चाँद आधा था, लेकिन उसकी परछाई पूरी—अपने से भी लंबी।
हवा में ठंडक थी, और भीतर कुछ सुलग रहा था।
आईने से बचकर निकल आई थी वह, पर उस परछाई से नहीं बच सकी।
धीरे से बोली—
“क्या मैं… सच में “रिया” हूँ?”
आईने की जगह अब ज़मीन थी, और ज़मीन पर फैली परछाई उसका अतीत बन चुकी थी—
हर ताना, हर शब्द, हर मुस्कान की नोक उसमें चमक रही थी।
बचपन से ही वह अलग थी।
गाँव की पगडंडियों पर दौड़ती, लड़कों के साथ पतंग उड़ाती, और माँ की सख़्त निगाहों के बीच भी सवाल पूछती—
“क्यों? हमेशा ‘लड़कियाँ ऐसे नहीं करतीं’ ही क्यों?”
फिर माँ बाप शहर आ गए, उसकी आँखों की चमक बुझती नहीं थी बल्कि उसकी आँखों की वह अजीब-सी चमक अक्सर लोगों की निगाहों को खींच लेती।
यहाँ मोहल्ले की औरतें कहतीं—“देखो, यह लड़की कुछ ज़्यादा ही तेज़ है… बड़ी होकर सबको छकाएगी।” बच्चों ने सुन लिया और उसका नाम गढ़ दिया—“ रिया -दीया।” वह नाम उसे चुभता, पर कभी-कभी हँसी भी आ जाती।
स्कूल की कविता प्रतियोगिता का दिन। मंच पर खड़ी, हाथ में पन्ना, दिल की धड़कन तेज़। सहपाठी हँस पड़े—“अरे इसे भेजो, कुछ न कुछ जीतकर तो लाएगी।”
मंच की रोशनी में वह छोटी लड़की पूरी आत्मविश्वास से खड़ी थी। शब्द उसके होंठों से झरते गए, तालियों की गूँज में उसका आत्मविश्वास पंख फैलाने लगा। परिणाम आया—प्रथम स्थान। पर पीछे से फुसफुसाहटें—“लो, “रिया “ फिर जीत गई “डायन ”
उस रात माँ से पूछ बैठी—“माँ, डायन क्या होती है? क्या मैं सच में डायन हूँ?”
माँ ने उसकी छोटी उंगलियों को थामते हुए कहा—“लोग नाम देते हैं जब किसी औरत की चमक से डरते हैं। डायन कोई नहीं होती, बेटा। तू डरना मत।”
कक्षा में उत्तर देती तो लड़कियाँ आँखें घुमातीं—
“देखो, सब जानती है।”
लड़के धीरे से हँसते—
“इससे उलझा तो गया काम से।”
फिर भी वह डगमगाई नहीं।
कॉलेज पहुँची तो पढ़ाई में टॉपर, लेकिन लड़कियाँ फुसफुसातीं—
“इसके पास मत बैठो, ये ज़्यादा बोलती है।”
लड़के दूरी बनाए रखते—
“किसी ने इसको छेड़ा तो मुँह तोड़ देगी।”
वह हँसकर सब टाल देती, लेकिन भीतर कहीं एक दीवार खड़ी होने लगी।
परीक्षा में टॉपर बनी तो लोग बोले—“इसकी पहुँच से कोई बाहर नहीं रह सकता।” जब सारे छात्र ‘अबला’ पर निबंध लिख रहे थे, उसने साहस से लिखा—“सबला।” क्योंकि यह शब्द ही उसकी डिक्शनरी में नहीं था।
उसने हर ताने को चुनौती बना लिया। धीरे-धीरे यही ताने उसकी पहचान बन गए।
मल्टीनेशनल कंपनी में जॉब मिली।
काम के बोझ और प्रोजेक्ट्स की जद्दोजहद में वह सबसे अलग खड़ी थी।
मीटिंग में बॉस भी उसकी निडर राय से चौंकते।
धीरे-धीरे उसके पीछे कानाफूसी शुरू हुई—
“आयरन लेडी है… पास मत जाना।”
“मर्दों को नीचा दिखाती है।”
और फिर वही शब्द, फुसफुसाते होंठों से निकलकर, कानों तक गूँजने लगे—
वह अपने काम में डूबी रही।
यहाँ भी उसकी मेहनत, लगन और तेज़ी दूसरों के लिए चुनौती बन गई।
कोई सीधा कुछ कहने की हिम्मत नहीं करता, पर पीठ पीछे वही पुराना ताना—
“विच …”
पहले-पहल वह हँस दी। सोचा, “ये उनकी हसरत है, पर उनमें हिम्मत नहीं।”
पर कब यह हँसी उसकी नसों में कसक बन गई, उसे खुद नहीं पता चला।
वह सोचती—क्या सचमुच उड़ रही हूँ?
या बस ज़मीन पर औरों से तेज़ चल रही हूँ?
