Monday, July 22, 2024
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आलोक शुक्ला की कहानी – बोलाई और चंपा

सुबह से हल्की–हल्की बरसात होते देखकर उसे बहुत कोफ्त हो रही थी, दो-तीन दिन से ऐसा ही मौसम था और कभी तेज़ तो कभी धीमी गति से लगातार होती बरसात मे छिपछिपाते हुए जाने के ख्याल से वो हमेशा खीझ उठता था, मन तो होता कि गरम-गरम पकौड़े खाते हुए चाय पिये और रेडियो पर गाना सुने पर दिक्कत ये थी कि अभी पिछ्ले ही हफ्ते चार महिने से साथ रह रहे उसके मॉ-बाप गॉव सतारा चले गये थे और खुद काम–धाम करने की उसकी आदत लगभग छूट ही गई थी जबकि उसे ही अब सब कुछ करना पड़ता इसलिए अपने इस इरादे को त्यागकर उसने अपनी नौकरी पर ही जाने की सोची । 
बोलाई… 
अपने नाम की हाँक सुनकर वो बड़े ही अनमने ढंग से पलटा , उसे कभी भी अपना नाम पसंद आता था पर मॉ-बाप के दिये नाम को बदलने की सोच भी उसके दिमाग मे नही आती थी , कहते हैं कि वो बहुत पटपट बातें करता था इसलिए लोगो ने प्यार से उसका नाम बोलाई रख दिया . 
प्यार के नाम से किसी को खीझ हो तो हो , भला प्यार से ऐसे वैसे नाम रखने वाला कभी सोचता भी होगा, ऐसी भी उम्मीद बोलाई नही करता था पर तकलीफ उसे तब होती थी जब चम्पा भी उसे इस नाम से झिडक देती कि सच ही तुम्हारा नाम बोलाई रखा ,बात करते हो तो रुकते ही नही…… और बोलाई चाहते हुये भी उसे कभी जवाब  में  ये नही कह पाता था कि भला वो पूरे मनोयोग से उसे सुनती क्यो थी ? ऐसा कि शायद उसकी बातों पर ज़िंदगी भर वो ध्यान लगाये बैठी रहेगी और ना ही ये कह पाता कि एक वो ही है जिसमे वो सब कुछ उड़ेल देना चाहता था लेकिन… 
बोलाई ने एक लम्बी सांस भरी और पलट कर अपने काम की ओर चला जिसके लिये उसे हाँक लगाई गयी थी, फिर वही चाकू-छूरी, अंदर का हाड़ मांस निकाल कर डॉक्टर को दिखाना औए सुई धाग़े से सिलना, बिसरा( कटे – फटे अंग ) को अलग रखना. हूअ..कहॉ तो उसके मॉ –बाप जूते सिल कर उसे डॉक्टर बनाने की चाहत रखते थे पर नियत ने उसे भी अपने बाप के धंधे मे ही लगा दिया बस फर्क ये कि उसके पिता मरे हुये जानवर की खाल काटते-छॉटते थे और वो मरे हुये इंसान की..बोलाई ने फिर एक गहरी सांस भरी और अपने सर को झटका. 
बोलाई ने कभी भी अपने काम के बारे मे खुद से कभी कोई सवाल नही पूछा था पर ऐसे ही एक दिन जब चम्पा ने उससे पूछा कि कैसा लगता है तुम्हे ये सब करने में ? तो पहले तो वो सोच नही पाया कि वो क्या बताये क्योकि ये सोचना भी उसे खीझ से भर देता था जिससे वो हमेशा बचता रहता था पर चम्पा के सामने बोलाई एकदम से ढुल जाता था.. 
चम्पा मरने के बाद भी इंसान की इंसानियत और हैवानियत के निशान उसके शरीर में मौजूद रहते हैं ..मै उन्हे काटता- छॉटता हुं, डॉक्टर की मदद करता हूं, शुरू मे सब बुरा लगता था पर जब ये मेरा काम ही बन गया है तो केवल जब तब खीझता रहता हूं,  पर.. पर ऐसा नही कि कुछ बुरा ही नही लगता …बुरा लगता है.. जब, जब लोग डॉक्टर को खरीदने की कोशिश करते हैं और तब … तब लगता है मैं डॉक्टर क्यों ना हुआ ..मैं डॉक्टर होता तो.. बोलाई की उद्दिग्न सांसों को महसूस करती चम्पा, उसकी बातों को सुनती चली जाती, उसकी सारी खीझ को पी जाती थी वो और अंत मे बोलाई का तंज दे कर कुछ और बातें करने लगती, कभी ऐसा भी होता था कि बोलाई उसकी जगह ले लेता और वो बोलाई बन जाती थी लेकिन बोलाई को कम ही ऐसे मौके देती थी चम्पा कि वो उसकी खीझ का गरल उसे पीने दे। 
चम्पा की ऐसी सोच ही नही बल्कि पूरा व्यक्तित्व ही बोलाई को भला लगता था । उसके मॉ –बाप जब तक उसके साथ रहे, उनकी ज़्यादा देखभाल चम्पा ही करती थी वर्ना बोलाई अपनी नौकरी के चक्कर मे मुर्दो के बीच या फिर उनके इंतज़ार मे झम्हाई लेने का इतना आदी हो गया था कि छुट्टियों में भी वो घर पर झम्हाई ही लेता रहता था या फिर खीझता रहता । 
बोलाई, बिसरा बांध दिया… पोस्टमार्टम रिपोर्ट बना चुके डॉक्टर आनंद ने उसे पुकारा था और बोलाई की हॉ को तवज्जो ना देकर बोला- ये रिपोर्ट पांडे जी को दे देना और कहना अपराधी को सज़ा होनी ही चहिये 
जी बहुत अच्छा… बोलाई ने प्रसन्न हो कर कहा, वास्तव मे डॉक्टर आनंद ही थे जो उसे चम्पा के बाद दुसरे ऐसे व्यक्ति थे जो बहुत अच्छे लगते थे. 
