुए बोला, “बच्चा हम दोनों की जिम्मेदारी होगा कियारा, हर कदम पर तुम्हारा साथ दूंगा”
भरोसे से भर कर उसने शौनक के कंधे पर सिर टिका दिया। ‘कल सुबह यह बात मम्मी को भी बतानी है शौनक। ऐसे वक्त में यह खबर उनके लिए संजीवनी का काम करेगी‘ कियारा के मन-मस्तिष्क में चल रही बहुत दिनों की कशमकश को एकाएक विराम मिल गया था।

लेखिका- सुधा जुगरान
देहरादून
उत्तराखंड
Email: [email protected]

अच्छी कहानी।
हार्दिक आभार आपका।
बहुत ही संवेदनशील कहानी है।आज की यंग जेनरेशन जिस तरह से आत्मकेंद्रित हो रही है। पारिवारिक जिम्मेदारियों से डर रही।परिवार बढ़ाने को स्वतंत्रता एवं केरियर में बांधा समझते उसके लिए बड़ी प्रेरणात्मक कहानी है एवं समाज की सामाजिकता एवं मनुष्य संसार के संवहन को रोकने में बांधा बना है आज की यंग पीढ़ी का बच्चों को जन्म न देना। प्रत्येक व्यक्ति युवा सोचते हैं एक हमारे बच्चे न करने से क्या फर्क पड़ेगा। मगर ऐसा हर युवा सोचेगा तो संसार के हर व्यक्ति पर फर्क पड़ता ये भूल जाते हैं।
इस सार्थक व सशक्त प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया
आपने यथार्थ लिखा है, बड़ी ही प्रेरक कहानी है, बल्कि यह कहना चाहिए कि यह आजकल की पीढ़ी का यथार्थ है। शीर्षक भी बिल्कुल सटीक, एक बार में विषय कुछ अलग लगा था लेकिन जिस खूबसूरती से आपने कथानक की शुरुआत की व उसको एक अहम मोड़ दिया यह प्रस्तुतिकरण अद्भुत है। आपको बहुत बहुत बधाई
आपकी खूबसूरत और सारगर्भित टिप्पणी के लिए तहेदिल से शुक्रिया सौम्या जी
प्रिय सुधा जुगरान जी आज आपकी कहानी पढ़कर ऐसा लगा मुझे कारूं का खजाना मिल गया ,सबसे पहले में अपने फैमिली ग्रुप पर डालना चाहूंगी , जहां जो युवा दंपत्ति रिश्तेदार ,विवाह के काफी समय बाद तक परिवार विस्तार के बारे में नहीं सोच रहे सिर्फ स्व आनंद घूमना फिरना कमाने एंजॉय, में रात दिन लगे हुए हैं,निःसंदेह यह कहानी उनके लिए ओर जो भी पाठक इस कहानी को पढ़ेंगे उनके दिल को छू जाएगी ,उनकी आत्मा में उतर जाएगी इस कहानी का कथोपकथन ।
इतनी प्रेरणादायक कहानी लेखन के लिए प्रिय आपको अनंत साधुवाद ,आजकल ऐसी ही प्रेरणात्मक लेखन की समाज को जरूरत है
कहानी में माता पिता की इकलौती संतान कियारा को परिवार की परिभाषा,परिवार का महत्व ,परिवार की उपयोगिता तब समझ में आती है जब वह अपने पिता की मृत्यु होने के बाद मां के द्वारा सहेजे गए संबंध देवर नन्द भाई इत्यादि सांत्वना देने से लेकर मृत्यु के बाद होने वाली आवश्यकताओं ,संस्कारों की पूर्ति करने हेतु अन्य ओर भी मित्र रिश्तेदार आनन गणन में उपस्थित हो जाते हैं ,हालांकि मृत्यु जीवन का अकाट्य सत्य हे सभी इससे कालांतर में ऊबर ही जाते हैं ,परंतु मृत शरीर के अंत्येष्टि के पूर्व उन सभी रिश्तेदारों की उपस्थिति मानों जीभर के रो लेने से उनकी सांत्वना से दुःख को क्रमशः हल्का कर देती हे
ओर जब रिश्तों का इतना महत्व होता हो वहां सिर्फ आजकल के युवा पति पत्नी परिवार वृद्धि में कोई ज्यादा या विशेष रुचि नहीं ले रहे ,अधिकतर की एक संतान ,या वो भी नहीं ,,,,,,
कियारा जो इकलौती संतान थी ,पिता की मृत्यु के बाद इस गंभीर सन्नाटे को उसने महसूस किया ,उसे याद आया पिता की बात जब में नाना बनूंगा तब ये करूंगा वो करूंगा,,,,,,मगर कियारा की अपनी सोच, महत्वकांक्षाओं ने उनकी यह इच्छा पूरी न होने दी ।
