Tuesday, July 16, 2024
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अरूणा सब्बरवाल की कहानी – आख़िरी धागा

रात भर किन- मिन , किन-मिन ,बारिश ने उसे पल भर भी सोने नहीं दिया…सुबह हो चुकी थी l बाहर अभी भी अँधेरा था…उसने नींद में ही बजते अलार्म को बन्द किया…मन ही मन में बुदबुदायीं पाँच मिनट और  कह कर रज़ाई में दुबक गयी और सुबह की मीठी -मीठी नींद का आनंद लेने लगी…वैसे वीक एण्ड के बाद , किसका  मन करता है काम पर जाने का । अचानक  दरवाज़े की घंटी बजी…आँख खुली तो पाँच मिनट एक घंटा बन चुका था ।नो बज चुके थे ,साढ़े नो काम पर पहुँचना था…आपा- धापी मच गयी ,उसने जल्दी से शावर लिया…कपड़े पहने…कच्चा-पक्का टोस्ट हाथ में लिए हवा की भाँति एक ही साँस में सबको गुड मोर्निंग गुड मोर्निंग विश किया…लोकर में बैग रखा ,कोट उतारते -उतारते ,खूँटी पर टंगे कोटों को उथल-पुथल करती , उलट-पलट करके देखने लगी…न जाने क्या ढूढ रही थी ।हार के उसने एक-एक कोट खूँटी से उतार कर देखा…निराशा ही मिली, बैग भी वहाँ नहीं था । हैरान थी ।परेशान थी…सोचने लगी कहाँ जा सकता है…? यहीं तो टाँगा था मैंने । किसी से पूछने की  हिम्मत भी नहीं  पड़ी ।उसकी हरकतों को देखते मैनेजर लिंडा नें पूछ ही लिया “ शीला कुछ ढूँढ रही हो क्या ?” ‘’नहीं नहीं कुछ ख़ास नहीं , एक बैग टाँगा था । कोई रखवा कर गया था…बेचारे ने एक घंटा लगा कर पसंद किया था…किंतु पैसे देते वक़्त उसके पास कैश नहीं था ,कार्ड से पैसे देना नहीं चाहता था बोला , कल दे जाऊँगा…भला आजकल कौन कैश इस्तेमाल करता है ?” ‘’ तुमने उसका नाम लिखा था बैग पर ?” लिंडा ने पूछा…।  “हाँ मिस्टर विलियम’’  शीला ने शर्माते हुए कहा। “ओह’’  लिंडा ने शरारती लहजे से कहा । पीछे के कमरे से आवाज़ आयी ‘’ वो तो उसी दिन शाम को ले गया था’’ ।यह सुनते ही शीला की चेहरे पर तनिक उदासी सी छा गयी ,सोचने लगी आज तो उसके आने की उम्मीद भी गयी ।वैसे भी बारिश में बिना  कारण कोई कैसे और क्यूँ बाहर निकलेगा  ? इतना कह कर वह काम में लग गयी । अवकाश के पश्चात शीला सप्ताह में तीन दिन चैरिटी शाप में निशुल्क सेवा करती है ,उसे गोदाम में नहीं ,टिल पर काम करना अधिक पसंद  है ।वहाँ उसे भाँति – भाँति के लोगों से मिलने का अवसर प्रताप होता है । उसे अच्छा भी लगता है…लोग दान देने का सामान लाते भी हैं ,साथ -साथ कुछ ख़रीद कर भी ले जाते हैं । रिटायर्ड लोग तो अपने अकेलेपन से ऊब कर गप्प-शप्प लगाने भी आ जाते हैं ।  उनमें  से एक विलियम भी है ।जो सदा सोमवार को ही आते है ,क्यूँ कि शीला सोमवार को दुकान पर काम करती है ।लिंडा, मारिया और सभी उसे मज़ाक़ करते रह्ते हैं । आज सोमवार है ,मारिया दूर से विलियम को आते देख लेती है ।शीला  को छेड़ती हुई कहती है “शीला वो देख कौन आ रहा है, आजकल ‘मिस्टर टेस्को बैग’  माफ़ करना मिस्टर विलियम के चक्कर कुछ अधिक लगने लेंगे हैं ,बात क्या है ?… मुझे तो बन्दा ही कुछ अजीब सा लगता है… जहाँ देखो टेस्को का बैग ले कर घूमता रहता है’’।(लंदन में टेस्को एक सूपर्मार्केट है)
