Sunday, April 19, 2026
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इंद्रजीत कौर की व्यंग्य-कथा – चर्बी वाली पिचकारी

होली जैसे रंग-बिरंगे त्यौहार में प्रेम्मो के आने की खबर सुनते ही सुरतीलाल का मन रंगीन हो गया। उसकी खुशियाँ आसमान छूने लगीं। हालाँकि छह दिन बाकी थे पर उसकी तैयारियाँ अभी से दौड़ पड़ी थी। शीशे में देखकर कभी अपने सफ़ेद बाल खींचकर निकालता तो कभी बीबी से छिपकर मुँह पर फेयरनेस क्रीम लेप लेता। यहाँ तक कि आधी रात को ऑरेंज फेस पैक भी दो बार लगा लिया था उसने। बढ़ी तोंद को कम करने के लिए गर्म पानी में नींबू निचोड़कर तभी से पीना शुरू कर दिया था जब से उसके आने की खबर मिली थी। साथ में पिज़्ज़ा, बर्गर, मलाई, पनीर वगैरह को भी दूर से नमस्ते कर चुका था।
  हो भी क्यों न? प्रेम्मों के लिए सुरती के मन में कभी देसी घी के लड्डू जो फूटा करते थे। एक साथ पढ़ते थे। पड़ोसन भी थी वो।  
“वो तो दहेज़ के चक्क्कर में माँ–बापू ने मेरी सादी इस मोटी अनीता से कर दी वरना आज, मैं और प्रेम्मो…प्रेम्मो और मैं… ओह…आज तुम होती तो मैं ऐसा होता… यहाँ घूमता, वहाँ घूमता और हर नयी फिल्म देखता, गर तुम होती तो…अब तुम आ रही हो…होली भी आ रही है…सच्च, कितना मज़ा आएगा!” सुरतीलाल आँहें भरकर सोच में डूबा जा रहा था। कभी इधर करवट लेता तो कभी उधर। कई बार वह पलंग से नीचे गिरते-गिरते भी बचा था। उसके सपने तो जैसे मुंगेरीलाल वाले हो गए थे, रूकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।
 “…मैं तुम्हारे कमसिन बदन पर हर तरह के रंग लगाऊँगा। गाल पर लाल रंग…अरे वो तो लाल हैं हीं…फिर भी और लाल कर दूंगा। (सोचते ही उसका मुँह भी लाल हो गया) हाँ, बालो में सुनहरा रंग और गोरी कमर…गोरी कमर पर तो हरा लगाऊंगा हरा…हाँ…देखना, बड़ा मज़ा आएगा। सुनो! मौका देखकर तुम्हें अपनी बाँह में भी भर लूँगा… अनीतवा तो कलमुँही दो बांहों में भी नहीं आ पाती, तुम्हारी पतली कमरिया तो एक्को बाँह में आ जाएगी…सच्च, बड़ा मन कर रहा है मिलने को…कित्ते साल हो गए तुम्हें देखे हुए… ओह! मेरी प्रेम्मो…।”
वह रंगीन कल्पनाओं में डूब चुका था। इतना खुश था कि होली के लिये रंग लेने बाजार खुद ही पहुंच गया, वरना उसने तो कभी रंग खरीदा ही नहीं था। जो भी उसे लगाता, उसी में से थोड़ा रंग लेकर सामने वाले को लगा देता।   
आज रंगों की दुकान में खड़े होकर वो चारों तरफ आँखे फाड़ कर देख रहा था। हर रंग के साथ अलग सपने भी बुन रहा था।  
“कौन-कौन से रंग दे दूँ ?” दुकानदार ने पूछा। 
“हूँ” सुरती ने कोई खास जबाब नहीं दिया।
“ भाई, मैंने पूछा कौन-कौन से रंग दे दूँ और भी ग्राहक खड़े हैं?” इस बार उसने गुस्से में पूछा।  
“भाई, सारे दे दो…हरा, लाल, पीला, नीला, सुनहरा रंग…सारे फटाफट।”  सुरती ने घबरा कर झटके में बोला।
“हाँ, ये लो, चार सौ हुए चाचा।”
“अबे चचा होगा तूँ और तेरा बाप…समझे।”
“बौरा काहें रहे हो…कौनो गलत कह दिया का?”
“अबे, भाई नहीं बोल सकता?…मैं तेरा चाचा लगता हूँ? बोल !!”
