“नहीं शिवेन, सब कुछ फिल्मों जैसा नही होता है।”
गार्गी ने अपना पिट्ठू बैग लादा और जूतों के तस्में बांधने लगी।
“लेकिन तुम ही तो कहती थी, मेरे साथ चलना अच्छा लगता है, सपने देखना फिर से शुरु किया है।” शिवेन मिमियाया।
“ये तो मैं अब भी कहती हूं, लेकिन इसका मतलब रुक जाना तो नही है।” गार्गी ने अब वेस्ट बैग में भी सामान भर लिया था।
“मैने तुम्हें लेकर बहुत संजीदा होकर सोचा है गार्गी।” शिवेन गंभीर था और उसका स्वर गार्गी के मन तक पहुंचने की कोशिश में।
“देखो शिवेन..” 
गार्गी ने मजबूती से उसके दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। शिवेन की डबडबाई आंखों को धुंधला दिखाई दे रहा था।
“मुझे भी तुम पसंद आने लगे हो लेकिन सच कहूं, तो मैं उतनी अच्छी नहीं हूं जितने तुम हो।” गार्गी ने शिवेन की आंखों में झांककर कहा।
“ये तुम क्या कहे जा रही हो! मैं तो हर तरीके से…”
“हां, तुम वो सब कुछ कर पाओगे मेरे लिए जिससे मैं खुश रह सकूं। लेकिन यकीन मानो, मैं चाहकर भी अपने आप को बदल नही पाऊंगी।” 
गार्गी ने झटके से मुड़कर अपनी भरी हुई आंखें छुपा ली।
“तुम कहो तो मैं इंतज़ार करुंगा तुम्हारे लिए।”
शिवेन अब जोड़ तोड़ पर उतर आया था।
“नही शिवेन, ये नई दुनिया का अभिशाप है हमारी पीढ़ी पर। हमने कम उम्र में ही दुनिया जो देख ली है। अब हमारे फैसले पहले की तरह आसान नही रहे। मुझे आज खुद पर ही यकीन नही है कि मैं अपने प्यार को निभा भी पाऊंगी या नही। वाकई, इसलिये ही भाग रही हूं।” 
गार्गी ने अब अपने आंसू नहीं छुपाए। सुबकते हुए अपने आप को ही थामा और बिल्कुल भी नही चाहा कि शिवेन उसे सहारा दे। और शिवेन भी, पारंपरिक स्नेही पुरुष के खोल में घुसकर गार्गी से अपने समर्पण और प्रेम की कोई कैफियत नहीं मांग पाया।
गार्गी चली गई।
शिवेन लौट आया।
देखा जाए, तो ये सब बरसों पहले से शुरु हो गया था। गार्गी का खूब सारा पढ़ना, उसके माता पिता का अपनी सारी सुप्त आकांक्षाओं का उसपर लाद देना। गार्गी का उन सभी को झटककर अपनी राह खुद बनाना। खूब पढ़ना और खूब कमाई करना। अपने निर्णय स्वयं लेना। अब माता पिता भी उसपर बलिहारी जाते, कि खुद को खोजने का जो समय और मौका उन्हें नहीं मिला, वो बेटी को मिल रहा है। या फिर, वो ले रही है अपने हक को इस दुनिया से। 
इन सारी परीकथाओं सी बातों में गार्गी के मन में उसके माता पिता जब तब एक राजकुमार की छवि भी बोते रहते थे। लेकिन गार्गी अकेले ही, लगभग उन सारे रास्तों पर चलने की अभ्यस्त हो चुकी थी जिसके लिए पारंपरिक रुप से किसी पुरुष के कंधे की जरुरत होती है। उसके सामने खुला आकाश था। माता पिता को लगता कि गार्गी शायद उनसे दो तीन पीढ़ियां आगे बढ़ गई है। थोड़ी सी भी कमी बेशी होती, तो वे शायद कहीं न कहीं कुछ करने की स्थिती में थे। लेकिन अनुभव, धनसंग्रह, आत्मनिर्भरता और दुनिया की अलग अलग संस्कृतियों के अभ्यास के चलते अब वह घर की कम उम्र की बुजुर्ग सी बन गई थी।
और इन्हीं दिनों में गार्गी को एक साथी भा गया था। उसी के जैसा घुमक्कड़, उतना ही आत्मनिर्भर, अपने निर्णय लेने वाला और जीवन को अपने स्वाद के अनुरुप ढ़ाल पाने की हिम्मत रखने वाला। विवेक अपने आप में सब कुछ पाने के बाद भी जीवन शुरु नही कर पाया था। उसमें कहीं से कहीं तक कोई कमी ही नही थी। बिल्कुल गार्गी के ही जैसा। दोनों जब मिले, तो ये जानते थे कि उनके पास खोने को कुछ भी नही है। और यदि दोनों में से किसी ने भी अलग रास्ता चुन लिया, तो किसी का कोई नुकसान नही है।