इन्हीं दिनों प्रोजेक्ट के सिलसिले में अर्जुन मिला।
दफ़्तर की भीड़ और सियासी खेल से अलग, उसकी आँखों में एक अजीब-सी ईमानदारी थी।
वह उसके साथ घंटों बहस करती, और अर्जुन चुपचाप सुनता रहता।
धीरे-धीरे बहसों में हँसी, हँसी में अपनापन और अपनापे में रिश्ता पनप गया।
सबको लगा, यह लड़की जो सबको डराती है, अब किसी के सामने नर्म भी हो सकती है।
शादी हुई।
पहले सब कुछ सहज लगा।
लेकिन सास-ससुर के घर पहुँचते ही फिर वही फुसफुसाहट—
“बहू बहुत बोलती है।”
“इस पर लगाम लगाओ।”
विवाह के बाद नए रिश्तों के साथ पुराने शब्द भी लौटे। सास के ताने—“पहले सबको फँसाती थी, अब मेरे बेटे को भी। डायन कहीं की।” रिया चुप रहती।
पड़ोसियों ने कहना शुरू कर दिया—
“इसकी परछाई भी भारी है।”
गली-मोहल्ले तक में बच्चे उसे देखकर कहते—
“डायन… डायन…”
जवाब उसके काम के प्रति प्रेम में था। उसकी मेहनत और लगन का फल l ऑस्ट्रेलिया का बुलावा अर्जुन ने गले लगाकर कहा—“मुझे तुम पर गर्व है।” पर सास ने फिर कहा—“अब विदेश भी ले जाएगी मेरे बेटे को, डायन जादू करती है।”
ऑस्ट्रेलिया पहुँची तो नया देश, नई भाषा, नई हवा। पर धीरे-धीरे वही पुरानी परछाइयाँ पीछे चलने लगीं। सहकर्मी आपस में फुसफुसाने लगे—“विच … विच … फ्लाइंग अबव यस आल.” पहले तो चुभा, पर उसने आईने में खुद से कहा—“तुम शब्द बदल सकते हो, पर मेरी मेहनत, मेरी उड़ान तुम्हारी पकड़ में नहीं।”
लेकिन ऑफिस, घर और समाज के बीच तालमेल बैठाते-बैठाते, वह और कठोर दिखने लगी।
रात को बालकनी में खड़ी होकर तारों को देखती और अपने भीतर से आवाज़ सुनती—
“फ्लाइंग, फ्लाइंग …
अबव द डाउटस, बियॉन्ड द नॉइज़,
राइजिंग ऑन विंग्स ऑफ लेबर एंड चॉइस.
नॉट अ बरूम, नॉट अ स्पेल,
जस्ट अ हार्ट देट स्ट्राइव्स, अ सोल देट्स द्वेल्स.
फ्लाइंग, फ्लाइंग …
वेयर ड्रीम्स टच द स्काई,
वेयर वर्ड्स फेल, बट दीड्स रिप्लाई.”
(“उड़ती जा रही हूँ… संदेह से परे, शोर से ऊपर, मेहनत और चुनाव की पंखों पर। ये कोई झाड़ू नहीं, कोई जादू नहीं—बस एक दिल है जो जुटा है, एक आत्मा जो ठहरी है। सपनों तक उड़ती, जहाँ शब्द कम पड़ जाएँ, वहाँ कर्म बोलते हैं।”)
फुसफुसाहटें बढ़ीं—“विच ऑन हर ब्ररूम ”—पर रिया अब डरती नहीं। उसकी मेहनत उसकी असली उड़ान थी।
समय बीता। बेटी सीया आई, रंगों में खोई, मासूमियत से भरी। एक दिन पेंटिंग बनाई—क्राउन वाला ताज। आकर बोली—“मम्मा, “डायन कौन होती है? क्या वो भी ताज पहनती है?”
रिया ठिठकी। दिल में पुराने घाव हरे हुए, पर चेहरा मुस्कराया। उसने बेटी को गोद में उठाया—“बेटा, डायन तो बस कहानियों में होती है। असली दुनिया में रानियाँ होती हैं—सपनों जैसी, बिल्कुल तुम्हारी तरह।”
पीछे से अर्जुन आया। बाँहों में भरते हुए मुस्कराया—“हाँ, मेरी डिअर… डिअर रिया … मेरी प्यारी डायन।”
सीया खिलखिलाई। घर की दीवारों में उसकी हँसी गूँज गई। समय यूँ ही खिसक गया..!
अब सीया लंदन में है। अर्जुन काम के सिलसिले में सिडनी और वह खुद मैल्बोर्न.. —फिर अकेली।
रात का सन्नाटा, खाली कमरे की दीवारें, और आईने के सामने खड़ी वह आँखों में थकान, होंठ सख्त। भीतर की आवाज़ फुसफुसा रही थी—“डायन…”
हर ताना, हर फुसफुसाहट, हर कामयाबी, हर असफलता—सब उसकी परछाई में उभर आए। गली, ऑफिस, घर—हर जगह उसकी परछाई लंबी होती जा रही थी।
वह बैठ गई। कमरा उसकी सोच का प्रतिबिंब बन गया। उसकी हँसी, अर्जुन की बातें, सास के ताने, सहकर्मियों की फुसफुसाहटें—सब एक साथ गूँज रही थीं। उसकी परछाई लंबी होती जा रही थी—मोहल्लों में, ऑफिस में, घर की गलियों में… सब जगह वही डर, वही फुसफुसाहट। उसने आँखें बंद कर लीं। वह अकेली आईने के सामने खड़ी रही। चेहरा देखती रही, आँखें पढ़ती रही। और अचानक लगा—आईना खुद फुसफुसा रहा है—“डायन…”
सवाल उसके भीतर गूंजा—क्या मैं सचमुच वही बन गई हूँ, जैसा ये सब मुझे पुकारते हैं? या फिर यह सिर्फ़ उनका डर है?