मनीबाई के इस केस मे उसके ससुराल वाले उन्हे खरीदने मे लगे थे जिससे उन लोगों को अपनी बहू के कत्ल के इल्ज़ामों से बचने मे मदद मिल जाय पर उनकी नज़र में गलत डॉक्टर की ड्युटी लग गयी थी क्योकि वो उन्हे तोड़ नही सके थे । 
अच्छा बोलाई कल पार्टी है घर आ जाना… डॉक्टर आनंद ने जाते-जाते बोला तो बोलाई एकदम से गुदगुदा गया क्योकि वो पहले भी उनकी पार्टियों में गया है, बहुत मज़ा आता है पर उसे एक बात से बड़ी खीझ होती है, अपने आप पर भी और दुसरों पर भी, दूसरों पर इसलिए कि मर्द और औरत, दोनों बडे ही खुलेआम ढंग से हाथ मिलाते थे…. गले मिलते थे, उसे समझ नही आता था कि लोग क्यों करते हैं ऐसा और, और कैसे कर लेते हैं पर कैसे कर लेने की ही बात पर वो अपने पर भी खीझता था कि वो क्यों नही कर पाता है ऐसे चम्पा को …हॉलाकि बोलाई को खुद ही इस बात पर हँसी भी आ जाती कि बातचीत में उंगली भी छू जाती है तो वो गड़बड़ा जाता है, गले क्या खाक मिलेगा वो चम्पा से …! 
बोलाई अच्छी तरह से इस बात को जानता था कि वो ऐसा कभी नही कर सकता इसलिए वो इस बात पर आगे ना सोचते हुए घर की ओर भागा क्योकि बरसात तो लगभग बंद हो गयी थी लेकिन रास्तों पर कीचड़ और पानी अभी भी बदस्तूर होगा इसलिए बेहतर यही था कि रात घिरने के पहले जल्द से जल्द घर पहुंचा जाए क्योंकि उसने दोपहर के खाने में तो दो बड़ा पाव से काम चला लिया था पर रात में तो उसे कुछ हल्का फुल्का कुछ बनाना ही पडेगा… । 
विविध भारती पर गाना सुनते हुए उसने खिचड़ी तो बना ली पर उसे मज़ा नही आया, बार– बार यही सोचता रहा कि चम्पा के यहॉ चला जाए पर मॉ – बाप के जाने के बाद से वो दो-तीन दिन से उसी के यहा खा रहा था इसलिए आज उसे वहां जाना ठीक नही लगा …. अचानक उसे लगा कि कोई दरवाज़े पर दस्तक दे रहा है, पहले तो उसने सोचा कि इतनी रात कौन होगा पर जब दस्तक तेज़ हो गयी तो वो उठ कर भागा और दरवाज़े को खोलते ही सामने चम्पा को खड़ा देख कर उसे अच्छा तो लगा पर अचरज भी हुआ कि इतनी रात गये.. क्या बात हो गयी..? 
इतनी देर क्यो लगा दी…दरवाज़ा खोलने में ? हूअ क्या आस–पास के लोगों को भी बताना था कि इतनी रात को कौन आया है तुम्हारे घर पर ? एक मीठी झिड़की देकर चम्पा कब बैठ गयी उसे पता ही नही चला और फिर उसकी इस बात पर बोलाई ने हड़बड़ाकर दरवाज़ा बंद किया कि अरे अब दरवाज़ा भी बंद करोगे या ऐसे ही खुला रखोगे…? 