शीला मन ही मन में बुदबुदाती है… ,देखा जाए तो मारिया सही ही कहती है ,पहली दृष्टि में तो विलियम मुझे भी  कुछ अजीब और अद्भुत सा लगा था । मुझे तो लगता है उसके  चेहरे पर मुस्कुराहट आने से घबराती है उसकी आँखों में एक अजीब सी नीरवता है । भावनाओं से परे ,भावहीन भी कहा जा सकता है। कभी-कभी एक गहरी उदासी भी झलकती है।
सोमवार को तो उसका चक्कर ज़रूर लगता है ,शीला जो वहाँ होती है ।उसके हाथ में सदा दो बैग होते है…एक टेस्को का ,जिसमें दूध,डबलरोटी ,अंडे वग़ैरा … दूसरा ख़ाली ख़रीददारी के लिये ।लंदन में प्लास्टिक के बैग बंद हो गये हैं ।विलियम नज़रें नीचे  किए ही दुकान में डेढ़ दो घंटे बिता देते हैं ।कभी कबार कनखियों से शीला पर नज़र डाल ही लेते हैं ।शीला भी उनकी सहायता के लिये सदा त्य्यार रहती है । आज सारा दिन बारिश होती रही…विलियम के पास छाता होते हुए भी ,उसने दुकान में दो घंटे लगा दिए ।एक लेडीज़ ब्लाउज़ ले कर टिल पर आये…अभी भी उन्हें तसल्ली नहीं हुई थी …बार -बार उसे नाप रहे थे…कभी उसे खींच-खींच के देखते…कभी ऊँगलियों से नापते…कभी गिरह  से.दस मिनट्स बाद उसे रैक पर रख दिया …एक मिनट बाद फिर उठा लिया…अभी भी दुविधा में थे…शयद टिल पर आने की हिम्मत जुटा रहे थे ….या ख़ुद से ही लड़ रहे थे कि शीला से पूछूँ या न पूछूँ ?  एक गहरी साँस लेकर, हिम्मत जुटा कर टिल पर आये, और हिम्मत जुटा कर उन्होंने शीला से पूछ ही लिया,“आपके हिसाब  से इसका नाप क्या होगा?”
डेस्क पर खड़े-खड़े शीला ने  ब्लाउस के टैग पर उसका नाप देख के उन्हें बता दिया ।फिर भी उन्हें तसल्ली नहीं हुई ।वहीं खड़े-खड़े अपने तरीक़े से हिसाब लगाने लगे…उन्हें इतने असमंजस में देखकर शीला ने उन्हें इंचिटेप से नाप कर बता दिया । तसल्लीवक्श हो कर ,ब्लाउस ले कर चले गए । सोमवार को आने का सिलसिला चलता रहा ।कभी ख़रीद दारी करते , कभी बिना कुछ लिए ही चले जाते ।पिछले तीन सप्ताह से विलियम का आना नही हुआ…यहाँ शीला को भी उसकी प्रतीक्षा थी।

वह ख़ुद नहीं जानती थी, अब उसे क्यूँ इंतज़ार रहता है उनका…? शायद उन्हे देखने की आदत हो गयी है । सारे जीवन में एक के बाद दूसरे कर्तव्य भार को स्वीकार किया… अपनी इच्छाओं को त्याग कर जिम्मदारियों की पूर्ति में ही शांति पाने की कोशीश की, फिर आज इस पड़ाव में मन में इतनी हलचल क्यूँ है , वह खुद हैरान थी l

सुबह से ही वर्षा हो रही थी…काम थोड़ा मंदा था ।शीला को उम्मीद नहीं थी कि आज विलियम का आना होगा, सोच ही रही थी कि अचानक “गुड आफ़्टरनून ’’ कथन ने उसकी सोच में ब्रेक लगा दी l सामने मिस्टर विलियम चार इंच की मुस्कान लिए खड़े थे बोले … “ लगता है आज मौसम सुधरने वाला नहीं है  ‘’ लंदन में मौसम के बहाने से ही वार्तालाप आरम्भ होती है ।आज शीला के साथ रेणु भी थी ,जिसे वह काम सिखा रही थी । कुछ देर वो किताबें देखते रहे । फिर ढूँढते -ढूँढते उनकी नज़र शो-केस में टंगे हुए मैचिंग एक स्कर्ट ब्लाउस सूट पर पड़ी । गहरी सोच में थे ।तय नहीं कर पा रहे थे । लगता था सदा कि भाँति उसके नाप को लेकर दुविधा में थे । शायद स्कर्ट कि कमर को लेकर असमंजस में थे.
