कविताएं – सूर्य कांत शर्मा
गुलाब…
गुलाब है गुलाल है
अब यही तो हाल है।
ख़्वाब हैं अरमान हैं
अहसास की तो ताल है।
आंखों के आईने में
ज़िंदगी के सवाल हैं।
पूछता है दिल तुझे
उम्र के इस दौर में
गुलाब कैसे खिल रहा?
गुलाब कब खिल रहा!
गुलाब ही गुलाब क्यों
खार भी तो मिल रहे।
खार की फ़िज़ा में
तू बता
गुलाब सा क्यूं
संवर रहा?
गुलाब है गुलाल है
हसरतों के सवाल हैं
बस यूं ही
गुलाब है कि हंस रहा
गुलाब है कि नेह से
निखर रहा।
हसरतों के सवाल हैं
मसर्रत ही ज़वाब है।
बस यूं ही
गुलाब है कि हंस रहा
गुलाब है कि नेह से
निखर रहा।
शब्द…
शब्द किसी के
भाव कभी के
बिंब-प्रतिबिंब
कहीं के
भंगिमाएं कहीं की
लेती रूप
मन मस्तिष्क में
सरस्वती साधकों के।
स्वर्ण से सृजन के
कण कण निस्रत
साहित्य प्रांगण में
उतरे अमृत से।
कभी शबद से
कभी साखी से
किंचित कविता से
संचित अनुभव से
तब के अनंग से
अब के प्रेम से।
पंच तत्व के पुतुल को
रोमांचित करते
कभी कर्म से
कभी कलम से।
भक्ति भाव से
गुरु सत्संग से
शब्द सदा ही रहते
जग में,
कभी भुजंग से
कभी चंदन से
कभी स्मृति में
कभी विस्मृति में।
शब्द रहते अजर अमर से
आत्म रूप से आप्त काम से।
आत्म रूप से आप्त काम से।
तुम हो वो ग़ज़ल…
सारे रदीफ़ काफिये कुर्बाँ
तुम पर,
कायनात सी वो
ग़ज़ल हो तुम।
सारे नमाज़ी औ व्रती
फ़िदा तुम पर,
काबे और काशी की
अज़ान भी
आरती भी
ऐसी मलिका सी पुखराज
हो तुम।
दिल के साज़ पर
छेड़ी वो ग़ज़ल
हो तुम।
सुन कर तुम्हें
है मंज़ूर काफ़िर
और नाख़ुदा होना
मेरे दिल की
वो ग़ज़ल
हो तुम।
रूह से रु ब रू
इबादत की आबरू
मुहब्बत का आसरा
हो तुम।
ज़िंदगी का मतला
उसकी इबादत का मिसरा।
उसकी रहमत का शेर
हो तुम।
तुम मानो या ना मानो
वही पाक साफ
खुदा की शक्ल लिए
वही ग़ज़ल हो तुम।
हर हाल में
समय की सिलवटों में
माँ के पैरों के नीचे
जन्नत का रास्ता हो तुम।
इंसानियत को सहलाती
मुहब्बत को खुदा बतलाती।
फिर क्यूँ कर ना कहदूँ
उस दो जहाँ के मालिक
की पसंदीदा ग़ज़ल हो तुम।
सपने मध्यम वर्ग के…
मध्यम वर्ग के कितने सपने
मन भावों के रंग हैं,जितने।
छोटी छोटी खुशियों के गहने
वैसे वैसे इसके सपने।
छौनेँ छौनेँ नैनो नैनो
ज्यों हों मनभावन के सपने।
यम नियम आसन प्राणायाम
से सपने
मानवता को केंद्र में रखते
इस जन बहुल के सपने।
देश की कितनी चिंता करते
बहुधा अपना जीवन होम
भी करते।
तिस पर भी समाज को
उसकी धुरी पर रखते
मध्यम वर्ग के अनूठे सपने।
हर परिवर्तन हर वर्तन पर
पर बल्लियों उछलते
आस बांधते,
इस ध्रुव तारे के सपने।
पर राजनीति और धनिक
के अपने सपने
नहीं देते वो ‘इसको’ टिकने।
कभी धर्म के ठेकेदार बनते
कभी नीति नियामक बनते
सब्ज बाग दिखाते
दिग्भ्रमित करते,
अपना उल्लू सीधा करते
ये भारत के अनन्य अपने।
मध्यम वर्ग को नीचे धकेलते
गरीबी के दलदल में झोंकते
ये भारत के कैसे अपने।
लोकतंत्र की बातें करते
फिर से मध्यम वर्ग बहलाते।
ये बहेलिए ये बहरुरूपिये
जब चाहे वे इन्हें बरगलाते
वक्त पड़ने पर खूब गरियाते।
मध्यम वर्ग भी सोच के रखे
कैसे कैसे सपने पाले?
इनसे भय्या पूछ के रखे,
कैसे हों मध्यम वर्ग के
सपने!!
कैसे हों मध्यम वर्ग के
सपने!!
सूर्य कांत शर्मा
Flat number B1, Plot number 3
Mansarovar apartment
Sector 5 Dwarka
New Delhi 110075
Mobile 7982620596, 9768319498

आंखों पर एनक और और ऐनक के पीछे से एक पत्रकार की झांकती या भेदती आंखें ,मृदु मुस्कान चेहरे पर लिए प्रिय सूर्यकांत जी आप भी गुलाब हैं।
गुलाब हजारों फूलों में खास है और खास है आपकी कविता
जब मन तरंग में हो ,खुशी से लबालब हो तब,
गुलाब हे गुलाल है
अब तो यही हाल है।
जब संघर्ष में भी असर न हो सेहत पर मन तरंग में रहे,तब दिल स्वयं से पूछता है
खार की फिजा में
तू बता
गुलाब सा क्यों संवर रहा?
ओर जब इंसान प्रेम की गिरफ्त में होता है तो दिल कहता है
मसर्रत ही जवाब है
गुलाब है कि नेह से
निखर रहा।
बेहद शानदार कविता गुलाब
शब्द पर संयोजित एक अच्छी कविता आदरणीय प्रिय सूर्यकांत जी
शब्द ही नाद है,शब्द ही तो हैं जो गढ़ते हैं, संवाद ,कथा, कविता,
भक्ति,प्रेम,रचना संसार।
गजल कविता भी खूब हे ,गजल का आदिकाल का स्वरूप प्रेम आधारित था,अब आज की गजल ने दुनिया का हर रंग धारण कर लिया हे,सामाजिक,नैतिक अनैतिक,सियासी,दोस्ती,दुश्मनी, फ़ानी रूहानी ,व्यंग्यात्मक ,पता नहीं क्या क्या अब तो हर चीज पर शेर हाजिर हे
आपकी गजल स्नेहिल हे ,बधाई
तीनों कविताएं सुंदर ,बहुत सुंदर
मुआफी चाहता हूं,कि मैने पहले इसका उत्तर नहीं दे पाया।
आपकी टिप्पणी से मन और मस्तिष्क को नई ऊर्जा मिली और लेखन सार्थक लगा। दरअसल सुधि पाठकों के आशीर्वचन ही तो संजीवनी हैं।
हृदय से आभारी हूं।
अच्छी कविता है सूर्यकांत जी! गुलाब कविता ज्यादा अच्छी लगी! बधाइयां आपको।
जी आदरणीया नीलम करैया जी।
सादर आभार।