चम्पा के परिहास के अंदर ठन ठन कर बजते खोखले पन को भांपकर बोलाई ने अपने को संयत करते हुए बोला “ कुछ खास “ ? क्योकि वो नही चाहता था कि चम्पा उसके इस भाव को जाने अगर वो ऐसा नही चाहती तो … 
अरे कुछ नही ..तुमसे बात करने का दिल चाहा… आ गयी.. अच्छा कुछ बनाया है ? ओ हो तो खिचड़ी खायी जा रही है और बिना पूछे वो खिचड़ी खाने लगी और बोलाई मेरी जूठी है बोलता ही रह गया । 
मैं बन की चिड़िया बन बन डोलूं रे ….. विविध भारती मे बजता हुआ यह गाना हवा मे तैर रहा था, माघ (जनवरी) की सी कड़ाके की ठंड से पूरी खोली ( कमरा ) कॉप सी रही थी..बल्ब से निकल रही पीली रोशनी पूरी खोली के माहौल को अजीब सा बना रही थी, इस अज़ीब से मरगुल्ले वातावरण के सन्नाटे को आखिर चम्पा ने ही तोड़ा “ बड़ी ठंड है “ और बोलाई ने कब “हॉ” बोला उसे खुद ही पता नही चला..कुछ सोच रहा था वो , चम्पा के गले लगने की तो कतई नही पर ये ज़रूर कि चम्पा का हाथ अपने हाथ मे ले कर उसकी ठंड को कम करे पर उसे लगा कि कही चम्पा उसे गलत ना समझे… काफी देर तक चुपचाप हवा की तरह दोनो चुप बैठे रहे । आज बोलाई, बोलाई नही चुपचाप था और चाहता था कि चम्पा, बोलाई बन जाए पर…. 
वातावरण में रेडियो के बंद होने की गू – गू की आवाज़, उन दोनों के बीच पसरे सन्नाटे को ज़ख्मी कर रही थी.. बोलाई उसे बंद करने के लिये बढ़ा ही था कि अचानक चम्पा उठी और “चलती हूँ” कह कर जाने लगी… 
चलो तुम्हे तुम्हारी खोली तक छोड़ आता हूँ…. बोलाई की इस बात पर चम्पा मुस्करा कर बोली .. मैं इतनी कमज़ोर नही हूँ ,
बोलाई .. बोलाई क्या कर रहे हो … शुरू करो अपना काम.. पोस्टमार्टम के लिए देर हो रही है…. और बोलाई एकदम से हड़बड़ा गया, डॉक्टर आनंद अगर थोड़ी देर और ना टोकते तो वो चम्पा को गले लगा ही लेता पर क्या वो ऐसा कर सकता था ? क्यों नही .. क्यों नही कर सकता था ..क्या वो उसके मरे पड़े शरीर को भी गले नही लगा सकता था ? बोलाई जैसे भरभरा ही गया था उसने कभी सोचा भी नही था कि कल रात को इतनी कमज़ोर नही हूँ कहने वाली चम्पा, आज जब वो अपनी नौकरी बजाने पहुंचेगा तो उसके साहस की परिक्षा लेने खुद चम्पा उसके सामने पड़ी होगी … उसे लग रहा था कि सब जगह आग लाग दे और डॉक्टर आनंद को बढ़ कर एक झापड़ रसीद कर दे , जो उसे बार – बार काम शुरू करने के लिए आवाज़ लगा रहे थे पर..पर वो वैसा कुछ भी नही सका वैसे ही जैसे वो चाह कर भी चम्पा को कभी गले नही लगा सका था क्योंकि कभी भी उसने अपने संस्कारों और मर्यादाओं को लांघने की नही सोची, वैसे भी नही जैसे डॉक्टर आनंद की पार्टियों में सहज होता है लोगों के लिये… और चम्पा के साथ तो कतई नहीं क्योंकि वो ब्याहता थी, एक बारगी बोलाई ने अपने सर को ज़ोर से झट्का.. उसे ना मालुम क्यों, अपनी सोच पर कोफ्त हो रही थी ..उसे लगा कि कल रात अगर वो उसे गले लगा लेता तो शायद आज वो उसके सामने इस तरह नही पड़ी होती.. पर पर वो ही क्यो ऐसा सोच रहा है क्या चम्पा अपना हाथ आगे नही बढ़ा सकती थी पर शायद उसका भी वही जवाब होता कि वो ब्याहता थी। 
शाम को आनंद की पार्टी में लोगों को गलबहिया करते देखते हुए चुपचाप खडा हुआ था बोलाई ..कुछ सोच नही सका… और हमेशा की तरह ना ही वो खीझा, आंखों की पोरों में आयी नमी को पोछता हुआ बोलाई पार्टी को बीच मे ही छोड कर, हल्के झिमझिमाते हुए पानी मे भीगता हुआ निकल पडा और वो भी बिना किसी खीझ के … 
बोलाई को अभी भी इस बात पर यक़ीन नही हो रहा था कि चम्पा मर चुकी है .. उसे लगा जैसे वो कोई सपना देख रहा था …. अचानक वो चिपचिपाती सड़कों पर तेज़ी से बदहवास दौड़्ने लगा ..उसे लगा वो घर पहुंचेगा तो थोड़ी ही देर मे चम्पा उसके दरवाज़े पर थपकी देते हुए अंदर आ जायेगी … वो वैसी ही गीली अवस्था मे पथराई आंखों से अपने कमरे मे बैठा चम्पा का इंतज़ार करते हुए अचानक इतनी ज़ोर से रोने लगा कि शायद उसने चम्पा की लाश के सामने रोया होता तो वो ज़िंदा हो कर उठ जाती और बोलाई को अपने गले लगा लेती…. इस सबके बीच चम्पा की मौत बोलाई के ज़हन में रह रह कर एक सवाल बन कर उभरती रही कि आखिर उसने आत्म्हत्या क्यों की…..? 