गार्गी ने कभी नही सोचा था, कि विवेक किसी दूसरी लड़की को अपने जीवन में ला सकता है। अनुभव के आधार पर गार्गी सही भी थी। विवेक लंबे समय तक गार्गी के साथ बना रहा। उसकी बातों में, भविष्य के सपनों में और कुछ साझे निर्णयों में भी।
गार्गी के माता पिता का पारंपरिक सपना पूरा होने को था। दामाद के रुप में गार्गी की पसंद भी लाजवाब ही होगी, यह सोचकर जब उन्होंने गार्गी की पसंद पर मोहर लगाते हुए सीधे ही कहा, कि उन्हें कुछ भी जानने की जरुरत नही है अब! वे तैयारी करना चाहते हैं शादी की। तब पता नही क्यों गार्गी खुश नही हो पाई थी। 
माना कि उसने बहुत कुछ पाया है जीवन में, लेकिन कहीं तो थोड़ी खोजी भूमिका का निर्वहन हो पाता, कहीं तो उसके माता पिता उससे कहते कि तुमसे दूर हो जाएंगे, तुम विदा हो जाओगी। उन्हें क्या उसके दूर हो जाने का दुख नही? लेकिन हमेशा की तरह गार्गी ने स्वयं को सम्हाला। पढ़ाई और आगे नौकरी, व्यवसाय के सिलसिले में बाहर जा रही बेटी को लेकर चिंतित रहने वाली मम्मी को उसने ही तो मजबूत बनाया है! अपनी सुरक्षा और आर्थिक मामलों, दस्तावेजों को लेकर सतर्क रहने का पाठ पढ़ाने वाले पापा को उसने ही तो अपने उत्तम प्रबंधन का कायल बनाया है। फिर जब आज वे उसके ही पढ़ाए हुए पाठ रटकर उसकी पसंद पर मोहर लगाते हुए बेहतर माता पिता होने का प्रदर्शन कर रहे हैं, तब ऎसा क्यों लग रहा है कि सोने की थाली में परोसे गए ऊंचे पकवानों के स्वाद में कोई अनकही कमी है!
मन के एक कोने में गार्गी ने चाहा था कि मम्मी उसे कुछ गृहस्थी के पाठ सिखाए समझाए, कैसे उन्होंने संघर्ष किया था, उन पन्नों को एक बार फिर से खोलकर दिखाए। लेकिन मम्मी की रटी हुई संघर्ष गाथा को बचपन में ही सुनकर उसने निषेध व्यक्त कर दिया था। उन्हें सुना दिया था कि वो अपने आप को इन संघर्षों में पिसने के लिए नही, अपनी सफलता की गाथा स्वयं लिखने के लिए तैयार करने वाली है। उसने अपने आप को तैयार किया भी। लेकिन आज मम्मी के चेहरे पर उन संघर्षों में तपकर आने वाली शुद्ध घी की लुनाई, उसके महंगे प्रसाधनों से घिसे जा चुके चेहरे पर क्यों आने को तैयार नही है?
कोई बात नही, हमें शायद दुखों से प्रेम करने की आदत होती है। यह कहकर गार्गी सिर झटक देती थी। साथ ही झटक देती थी उन सारे प्रश्नों को भी, जो वह विवेक से पूछना चाहती थी। उनमें कोई वादा नही था, शादी का भी नही। लेकिन एक प्रश्न जरुर मन में कुलबुलाता था। कि उन्हें शादी करना और साथ रहना क्यों है आखिर? क्या सामाजिक दबाव है? या कोई कमी है दोनों में जो साथ रहने से पूरी हो जाएगी? और इन प्रश्नों के सही उत्तर दोनों के ही पास नही थे।
गार्गी की मम्मी साड़ियों की पेटियों में रखे रेशम और गोटापट्टी पर हाथ फेरती रहती, गहनों के मखमली बक्सों में सजी सोने, हीरे, जड़ाऊ की नाज़ुक कलाकारी पर बलिहारी होती रहती। कल्पना करती रहती कि कब इन वस्त्राभूषणों का भाग्य जागेगा और वे परंपरागत रुप से गार्गी को सजा पाएंगे!