“माफ़ करो भैयाजी…बहुत बड़ा जुलम हो गवा।” उसने हाथ जोड़े और जुड़े हुए हाथ अपने माथे पर लगा लिये।
 सुरती थोड़ा झेंप गया। उसके चारों तरफ भीड़ इकट्ठा हो गयी थी। धीमीं आवाज़ में अपने गुस्से का कारण दुकानदार को बता डाला, “यार जब भी कोई मुझे ‘चाचा’ या ‘अंकल’ कहता है तो मेरा पारा हाई हो जाता है…देख मैं इत्ता बड़ा लगता हूँ क्या?…नहीं न?…सुनो! प्रेम्मो आ रही है।”
“क्या?…कौन पेम्मो?”
   “अरे तुम नहीं समझोगे, लो रंग के पैसे…यह पाँच सौ का नोट है…हाँ सुन्न…कीप द चेंज।” सुरती लाल ने हिलते और शर्माते हुए कहा। सिर ऐसे झुक गया था कि अभी वह जमीन में धंस जाएगा। “आज न छोड़ेंगे…खेलेंगे हम होली’ मन ही मन गाते हुए दुकान से बाहर आ गया। घर पहुँचने तक उसके मुँह में गाने और मन में सात्विक चिंतन चलते रहे।
 आखिर होली वाला दिन आ गया।
 सुरती सुबह से ही बाहर खड़ा हो गया। उसका दिल ट्रैक्टर की आवाज से भी तेज धड़कने लगा। ऐसा लग रहा था कि ट्रैक्टर यहाँ होता तो शर्म के मारे औजार-औजार हो जाता
  उसका बेसब्री से किया हुआ इंतज़ार रंग लाया। पीछे से आती हुई एक लाल रंग की गाड़ी अचानक पड़ोस में रुकी। सभी लोग गाड़ी से उतर गए। प्रेम्मो नहीं दिखी। सुरती इधर-उधर तांका-झांकी करने लगा। 
 “कहाँ गई मेरी प्रेम्मो? कहीं दूसरी गाड़ी से तो नहीं…वो आई भी थी कि नहीं।” बुदबुदाते हुए उसने पीछे मुड़कर देखा कोई गाड़ी नहीं थी। परेशान हो गया। उसने चारों तरफ नज़रें दौड़ाईं। वो कहीं न दिखी। उदास का भी दास हो गया वो। आँखों में सुनामी आ गई थी। रंगो को सड़क पर फेंकने की इच्छा हो रही थी। सिर दीवार पर सटाक से पटकने का मन कर रहा था उसका। जो बासन्ती मन अभी फड़-फड़ा रहा था, पतझड़ हो गया। वह भारी मन से घर की ओर मुड़ने लगा।
“कैसे हो सुरती?” अचानक किसी ने पीछे से कंधे पर हाथ धर कर पूछा। उसे आवाज जानी पहचानी लगी। मुड़ते ही तुरंत पहचान तो नहीं पाया पर ध्यान से देखने पर आश्चर्य भरी चीख निकल पड़ी, “प्रेमा तुम्म? अरे कैसी हो?” इतना बोलकर वह दो कदम पीछे हट गया। 
“तूने पहचाना नहीं?”