परन्तु अब उसने जन लिया था एकाकी जीवन की झांकी कितनी खतरनाक थी ,परिवार का संबल कितना जरूरी था ।
अपने पति शौनक से परिवार बढ़ाने की जिज्ञासा जाहिर की तब शौनक की खुशी देखते बनती हे ।
प्रिय सुधा जी पुनः आपको कोटि कोटि धन्यवाद
आ. कुंती जी आपकी टिप्पणी ने मेरा कहानी लेखन सफल कर दिया। आपने कहानी के मर्म को अत्यंत गहराई से समझ कर बहुत ही सशक्त व सारगर्भित प्रतिक्रिया दी। आप बेशक इस कहानी का लिंक अपने फैमली ग्रुप में शेयर कीजिये। मुझे खुशी होगी। यह तो लेखक का सौभाग्य है कि उसे अधिक से अधिक पाठक पढ़ें और उससे कुछ मिल सके तो अवश्य प्रेरणा ले।
हार्दिक शुक्रिया आपका।
आ. सुधा जुगरान जी की कहानी ” सरहदों का सन्नाटा” सशक्त लेखनी का उदाहरण है। कहानी सोचने पर विवश करती है कि क्या आजकल की युवा पीढ़ी इतनी व्यावहारिक और संवेदनाशून्य हो गई है कि रिश्तों से अधिक वह अपने करियर को महत्व देने लगी है। किंतु यह एक सार्वभौमिक सत्य है कि रिश्ते जीवन को ठोस धरातल देते हैं गति देते हैं। जीवन के लिए रिश्ते ऑक्सीजन का काम करते हैं। इसी सत्यता का बोध कियारा को तब होता है जब अपने पिता की मृत्यु होने पर मां द्वारा सहेजे गए रिश्तेदार भाई देवर ननद न केवल सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं बल्कि मां का संबल बनकर खड़े हो जाते हैं तब कियारा को परिवार के महत्व का एहसास होता है और वह पति से परिवार बढ़ाने को कहती है। अत्यंत सामायिक एवं प्रेरणादायक कहानी। हार्दिक बधाई सुधा जी।
मन और आँखें दोनों नम हो गई, इतनी मार्मिकता से आपने सब कुछ लिखा कि जीवंत हो उठा। साथ ही युवा पीढ़ी को सन्देश बहुत प्रभावी रूप से दिया, इस यराह कि सोचने को विवश ही हो जाएँ.
तुम्हें कहानी पसंद आई मेघा, बहुत खुशी हुई। इतनी सटीक व खूबसूरत प्रतिक्रिया देने के लिए तहेदिल से शुक्रिया।
तहेदिल से शुक्रिया रेनू जी। आप जैसी सशक्त लेखिका की प्रतिक्रिया मेरे लिए हमेशा ही महत्वपूर्ण है। एक-एक शब्द आपका वर्तमान समय की तस्वीर उकेरता है।
सुधा जी! आपकी इस कहानी ने बहुत प्रभावित किया। कहानी हमने पहले ही पढ़ ली थी और इस पर लिख भी लिया था लेकिन पोस्ट करना भूल गए और वह डिलीट हो गई।
यह कहानी बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है। यह आज की ज्वलंत समस्या बनने जा रही है।। आपकी कहानी वास्तव में ऐसी सोच के विरुद्ध प्रेरणास्पद है।
परिवार का अपना एक महत्व है,जरूरत है। विदेशों का आकर्षण एक सम्मोहन की तरह प्रभाव डाल रहा है। पर हिंदुस्तान में रहने वाले भी कई परिवार ऐसे हैं जो बच्चे को जन्म देना ही नहीं चाहते। युवावस्था के जोश में लोग समझते नहीं। संस्कारों का महत्व नहीं समझते। यह हम सब एक संकट पूर्ण स्थिति का आवाहन कर रहे हैं।
काश आपकी कहानी उन सब तक पहुँचे।उन लोगों तक पहुँचे जो बच्चे के बारे में सोच भी नहीं रहे और वे समझ पाएँ कि उनके लिए जीवन में क्या जरूरी है ।
एक बेहतरीन कहानी के लिए आपका तहेदिल से शुक्रिया।
आपने कहानी पढ़ कर इतनी सटीक प्रतिक्रिया दी, यह मेरी कलम के लिए प्रोत्साहन है। आपने सही कहा, यह आज की अत्यंत ज्वलंत समस्या है, जिसका असर एक समय के बाद दिखाई देगा। हार्दिक शुक्रिया आपका।