बालकनी की ठंडी हवा, आईने में परछाई लंबी, बहुत लंबी। धीरे-धीरे उसने आँखें बंद कीं।
और उसी क्षण भीतर से आवाज़ आई—
“नहीं, तू डर नहीं, तू दस्तक है।
तू वही है, जो परछाई से लंबी हो गई है।”
बालकनी की ठंडी रेलिंग पर उंगलियाँ टिकाए वह देर तक अपनी परछाई को देखती रही —
लम्बी… अपने से भी लम्बी।
नीचे सड़क पर किसी के कदमों की आहट थी, लेकिन उसके कान तो जैसे भीतर के सन्नाटे में अटके थे।
ख़ुद से यह प्रश्न पूछते हुए उसने सिगरेट की अधजली डिबिया उठाई — जो किसी और की आदत थी, उसकी नहीं।
“तुम्हें यह सूट नहीं करता,”
उसकी आवाज़ अब भी दीवारों में गूँजने लगी
उसने मुस्कराकर जैसे खुद से कहा —
“अब तो कुछ भी सूट नहीं करता,”
अगले दिन, आईने के सामने खुद को देखती हुई, यह धूल कब जम गईं.. वैक्यूम क्लीनर तो सफाई करता है पर शायद उसका ध्यान आईने पर नहीं गया था, धूल साफ करते हुए, आईने के साथ पेशोपश करती हुई वह, जैसे धूल हटाते ही कमरे की चमक लौट आती है, उसे वह दोपहर भी याद आई जब माँ ने कहा था,
“बेटी, परछाईं कभी छोटी नहीं होती… बस सूरज थोड़ा नीचे होता है।”
वह हँसी थी तब… और अब वही वाक्य कहीं भीतर टीसता है।
“तो क्या मैं भी अब ढलते सूरज की परछाई हूँ?”
वही बहसें, वही चुप्पियाँ, वही अधूरी बातें जो किसी मोड़ पर रुक गई थीं।
वह बालकनी से भीतर गई, आईने के सामने खड़ी हुई —
“ तो क्या मैं सचमुच डायन हूँ?”
उसने आईने से पूछा।
आईना चुप था, पर उसकी आँखें कह रही थीं —
“नहीं… तू बस अपने ही सवालों की शिकार है।”
धीरे-धीरे उसने परछाई पर नज़र डाली —
अब वो उतनी लम्बी नहीं थी।
शायद सूरज थोड़ा ऊपर आ गया था,
या शायद… उसने खुद को थोड़ा समझ लिया था।
तभी सीया का मेसेज आया—
“माँ, आप जैसा ‘पोहा’ मैंने खुद बनाया!”
रिया मुस्काई। हल्की गर्माहट भीतर तक उतर गई।
अर्जुन का वॉइस मेसेज “ कैसी हो डायन अभी तक तुम्हारी स्पेल से बँधा वीकेंड पर आ रहा हूं..!”
सामने गुलाब की डाल पर नई कोंपलें थीं।
वो हल्के से मुस्कराती हुई – उठ खड़ी हुई। प्रोजेक्ट का बहुत सारा काम था..!
पर हृदय में मुस्कान की एक लहर गूँज रही थी।
गुलाब को उसकी खुशबू से पहचाना जाता है, नाम से नहीं..।
आज, उसकी परछाई पीछे रह गई।
और रिया, दीया, डायना, डायन…
सारे नाम सिर्फ़ यात्राओं और अनुभवों की परतें बनकर रह गए।
वह बालकनी में खड़ी, हल्की हवा में साँस लेती रही।
“परछाइयाँ कभी डराती नहीं… बस बताती हैं कि रोशनी अभी भी पास है,”
वह सॉफ्टली मुस्काई।
अब, वह जी रही थी स्वयं की पुकार में,
नामों की परछाई से परे…
सिर्फ़ अपनी मेहनत, अपने प्रयास, अपने सपनों की रोशनी में..!