लेकिन मम्मी की कल्पना यथार्थ में बदल पाती, इससे पहले ही विवेक का वैराग्य जागृत हो गया। वह और गार्गी, जीवन साथी के रुप में तो एक दूसरे के अलावा और किसी की कल्पना करने के लिए तैयार नही थे। लेकिन विवाह उन्हें क्या दे देगा? ऎसा क्या अलग हो जाएगा जो उनके अकेले के जीवन में वे नही पा सकते? इन सारे प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर उन्हें नही मिल पा रहे थे। दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति, वंशबेल और परिवार आदि की अवधारणाएं वैसे भी उन्हें बांध पाने में असमर्थ थी। यह जरुर था कि इस मानसिक बवंड़र को भी उन्होंने अपने अपने माता पिता के समक्ष रखा अवश्य था। लेकिन अपने इतने काबिल बच्चों के लिए निर्णय लेना और उन्हें सही राह दिखाना शायद वे भूलने लगे थे।
दोनों के अभिभावकों ने उन्हें सोच समझकर निर्णय लेने, थोड़ा समय रुककर एक दूसरे को और समझने और विवाह सलाहकार आदि के पास जाने जैसी सलाह दी। इन सारे प्रकारों में गार्गी और विवेक को कहीं से भी अपने प्रश्नों के उत्तर मिलते दिखाई नही दे रहे थे। 
जीवन एक ड्रोन शॉट के वीडियो के समान चल रहा था। नीले हरे समुंदर के आस पास कभी रेतीले तट, तो कभी विशालकाय चट्टानें, जंगली फूल, झरनों से फूटता सौंदर्य और सूर्यप्रकाश को एक विशेष कोण से दिखाता सतरंगी सौन्दर्य। इन सभी के बीच पथरीली सच्चाई, दरकती ज़मीन और रिश्तों की महत्ता दर्शाती पहाड़ी ऊंचाई कहीं नही दिखाई देती। पार्श्व में यदि मधुर और प्रवाहमय संगीत का साथ हो, तो लगता है हमने उस अनकहे सुर को पा लिया है जो कभी कभी अंतस में हिलोरे लिया करता था।
लेकिन जब बाहर आते हैं इस कल्पना विलास से, तो भूख, स्वास्थ्य, स्वाभाविक अपेक्षाएं और जमीनी जीवन अपनी पूरी पूरी सच्चाई के साथ सामने खड़ा होता है। समेटना होता है स्वयं को और झोंक देना होता है अपने आस पास लपेटी हुई ’मैं’ की अहंकारी दीवार को, समर्पित होकर सींचना होता है कुछ रिश्तों को, मानवीयता को और समाज को भी।
एक उम्र होती है जब ये सब नही सुहाता। शायद उसी उम्र में विवाह की महत्ता को स्वीकार करना भी सहज होता है। क्योंकि जो आपके पास नही है, वह साथी से आसानी से मिल जाता है। संघर्ष भी साझे होते हैं और स्वाभाविक रुप से आनेवाला अवलंबत्व इस संबंध को गाढ़ा करने लगता है।
लेकिन इन सारी परिभाषाओं से परे था गार्गी और विवेक का संबंध। विवेक को नही मिले अपने प्रश्नों के उत्तर। गार्गी ने भी झूठ बोलकर परंपरा के प्रति अपनी अनभिज्ञता को छुपाने का कोई प्रयत्न नही किया। पारदर्शी थे दोनों और यह प्रकट ही था कि दोनों इतने पूर्ण और सिद्ध हो गए हैं, कि जीवन में पाने को कुछ बचा ही नही है भौतिक रुप से।
और तब विवेक ने इस बाहरी यात्रा को विराम देकर अपनी अन्तर्यात्रा शुरु कर दी थी। पहले तो खण्डहरों में घूमकर अपने अन्दर के खोखलेपन से परिचय पाया। फिर कुछ तीर्थयात्राओं के दौरान मन को स्थिरता मिलने लगी। कम से कम यह परिभाषित हो पाया कि उसके पास क्या नही है। और आगे चलते जाने पर उसे यह भी समझ में आ गया, कि जो भी कमी जीवन में है, उसकी पूर्ति गार्गी से विवाह करने से तो कभी भी नही होने वाली।
अजीब से दिन थे वे। जब विवेक और गार्गी किसी प्रेमी प्रेमिका के समान मिलते थे, विवेक उसे वैराग्य का अपना ताजा ज्ञान बांटता था और गार्गी ही उसकी विवेचना कर विवेक को समझाती थी कि कैसे उसका होना विवेक के लिए कोई मायने नही रखता है। आश्चर्य यह भी था कि इस प्रकार के अन्तर्विरोध के बावजूद दोनों मिलते रहे, अपना होना खोजते रहे। और एक दिन वह भी आया, जब विवेक ने अपनी राह अलग होने की घोषणा कर दी। बिना औपचारिकता के गार्गी ने कुछ आंसू बहाए लेकिन वह आन्तरिक रुप से विवेक के इस निर्णय पर खुश थी, कि कम से कम उसे अपना मार्ग मिल सका।
