Wednesday, February 11, 2026
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डॉ. मुकेश असीमित का व्यंग्य – लोकतंत्र का रक्षा-बंधन पर्व

हमारे यहाँ त्योहारों के पीछे ज़रूर कोई कथा होती हैकभी देवता-पिशाच की लड़ाई, कभी रानी-पुत्र की करुणा। राखी की भी कई कथाएँ हैं, पर लोकतंत्र की एक कहानी ऐसी है जो इतिहास में दर्ज नहीं हुईक्योंकि यह आज भी हर साल घट रही है। इसे कहते हैंलोकतंत्र का रक्षा-बंधन
इस पावन पर्व की शुरुआत तब हुई जब स्वतंत्रता के बाद भ्रष्टाचार पहली बार अपनी शीतनिद्रा से बाहर निकला। जन्म तो इसका प्राचीन भारत में ही हो चुका था, पर तब यह एक दुबला-पतला, डरपोक-सा साँप का संपोला था। देवी-देवता, ऋषि-मुनि इसे कभी-कभार डाँटकर भगा देते। आज़ादी के बाद सत्ता के नए पालकों ने इसे देखाकाला, कलूटा, पर उपयोगी। बस, उठा लाए आस्तीन में। कालांतर में यह साँप अपने पालनहारों से भी ज़्यादा ताकतवर हो गया।
पर भ्रष्टाचार अकेला नहीं था। उसकी एक बहन थीरिश्वत। नागिन का सम्मोहक रूप । रूपसी  ऐसी कि सारे तंत्र पर सम्मोहन कर दे। जो भी उसे देखता, उसकी जेब में खुद-ब-खुद कंपन उठता। सरकारी कुर्सियों से लेकर विभागीय ठंडे कमरों तकरिश्वत के रूप का जलवा छाया रहता। उसके दीदार से बैंक खाते फूलते, लॉकर मोटे होते, और उसके दंश से  ईमानदारी अस्पतालों में वेंटिलेटर पर पड़ी रहती।
पर वक्त घूमता है। आरटीआई वाले, स्टिंग वाले, सीबीआई-ईडी वाले अचानक नैतिकता की हिलोर में आ गए। रिश्वत को हर मोड़ पर घेरने लगे। सोशल मीडिया ने तो उसकी इज्ज़त का लाइव-टेलीकास्ट शुरू कर दिया। कभी जिस रिश्वत पर अधिकारी लार टपकाते थे, अब उसकी सीडी वायरल हो रही थी। रिश्वत रो पड़ी—“ये कैसा जमाना आ गया है भाई?”
भ्रष्टाचार भी उदास था—“अगर बहन की अस्मिता गयी, तो फिर मेरा क्या होगा ?”
तभी राखी का दिन नज़दीक आया और भ्रष्टाचार को एक दिव्य विचार आया
बहन, इस बार राखी तुम सिर्फ मुझसे नहीं, मेरे सभी पालनहारों से बाँधोगी। जिस दिन ये तुम्हें बहन मान लेंगे, उस दिन से कोई तुम्हारी इज्ज़त पर उंगली नहीं उठा सकेगा।
पालनहारों को भी यह योजना सूट कर गई। वे रिश्वत के अवैध संबंधों की पोल खुलने से बुरी तरह खिन्न थे। भ्रष्टाचार ने कहा
घबराओ मत। लोकतंत्र का रक्षा-बंधन पर्व मनाओ। इसे राष्ट्रीय कार्यक्रम बना दो। आरटीआई, सीबीआई, ईडीसबको बुलाओ। पर पहले डरा दो। उनकी पितृ-पितामह  पीढ़ी तक के क़िस्से खंगालकर सामने रखो। उन्हें भी पता हैउनकी रगों में भी रिश्वत की बूंदें बहती हैं। बस, डर दिखाओलाइन में आ जाएँगे।
फिर क्या थामहकमे अलर्ट कर दिए गए। तबादलों की तलवारें हवा में चमकने लगीं। प्रमोशन रुकने की कानाफूसी होने लगी। सत्ता और विपक्ष, दोनों को समझाया गया
सरकारें बदलेंगी, पर रिश्वत अजर-अमर है। इसे सम्मान देना सीखो।
रक्षा-बंधन के हफ्ते भर पहले कार्यक्रम घोषित हुआलोकतंत्र रक्षा पर्वरिश्वत रक्षा हेतु विशेष आयोजन।
बजट अलॉट हुआ। टेंडर रिश्तेदारों में बाँटे गए। सूखे पड़े लॉकर फिर से फूलने लगे। प्रवेश-द्वार पर शर्त लगीकेवल रिश्वत के पुराने यार ही अन्दर आएँगे; नए लोग पास खरीदकर लाइव देख सकते हैं।
मुख्य पंडाल सजादो हजार के नोटों से। मंच पर भ्रष्टाचार मुख्य अतिथि था। उसके बगल में बैठी रिश्वतनई दो हज़ारी साड़ी में चमकती हुई, जैसे नोटबंदी ने उसका मेकअप ही बदल दिया हो।
भ्रष्टाचार ने भाषण दिया
तुम सबने मेरी बहन को सरेआम बदनाम किया है। जबकि तुम ही उसे हर विभाग में स्वागत में  पलक पांवड़े बिछाए रहते हो । आज, इस पवित्र पर्व पर, तुम सब मेरी बहन से राखी बंधवाओगे। इससे जनता को लगेगा कि रिश्वत और लोकतंत्र में कोई अवैध संबंध नहींये तो भाई-बहन का पावन बंधन है!
तालियाँ गूँज उठींजितनी नकली, उतनी ज़ोरदार।
विपक्ष ने हल्का विरोध किया, पर भ्रष्टाचार ने समझाया
देखो, आज सत्ता में वह है, कल तुम होगे। रिश्वत न इधर की है न उधर कीयह तो ममता की तरह सर्वदलीय है। तुम सबकी सात पीढ़ियों का रिकॉर्ड मेरे पास है। अगर अपनी फ़ाइलें बचानी हैं तो दूसरे की फ़ाइलें मत खोलो।
फिर बहन-भाई के इस महोत्सव की रस्म शुरू हुई। रिश्वत ने मंच पर रखा थाल उठायादो हजार की राखी के साथ।
सभी ने अपनी-अपनी कलाई बढ़ाई।
सभी ने नेग दिएलिफाफे मोटे थे, नाम पतले।
भ्रष्टाचार ने समझाया
सिर्फ़ नकद। क्यूआर कोड से पवित्रता भंग होती है।
रिश्वत खुश थी। भ्रष्टाचार प्रसन्न।
लोकतंत्र ने चैन की साँस ली। जनता बाहर खड़ी थीजैसे हर बार रहती है।
और इस तरह हर साल यह पर्व मनाया जाता है
रिश्वत की राखी, भ्रष्टाचार की कलाई, और लोकतंत्र का हँसता-रोता चेहरातीनों का त्रिवेणी संगम।
डॉ मुकेश असीमित
मेल ID- [email protected]
Gangapur City rajasthan 322201
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2 टिप्पणी