डॉ. सुनीता शर्मा
संस्थापक : विहास (विश्व इंडियन हिंदी आर्ट एंड संस्कृति) वैश्विक भारतीय हिंदी कला एवं संस्कृति संगठन
नागरी लिपि परिषद: अध्यक्ष ऑस्ट्रेलिया
शिक्षा मंच : ऑस्ट्रेलिया
महिला काव्य मंच: मैलबोर्न
विश्व साहित्य सेवा संस्थान :अध्यक्ष :न्यूजीलेंड/ ऑस्ट्रेलिया व अंतरराष्ट्रीय स्पीकर
शिक्षक और साहित्यकार, हिंदी एवं भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में सक्रिय। अनेक राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानितl
* परछाई से परे *
प्रिया सुनीता शर्मा जी आपकी जब मैं यह कहानी पढ़ी उससे पहले आपका जीवन परिचय पढ़ा
उसे पढ़ कर लगा, इस कहानी में मुझे आपकी परछाई दिखाई दे आप एक अंतरराष्ट्रीय स्पीकर एवं कई सम्मानों से सम्मानित एक महला वर्ग को प्रतिनिधित्व करती हुई विभिन्न आयामों को छूता हुआ आपका व्यक्तित्व निश्चित थी क्रमशः इसी तरह आगे बड़ा होगा
होनहार बिरवान के होत चिकने पात,
कहानी की पत्र रिया भी बचपन से ही भेड़ चाल में न चलने वाली ,अपने पद चिन्ह खुद बनाने वाली एक लड़की रही,
इसके लिए उसे कई घर ,समाज के ताने भी सुनने पड़े,
लेकिन इन सब से बेखबर वह अपने पंखों को परवाज देती गई
समाज का नियम है कि जब कोई चीज उसकी हद में नहीं होती तो वह उसको किसी भी तरह से झुकाने की गिरने की कोशिश करता है मगर जब आत्मा बलशाली हो तो वह अपनी राह खुद बना लेती है।
ससुराल में भी कोई ना समझना हो लेकिन पति अगर समझता है तो किसी चीज का स्त्री को भय नहीं होता
वह अपने काम में प्रतिष्ठा प्रकार विदेश में नाम कमाती है ,सच है गुलाब अपनी खुशबू से जाना जाता है ना कि नाम से और परछाई हमेशा आपको यह बताती है की रोशनी आपके करीब ही है
एक बेहतरीन सशक्त कहानी के लिए प्रिया सुनीता जी आपको साधुवाद।
आदरणीय आपके स्नेहिल शब्दों ने मन को सच में भावुक कर दिया।
कहानी “परछाई से परे” पढ़कर आपने जो गहराई महसूस की और उसमें मेरी परछाई देखी—यह मेरे लिए किसी सम्मान से कम नहीं।
आपकी समीक्षा न सिर्फ कहानी की आत्मा तक पहुँची है, बल्कि स्त्री–शक्ति, आत्मबल और जीवन-संघर्ष की उस यात्रा को भी बहुत सुंदरता से शब्द दिए हैं, जिसे मैं अपनी लेखनी में व्यक्त करना चाहती हूँ।
आपकी शुभाशंसा और आशीर्वचन मेरे लिए प्रेरणा हैं।
हृदय से आभार और ढेर सारा स्नेह।
— सुनीता शर्मा
डा0सुनीता शर्मा की कहानी “परछाई से परे “पढ़ी मन को झकझोर गई। एक शीशे की छत और शीशे की ही दीवारें औरतों के लिये समाज ने बना रखी हैं उससे ऊपर निकलने याने उन्हें पार करने की कोशिश करते ही महिलाओं पर लांछन और तानों बौछार होने लगती है और बहुदा वो सिकुड़ सिमट कर ख़ुद ही उनमें क़ैद हो जाती है या फिर उन सीमाओं को लांघने पर उसे स्वयं पर संदेह होने लगता है । पर यहाँ रिया की माँ, पतिअर्जुन और फिर बिटिया उसे सामान्य होने का एहसास दिलाते हैं। एक प्रतिभावान महिला के द्वंद को सुंदरता से उकेरा है सुनीता जी ने । बहुत सुन्दर कहानी बधाई बहुत-बहुत।
प्रणाम एवं हृदय से धन्यवाद
आपकी इतनी संवेदनशील और गहन समीक्षा पढ़कर मन सचमुच भावुक हो गया।
“परछाई से परे” में जिस द्वंद्व, टूटन, संघर्ष और आत्मबल की यात्रा को मैंने रिया के माध्यम से उकेरा—उसे आपने जिस सूक्ष्मता से समझा, वह मेरे लिए अत्यंत सम्मान की बात है।