“हां…हां…हां क्यों नहीं? कैसी हो?…कब आई?” उसने प्लास्टिक मुस्कान बिखेरते हुए कहा।
“अभी गाड़ी से ही तो…!” प्रेम्मो ने आश्चर्य से कहा।
दरअसल सुरती लाल ने पीछे से ही सबको देखा था। शादी से पहले वाला प्रेम्मो का भौगोलिक आकार-प्रकार बदल चुका था। उसकी कमरिया अब कमरा बन गई थी। कमसिन गालों में रसगुल्ले भर गए थे। हाथ, हाथी के पाँव जैसे हो गए थे। अपनी प्रेम्मो के प्रति सुरती की दृष्टि संकुचित और परम्परागत थी इसीलिए वह पहचान नहीं पाया था।
 “इनसे मिलो, ये हैं मेरे पति, सॉफ्टवेयर इंजीनियर राहुल और इधर हैं मेरे सास-ससुर।”
“अरे वाह! पूरा परिवार आया है। मुझे लगा बस तुम ही आओगी मायके घूमने…।”  अंतिम पंक्ति ऐसे बोली जैसे धीमी गति का समाचार पढ़ रहा हो। उसे देखकर गला रुंध गया था। ऐसा लग रहा था कि शेयर मार्केट धड़ाम से नीचे गिर गया हों। भगवान उसके खिलाफ षडयंत्र रच रहा हों। उसने आसमान की तरफ देखा और प्रेम्मो समेत सभी को हाथ जोड़कर नमस्ते करके घर आ गया। 
 वह उदासी की गहराईयों में गोते लगाने लगा। मुँह बड़े वाले गोल ताले की तरह लटक गया और आँखें सोयी सी हो गईं थीं। उसकी मायूसियत और मनहूसियत को कोई जान नहीं पाया। वह कमरे में आया और पलंग पर धम्म से लेट गया। उसने अपने आप को बहुत समझाने की कोशिश की। चिंतन-मनन किया। कमरे की सीलिंग को देखते हुए दांये-बांये, ऊपर-नीचे, इधर-उधर सभी कोणों से सोच मारा। पंखे की पत्तियों की तरह तीन सौ साठ डिग्री तक अपना दिमाग घुमाया और एक अनोखे निष्कर्ष तक पहुँच गया,
“मर्द मोटे हो सकते हैं तो औरतें क्यों नहीं? वे भी तो इंसान हैं। चढ़ने से पहले चर्बी पूछती थोड़े ही है कि तुम मर्द हो कि औरत? औरतिया तो कभी अपने पति से सिकायत नहीं करती कि तोंद लटका कर धन्नो सेठ क्यों बनते जा रहे हो?…सादी के टैम तो तुम सलमान खान थे?…सच्च।” 
सुरती चिंतन करते हुए सो गया। थोड़ी देर में उसकी आँखें खुलीं तो हल्का महसूस कर रहा था। अचानक उसे लगा कि मुँह पर कोई फव्वारे से पानी डाल रहा हो। बुरी तरह गीला हो गया था वो। आँखों से पानी हटाने के बाद उसने ध्यान से देखा। उसकी बीबी अनीता पिचकारी हाथ में लिए मुस्करा रही थी। वो थोड़ा ठिठका। कुछ पलों के लिए उसने आंखे बंद कर लीं। 
अचानक उठ पड़ा। पलंग के कोने में पड़े रंगों को उठाया और हँसते हुये बीबी के गालों पर लगा दिया। उसे  दोनों हाथों में भरने की कोशिश की। हालाँकि वह असफल रहा पर ‘कोई बात नहीं’ का  भाव चेहरे पर साफ दिख रहा था।

इंद्रजीत कौर
गाजीपुर जिले में जन्म। बचपन से साहित्य के प्रति रूचि व लेखन। लगभग तीस   वर्षों से व्यंग्य-लेखन में सक्रिय। क्षेत्रीय, राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में भी व्यंग्य प्रकाशित ।सांझा व्यंग्य संकलनों में व्यंग्य प्रकाशित। पंजाबी पत्रिका ‘पंजाबी सुमन’ में लगभग दो वर्षों तक  मासिक स्तम्भ लेखन । हास्य व्यंग्य पत्रिका ‘अट्टहास’ में लगभग बारह  वर्षों तक स्तम्भ लेखन। आकाशवाणी और दूरदर्शन कार्यक्रमों में भागीदारी। अनेक पुरस्कारों व सम्मानों के व्यंग्यगंधा सम्मान , यू. पी. प्रेस क्लब की तरफ से सृजन सम्मान, ज्ञान चतुर्वेदी राष्ट्रीय व्यंग्य सम्मान , उ. प्र. हिन्दी संस्थान लखनऊ की तरफ से शरद जोशी सर्जना पुरस्कार प्राप्त ।
व्यंग्य संग्रह -‘ईमानदारी का सीजन’, ‘पंचरतंत्र की कथाएं’, चुप्पी की चतुराई, ‘चयनित व्यंग्य रचनाएँ’, ‘एनहा दी वी सुनो’ (पंजाबी व्यंग्य संग्रह ) व हथौड़ा (शीघ्र प्रकाश्य)  
वर्तमान मे बेसिक शिक्षा विभाग, सीतापुर में कार्यरत। 
मोबाइल   –  7380739992
ईमेल – [email protected] 
twitter – @kaur_indrajeet,  ब्लॉग – indrajeetnama.blogspot.in 
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