चम्पा……. 
चम्पा , जो हमेशा दुसरों के मन में एक सवाल बन कर उभरती थी खुद के लिए भी कभी एक सवाल से ज़्यादा कभी कुछ नही रही जिनके जवाबों को वो ढूढती फिरती रहती पर वो ये जानती थी कि वो खुद के लिये कितना ही बड़ा सवाल हो दुसरों के लिये बड़ा ही लज़्ज़तदार जवाब होती थी,जिसके आस – पास भी होती वो खुद को जीवन से भरा हुआ पाता लेकिन इस सबमें होता ये था कि चम्पा खुद में हर जगह अनुत्तरित ही रह जाती । 
हर जगह , हर आदमी जिसमें उसका पति रम्मैया भी शामिल था, उसमें अपने जवाब ढूढता रहता और चम्पा हंसती- मुस्कराती हुई सबके सवालों का जवाब देती , सामने वाले की खीझ का गरल पीते हुए कब की नीलकंठ बन गयी थी उसे पता ही नही चला और कभी उसे अपने नीलकंठ बनने का एहसास होता भी तो उस पर मन ही मन मुस्कराती और फिर इस बात को भूल जाती लेकिन ये बात भूलना ही उसके लिये घातक हो गया क्योकि वो भगवान नही इंसान थी और चाह कर भी वो लोगों की खीझ के गरलपान से हुए प्रभाव से अपने को मुक्त नही कर सकती थी। 
हुआ भी यही, यकबकक उसे अपने जीने का कोई कारण नही समझ नही आया तो वो मर गयी क्योंकि जीने के हज़ार बहाने होते हैं तो मरने का सिर्फ ये कि वो मर जाय.. पर अब इसका क्या कहा जाए कि चम्पा के जीने का हज़ारवॉ बहाना बोलाई के यहॉ उस रात जाना बन पड़ा था.. बन गया इसलिए कहना पड़ रहा है कि क्योंकि यक़ीन मानिए चम्पा कतई मरना नही चाहती थी.. वो तो हंसने-खेलने वाली नन्ही बच्ची थी जो खुद को भी बिना बताये कब जवान हो गयी पता ही नही चला. 
अभी कुछ समय पहले की तो बात है जब लतखौरी गावॅ के गुमरैहटा टोले की धूल धुसरित गलियों में इचकदाना-बिचकदाना करती हुई नन्ही चम्पा एकदम नये कपड़े पहन कर पूरे घर में इतराती फिर रही थी कि तभी उसके बापू रामखिलावन ने आवाज़ लगाई ‘बिट्टो’ चम्पा के बापू उसे इसी नाम से बुलाते थे ‘ चल आ , मंडप मे आ के बैठ’ ..
