Wednesday, February 11, 2026
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डॉ. यशोधरा भटनागर की तीन लघुकथाएँ

1 – मिट्टी पिंड दी
“मिन्नी हुण थोड़े दिन वास्ते एत्थे आ जा।रह जा थोड़े दिन अपनी बीजी कोल।” बीजी की आवाज़ और आवाज़ में दर्द अभी  भी भीतर तक महसूस हो रहा है।न जाने क्यों मन अनजाने भय से घबराने सा लगा।
     पहली फ्लाइट से ही भारत चली आई।
       बार-बार बीजी का चेहरा आँखों के सामने घूमने लगा। ममता से पगी बड़ी-बड़ी आँखें,चंपई रंग,ऊँची-पूरी सिक्खनी। बीजी दादी कम दोस्त ज्यादा है।तीन बरस की ही तो थी जब मॉम और डैड अमेरिका शिफ्ट हो गए थे। कितना रोई थी बीजी से चिपक कर। धुंधली यादों में वह चित्र उसकी आँखों में आज भी बसा हुआ है।बस वीडियो कॉल से ही बीजी  से बातें होती रहीं पर उसका दिल बीजी से पहले सा जुड़ा रहा। 
       छुट्टियों में बीजी के पास पिंड आती तो दिन पंख लगा कर फुर्र से उड़ जाते।
           खेत-खलिहान,नहर की सैर के लिए बीजी अपने  साथ ही ले जातीं। नन्हीं मिन्नी से लेकर युवती मिन्नी तक के सभी सवालों के जबाब बीजी के पास होते।
“बीजी ये पीले फूल किन्ने सोने हैं।”
“पुत्तर ऐ सरों दे खेत ने।
फिर सरसों,मैथी, बथुआ,मूली ,गाजर, टमाटर सब दुपट्टे में बाँधे घर लौटते।
     “ हीरन तो महंगे असी रोहलती मिट्टी
बन हकदार मेरी रग-रग दी….”
 गाते बीजी कहीं खो सी जातीं।
शाम को लाल तप्त तंदूर पर बीजी कुरकुरी रोटी उतारतीं तो मैं मंत्र मुग्ध सी उन्हें देखती रहती।
“लै हुण रोटी खा ले।” बीजी बड़े प्यार से थाली मेरे हाथ में थमा देतीं।
    मा-छोले की दाल,आलू-गोभी, टमाटर की सब्जी,कटी हुई मूली और मक्खन से तर तंदूरी रोटी। अमेरीका में कैसे तरस जाती है बीजी के हाथ के खाने के लिए।
     एयरपोर्ट से पिंड का रास्ता बहुत ही लंबा लग रहा था।मन में उथल-पुथल और बढ़ गई।  वाहेगुरु मेरी बीजी की रक्षा करना। 
         सरदार हरपाल सिंह की कोठी पहुँचते ही सामान गुलाबो को थमा मैं बीजी के कमरे की ओर दौड़ गई।
“आ गया मेरा पुत्तर!मेरा बच्चा!”
“पैरी पौना बीजी।ओह व्हाट हैपेंड टू यू माय फ्रैंड?हाऊ आर यू?” चारपाई पर लेटी बीजी से लिपटते हुए मैंने कहा।
“मरजानिए गिटपिट ही करेगी या …”बीजी ने नकली गुस्सा करते हुए कहा तो मैंने बीजी को अपनी बाँहों के घेरे में और ज़ोर से कस लिया। बीजी की वही खूश्बू अंदर उतर आई जब बीजी अपनी छाती से चिपका कर, लोरी गाकर मुझे सुलाते थीं।
“कितने कमज़ोर हो गये हो बीजी आप!”मेरी रुलाई फूट पड़ी।
“बुढ़ापा है लाडो!वाहे गुरु दा बुलावा कदों आ जाए पता नहीं।बस तेरे विच जीव अटका होया सी।”
“नहीं बीजी ऐसा नहीं कहते।”मैंने बीजी के मुँह पर अपना हाथ रखते हुए कहा। 
  बीजी मुश्किल से बैठ पा रहीं थीं। एक बारगी लगा कि क्या वाकई में बीजी मेरे ही इंतजार में बैठीं हैं। उनके हाथ की पकड़ ढीली पड़ रही थी। दाएँ हाथ की मुठ्ठी में कस के दबा रखी लाल कपड़े की पोटली मेरी ओर बढ़ा दी।
