कर्नल साहब की बेटी श्रुति बी.टेक. पूरा कर घर लौटी। गर्व से भरे कर्नल साहब ने पत्नी से कहा –
“एक शानदार रिश्ता आया है। लड़का भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयनित है, माँ लेक्चरर हैं और पिताजी सरकारी महकमे में डायरेक्टर। हमारी बेटी तो रानी बनकर राज करेगी।” पत्नी सहर्ष सहमत हो गईं।
अगले ही दिन उन्होंने बेटी से बात की। पर श्रुति की योजनाएँ अलग थीं। उसने दृढ़ स्वर में कहा –
“पापा, मैं एमबीए करना चाहती हूँ। बाहर की यूनिवर्सिटी से एडमिशन लेटर भी आ चुका है।”
मगर मम्मी-पापा के बार-बार समझाने पर वह आखिर में लडके वालों से मिलने को तैयार हो गई।
दोनों परिवार आमने-सामने बैठे। लड़के वालों को श्रुति पहली ही नजर में भा गई। उन्होंने तुरंत शादी की बात आगे बढ़ाई। श्रुति घबरा उठी, धीरे से बोली –
-“अंकल, मुझे अभी एमबीए करना है। यह मौका मैंने कठिन मेहनत से पाया है और शादी के बाद भी मैं काम करना चाहुँगी।”
लड़के के पिता मुस्कुराए –
-“बेटा, बस एक-दो साल की बात है। शायद अभी बेटे के साथ इंटीरियर में रहना पड़े; उसके बाद जो चाहो सो करना… लेकिन तुम्हें पैसों की कभी कोई कमी नहीं रहेगी।”
श्रुति ने पूरे आत्मविश्वास से उत्तर दिया –
-“अंकल, बचपन से भी कभी पैसों की कमी नहीं रही। आगे भी मैं खुद अपने बल पर ही कमाउंगी। जो सपना मैंने मेहनत से पाया है, उसे छोड़ना मेरे लिए असंभव है।”
उसके आत्मविश्वास से भरे स्वर ने सबको चुप कर दिया।
फिर भी कर्नल साहब ने इशारे से लड़के वालों को आश्वस्त किया– “मैं समझा लुंगा श्रुति को।”
जब मेहमान चले गए, तो पापा ने बेटी को समझाना शुरू किया।
श्रुति ने दृढ़ता पूर्वक आँखों में ऑंखें डालकर पापा से कहा –
“पापा, जबरदस्ती आप मेरी शादी तो करवा देंगे लेकिन अगर मैं वहां नहीं टिक पाई… और हो सकता है छह महीने में ही मैं मायके लौट आऊँ… तो क्या आप ऐसी शादी देखना चाहेंगे?”
पापा ने बेटी की आँखों में दृढ़ता, आत्मविश्वास और स्वतंत्र सोच को पढ़ लिया और हथियार डाल दिए।
श्रुति विदेश जाकर एमबीए करने लगी।
वहीं एक समारोह में उसकी मुलाकात विभोर नामक भारतीय युवक से हुई। दोस्ती हुई… कुछ मुलाकातें हुईं। एक दिन विभोर ने शादी का प्रस्ताव रखा।
श्रुति ने जल्दबाजी नहीं की। पहले उसके परिवार की जानकारी जुटाई, फिर दोस्तों से विभोर के स्वभाव के बारे में पूछा। जब पूरी तरह संतुष्ट हुई, तब ही उसने मम्मी-पापा को बताया।
माँ ने जिज्ञासु स्वर में पूछा –
“श्रुति, विभोर में ऐसा क्या है जो तुझे वह भा गया?”
श्रुति मुस्कुराई –
“माँ, तीन बातें वह मुझसे कभी नहीं पूछेगा –
फोन पर किससे बात कर रही है,
कहाँ जा रही है और
यह क्या पहन रखा है?
यही मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान है।”
मम्मी-पापा ने बेटी की पसंद, उसके व्यवहारिक और प्रभावशाली निर्णय को सिर माथे लिया। श्रुति की शादी विभोर से सम्पन्न हुई— सम्मान, विश्वास और बराबरी की नींव पर टिकी एक साझेदारी के रूप में।


नीलमणि जी!
सर्वप्रथम यह लघुकथा नहीं है!इसे लघु कहानी कह सकते हैं। लघुकथा कुछ ही अंतराल की कथा होती है। कुछ ही पल का चमत्कार! जिसमें अभिव्यक्ति की तीव्रता, प्रभावशीलता होती है। दिन-रात का अंतराल भी नहीं।
एक लघु कहानी के रूप में प्रेरणास्पद और अच्छी कहानी है। लड़कियों के भविष्य के प्रति जागरूक करती कि पहले लक्ष्य फिर विवाह!
बधाई आपको।