..हिचकिचाते-हिचकिचाते डेस्क पर आए ,झिझक़ते-झिझक़ते बोले “ प्लीज़ क्या मैं वो सूट देख सकता हूँ ’’ ? शीला उसके चेहरे पर आते-जाते भावों को पढने का प्रयास करती रही।
शीला ने स्टूल रख कर बड़ी मेहनत से सूट उतारा । सूट शायद उन्हें पसंद आ गया था ,टिल  तक आते-आते उनकी नज़र मैचिंग हैंड बैग और सैंडल पर पड़ी ।उन्होंने वह भी उतरवाए और ख़रीद लिये ।  पैसे देते वक़्त विलियम ने प्यार से  एक दबी सी मुस्कुराहट के साथ आँख मार दी…और थैंक यू कह कर चले गये । पिछले  तीन चार सप्ताह से विलियम नज़र नहीं आये थे ।  आज चार सप्ताह पश्चात् विलियम को देख कर शीला का मन खिल उठा ,किंतु उनके न आने का कारण पूछने की हिम्मत नहीं हुईं । जाने क्यूँ उसे विश्वास था…कि आज तो कुछ बात करेगा उसने तो हेलो तक नहीं की…वह तो चुपचाप मुलायम सी मुस्कुराहट फेंक निकल गया ,जैसे मुँह में मोती डालें हों ।फिर ख़ुद ही सफ़ाई देते बोली ,हर  बात को कहने के लिये लफ़्ज़ों का सहारा ज़रूरी तो नहीं ।
विलियम के  आने-जाने का सिलसिला चलता रहा । सोमवार का दिन उन दोनो के अकेलेपन में एक तालाब की भाँति था…जिसमें थोड़े से वक़्त के लिये हलचल हो जाती थी ।
शीला के व्यवहार ने विलियम का मन जीत लिया…रास्ते भर सोचते रहे कितनी लगन  और ईमानदारी से काम करती है ।कितनी बार उसे ऊपर-नीचे चढ़ना पड़ा, शिकन तक नहीं आयी उसके चेहरे  पर,कमाल की सहनशीलता है उसमें ,मुझे तो क्या किसी को उससे प्यार हो सकता है ।
शीला की आज छुट्टी थी वह हाई -स्ट्रीट में ख़रीददारी कर रही थी ।अचानक मिस्टर विलियम से टकराव हो गया…मौसम की बात हुई…हिम्मत बटोरते बोले आओ कोस्टा में कॉफ़ी पीते हैं ।पल भर को शीला सोच में पड़ गयी ,मना करने का कोई कारण भी नहीं था ।उन्होंने इतना आग्रह किया कि उसके पास और कोई विकल्प भी नहीं था ।मन ही मन में विलियम ख़ुश थे की चार घड़ी बैठ कर बातें करेंगे । कुछ देर दोनो के बीच चुप्पी चहल क़दमी करने लगी…विलियम सोचने लगे क्या मौखिक शब्दों की कोई ज़िम्मेदारी नहीं…कैसे मान लूँ मौखिक शब्दों के भाव होते ।  हार कर शीला को ही चुप्पी को भगाना पड़ा और बातों की शुरुआत शीला नें परिवार के बारे में पूछने का प्रयास किया…किंतु उन्होंने बड़े सलीक़े से टाल दिया ….कहने लगे आस -पास लोग होते हुए भी कोई इंसान कितना अकेला होता है ,आप भी जानती ।ख़ुद को धोखा देने के लिये खोल चढ़ा रखा है …होंठों की हँसी खोखली हो चुकी है ,इसीलिए दुकान में आ जाता हूँ ,आपसे मिलने ,जीवन में रंग भरनें ।” “ हैलो शीला ‘’ अपना नाम सुनकर वह चौंकी…कोस्टा में मारिया भी अपने पति के साथ लंच के लिये आयी थी । बात आयी-गयी हो गयी ।शीला जानती थी ,मारिया चुप रहने वाली नहीं है  । दो दिन बाद जब वह काम पर गयी , वही हुआ जिसका उसे शक था ।लिंडा तो मानो  तैयार  खड़ी थी…शरारत भरी मुस्कान से बोली  “शीला सुना है रोमान्स बड़े ज़ोर-शोर  से चल रहा है 
