Wednesday, February 11, 2026
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पूजा अग्निहोत्री की दो लघुकथाएँ

स्ट्रैचमार्क्स
नवल और नीता का प्रेम विवाह था। लेकिन जबसे उनके जीवन में नन्ही परी ने दस्तक दी उनके परिवार में तो खुशियाँ बढ़ी लेकिन उन दोनो में दूरियाँ बढ़ती जा रही थी।
कारण भी समझ में नही रहा था।
ये बात नवल की माँ को भी महसूस हो रही थी, पर वो मर्यादावश चुप थी और नीता लज्जावश।
एक दिन परेशान होकर उसने नवल से पूछ ही लिया, अब ऐसा क्या हुआ कि आप अब मुझसे दूर दूर रहते है।
कुछ भी तो नही।
नही कुछ तो है, बताओ मुझे सच सुनना है।
तो सुनो, तुम्हारे शरीर (पेट) पर पड़े निशान देखकर मुझे घिन आती है। ऊपर से तुमने जो मोटापा बढ़ाया है न, इससे तुम पहले जैसी रही ही नहीं।
जैसे ही पति ऑफिस के लिए निकले तो सासू माँ ने बहु की आँखें नम देखी। उन्होंने ज्यों ही पूछा उसकी रुलाई फुट पड़ी।
और जब उन्होंने प्यार से सर पर हाथ रखकर पूछा तो नीता के अंदर का लावा शब्दों के रूप में फूट पड़ा। 
उसने बताया, “माँ जी, इनको अब मैं पसंद नही, इन्होंने  कहा कि मेरा बेडौल शरीर देखकर घिन आती है, मेरे पेट के निशान देखकर उल्टी करने का मन होता है।
शाम को जब नवल घर लौटा तो माँ ने उसके सर में तेल डालने के बहाने से बात शुरू की, और उसे बताया – “दुनिया की कोई भी समतल वस्तु खूबसूरत नही हो सकती। जब तक कि प्रकृति उसपर अपनी चित्रकारी करे। चाहे वो उन्नत पर्वत श्रृंखला हो या मरुथान के वलय। ठीक उसी तरह स्त्री की देह पर बनने वाले माँसल वलय और उसके पेट पर प्रसव के बाद पड़ने वाले  खरोंच के निशान दुनिया की सबसे खूबसूरत पेंटिंग होती है जो उसके बच्चे ने बनाई होती है।“
नवल की समझ में माँ की बात गयी, और उसने मन ही मन आज की रात को मधुरयामिनी बनाने का निश्चय कर लिया और पैदल ही चौराहे की तरफ निकल गया, मोगरे की वेणी खरीदने।
कौन
सुबहसुबह डायनिंग टेबल पर कप और प्लेट आपस में बात कर रहे थे। कप ने कहा, -“अपना अस्तित्व मिटाकर दूसरों को खुश करना कोई इससे सीखे।
सच कहा तुमने, कितनी तपन झेलती है, ताकि किसी के मुँह का स्वाद बना सके।
हाँ जैसे पैदा ही रंग भरने के लिये हुई है।
देखो, इसके साथ पाते ही पानी भी रंगीन होकर महक उठता है।
साथ ही ऊर्जा और ताजगी देने में भी इसकी कोई बराबरी नही कर सकता।
सच! इंसानो के लिये अस्तित्व मिटाने के बाद खाद बनकर प्रकृति के फूलपौधों में रंग भरती है।
कौन?” चौंक कर प्लेट ने पूछा।
चाय! और तुमने क्या सोचा?” कप ने प्रतिप्रश्न किया।
मुझे लगाऔरत‘, वो भी तो

पूजा अग्निहोत्री
जन्म – 4 सितंबर , 1983
जन्मस्थान – छतरपुर (मध्यप्रदेश)
शिक्षा – इंटरमीडिएट (विज्ञान संकाय), स्नातक (कला संकाय), परास्नातक (अंग्रेजी साहित्य), पीजीडीसीए।
संप्रति – स्वतंत्र लेखन, पटकथा लेखन,
अभिरुचि – पाककला, पोषाक सज्जा।
प्रकाशित / अप्रकाशित – अभिनव इमरोज, लघुकथा कलश, किस्सा कोताह, विश्वगाथा, स्रावन्ति (दक्षिण भारतीय हिंदी प्रचारिणी महासभा), दृष्टि, क्षितिज, क्राइम ऑफ नेशन, पलाश, धर्मयुग, इत्यादि पत्रिकाओं एवं समाचार-पत्रों में लगातार लघुकथाएँ, कविताएँ, आलेख आदि प्रकाशित।
साझा संकलन – काव्य पुंज, दास्तान-ए-किन्नर।
यूट्यूब चैनल (किडलॉजिक्स, बैडटाइम स्टोरी) के लिये पटकथा लेख ।
विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में साहित्यिक पुस्तकों की समीक्षा प्रकाशित ।
मोबाइल – 7987219458
ईमेल – [email protected]
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2 टिप्पणी

  1. आदरणीय पूजा जी! आपकी पहली लघुकथा ज्यादा अच्छी लगी। सासू माँ ने अच्छा समझाया।
    दूसरी लघुकथा सामान्य लगी।
    दूसरी पंक्ति में ही ‘कौन’ का जवाब मिल गया था कप और प्लेट से समझ में आ गया था कि चाय है। अगर बीच में ही उत्तर मिल जाता है तो आगे कोई बढ़ना नहीं चाहता फिर भी हमने सोचा कि आगे जाते हैं और अंतिम पंक्ति में प्लेट सोचती है कि जवाब औरत होगा।
    कहानी संवेदनशीलता नहीं जगा पाई अपने प्रति।

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