आपने जो “शीशे की छत और शीशे की दीवारें” कहा—वह स्त्री-अनुभव का सटीक और दर्द भरा सच है।
और यह जानकर बहुत संतोष हुआ कि रिया की माँ, पति और बेटी के माध्यम से मैंने जो उम्मीद और आत्मविश्वास का संदेश दिया—वह आप तक पहुँचा।
आपकी सराहना मेरी लेखनी के लिए प्रेरक शक्ति है।
-सुनीता शर्मा
हृदय की गहराइयों से आपका धन्यवाद करती हूँ कि आपने मेरी कहानी “परछाई से परे” को अपने प्रतिष्ठित मंच पर स्थान दिया।
पुरवाई में प्रकाशन केवल एक उपलब्धि नहीं, बल्कि साहित्य-सेवा के प्रति मेरे विश्वास को और दृढ़ करने वाला प्रेरक क्षण है।
आपके चयन ने मेरी लेखनी को सम्मान दिया और मुझे यह विश्वास भी कि समाज और स्त्री-जीवन की वास्तविकताओं को शब्दों में पिरोने का मेरा प्रयास सही दिशा में है।
आपकी संवेदनशील दृष्टि, साहित्य के प्रति समर्पण और लेखकों को दिए जाने वाले इस प्रोत्साहन के लिए हृदय से आभार।
यह अवसर मेरे लिए गर्व भी है और एक नई ऊर्जा का स्रोत भी।
आपकी कहानी “परछाई से परे” पढ़ी।
और थोड़ी देर के लिये विचारों में डूब गए।
सामाजिक मान्यताओं, परंपराओं और रूढ़ियों से हटकर या फिर लड़कियों को लेकर बनाए हुए नियमों को तोड़कर वह जब कोई काम करती है या अलग नजर आती है तो अनायास ही सबकी नज़रें उस ओर उठ ही जाती हैं।
जो भी पहली बार बंधन तोड़ कर आगे बढ़ता है उस पर सबकी नजर रहती है। कुछ प्रशंसा करते हैं कुछ उलाहना देते हैं और कुछ निंदा करते हैं ,लेकिन हमारा आत्मविश्वास अगर हमारे साथ रहता है कि हम जो कर रहे हैं वह सही और अच्छा है, तो निश्चित ही वह हमारी ताकत बन जाता है। और फिर हमें कोई भी बाधा रोक नहीं पाती।
आगे बढ़ने वालों से ईर्ष्या करने वालों की कमी नहीं रहती।
इसमें ‘डायन’ शब्द हमें रह-रह कर चुभता रहा।
हम यह सोचते रहे की ईर्ष्या में ताने तो समझ में आते हैं,पर पर डायन शब्द का चयन आपने क्या सोचकर किया होगा इसका प्रयोग तो बहुत ही बुरे अर्थ में किया जाता है!!!!????????
यह हम आपसे जरूर जानना चाहेंगे।
सामान्यतया डायन नुकसान ही पहुँचाती है खा जाने की हद तक।
मृत्यु तुल्य।
ईर्ष्या अगर इस हद तक पहुँचती है तो वह बहुत बड़ा नुकसान करने में भी समर्थ हो सकती है।
हम इसे प्रतीकात्मक अर्थ में लेते हुए यह समझ पाए कि अपने पूरे प्रयासों के बाद भी सहपाठी यह सहकर्मी सफलता के उस आयाम तक नहीं पहुँच पाए जहाँ तक रिया पहुँच पाई। इसलिए उनकी उम्मीदों पर यह वज्रपात की तरह रहा।
इंसान स्वयं अपनी ओर मुश्किल से देख पाता है, वरना वह समझ पाता कि हमारी हार यह समझाती है कि हमारे प्रयासों में कुछ कमी रही।
कहानी पढ़ कर आपका जीवन परिचय जानने की जिज्ञासा हुई।
जीवन परिचय पढ़ने के बाद ऐसा लगा कि आपने जो भी लिखा वह बहुत सोच समझ कर ही लिखा होगा
लेकिन डायन शब्द अभी भी दिमाग में अटका हुआ है। डायन शब्द का इस तरह का प्रयोग हमने पहली बार पढ़ा।
कहानी अच्छी है, इस दृष्टि से कि वह एक महत्वपूर्ण उद्देश्य लेकर चल रही है।
जब हम जीवन पथ में आगे की ओर बढ़ें, तो हमारे आसपास हमें रोकने, टोकने और टाँग खींचने वाले, मनोबल तोड़ने वाले ;चाहे जितने भी लोग, किसी भी पथ पर, किसी भी रूप में क्यों न मिलें, हमारा हौसला नहीं टूटना चाहिये ।
आत्मबल, आत्मशक्ति और आत्मविश्वास दृढ़ रहे, तो सब संभव है।
यूँ कि-
रुकने का नाम मौत है चलना है जिंदगी!