वो मना करना चाह रही थी पर नही कर सकी क्योंकि उसकी माई कंचनिया ने इसी शरत पर तो उसे नये नये कपड़े दिलवाये थे, सो तेरह साल की हंसती –खेलती नन्ही चम्पा , चौदह साल के रम्मैया से उस शाम ब्याह दी गयी जिन्हें ब्याह के मायने भी नही पता थे सिवाय इसके कि नये –नये कपड़े और अच्छा खाना मिलता है हॉलाकि रम्मैया इस मामले मे ज़्यादा खुश था क्योकि उसे नये कपड़ों के साथ नये जूते भी मिले थे जिसे उसने बापू के साथ दुकान मे बैठ कर नही सिला था बल्कि किसी और दुकान से खरीदे गये थे । 
चम्पा ,ब्याह के दो साल बाद ही गौना करके रम्मैया के साथ भेज दी गयी। इन दो सालों में अपनी सहेलियों के साथ हंसते बोलते हुए चम्पा पूरा नही लेकिन थोड़ा बहुत ब्याह का मतलब समझ पायी थी उसमे गौना के पहले अपने पति रम्मैया की भेजी वो चप्पले भी शामिल थी जिसके पहनते ही उसे गुदगुदी होने लगती थी हॉलाकि इस गुदगुदी ने उसे गौना होने के बाद रम्मैया के साथ शुरू की कुछ रातों ने बहुत तक़लीफ पहुँचाई.. ऐसी कि वो अचकचाई सी रहने लगी थी … उसे अपने गॉव मे रत्ती , अँगुली , विक्कू और गुड्डी के साथ खेलना खुब याद आता था ,मॉ के साथ चिपक कर सोना तो उससे कही ज़्यादा याद आता था .. इस याद आने में उसे अपने मामा का लड़का दद्दू खुब याद आया .. कितना चिपकता था उससे और कैसे एक दूसरे के कपड़े उठा कर …छी.., चम्पा को शरम के साथ दद्दू के ऊपर खुब गुस्सा आया .. ये अलग बात थी कि उसे तब कुछ महसूस नही होता था लेकिन दद्दू तो उससे दो साल बड़ा था उसे तो ज़रूर इस बारे में पता होगा.. नही तो भला क्यूं देखने दिखाने की चुहल करता’ बदमाश.. राक्षस कही का ‘ चम्पा सोच में ही बड़बड़ाई। 
अरे चम्पा किसे गाली दे रही है …सॉझ घिर आई और तैने अभी तक दिया-बत्ती तक ना की ? …. अपनी सास रतिया की आवाज़ सुन कर चम्पा भागी दिया बत्ती के लिए। अपनी सोच में कब शाम हो गई उसे पता ही नही चला था .. पर अब ये तो जैसे आये दिन का किस्सा बन गया था, इसे देख कर चम्पा को कुछ दिन उसके मायके भेजने का सोचा रम्मैया के घर वालों ने। 
चम्पा ने गॉव पहुँचते ही सबसे पहले दद्दू से मिलने की ज़िद की और फिर लोगों ने सुना कि बात बात में चम्पा ने दद्दू को एक ऐसा झापड़ रसीद किया कि पूछो मत और अभी कुछ ही दिन हुए थे सबके साथ हँसते-बोलते हुए कि उसने खुद ही रम्मैया को लिवा ले जाने के लिये संदेशा भिजवा दिया, ऐसा लगता था जैसे गॉव वो दद्दू को झापड़ मारने ही आयी थी।
चम्पा हमेशा ही ऐसा प्रतिकार तो नही कर सकी पर समाज में औरत को महज एक मांस का लोथड़ा समझे जाने की फलती – फूलती संस्कृति के बीच जहॉ ढूढें से भी कोई इस सबसे परे ना दिखे फिर वो चाहे उसका सगा हो या पराया जबकि उसे इन्ही के इर्द गिर्द सांस लेना हो तो ऐसे में वो हमेशा दद्दू जैसा प्रतिकार तो नही कर सकती थी पर ऐसा भी नही कि उसने प्रतिकार करना ही छोड़ दिया । 
अब जैसे ढेर सारा इत्र लगाये रम्मैया के दोस्त बदलू के मन की दुर्गंध को बखुबी महसूस करने बाद भी वो कुछ इस तरह अंजान और सहज बनी रहती थी कि बदलू उसे केवल ताक सकता था और ताकने देने मे भला किस औरत का क्या बिगड़ता था पर चम्पा यहॉ अपनी शरारत से बाज़ नही आती, वो ऐसे लोगों को भईया या भाईसाब कह कर नैतिकता के धरातल मे ऐसे लूटती – पीटती कि बेचारा उसे ढंग से ताक भी नही पाता पर चम्पा का सामने वाले की आंखों में चुभता नाक-नक्श कुछ इस तरह असर डालता कि सारी नैतिकता की ज़मीन बंज़र हो जाती थी.. इसमे रम्मैया का एक और दोस्त माधव बड़ी मुस्तैदी से खड़ा रहता‌। 
जब तब साथ खाना खाते हुए माधव, रम्मैया के सामने ही हॅसी- हॅसी में अपनी हसरत कुछ ना कुछ कह कर ज़ाहिर करने लगता और ऐसे ही एक दिन वो बोला ‘बंदर के नसीब में हूर लगी है..मुझे पहले पहले मिली होती तो’ और फिर ज़ोर से ठहाका लगाने के बाद अरे ..‘ भौजी अभी भी देर ना हुई तु कहे तो तेरे को भगा ले जाऊ ? 
ऐसे मे बेचारा रम्मैया महज हॅस कर रह जाता ,उसे ये सब हॅसी ठिठोली ही लगती हॉलाकि चम्पा इस सब की हक़ीक़त को बड़े अच्छे से समझती थी इसलिए इस हॅसी मे ज़्यादा साथ नही देती.. वो कुछ जवाब देने को सोचती ज़रूर थी पर ऐसी बातें ना ही बढाए वही ठीक पर इस सबमें वो अपने पति की सहजता के प्रति एक गर्व से भर जाती थी हॉलाकि ये गर्व जब – तब टूटता भी था और कही नही तो रोज़ रात में एक व्यतिरेक से भरे सहवास के दौरान तो टूटता ही था ….. 
