कुछ दिनों से मेरे घर में मरम्मत का काम चल रहा था। आज मिस्त्री रोज आ रहे दो मजदूरों में से एक की जगह एक बारह-तेरह वर्ष के बच्चे को ले आया। वह मिस्त्री और दूसरे मजदूर की मदद कर रहा था। एक को कुदाल फावड़ा पकड़ाना, तो दूसरे को मिटटी की टोकरी तो फिर पहले वाले को रोड़ी। विभिन्न वस्तुओं को नीचे से ऊपर पहुँचाते हुए वह फिरकी की तरह सीढ़ियों पर घूम रहा था। मेहनत वह कर रहा था, लेकिन तकलीफ श्रीमती जी को हो रही थी। आखिरकार उनसे नहीं रहा गया और पहुँच गयीं मिस्त्री की खबर लेने।
“भैया इस बच्चे को कहाँ से पकड़ लाये?”
“अरे, हमारा बेटा है मैडम? ऐसे ही किसी को पकड़ लाएंगे क्या? कैसी बात कर रही हैं, मैडम आप ?”
“सॉरी मेरा मतलब था कि अभी इसकी पढ़ने की उम्र में इससे मजदूरी करा रहे हो। पढ़ने क्यों नहीं भेजते। सरकारी स्कूलों में तो पढाई मुफ्त होती है। ऊपर से किताबें, ड्रेस और साथ में एक समय का खाना भी मुफ्त मिलता है।”
“पैसे की बात नहीं है मैडम, इतना तो हम कमा ही लेते हैं, मगर ये ससुर पढ़ना नहीं चाहता तो हमने सोचा, अपना काम ही सिखा दे तो आगे काम आएगा। पढ़ लिखकर भी क्या उखाड़ लेगा।”
“अरे ! ये क्या बात हुई ? बच्चे ने कहा , पढाई में मन नहीं लगता और आपने तुरंत मजदूरी में लगा दिया? कौनसा दुनिया के बच्चे ख़ुशी से पढ़ते हैं? मगर पढ़ना तो पड़ता है ।”
उन दोनों की ये बातचीत चल रही थी और मेरा पारा हाई हो रहा था।
“भैया, पढ़ना तो बहुत जरुरी है। कैसे भी करके बारहवीं तक तो पढ़ाइये। कुछ पढ़ जायेगा तो कहीं छोटी मोटी नौकरी ही लग जाएगी। आखिर इस धूल धक्कड़ के काम से तो बचेगा।”
अब तो मुझसे रहा नहीं गया और मैंने श्रीमती जी को आवाज लगाई, “जरा इधर आना, मेरी जुराबें नहीं मिल रही।”
जैसे ही श्रीमती जी कमरे में घुसी, मैं उनपर बरस पड़ा, “अरे, तुम क्यों सबके मामलों में दखल देती हो? सारी दुनिया की पढ़ाई का ठेका तुम्ही ने ले रखा है क्या ? जहाँ किसी बच्चे को मजूरी करते देखती हो बस पड़ जाती हो पीछे। पढ़ाई करनी चाहिए, पढ़ाई करनी चाहिए, दिमाग खराब कर रखा है।”
“अरे तो क्या गलत है इसमें? हमारे देश और समाज के विकास के लिए हर नागरिक का शिक्षित होना जरुरी है।”
“बस करो यार! बहुत हो गया तुम्हारा समाज सुधार! कभी सोचा है सारे पढ़ जायेंगे, तो हमारे लिए मजदूरी कौन करेगा? हमारे घर कौन बनाएगा? एक तो वैसे ही इनके रेट बढ़ते जा रहे हैं। पढ़-लिख गए, तो हमारे सिरों पर बैठ जायेंगे…।”
2: तैराक
सामने आवश्यकताओं का एक दरिया हरहरा रहा था। उसकी नाव बहुत छोटी थी और तैरना आता नहीं था। दरअसल उसने बीमार पिता की गृहस्थी के समानांतर अपनी गृहस्थी भी बसा ली थी। शुरू-शुरू में तो हिलकोरे लेती नाव, चप्पू के चलने की जल-तरंगी आवाज, लहरों पर फिसलती चाँदी, तैरते झाग सब कुछ उसे रोमांचित करता। मगर धीरे धीरे लहरे ऊँची और ऊँची होती गयीं।
