मेट्रो में उस प्रेमी जोड़े को देख कर हर कोई हैरान था। उन दोनों की जोड़ी हूर और लंगूर की लग रही थी। लड़की बहुत सुंदर थी और महंगे और शानदार कपड़े पहने हुए थी, वहीं लड़का सादा कपडे पहने हुए सांवला व दुबला-पतला नौजवान था। उसकी माली हालत भी कुछ ज्यादा ठीक नहीं लग रही थी। जबसे वे दोनों मेट्रो में सवार हुए तबसे दोनों में प्यार की पींगे बढ़ती ही जा रही थीं। मेट्रो में सफर कर रहे अन्य प्रेमी जोड़ों को उस प्रेमी जोड़े के आगे अपना प्रेम बड़ा फीका सा लग रहा था।
उन्हें यूं प्रेम में डूबे हुए देख कर लैला-मजनू, हीर-रांझा, शीरी-फरहाद और न जाने कितने और ऐतिहासिक प्रेमी जोड़े याद आने लगे। एक मेट्रो स्टेशन पर प्रेमिका उतर गई। प्रेमी ने नम आंखों से उसे विदा किया और वापिस मेट्रो की सीट पर आकर बैठ गया। मेट्रो का पूरा डिब्बा इस बिछोह के दृश्य को देख कर द्रवित हो उठा। कुछ देर बाद प्रेमी दहाड़े मार कर रोने लगा। लोगों ने उसके दुःख को साझा करने का प्रयास किया।
एक यात्री ने उससे पूछा, “कितने सालों का पुराना प्रेम है तुम दोनों का?”
“सालों पुराना नहीं कुछ घंटों पुराना है।” प्रेमी ने सुबकते हुए बताया।
दूसरे यात्री ने चौकते हुए उससे पूछा, “कितने घंटों पुराना?”
“चार घंटों पुराना।” प्रेमी ने बताया।
मेट्रो में यात्रा कर रहे एक अन्य प्रेमी से ये बर्दाश्त नहीं हुआ, “अबे, एक साल तो मुझे भी हो गया प्यार में डूबे हुए लेकिन इतना तो मैं भी कभी अपनी प्रेमिका से बिछड़ते हुए नहीं रोया जितना तू रो रहा है।”
उस प्रेमी के बगल में खड़ी उसकी प्रेमिका को ये बात अच्छी नहीं लगी और प्रतिक्रिया स्वरूप उसने अपने प्रेमी के एक जोरदार कोहनी मारी।
ये सुन वो प्रेमी झल्लाहट में चीखा, “अरे, मैं प्रेम की खातिर नहीं रो रहा हूं। मैं तो उस डायन के कारण रो रहा हूं।”
एक शायर मिजाज बुजुर्ग अपने मुंह में रखे जर्दा और उसकी बिरादरी के बाकी सदस्यों को एक तरफ करते हुए बोले, “अमां, हम तो तुम दोनों को मॉडर्न लैला-मजनू समझ बैठे थे, पर तुमने तो अपनी लैला को डायन बता दिया।”
मॉडर्न मजनू ने बिलखते हुए कहा, “चचा, माना तो मैंने भी उसे लैला ही था पर उसका मन बड़ा मैला निकला।”
“वो कैसे भला?” बुजुर्ग ने हैरान हो पूछा।
“जब हुड्डा सिटी सेंटर में मेट्रो में साथ चढ़ी थी उसने अपनी नशीली आंखों का ऐसा जादू डाला कि मै उसे लैला और खुद को मजनू मान बैठा। कुछ घंटों में ऐसा लगा कि हम दोनों का जन्मोजनम का साथ है। पर मैं गलत था।” प्रेमी ने सुबकते हुए बताया।
“वो भला कैसे?” एक जासूस टाइप के अंकल ने पूछा।
प्रेमी ने एक लंबी सांस ली और फिर धीमे-धीमे सांस को छोड़ते हुए बोला, “मैं उसकी बाहों में ऐसा जकड़ गया था, कि उस जकड़न से बहुत देर तक छूट न सका। मुझे ऐसा लग रहा था कि जैसे मैं स्वर्ग में हूं और मुझे किसी अप्सरा ने अपनी बाहों में भर रखा है।”
प्रेमी की बात सुन कर शायर मिजाज बुजुर्ग अपनी जवानी के दिनों में खोते बोले, “होता है, होता है, जब इश्क़ में डूबे हों तो ऐसा ही होता है।“
“पर चचा, जिसे इश्क़ समझा वो फरेब था।“ प्रेमी ने सुबकते हुए कहा।
शायर मिजाज बुजुर्ग ने हैरान हो पूछा, “वो भला कैसे?”
“वो फरेबी लड़की मुझे बाहों में जकड़े-जकड़े मेरा सबकुछ साफ़ कर गयी। पर्स, मोबाइल और मेरी सोने की चैन जो अभी एक हफ्ते पहले ही खरीदी थी सब ले उड़ी।“ इतना कह कर वो प्रेमी दहाड़ मार कर रोने लगा।
उस बेचारे प्रेमी की सच्चाई जानकर मेट्रो में मौजूद जहां बाकी प्रेमियों ने चैन की सांस ली, वहीं शराफत का लबादा ओढ़े जेबकतरों व जेबकतरियों ने उस महाजेबकतरी लैला को मन ही मन सलाम किया।
शायर मिजाज बुजुर्ग से ये सब बर्दाश्त नहीं हुआ और उन्होंने झल्लाते हुए कहा, “लाहौल विला कुव्वत! ये आजकल फास्ट फूड इश्क़ भी गजब ढा रहा है।“ इतना कह कर वह अगले मेट्रो स्टेशन पर उतर गए और कैमरे की नज़र बचा कर मेट्रो के सफ़र के दौरान अपने मुँह में इतनी मेहनत से इकठ्ठा किए गए सारे तामझाम को मेट्रो की पटरी को पूरी इज्जत के साथ सौंप दिया।
शब्दो को सरल भाव और कहानी मे जीवंत करने मे लाजवाब है आप बड़े भाई साहब बहुत सुंदर बधाई हो