बिटिया और पति का सार्थक सहयोग सार्थक सबलता का प्रमाण है। जो हौसले को थाम कर रखता है और आगे की और देखने के लिये प्रेरित करता है।
शीर्षक की सार्थकता को हम इस तरह लेते हैं कि वास्तव में स्त्रियों के लिये निर्धारित परिधि रूपी परछाई को तोड़कर आगे बढ़ने का प्रयास। यहाँ आपका शीर्षक सार्थक नजर आता है।
आदरणीय नीलिमा जी,
सादर प्रणाम।
मेरी कहानी “परछाई से परे” को इतने ध्यान, गंभीरता और संवेदनशील दृष्टि से पढ़ने के लिए हृदय से धन्यवाद। आपके विचार न केवल गहन हैं बल्कि सामाजिक संरचनाओं और स्त्री–अस्तित्व की वास्तविकताओं को समझने की अद्वितीय क्षमता भी प्रकट करते हैं।
आपने जो बात ‘बंधन तोड़कर आगे बढ़ने’ और ‘दृष्टि की परतों’ के बारे में कही है, वह कहानी के मूल भाव को सार्थक रूप से सामने रखती है। सच कहें तो—जो पहली बार परंपरा की सीमाओं से बाहर कदम रखता है, उसकी राह में प्रशंसा से अधिक प्रश्न और आलोचनाएँ खड़ी होती हैं। आपका यह विश्लेषण अत्यंत सटीक है।
‘डायन’ शब्द के संदर्भ में
आपकी जिज्ञासा बिल्कुल उचित है, और मैं इसे स्पष्ट करना आवश्यक समझती हूँ।
कहानी में यह शब्द किसी वास्तविक व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि समाज के उस मानसिक ढाँचे के लिए प्रयोग किया गया है जो स्त्री की प्रगति, स्वतंत्रता और उपलब्धि को देखकर भीतर ही भीतर तिलमिला उठता है।
हमारे समाज में सदियों तक ‘डायन’ शब्द का उपयोग उन स्त्रियों के लिए किया गया
जो—
स्वाभिमानी थीं,
बुद्धिमान थीं,
निर्णय लेती थीं,
और पुरुष-नियंत्रित व्यवस्था को स्वीकार नहीं करती थीं।
इन्हें डराने, नीचा दिखाने और समाज से अलग करने का यही सबसे कठोर हथियार था।
इसलिए कहानी में ‘डायन’ शब्द प्रतीक है—
उन विषैली मानसिकताओं का,
जो ईर्ष्या, कुंठा और असुरक्षा से भरी हुई हैं,
और किसी भी स्त्री के उन्नयन को सहन नहीं कर पातीं।
आपने सही कहा—
ईर्ष्या जब अपनी सीमा पार कर जाती है तो वह ‘नुकसान पहुँचाने’ वाली प्रवृत्ति का रूप ले लेती है। यही विचार कहानी में इस शब्द के चुनाव के पीछे था।
आपके इस प्रश्न ने मुझे प्रसन्न किया, क्योंकि इसका अर्थ है कि पाठक कहानी को जिया और सोचा, केवल पढ़ा नहीं। यही किसी लेखक के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि होती है ।
आपकी समग्र समीक्षा
आपने ‘आत्मबल’, ‘आत्मविश्वास’, और ‘जीवन-पथ में बाधाओं’ के संदर्भ में जो निष्कर्ष लिखा है, वह कहानी का मूल संदेश ही नहीं बल्कि एक जीवन-दर्शन भी है।
“रुकने का नाम मौत है, चलना है ज़िंदगी”—
आपने इस एक पंक्ति में पूरी कथा का सार कह दिया है।
आपके विचारों, आपके समय और आपके स्नेहिल शब्दों के लिए पुनः आभार।
यह मेरे लिए सम्मान की बात है कि मेरे लेखन ने आपके भीतर यह संवाद जगाया।
सादर
— सुनीता शर्मा
* परछाई से परे *
प्रिया सुनीता शर्मा जी आपकी जब मैं यह कहानी पढ़ी उससे पहले आपका जीवन परिचय पढ़ा
उसे पढ़ कर लगा, इस कहानी में मुझे आपकी परछाई दिखाई दे आप एक अंतरराष्ट्रीय स्पीकर एवं कई सम्मानों से सम्मानित एक महला वर्ग को प्रतिनिधित्व करती हुई विभिन्न आयामों को छूता हुआ आपका व्यक्तित्व निश्चित थी क्रमशः इसी तरह आगे बड़ा होगा
होनहार बिरवान के होत चिकने पात,
कहानी की पत्र रिया भी बचपन से ही भेड़ चाल में न चलने वाली ,अपने पद चिन्ह खुद बनाने वाली एक लड़की रही,
इसके लिए उसे कई घर ,समाज के ताने भी सुनने पड़े,
लेकिन इन सब से बेखबर वह अपने पंखों को परवाज देती गई
समाज का नियम है कि जब कोई चीज उसकी हद में नहीं होती तो वह उसको किसी भी तरह से झुकाने की गिरने की कोशिश करता है मगर जब आत्मा बलशाली हो तो वह अपनी राह खुद बना लेती है।
ससुराल में भी कोई ना समझना हो लेकिन पति अगर समझता है तो किसी चीज का स्त्री को भय नहीं होता