  1. मुकेश जी!

    शायद आपको पहली बार पढ़ा लेकिन मजा आ गया पढ़कर। वैसे इस व्यंग्य हम कम पढ़ते हैं। नहीं पढ़ते हैं ऐसी कोई बात नहीं।
    दरअसल शीर्षक पढ़कर आपका व्यंग पढ़ने की इच्छा हुई।
    शीर्षक रचना का प्रमुख आकर्षण होता है।
    *लोकतंत्र का रक्षाबंधन- पर्व*

    वास्तव में रिश्वत और भ्रष्टाचार भाई-बहन जैसे ही तो हैं।एक के बिना एक का काम न चले।

    *रिश्वत की राखी भ्रष्टाचार की कलाई और लोकतंत्र का हँसता रोता चेहरा।*
    जो भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, उनका चेहरा हँस रहा है और जो लिप्त नहीं हैं वे या जो दे नहीं पाते वे रोते हैं।
    भाई-बहन के पवित्र त्यौहार की नई झाड़ू से भी इस गंदगी की सफाई नहीं हो सकती आपके इस व्यंग को पढ़ते हुए लाल बहादुर शास्त्री जी का एक संस्मरण याद आया जब उनकी सरकारी गाड़ी उनके बेटे ने यूज़ कर ली थी और उन्होंने कितना ईंधन खर्च हुआ, यह जानकारी लेकर उसके पैसे अपने खाते में से दिये।उस पर भी पर्याप्त पैसे नहीं थे इसलिए किश्तों में दिये।
    जब नेता लोग ही सही नहीं हैं तो फिर अधिकारियों और जनता से क्या उम्मीद की जाए। पूरी एक चेन है जिसका सिग्नल ऊपर से मिलता है और सिलसिला नीचे से चालू होकर ऊपर तक पहुँचता है।
    वास्तव में यह त्रिवेणी का संगम ही है पर इसका पर प्रभाव कर्मनाशा सा है।

    कितनी अजीब बात है हिंदुस्तान में रहकर हम अपनी हिंदुस्तानियत को,या कहें भारत में रहकर भारतीयता को ढूँढते हैं।नीतिगत सांस्कृतिक पहचान तो पूरी तरह खो ही गई है।
    यहाँ तो चोर चोर मौसेरे भाई वाला किस्सा है।

    आपके इस व्यंग्य को पढ़कर हँसी तो आई ।व्यंग भी अच्छा लगा, पर व्यवस्था के लिये तकलीफ हुई।
    जितने भी व्यंग्य लिखे जा रहे हैं,अपेक्षाएँ तो सुधार की अपेक्षाओं से से जुड़ी हैं लेकिन जिन्हें सुधारना और सुधरना है वह इन्हें पढ़ते ही कहाँ हैं!
    कम से कम नेताओं और अधिकारियों के लिए व्यंग्य पढ़ना कंपलसरी हो जाना चाहिये।

    खैर….. एक बेहतरीन व्यंग्य के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।

  2. आपकी इस विस्तृत प्रतिक्रिया के लिए सविनय आभार आज के इस पाठक-विहीन समाज में यदि कोई आपकी रचना को न केवल पढ़ ले, बल्कि उसे पूरा पढ़े, तो यह किसी भी लेखक के लिए अपने-आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। उससे भी अधिक सुकून देने वाली बात यह है कि जब लिखा हुआ पाठक को पसंद आ जाए, तब लेखन सचमुच सार्थक हो उठता है।

    वरना आज तो लिखने का काम केवल उत्पादन बन गया है—हर तरफ़ शब्दों का अंबार है, लेकिन संवेदना और सरोकार की कमी साफ़ दिखाई देती है।

    व्यंग्य केवल हँसाने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह सार्थक प्रश्न खड़े करता है और पाठक को सोचने के लिए विवश करता है। यही व्यंग्य की असली शक्ति और ज़िम्मेदारी है, जिसे मैं निभाने की कोशिश करता हूँ

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