चर्च की घंटियाँ कब बजने वाली हैं …अपने बढ़िया कपड़े तैयार  रखें क्या …’’ लिंडा के बाद सभी  पीछे पड़ गयीं और बोलीं ,हमें  भूल मत जाना…निमंत्रण की प्रतीक्षा रहेगी ।
शीला ने  मुलायम सी मुस्कुराहट फेंकी और ,सोचने लगी शक तो होना ही है क्यों कि आज कल तो विलियम के चक्कर भी बढ़ने लगे हैं, और दोनो  के बीच में एक मौन सह्चर्य का रिश्ता भी तो कहीं न कहीं पनप रहा है।
स्कूल में हाफ़-टर्म की छुट्टियाँ है ।छुट्टियों के दौरान दुकान में ब्रिंग एंड बाई सेल लगती हैं  । उसमें  छोटे बच्चों की किताबें और  खिलौने सेल में लगाते है…उन दिनों सारा दिन दुकान में बच्चों का ताँता लगा रहता है ।बच्चे भी व्यस्त और ख़ुश रहते हैं । बच्चों में भी दान देने की भावना पैदा होती है । चैरिटी का सामान भी बिक जाता है । विलियम एक दो बार आए ,बच्चों की भीड़ देख कर वापस चले गए ।मारिया कहाँ चुप रहने वाली थी ,शीला से चुपके से बोली “ शीला तुम्हारा देवदास .चक्कर लगाता रहा ,उसकी आँखे तुम्हें  रही थीं .” फिर ज़ोर से हँसी और काम में जुट गयीं।
शीला दो हफ़्ते की छुट्टी पर थी । घर का बहुत सा काम जमा हो  गया था…रात भर वह यही योजना बनाती रही कि कब क्या करना है ,बशर्ते मौसम सुधर जाये ।लंदन में सभी योजनाए मौसम पर ही निर्भर करती है ।सुबह खिड़की से झाँकती किरणों के उजाले ने उसे जगा डाला…इस उजाले ने उसके भीतर एक नयापन ला दिया…जिसे वह भीतर तक महसूस करने लगी…तय्यार हो कर वह निकल पड़ी शॉपिंग के लिये…घर लौटने से पहले शीला ने सोचा कुछ खाने को ले लेती हूँ ,घर जा के पकाना नहीं पड़ेगा। पैसे दे कर अपनी धुन में चल रही रही थी कि सामने मुस्कुराते  हुए मिस्टर विलियम खड़े थे… उनकी नज़रें शीला पर ही टिकी थीं.. सोचने लगी न जाने कब से उसे घूर रहे थे। इधर मिस्टर विलियम मन ही मन में सोच रह थे…अच्छा मौक़ा है बैठ कर दो बातें करने का ….कहूँ  या न कहूँ और कैसे ..? पता नहीं मानेगी कि नहीं ? जैसे  ही शीला निकट आयी , वह उल्लासित स्वर  में बोले “  हेलो…शीला लव्ली तो सी यू ।” शीला को कुछ समय लगा उन्हें पहचानने  में…वह हैरान थी ,कि क्या यह वही आदमी है ?