“लाडो तेरा ही इंतज़ार कर री सी मैं।हुंण तू आ गई है ले संभाल अपनी थाती।” तिल्ले वाली कढ़ाई की लाल मखमल की पोटली बीजी ने मेरे हाथ में थमा दी। धीमे से उनके होंठ बुदबुदाए-” पिंड दी मिट्टी…वतन दी मिट्टी… ”             
    दूर कहीं आवाज सुनाई दे रही थी “हीरन तो महंगे असी रोहलती मिट्टी बन हकदार मेरी रग-रग दी…”
  मैं बीजी की अंतिम भेंट हाथों में दबाए बीजी को विदा कर रही थी।
2 – माँ
कैसी होगी माँ? जब से ओल्ड एज होम से केयर टेकर का कॉल आया है उसे एक पल के लिए भी चैन नहीं।फ्लाइट में बैठे-बैठे अतीत उसकी आँखों के सामने से गुजरने लगा।
     अच्छे से बहुत अच्छे जॉब के लिए वह अपने शहर से दूर चला आया पर इतनी दूर भी नहीं। हर सैटरडे-संडे माँ के पास चला जाता। 
       धीरे-धीरे बढ़ती उम्र के चलते माँ की तबीयत गिरने लगी।वह अकेला माँ की देखभाल करें या अपनी नौकरी संभाले? ऐसी नौकरी जिसमें दिन के पूरे चौबीस घंटे भी समा जाएँ तो कम।माँ की देखभाल के लिए वह उन्हें अच्छे ओल्ड एज होम ‘सांझी छत’ में ले आया।सैटरडे-संडे माँ से मिलने का क्रम जारी रहा पर बेहतर और बेहतर पैकेज की चाह और ज़रूरत के चलते बदलती नौकरियाँ, बदलते शहरों  के कारण माँ और उसकी दूरी बढ़ती चली गई।
    और आज यह फोन कॉल! सड़क पर भागती टैक्सी संग भागता उसका मन रो पड़ा।
             टैक्सी ‘सांझी छत’ रुकी और वह बेतहाशा दौड़ता हुआ माँ के कमरे में पहुँचा।
   माँ दीवार की ओर करवट लिए लेटी थी शायद सो रही थी।
    “मुझे माफ कर दे पर क्या हो गया क्या करता?मैं तुझे बहुत प्यार करता हूँ। क्या करूँ नौकरी ही ऐसी है बारह बारह घंटे काम। पहले सैटरडे-संडे मिलता था… अब वह भी नहीं पर तुझे फोन तो करता था न।” माँ से लिपट वह सुबकने लगा।
      माँ ने क्लांत मुख से बेटे की ओर देखा और बोली -”बेटा पेपर में न्यूज़ थी-ऑफिस वर्क प्रेशर के चलते एंप्लॉई ने सुसाइड… “और उससे लिपट वह फफक कर रो पड़ी।
3 – पत्थर दिल
पत्थर हूँ मैं !पत्थर!पड़ा हूँ,बस पड़ा ही रहता हूँ।
       कोने वाले मकान के मालिक ने मुझे सड़क के मोड़ पर रख दिया ताकि उसकी अपनी परिधि बढ़ जाए।
       आते-जाते तो बहुत से लोग हैं,गिरते भी हैं, चोटिल भी होते हैं ।पर किसी ने भी मुझे न सरकाया।
           आज साइकिल सवार नन्हा बिल्लू मुझ पर गिर गया। सिर से खून का फव्वारा बहने लगा। वह बहुत जोर से रोने लगा। रोना तो मुझे भी आ रहा था पर प्रकृति ने मुझे आंँसू दिए ही नहीं। बस मन बहुत दुखी हो गया। कितना लाचार हूँ मैं! अपनी जड़ता को कोसता हूँ। 
भला हो मैडम जी का। मैडम ने मुझे रक्तरंजित देखा तो कुछ युवकों की मदद से मुझे सड़क के एक ओर पेड़ के नीचे, सरका दिया।
     कुछ राहत महसूस हुई। दोस्तो! पत्थर हूँ तो क्या? मैं किसी को भी चोट पहुँचाना नहीं चाहता। चोटिल हो सकता हूँ पर किसी का खून नहीं बहाना चाहता। पेड़ -पौधों और वल्लरियों के साथ मैं बहुत खुश हूँ। पत्थर दिल होना पत्थरों की फितरत नहीं…।