ये रोज़नामचा उसे ज़रा भी नही भाता था , आखिर प्यार भी कोई चीज़ है पर ये अज़ीब बिडम्बना थी कि जिसकी उसे सबसे ज़्यादा ज़रूरत महसूस होती थी वो उसे गाहे –बगाहे ही मिलता था …. अपने इस रोज़नामचे के बारे मे सोचती तो वो एक अज़ीब सी वितृष्णा से भर जाती थी इसलिए चम्पा इस बारे मे ज़्यादा नही सोचना चाहती थी बिलकुल एक ब्याहता भारतीय नारी की तरह ।
ऐसे ही भारतीय नारी की परम्परा का पालन करते हुये वो गर्भवती भी हो गयी, सोलह की देहरी लांघ, सत्रहवे वसंत की नर्म हवा उसे गर्म लगने लगी थी, वो अभी इस सबके लिए किसी भी रूप मे तैयार नही थी और शायद यही करण था कि बच्चा उसके पेट मे भी नही ठहरा और एक दिन अत्यधिक रक्तश्राव के साथ वो अनचाहा जीव बह गया… इस सबमें सबको दुखी देखकर चम्पा को भी दुख लगा लेकिन अनचाहा ना होने से उसने राहत की सांस भी ली.. । 
चम्पा की ये राहत सांस उसके जीवन का अभिशाप बन गयी, ना जाने विधाता का ये कैसा न्याय था उसके साथ कि उसकी संतान ना चाहने की मर्ज़ी पूरे जीवन भर के लिये उसके शरीर की भी मर्ज़ी हो गयी क्योकि जब उसने कुछ सालों में बच्चे की इच्छा की तो डॉक्टर्स ने बोल दिया कि उसका गर्भाशय बेहद कमज़ोर है और उसका मॉ बनना सम्भव नही..। 
चम्पा अपने को इस बात के लिये कोसना चाहती थी पर ना-मालुम क्यों ज़्यादा कोस नही पायी शायद एक बच्चा जो उसके अंदर था दूसरे बच्चे के लिये तैयार नही होता होगा. धीरे –धीरे इस बात से सास रतिया, पति रम्मैया और खुद चम्पा बेहद असहज हो चले … रम्मैया के बापू रामआसरे, अपनी छोटी सी जूते चप्पल बनाने की गुमटी रम्मैयाके हवाले करके अपने गॉव लातूर चले गये और सास रतिया अपने पोते की चाह मे रूकी हुई थी सो अब वो कब तक रुकेगी , इसका कोई भरोसा नही था । 
गलीज़ सी बस्ती के धुंधहे से वातवरण में चम्पा बेहद अकेली होती चली जा रही थी, रम्मैया दिन भर टूटे-फुटे जुते-चप्पलों को जोड़ कर और सिल कर जब अपनी दो कमरों की खोली मे पहुँचता तो खुद के साथ सबको भी टूटा-फुटा ही पाता पर इसे वो सिल नही पाता ना ही जोड़ पाता …..। 
इस टूटहे से माहौल मे रम्मैया खुब पीने लगा जिसमें गाहे – बगाहे माधव और बदलू भी खुब साथ देते थे.. फिर तो ये रोज़ का सिलसिला हो गया… ये सब देख, चम्पा चाह कर भी कुछ नही कर पाती थी.. पीने के बाद रम्मैया के दोनों दोस्त उसकी ओर ललचाई हुई निगाहें डालते हुए चले जाते तो रम्मैया चम्पा को मांस के लोथड़े की तरह देर तक झिझोड़ता रहता और चम्पा निचुड़ कर कुछ देर तक तो उसी तरह बिस्तर में पड़ी रहती पर फिर तेज़ी से उठती.. देर रात देर तक नहाती और फिर बाहर जा कर काफी देर तक बैठी रहती … यूं ही आसमान को ताकती हुई…..।
इसी ताकने में देर रात अपने काम से लौटते बोलाई से कब उसकी जान- पहचान हो गयी.. उसे पता ही नही चला…. हुआ यूं कि  जब बोलाई ने कई दफा चम्पा को ऐसे देर रात बाहर बैठे हुए देखा और फिर जब धीरे –धीरे उन दोनों की अजनबी सी मुस्कराहट, पहचानी सी हो गयी तो उसने एक दिन बड़ी हिम्मत करके बोला कि इस तरह देर रात बाहर बैठना ठीक नही… ये अलग बात थी कि यही बात उन दोनों के लिए एक नये सिलसिले की शुरूवात भी बन गयी थी .. दोनों अपनी ज़िंदगी से ऊबे हुए थे सो दोनों को एक दुसरे का साथ भी भाने लगा । 