और आगे चलकर गार्गी भी धीरे धीरे घुमक्कड़ी की ओर आकृष्ट हुई। खूब सारी सुविधाओं के साथ यात्राएं करती, जंगलों, झरनों और पहाड़ों की खाक छानते हुए वह इस नतीजे पर पहुंची, कि यह यात्रा किसी एक प्यास को तो खत्म करती है लेकिन दूसरी को बना भी देती है। बेहतर है कि किसी योजना के बिना एक राह चुन ली जाए, फिर देखते हैं जीवन कहां पर ले जाता है।
गार्गी को दुख भी था विवेक जैसे संपूर्ण इंसान के जीवन से निकल जाने पर। लेकिन एक तरीके से वह उसकी शुक्रगुज़ार भी रही, कि उसने अपना बहुत सा वैचारिक धन गार्गी को दिया था। गार्गी की पहली यात्राएं विवेक को याद करने, भूलने, साथ रखने, जीने और मन को सांत्वना देने की रही।
इस बीच गार्गी के मम्मी पापा पुन: बेटी के इतने आत्मविश्वासी जीवन के सामने स्वयं को असहाय पाते रहे। दबी छुपी ज़बान से उसकी उम्र, बाकी हमउम्रों की सामाजिक प्रगति और उनके भी अरमानों के बारे में बोलते रहे। लेकिन गार्गी का जीवन के प्रति नज़रिया, फिर हाल ही में विवेक से अलग होने का दुख उन्हें मुखर होने नही दे रहा था।
इन्हीं यात्राओं में एक पहाड़ी गांव के छोटे से गेस्ट हाउस में रमते जोगी के समान रुक गई थी गार्गी। लोकगीत गाती और अनाज कूटती पीसती महिलाओं के रंगीन छापेवाले परिधानों पर रीझ गई। आस पास की खूबसूरती, अपनापन, सादा खाना, खिड़की से आमंत्रण देती बर्फीली चोटियां और हवा में से आती अपनेपन की हांक उसके चेहरे पर लंबे समय के बाद मुस्कुराहट ला पाई थी। 
और इन्हीं सब के बीच गाईड बनकर उसके साथ पिछले पन्द्रह दिनों से घूम रहा था शिवेन। इस इलाके में वह भी कुछ वर्ष पहले ऎसे ही किसी सम्मोहन के वशीभूत होकर आया था। पढ़ा लिखा और बेहतर नौकरी के लिए सारी योग्यता रखने के बावजूद उसने अपने मन की सुनी थी। शौकिया तौर पर गाईड के रुप में काम करता और बाकी अपने लेखन के ज़रिये पैर जमाने की कोशिश करता।
लिखने पढ़ने में रुचि के चलते अपने विशिष्ट शब्द भण्डार, मन की स्थिति की बेहतर विवेचना और पहाड़ों से होनेवाले अवचेतन में पहले से बसे प्रेम को जगाते हुए लगाव की बारीकी के चलते वह गार्गी के समानांतर चलने लगा था। गार्गी को भी काफी सारी अनुभूतियां एकदम ताजी और पहली बार जैसी ही सौंधी लग रही थी। 
अपने आप को, अपने विचारों को एक दूसरे के साथ बांटने के अलावा अब उन्हें महसूस हो रहा था कि ज्यादा से ज्यादा साथ रहने के बहाने भी खोजने मे उन्हें मजा आ रहा था। एक दूसरे को पत्र लिखना, साथ के सौन्दर्य को परिभाषित करती और सीधे सीधे लेकिन थोड़ा अलग कोण से इशारा करती प्रेम कविताओं का आदान प्रदान करना, उनकी दिनचर्या में शामिल होने लगा था। कैशोर्य के कुछ रुके थमे से, व्यग्र और चंचल से लम्हों को जीने में जहां गार्गी को एक बार फिर से जीवन परिभाषित होता दिखाई दे रहा था, शिवेन तो गार्गी को सीधे सीधे अपने जीवन साथी के रुप में देखने लगा था।
फिर अचानक एक दिन गार्गी ने नींद न आने के बहाने उसकी और विवेक की पुरानी चैट को पढ़ा। विवेक के विचारों की गहराई थी या पुरानी यादों का सैलाब, उसमें शिवेन जैसे कहीं बहकर किनारे पर पटक दिया गया था। तो क्या गार्गी के व्यक्तित्व में आज भी विवेक का ही अक्स प्रभावी है? क्या एक बार फिर से पुकार ले वो विवेक को? नही, वापसी के लिए नही लेकिन जीवन के इस दोराहे पर क्या निर्णय लेना चाहिए उसे? 