…लिबास से लापरवाह, शरीर में ढीलापन ,अचानक इतना बदलाब…? ‘’ वाह क्या बात है विलियम ,आज तो रॉक हड्सन से कम नहीं लग रहे हो ‘’  शीला ने तारीफ़ करते कहा…। विलियम ने  मुस्कुरा कर कहा” थैंक यू “। विलियम नें चाँद  जैसी मुस्कुराहट बिखरते आग्रह किया “चलो  चाय पीते हैं ?” । इतने स्नेह भरे प्रबल आग्रह को शीला नें झट से स्वीकार कर लिया और बोली  “एक शर्त पर..कि आज चाय मेरी ओर से होगी …”। “ ठीक है आइए…” चुस्कियाँ लगाते इधर -उधर की बातें होती रहीं … दोनो में स्नेह भरी दृष्टि का लेन-देन हुआ ,जितना कुछ कहा गया  उससे अधिक अनकहे  को सुना और महसूस किया …प्यार  से वह शीला के हाथ पर हाथ रखते बोले “ जिस तरह फूल की सुगंध सबको अच्छी लगती है ,इस, इसमें कोई अस्वाभाविक बात भी नहीं लेकिन, फूल अच्छा लगे ,उसे हाथों में लेने का मन करे… एसा मेरे साथ पहली बार हो रहा है क्यूँ …?  पर बहुत अच्छा लग रहा है  । 
चाय पीते शीला ने उन्हें बहुत नज़दीक से देखा…शीला को कुछ अलग सा लगा ….बड़ा सौम्य और शरीफ़ ,जिसके आचार-व्यवहार में शिष्टता  थी ।उसके चेहरे पर एक गहरा सूनापन भी था  ,लगता था जैसे उसकी छाती में दर्जनों सुराख़ हों। दोनो पर दोस्ती का रंग धीरे -धीरे चढ़ रहा था । शीला का मन उसके  बस से बाहर होता जा रहा था ।  उसे अपनी बचकना हरकत पर हँसी आने लगी । ख़ुश भी थी और शर्मिन्दा भी ।ख़ुश इसलिए थी कि जीवन के इस पड़ाव में भी वह दूसरों को आकर्षित कर सकती है…और शर्मिन्दा इसलिए कि इस उम्र में भी मन विचरता जा रहा है ,क़ाबू में नहीं ।वह इस एहसास का आनन्द लेने लगी थी ।उसे जिज्ञासा भी होने लगी ,कि इस समय विलियम के मन में क्या चल रहा होगा  ? वो भी अवश्य कुछ एसा  ही सोच रहा होगा । आज तक कभी उसने अपने बारे में  बताया ही नहीं  ।वह तो केवल अन्दाज़  ही लगा सकती है । काम सामन्य रूप से चलता रहा।
उस दिन दुकान अभी पूरी खुली भी नहीं थी और विलियम बाहर खड़े थे । शीला के अतिरिक्त दुकान में कोई नहीं था ,वो कुछ देर खड़े रहे ,न जाने किस सोच में थे… जब उन्होंने देखा इधर-उधर कोई नहीं है ,सबकी नज़रों से बचा कर शीला के डेस्क पर एक कार्ड उसकी ओर सरका  दिया…और चुप चाप खड़े रहे…चाहते थे शीला… ने कार्ड  उनके सामने ही धीरे-धीरे  खोला ….एक मुलायम सी मुस्कान से निमंत्रण स्वीकार करते पूछा “कितने बजे, कहाँ और कौन-कौन आ रहा है “? इतना सुनते ही विलियम की आँखे चमकने लगीं । “   बोले आपके लिये एक सर्प्राइज़ भी है ‘’   ।निमन्त्रण दोपहर का था ।इसके बारे में शीला नें काम पर किसी से ज़िक्र करना उचित नहीं समझा ।वह उसकी ख़ुशी में शरीक होना चाहती थी ।सर्प्राइज़ शब्द ने शीला के मन में जिज्ञासा उत्पन्न कर दी। वो सुबह भी आ गयी थी…ताज़गी भरी सुबह…ऐसी सुबह जिसे अपने सीने  में मचलते हुए महसूस करते हैं ।जिसकी सुगंध आपके रोम- रोम को पुलकित कर देती है ।आप उड़ने को बेताब हो उठते हैं ।