चम्पा की सूखी ज़िंदगी में बोलाई उसे एक ताज़ा हवा के झोके की तरह सिहरा देता था, बोलाई की सादगी और उससे मिलता एक असीम प्यार भरा सम्मान , जो चम्पा को कहीं भी और कभी भी नसीब नही हुआ, के कारण उसको बोलाई का साथ खूब भाने लगा. बोलाई भी अब मौके –बेमौके उसके यहॉ आने –जाने लगा…..पहले तो इस बात से किसी को कोई एतराज़ ना हुआ पर बाद में ये बात रम्मैया और सास रतिया को नागवार गुजरने लगी पर इस बात से चम्पा को कतई फर्क न पड़ता.. शायद ये उसका अपनी जली – कटी ज़िंदगी से प्रतिकार करने का अपना एक तरीका था । 
ऐसे मे, पोता ना दे पाने के कारण चम्पा से पहले से नाराज़ सास रतिया, रम्मैया का दुसरा ब्याह करने की बात कह के गॉव चली गयी तो रम्मैया जो पहले चम्पा से कम झिकझिक करता था . अब और झिकझिकाने लगा और चम्पा के केवल हॉ.. हुं.. से ज़्यादा ना बोलने पर वो और गुस्सा करने लगता.. ऐसे ही एक दिन जब बात आगे बढ़ गयी तो वो बिना खाना खाये ही बोलाई के यहां चली गयी कि जब लौट कर आयेगी तो रम्मैया का गुस्सा शांत हो जायेगा और खुद भी वो अपने मन को शांत कर सकेगी… क्योकि आज जिस तरह से रम्मैया उसे मारने को बढ़ा था उससे वो आज बड़ी उदिग्न हो गयी थी, वैसे भी, जब भी रम्मैया, बोलाई से उसके गलत सम्बंधों की बात करता, तो वो बड़ी आहत होती थी जिसका वो हमेशा प्रतिवाद करती थी क्योकि एक तो ऐसा सचमुच कुछ नही था और अगर होता भी तो शायद वो बुरा नही मानती.. 
हॅ… अपनी आखिरी सोच पर उसे बहुत अचरज हुआ कि भला वो ऐसे कैसे सोच सकती थी… शायद ये उसके मन के अंदर वो दबी हुई चाहत थी जो गुस्से में ही बाहर निकलती थी.. एक प्रतिकार के रूप में बोलाई के सादगी से भरे साथ की चाहत, लेकिन यही वो बात भी थी जो बोलाई से इतना मिलने – जुलने के बाद भी, एक दूरी बना कर रखती थी क्योकि वो बोलाई की सच्चाई को उसके अपने प्रतिकार के रूप मे पैदा हुए प्यार से धोखा नही दे सकती थी.. और बोलाई भी कमोवेश ऐसे ही हालात में चम्पा से बनी दूरी को बनाये रखता था कि एक अच्छी सोच और सूरत वाली उसके पड़ोस की ब्याहता, उसकी अच्छी दोस्त है यही बहुत है 
बहरहाल चम्पा, बोलाई के यहां थोड़ी देर बैठ कर थोड़ी बहुत सयंत तो हुई पर उतनी नही जितनी हुआ करती थी.. 
देर रात चम्पा ने बोलाई के यहॉ से आकर जैसे ही अपने घर की देहरी लांघी… उसके सामने दारू के नशे मे धुत रम्मैया और उसके दोनों दोस्त बदलू और माधव मज़े लेते हुए बैठे थे, उसका दिमाग तो भनभना गया पर वो उन पर ध्यान ना देते हुए अपने अंदर वाले कमरे मे पहुंच कर बिस्तर पर ढुलक गयी…उसकी पलके भारी हो रही थी वो सो जाना चाहती थी पर उसे मालुम था कि रम्मैया अभी आयेगा और फिर जब तक उसको कुत्तों की तरह खरबोट नही लेगा, सोयेगा नही सो अनमनी सी वो जागती रही.. इसी सोने -जागने मे उसने सुना कि बदलू बोल रहा है कि’ भई रम्मैया ,बुरा मत मानना पर बोलाई के साथ सोती है तेरी बीबी और तु कुछ नही करता… तो फिर हम क्या बुरे हैं.. हमें भी थोड़ा मज़ा करने दे’ और फिर जो जवाब रम्मैया ने जवाब दिया उसने चम्पा के दिल दिमाग में गर्म लोहा सा कुछ पेवस्त कर दिया.. जाओ आज तुम दोनों भी इस रंडी का मज़ा ले लो .. साली मेरी तो सुनती नही …