वह अपने काम में प्रतिष्ठा प्रकार विदेश में नाम कमाती है ,सच है गुलाब अपनी खुशबू से जाना जाता है ना कि नाम से और परछाई हमेशा आपको यह बताती है की रोशनी आपके करीब ही है
एक बेहतरीन सशक्त कहानी के लिए प्रिया सुनीता जी आपको साधुवाद।
आदरणीय आपके स्नेहिल शब्दों ने मन को सच में भावुक कर दिया।
कहानी “परछाई से परे” पढ़कर आपने जो गहराई महसूस की और उसमें मेरी परछाई देखी—यह मेरे लिए किसी सम्मान से कम नहीं।
आपकी समीक्षा न सिर्फ कहानी की आत्मा तक पहुँची है, बल्कि स्त्री–शक्ति, आत्मबल और जीवन-संघर्ष की उस यात्रा को भी बहुत सुंदरता से शब्द दिए हैं, जिसे मैं अपनी लेखनी में व्यक्त करना चाहती हूँ।
आपकी शुभाशंसा और आशीर्वचन मेरे लिए प्रेरणा हैं।
हृदय से आभार और ढेर सारा स्नेह।
— सुनीता शर्मा
डा0सुनीता शर्मा की कहानी “परछाई से परे “पढ़ी मन को झकझोर गई। एक शीशे की छत और शीशे की ही दीवारें औरतों के लिये समाज ने बना रखी हैं उससे ऊपर निकलने याने उन्हें पार करने की कोशिश करते ही महिलाओं पर लांछन और तानों बौछार होने लगती है और बहुदा वो सिकुड़ सिमट कर ख़ुद ही उनमें क़ैद हो जाती है या फिर उन सीमाओं को लांघने पर उसे स्वयं पर संदेह होने लगता है । पर यहाँ रिया की माँ, पतिअर्जुन और फिर बिटिया उसे सामान्य होने का एहसास दिलाते हैं। एक प्रतिभावान महिला के द्वंद को सुंदरता से उकेरा है सुनीता जी ने । बहुत सुन्दर कहानी बधाई बहुत-बहुत।
प्रणाम एवं हृदय से धन्यवाद
आपकी इतनी संवेदनशील और गहन समीक्षा पढ़कर मन सचमुच भावुक हो गया।
“परछाई से परे” में जिस द्वंद्व, टूटन, संघर्ष और आत्मबल की यात्रा को मैंने रिया के माध्यम से उकेरा—उसे आपने जिस सूक्ष्मता से समझा, वह मेरे लिए अत्यंत सम्मान की बात है।
आपने जो “शीशे की छत और शीशे की दीवारें” कहा—वह स्त्री-अनुभव का सटीक और दर्द भरा सच है।
और यह जानकर बहुत संतोष हुआ कि रिया की माँ, पति और बेटी के माध्यम से मैंने जो उम्मीद और आत्मविश्वास का संदेश दिया—वह आप तक पहुँचा।
आपकी सराहना मेरी लेखनी के लिए प्रेरक शक्ति है।
-सुनीता शर्मा
आदरणीय पुरवाई संपादक मंडल,
हृदय की गहराइयों से आपका धन्यवाद करती हूँ कि आपने मेरी कहानी “परछाई से परे” को अपने प्रतिष्ठित मंच पर स्थान दिया।
पुरवाई में प्रकाशन केवल एक उपलब्धि नहीं, बल्कि साहित्य-सेवा के प्रति मेरे विश्वास को और दृढ़ करने वाला प्रेरक क्षण है।
आपके चयन ने मेरी लेखनी को सम्मान दिया और मुझे यह विश्वास भी कि समाज और स्त्री-जीवन की वास्तविकताओं को शब्दों में पिरोने का मेरा प्रयास सही दिशा में है।
आपकी संवेदनशील दृष्टि, साहित्य के प्रति समर्पण और लेखकों को दिए जाने वाले इस प्रोत्साहन के लिए हृदय से आभार।
यह अवसर मेरे लिए गर्व भी है और एक नई ऊर्जा का स्रोत भी।
सादर
डॉ. सुनीता शर्मा
आदरणीय सुनीता जी!
आपकी कहानी “परछाई से परे” पढ़ी।
और थोड़ी देर के लिये विचारों में डूब गए।
सामाजिक मान्यताओं, परंपराओं और रूढ़ियों से हटकर या फिर लड़कियों को लेकर बनाए हुए नियमों को तोड़कर वह जब कोई काम करती है या अलग नजर आती है तो अनायास ही सबकी नज़रें उस ओर उठ ही जाती हैं।
जो भी पहली बार बंधन तोड़ कर आगे बढ़ता है उस पर सबकी नजर रहती है। कुछ प्रशंसा करते हैं कुछ उलाहना देते हैं और कुछ निंदा करते हैं ,लेकिन हमारा आत्मविश्वास अगर हमारे साथ रहता है कि हम जो कर रहे हैं वह सही और अच्छा है, तो निश्चित ही वह हमारी ताकत बन जाता है। और फिर हमें कोई भी बाधा रोक नहीं पाती।
आगे बढ़ने वालों से ईर्ष्या करने वालों की कमी नहीं रहती।
इसमें ‘डायन’ शब्द हमें रह-रह कर चुभता रहा।
हम यह सोचते रहे की ईर्ष्या में ताने तो समझ में आते हैं,पर पर डायन शब्द का चयन आपने क्या सोचकर किया होगा इसका प्रयोग तो बहुत ही बुरे अर्थ में किया जाता है!!!!????????