और दूसरे ही दिन उसने अपना सामान बांधना शुरु कर दिया था। पता चलने पर शिवेन दौड़ा हुआ आया भी था। लेकिन गार्गी फिर से निकल चुकी थी, एक पड़ाव पार करने के बाद। शिवेन उन सारे पत्रों, फूलों और गार्गी के दिए हुए नन्हें उपहारों को लेकर पहाड़ की उस चोटी पर खड़ा हो गया जहां से उसे नीचे उतरती हुई गार्गी सबसे ज्यादा समय तक दिखाई दे सके। 
उसके पास कोई शब्द नही थे। जाती हुई गार्गी को रोकने के लिए कोई कारण नही था। जैसा कि उसने गार्गी को वचन दिया था, वह इन सारे शब्दों, फूलों, अनुभूतियों और उपहारों की अभिव्यक्तियों को इस पहाड़ से नीचे गिरा देने वाला था। खत्म कर देने वाला था गार्गी का अध्याय अपने जीवन से। 
और शिवेन को लगा, कि ये पहाड़, बर्फीली चोटियां, ये बहती नदी, ठंडी हवा और आस पास की झाड़ियों में लगे फूल भी उसपर हंस रहे हैं। उसके बहते आंसुओं का मजाक उड़ा रहे हैं। उसे लगा जैसे पूरी प्रकृति ही उसके सामने खड़ी होकर उसका और उसकी पूरी पीढ़ी का उपहास कर रही है। अपने आप को आगे ले जाने की होड़ में, पूर्ण बनाने की स्पर्धा में और सब कुछ पा लेने, अनुभव कर लेने के बाद समर्पण की राह को चुनने का उसकी पीढ़ी का निर्णय एक फटे हुए झण्डे जैसा किसी पुराने टीले पर फड़फड़ा रहा था।
सफलता की चोटी पर भी अपने आप को अभिशप्त महसूस करने वाले शिवेन को लगा, जैसे उस टीले पर गार्गी के ही कहे हुए अंतिम शब्द भी अंकित हैं।
नही शिवेन, ये नई दुनिया का अभिशाप है हमारी पीढ़ी पर। हमने कम उम्र में ही दुनिया जो देख ली है। अब हमारे फैसले पहले की तरह आसान नही रहे। मुझे आज खुद पर ही यकीन नही है कि मैं अपने प्यार को निभा भी पाऊंगी या नही। वाकई, इसलिये ही भाग रही हूं। 
घोषणा कर भागने वाली गार्गी अकेली और पहली नही थी! शिवेन और विवेक भी भ्रमित होकर दोराहे पर खड़े रहने वाले चुनिंदा नही थे। इन पहाड़ों के इर्द गिर्द, समुद्री किनारों पर, जंगलों की खाक छानते इस पीढ़ी के कितने ही पूर्ण व्यक्तित्व मिल जाएंगे हमें। इनकी यात्राओं की तैयारी में सिर्फ एक चीज़ ये अपने साथ रखना भूल जाते हैं, आईना। इंतज़ार है कि ये कभी स्वयं से भी मिल पाए। 
अंतरा करवड़े
अनुध्वनि
117, श्रीनगर एक्स्टेंशन
इंदौर 452018
म.प्र.
# +919752540202
greatantara@gmail.com

2 टिप्पणी

  1. योग्यता, स्वयं पर अधिकार व स्वतंत्रता वाक़ई सामाजिक जीवन को प्रभावित कर रही है, सामाजिक रिश्तों की बुनियाद ही एक दूसरे की आवश्यकता, स्नेह व समर्पण है जो की उम्र के एक पड़ाव के बाद मुश्किल हो जाता है. बेहद ईमानदारी से हर एक रेशे को बुना है आपने .शानदार कहानी अंतरा जी.❤️❤️

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