इधर विल्लीयम के लिए भी आज की सुबह और सुबह से अलग थी ,मगर सुबह कैसे अलग हो सकती है ।सुबह का स्वभाव तो एक ही  है  ।बदला तो मैं हूँ…मुझे तो सब कुछ बदला नज़र आ रहा है । दोपहर के दस  चुके थे ।थोड़ी  धुँध अभी भी थी ।पूरब में  सूरज उगा की नहीं इसका अनुमान लगाना कठिन था ।हवा भी बंद थी ।पेड़ों की शाखाओं पर ओस की बूँदें धीरे – धीरे टपकनें लगीं और मौसम  साफ़ होने लगा था ।शीला की साँस में साँस आयी। सोचने लगी हाँ तो  कर दी ,अब उसे चिंता थी पहने क्या स्कर्ट और ब्लाउस , या ट्राउज़र ,या साड़ी…न, न…स्कर्ट ब्लाउस ही ठीक रहेगा…अंग्रेज़ आदमी ने बुलाया है ,उसके मेहमान भी अंग्रेज़ ।उनके साथ उसने अपने  मैचिंग जूते और बैग भी निकाल लिये । वो अंग्रेज़ मैं हिंदुस्तानी…? फिर स्वयं ही तर्क देते बोली…प्यार किसी भी उम्र में हो सकता है…उसका अपना तर्क होता है  ,जो उम्र , जात ,पात ,धर्म की सारी दीवारों को गिराने की शक्ति रखता है। तैयार होते -होते एक बज गया था । शीला को रेस्टोरेंट में अंदर आते देख विलियम ख़ुशी से निश्ब्द…पल भर को उसे लगा जैसे अंधरे में रोशनी दाख़िल हुई हो…वह हैलो करना  भी भूल गये…उन्हें विश्वाश नहीं हो रहा था। कुछ पल संवादहीन गुज़रे। चुप्पी को तोड़ते , शीला ने उसके दोस्तों को स्वयं ही अपना परिचय देते कहा “हेलो मैं शीला विलियम की दोस्त ‘’ ।सामने बैठी औरत ने अपना हाथ आगे करते कहा, मैं फ़ियोना और ये डैनी ,अपने बग़ल में बैठे पुरुष की ओर सम्बोधित करते कहा । लंच बहुत सफल रहा , सभी एक दूसरे से काफ़ी मिल -जुल गये थे ।लंच के पश्चात् मिस्टर विलियम आग्रह करने लगे की कौफ़ी उनके घर चल कर पीते हैं । फ़ीओना और डैनी नें तो यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि उनकी बेटी आने वाली है ।शीला को यूँ लगा मानो इनकी पहले से ही योजना होगी ।विलियम ने स्वयं को सहज करने के लिये एक गहरी साँस ली…शीला की ओर अनुरोध से देखा ।शीला ने उनके अनुरोध का मान रखते पलक झपक संकेत से हाँ  कर दी । रास्ते में विलियम ने शीला का हाथ स्नेह से पकड़ते  कहा  शीला तुम्हें मिलने के बाद एसा लगता है कि हर गुनगुनाती सुबह के साथ एक चिड़िया गुनगुनाती है ,और कह जाती है सब कुछ तुम्हारी मुट्ठी में है ….