पिता का इलाज, बहनों की पढाई और विवाह- वह अपने एकमात्र चप्पू को मजबूती से थामे पूरी शक्ति से अपनी डगमगाती नाव को खेने लगा । मगर जैसे-जैसे लहरों का तांडव बढ़ता जा रहा था, उसकी नाव के हिचकोले भी बढ़ रहे थे। हिम्मत जवाब दे रही थी। फिर उसके घर संतान का आगमन हुआ। और लो! उसकी दिन-दिन कमजोर पड़ती नाव किसी पत्ते सी उलट गयी। अब वह गहरे पानी में डूब रहा था।
डूबते हुए भी कुछ आवाजें उसका पीछा कर रही थी। कुछ पूरी तरह निराश हो विलाप कर रहीं थी, कुछ उसे कोस रही थीं तो कुछ उसे हिम्मत बंधा रही थीं। हिम्मत बंधाने वाली हर आवाज के साथ उसके हाथ-पांव और सक्रिय हो उठते लेकिन फिर भी वह डूबता ही जा रहा था।
अचानक उसे कुछ किलकारियां सुनाई दी, उसने पूरी शक्ति से हाथ-पैर मारने शुरू कर दिए। कुछ पल के संघर्ष के बाद उसे लगा, वह नीचे जाने की बजाय ऊपर आ रहा है। यह अहसास होते ही उसमें उत्साह का अद्भुत संचार होने लगा । बस कुछ पल और अब वह पानी की सतह पर किसी कुशल तैराक सा तैर रहा था। उसने तैरना सीख लिया था।
बाल मजदूरी की दृष्टि से देखें तो विरोध अधिक जायज़ था।
शिक्षा भी उतनी ही जरूरी है।पर लघुकथा ने चमत्कृत वहाँ किया जब पति ने बुलाकर विरोध किया।
मजदूर वर्ग की अपनी अलग समस्याएँ होती हैं।जो मजबूरी भी होती है।
दूसरी लघुकथा दो बार पढ़ी।
यह मनोवैज्ञानिक धरातल पर भावात्मक मनोभावों के चमत्कार सी लगी।
संसार रूपी सागर में पारिवारिक उत्तरदायित्व से जूझती छोटी सी नाव पर्याप्त न थी किन्तु शिशु के आगमन रूपी हौसले ने मुश्किलों से तैर कर उतरना सिखा दिया।
यह लघुकथा उत्तरदायित्व के प्रति हौसले,विजय और आनन्द की प्रेरणा है।
बधाई बहुत-बहुत।
दोनों लघुकथाएं बहुत सुंदर शोभना जी।कई बार लोगों को कहते सुना है कि व्यवस्था की बागडोर अगर स्त्रियों के हाथ में आ जाए, तो कितनी सहजता से हर समस्या सुलझ जाए, क्योंकि उसके लिए लोक कल्याण सर्वोपरि है। किंतु पुरुष केवल अपनी स्वार्थपूर्ति पर केंद्रित रहता है।
दूसरी कथा में बिंबों द्वारा भावों एवं वस्तुस्थिति का संप्रेषण प्रभावपूर्ण रहा।
प्रिय शोभना!
बाल मजदूरी की दृष्टि से देखें तो विरोध अधिक जायज़ था।
शिक्षा भी उतनी ही जरूरी है।पर लघुकथा ने चमत्कृत वहाँ किया जब पति ने बुलाकर विरोध किया।
मजदूर वर्ग की अपनी अलग समस्याएँ होती हैं।जो मजबूरी भी होती है।
दूसरी लघुकथा दो बार पढ़ी।
यह मनोवैज्ञानिक धरातल पर भावात्मक मनोभावों के चमत्कार सी लगी।
संसार रूपी सागर में पारिवारिक उत्तरदायित्व से जूझती छोटी सी नाव पर्याप्त न थी किन्तु शिशु के आगमन रूपी हौसले ने मुश्किलों से तैर कर उतरना सिखा दिया।
यह लघुकथा उत्तरदायित्व के प्रति हौसले,विजय और आनन्द की प्रेरणा है।
बधाई बहुत-बहुत।
दोनों लघुकथाएं बहुत सुंदर शोभना जी।कई बार लोगों को कहते सुना है कि व्यवस्था की बागडोर अगर स्त्रियों के हाथ में आ जाए, तो कितनी सहजता से हर समस्या सुलझ जाए, क्योंकि उसके लिए लोक कल्याण सर्वोपरि है। किंतु पुरुष केवल अपनी स्वार्थपूर्ति पर केंद्रित रहता है।
दूसरी कथा में बिंबों द्वारा भावों एवं वस्तुस्थिति का संप्रेषण प्रभावपूर्ण रहा।