यह हम आपसे जरूर जानना चाहेंगे।
सामान्यतया डायन नुकसान ही पहुँचाती है खा जाने की हद तक।
मृत्यु तुल्य।
ईर्ष्या अगर इस हद तक पहुँचती है तो वह बहुत बड़ा नुकसान करने में भी समर्थ हो सकती है।
हम इसे प्रतीकात्मक अर्थ में लेते हुए यह समझ पाए कि अपने पूरे प्रयासों के बाद भी सहपाठी यह सहकर्मी सफलता के उस आयाम तक नहीं पहुँच पाए जहाँ तक रिया पहुँच पाई। इसलिए उनकी उम्मीदों पर यह वज्रपात की तरह रहा।
इंसान स्वयं अपनी ओर मुश्किल से देख पाता है, वरना वह समझ पाता कि हमारी हार यह समझाती है कि हमारे प्रयासों में कुछ कमी रही।
कहानी पढ़ कर आपका जीवन परिचय जानने की जिज्ञासा हुई।
जीवन परिचय पढ़ने के बाद ऐसा लगा कि आपने जो भी लिखा वह बहुत सोच समझ कर ही लिखा होगा
लेकिन डायन शब्द अभी भी दिमाग में अटका हुआ है। डायन शब्द का इस तरह का प्रयोग हमने पहली बार पढ़ा।
कहानी अच्छी है, इस दृष्टि से कि वह एक महत्वपूर्ण उद्देश्य लेकर चल रही है।
जब हम जीवन पथ में आगे की ओर बढ़ें, तो हमारे आसपास हमें रोकने, टोकने और टाँग खींचने वाले, मनोबल तोड़ने वाले ;चाहे जितने भी लोग, किसी भी पथ पर, किसी भी रूप में क्यों न मिलें, हमारा हौसला नहीं टूटना चाहिये ।
आत्मबल, आत्मशक्ति और आत्मविश्वास दृढ़ रहे, तो सब संभव है।
यूँ कि-
रुकने का नाम मौत है चलना है जिंदगी!
बिटिया और पति का सार्थक सहयोग सार्थक सबलता का प्रमाण है। जो हौसले को थाम कर रखता है और आगे की और देखने के लिये प्रेरित करता है।
शीर्षक की सार्थकता को हम इस तरह लेते हैं कि वास्तव में स्त्रियों के लिये निर्धारित परिधि रूपी परछाई को तोड़कर आगे बढ़ने का प्रयास। यहाँ आपका शीर्षक सार्थक नजर आता है।
बेहतरीन कहानी के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।
आदरणीय नीलिमा जी,
सादर प्रणाम।
मेरी कहानी “परछाई से परे” को इतने ध्यान, गंभीरता और संवेदनशील दृष्टि से पढ़ने के लिए हृदय से धन्यवाद। आपके विचार न केवल गहन हैं बल्कि सामाजिक संरचनाओं और स्त्री–अस्तित्व की वास्तविकताओं को समझने की अद्वितीय क्षमता भी प्रकट करते हैं।
आपने जो बात ‘बंधन तोड़कर आगे बढ़ने’ और ‘दृष्टि की परतों’ के बारे में कही है, वह कहानी के मूल भाव को सार्थक रूप से सामने रखती है। सच कहें तो—जो पहली बार परंपरा की सीमाओं से बाहर कदम रखता है, उसकी राह में प्रशंसा से अधिक प्रश्न और आलोचनाएँ खड़ी होती हैं। आपका यह विश्लेषण अत्यंत सटीक है।
‘डायन’ शब्द के संदर्भ में
आपकी जिज्ञासा बिल्कुल उचित है, और मैं इसे स्पष्ट करना आवश्यक समझती हूँ।
कहानी में यह शब्द किसी वास्तविक व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि समाज के उस मानसिक ढाँचे के लिए प्रयोग किया गया है जो स्त्री की प्रगति, स्वतंत्रता और उपलब्धि को देखकर भीतर ही भीतर तिलमिला उठता है।
हमारे समाज में सदियों तक ‘डायन’ शब्द का उपयोग उन स्त्रियों के लिए किया गया
जो—
स्वाभिमानी थीं,
बुद्धिमान थीं,
निर्णय लेती थीं,
और पुरुष-नियंत्रित व्यवस्था को स्वीकार नहीं करती थीं।
इन्हें डराने, नीचा दिखाने और समाज से अलग करने का यही सबसे कठोर हथियार था।
इसलिए कहानी में ‘डायन’ शब्द प्रतीक है—
उन विषैली मानसिकताओं का,
जो ईर्ष्या, कुंठा और असुरक्षा से भरी हुई हैं,
और किसी भी स्त्री के उन्नयन को सहन नहीं कर पातीं।
आपने सही कहा—
ईर्ष्या जब अपनी सीमा पार कर जाती है तो वह ‘नुकसान पहुँचाने’ वाली प्रवृत्ति का रूप ले लेती है। यही विचार कहानी में इस शब्द के चुनाव के पीछे था।
आपके इस प्रश्न ने मुझे प्रसन्न किया, क्योंकि इसका अर्थ है कि पाठक कहानी को जिया और सोचा, केवल पढ़ा नहीं। यही किसी लेखक के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि होती है ।
आपकी समग्र समीक्षा
आपने ‘आत्मबल’, ‘आत्मविश्वास’, और ‘जीवन-पथ में बाधाओं’ के संदर्भ में जो निष्कर्ष लिखा है, वह कहानी का मूल संदेश ही नहीं बल्कि एक जीवन-दर्शन भी है।
“रुकने का नाम मौत है, चलना है ज़िंदगी”—
आपने इस एक पंक्ति में पूरी कथा का सार कह दिया है।
आपके विचारों, आपके समय और आपके स्नेहिल शब्दों के लिए पुनः आभार।
यह मेरे लिए सम्मान की बात है कि मेरे लेखन ने आपके भीतर यह संवाद जगाया।
सादर
— सुनीता शर्मा