चम्पा उठ कर चिल्लाना चाहती थी पर पता नही क्या हुआ वो यूं ही निश्चल पड़ी रही…ना जाने ये कैसा उसका प्रतिकार था … उस निश्चलता में कब बदलू आया या कब माधव आया या फिर कब उसका तथाकथित पति रम्मैया आया.. उसे पता नही चला..फिर जब उसकी तंन्द्रा टूटी तो उसने देखा रम्मैया उसके बगल में नंगा पड़ा हुआ है और वो उसी के बगल में नोंचीखसोटी हुई पड़ी हुई है.. वो एकदम से उठी.. जैसे कोई बिच्छू उसके बगल में आ गया है .. एक बारगी उसका मन हुआ कि बगल में पड़ा हुआ हंसिया उठाये और रम्मैया का गला काट दे . पर.. पर .. वो ऐसा नही कर सकी .. वो , वो कहीं दूर बहुत दूर भाग जाना चाहती थी.. ऐसी ही नोंची – खसोटी हालत में… अचानक सॉय-सॉय करते उसके दिमाग में उसे लगा कि जैसे उसके पूरे बदन में कीड़े बजबजा रहे हैं.. वो गला फाड़ के रोना चाहती थी पर ना- मालूम क्यूं वो रो भी नही पा रही थी….. वो यूं ही काफी देर निढाल सी पड़ी रही.. फिर वो तेज़ी से उठी और अलमारी के ऊपर रखी कीड़े मारने की दवा उठा ली .. उसे लगा, वो उसके बदन में बज बजा रहे कीड़ों को ज़रूर मार देगी… उसने एक सांस में सारी दवा गटक ली….. अंदर कुछ मथने सा लगा पर उसे उसने बाहर नही आने दिया ..पर फिर ऑख से अचानक बह आये आंसुओं को वो नही रोक पायी…..थोड़ी देर बाद सब शांत हो गया .. उसके दिल –दिमाग के सारे कीड़े मर गए… । 
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यही निकला कि ( खूब सारा सेक्स करने के बाद ) चम्पा ने आत्महत्या कर ली थी पर क्या सच यही था ? चम्पा ने तो कीड़े मारने की दवा ,अपने बदन के कीड़े मारने के लिया पिया था जो इस गलीज़ समाज ने उसमे पेवस्त कर दिये थे .. अब इसमें वो भी मर गयी तो इसमें उसकी क्या गलती ..? वो तो जीना चाहती थी .. वो मर ही नही सकती थी .. वो मरी नही .. कम से कम बोलाई तो यही मानता था कि उसकी चम्पा अभी भी जीवित है और कही से निकलकर आयेगी और बोलेगी.. ‘ बोलाई’ ।
आलोक शुक्ला
रंगकर्मी, लेखक, निर्देशक एवम् पत्रकार
जन्म -25 अगस्त 1969, बांदा (यूपी)
शिक्षा – बी एस सी
स्थाई पता -रीवा (मध्य प्रदेश)
अस्थाई पता -दिल्ली_110092
1986 से श्री हबीब तनवीर, सागर सरहदी, रंजीत कपूर, प्रो सतीश मेहता, शिवदास घोडके, योगेश त्रिपाठी आदि के साथ नया थियेटर और अपनी संस्था प्रासंगिक से सतत रंगकर्म
प्रकाशित पुस्तकें
1 -नाट्य संग्रह “ख्वाबों के सात रंग” -2021
2 -संस्मरण/आत्मकथ्य “एक रंगकर्मी की यात्रा” 2022
इंडिया नेटबुक्स नाट्य रत्न साहित्य सम्मान- 2022
सीनियर फेलोशिप अवॉर्ड -2018 (सीसीआरटी, कल्चर मिनिस्ट्री)
बेस्ट एक्टिंग अवॉर्ड- मध्य प्रदेश अष्टम लोकोत्सव -1989.
बेस्ट एक्टिंग अवॉर्ड- महाराष्ट्र राज्य हिंदी नाट्य स्पर्धा -1997
फीचर फिल्म _ धन्ना, पहेली, डरना ज़रूरी है आदि
लघु फिल्म _ हलुआ, तुम हो
सीरियल _ शान्ति, स्वाभिमान, योर ऑनर, रूमानी दुनिया, मिसिंग, क्योंकि सास भी कभी बहू थी, कितनी मस्त है ज़िंदगी, एक नया सवेरा आदि
टीवी चैनल _ स्पेस टीवी, न्यूज एक्सप्रेस, प्रज्ञा टीवी,महुआ टीवी, मितवा टीवी आदि
संपर्क-9999468641
[email protected]
आलोक शुक्ला
आलोक शुक्ला
टीवी मीडिया में कई वरिष्ठ पदों पर रहे. अपनी रंग यात्रा में पुरे भारत के साथ यूरोप (जर्मनी) के कई शहरों में शोज किये, ट्रेवल शो बनाये और डरना जरूरी है व पहेली फिल्म के साथ कई लघु फ़िल्मों और धारावाहिकों मे काम किया. संस्कृति मंत्रालय ने 2018 में लोक रंगकर्म पर सीनियर फेलोशिप अवार्ड से सम्मनित. संपर्क - 9999468641
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