डॉ.यशोधरा भटनागर
संपर्क – [email protected]
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3 टिप्पणी

  1. यशोधरा जी,

    आपकी तीनों ही लघु कथाएँ बहुत संवेदनशील हैं।

    अपनी जन्मभूमि की मिट्टी सात समुंदर पार
    भी अपने देश से जोड़ कर रखती है।
    पहली लघुकथा ,”मिट्टी पिंड दी” इसी कथन की पुष्टि करती है।
    दादी पोती में दोस्ती का रिश्ता ज्यादा था। इसलिए उनकी खबर पाते ही मिन्नी पहली ही फ्लाइट से दौड़ी चली आती है और आने पर देखती है कि दादी काफी कमजोर हो चुकी हैं।दादी उसे तिल्ले की कढ़ाई वाली लाल मखमल की पोटली देते हुए कहती हैं –
    *पिंड दी मिट्टी …. वतन दी मिट्टी….*
    *हीरन तो मंहगी असी रोहलती मिट्टी*
    *बन हकदार मेरी रग-रग दी*

    वतन की मिट्टी का विदेश में भी पास रहने का अहसास अपनों से, अपने रिश्तों को अटूट रखता है, जोड़कर रखता है। जन्मभूमि की मिट्टी, देश की मिट्टी इतनी प्रिय होती है कि उसके लिये हर कष्ट सहकर भी प्राण देने की ललक रहती है।

    दूसरी लघुकथा *”माँ*
    इस कहानी में माँ के प्रति प्रेम और जी तोड़ नौकरी की मारा-मारी के मध्य ,मजबूरी के बंधन में गसे रिश्तों की पीड़ा का संवेदनशील अनवरत प्रवाह है।
    अकेले होने के कारण माँ को साँझी छत में रखना, सुरक्षा , आराम व देखरेख की दृष्टि मजबूरी की जरूरत थी।
    माँ के पास पहुँचने पर जब माँ न्यूज़ की बात बताती है कि,”बेटा पेपर में न्यूज़ थी -ऑफिस वर्क प्रेशर के चलते एंम्पलॉई ने सुसाइड….।”
    माँ बेटे दोनों गले लिपट के रो रहे थे।
    बेहद-बेहद मार्मिक।

    तीसरी लघुकथा “पत्थर दिल” प्रतीकात्मकता में मनुष्य के संवेदनहीन होती मानवता या कहें इंसानियत के बरक्स पत्थर की पीड़ा है।
    पत्थर निर्जीव है पर बुद्धि होने पर भी ,ठोकर खाकर भी, व्यक्ति को समझ में नहीं आता कि इस पत्थर को बीच से हटाकर किनारे रख दिया जाए ताकि किसी को ठोकर न लगे।
    यही पत्थर का दर्द है। वह तो पत्थर है ही पर फिर भी किसी को वो स्वयं चोट नहीं पहुँचाता
    लेकिन लोग इतना कोमल दिल रख कर भी पत्थर हो जाते हैं अगर वह यह नहीं समझ पाएँ कि पत्थर को बीच राह से हटा दें ताकि उन्हें भले ही चोट लग गई, किसी और को न लगे।

    तीनों ही लघु कथाएँ अभिव्यक्ति की तीव्रता को व्यक्त करती हैं।

    एक -प्रवास में भी देश के मिट्टी के प्रति प्रेम को व्यक्त करती है।
    दूसरी-पैसा,नौकरी, परिवार के मध्य मजबूरियाँ, जहाँ प्राइवेट नौकरी में बेइंतहा काम लेने पर मजबूरी में लोग आत्महत्या कर लेते हैं,प्राण ही सस्ता है बाकी सब कुछ महंगा लगता है।
    तीसरी कहानी में पत्थर का दर्द है कि पत्थर इतना कठोर नहीं है जितना मनुष्य का दिल

    बेहतरीन लघुकथाओं के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।

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