तो मेरा आत्मविश्वास जागने लगता है…घर पहुँचते ही विलियम ने स्नेह से शीला का हाथ पकड़ कर घर की दहलीज़ पर करवायी ।घर साफ़ सुथरा बड़े सलीक़े से रखा था …गर्म था…आरामदायक था…किंतु गतिहीन…चहल-पहल रहित…बेजान… पूरे घर में एक अजीब सा सन्नाटा छाया था , आवाज़ रहित। कौफ़ी पीते हुए इधर-उधर की बातें होती रहीं । ‘’  विलियम मुझे तुम्हारी सर्प्राइज़ का इंतज़ार  है…”? उसके चेहरे पर चिंता की रेखाएँ उभर आयीं…उसने एक गहरी साँस ली ,मुस्कुराया…बोला “तुम  बैठो मैं पाँच मिनट में आया ‘’ । उसे गए पंद्रह मिनट हो गये था…शीला बेचैन थी ,घड़ी की सुई मानो वहीं जम गयी हो। अचानक शीला ने देखा एक बहुत लम्बी-चौड़ी औरत ….बड़े सलीक़े से  सजी हुई…अच्छे तरीक़े से बाल  बने हुए ….तीन इंच की हील पहने….मैचिंग बैग लिये… सर पर भूरा विंग पहने … उस पर मैचिंग फ़र का हैट …मटक -मटक कर कैट वॉक करते उसी की ओर आ रही है ।शीला हक्का-बक्का हुई…स्तब्ध और निशब्द सी…चौंकी…उसने ग़ौर से देखा…फिर चश्मा उतार के देखा…उसने कपड़े भी वही पहने थे जो दुकान में से शीला से उतरवाए थे…शीला को घूँसा सा लगा…उसकी सोच से बाहर था… सोचने लगी यहाँ तो कहानी कुछ और ही है ।क़रीब आते ही उसने शीला पर एक लम्बी सी फ़्लाईंग किस्स  फेंकी । हाथ में पकड़े पंखे को दाँए -बाँए हिला कर हवा लेती रही…टबर्ल किया ,यानी गोल -गोल घूमीं…एक बार फिर , लम्बी सी  फ़्लाईंग  किस्स दी… शीला निर्वचन…आश्चर्य  चकित सी उसकी ओर देखती रही…वह औरत की आवाज़ में बोला “ प्यारी शीला डरो मत, मैं विलियम , तुम्हारा विलियम  , माई डियर यही मेरा सच है ,इसे  सामने ला कर ,मैं दोस्ती का फ़र्ज़ निभा रहा हूँ  , तुम्हें अंधेरे में नहीं रखना चाहता था ।
मैं  बचपन से ही एसा हूँ , हमेशा से अकेलापन महसूस किया है…मेरा  मानसिक गठन ही कुछ एसा है कि सबका साथ रहते भी ,मन का एक कोना किसी अंधेरी सुरंग की तरह परेशान करता रहता है …बहुत सताया है…दुनिया वालों नें ….ज़िंदगी के रंगों को देख ही नहीं सका…जो हूँ सो हूँ…तुम्हारे सामने हूँ …तुम्हारा दोस्त एक ड्रैग-क्वीन ( पुरुष  जो अक्सर गेय होते है वह औरतों के भेष में मंच पर नाटक करते हैं ) और एक ट्रैन्स्वेस्टायट  (  transvestite ) ( जो पुरुष इस्त्रि का लिबास पहनता हो )है।  सॉरी डियर…ज़िंदगी के  फ़ैसले दूसरों की ख़ुशियों के लिये नहीं लिये जाते…।  
मैं ख़ुद के लिये जीता हूँ…नामुकम्मल होते हुए भी ख़ुश हूँ..जो सच दिख रहा हैं, उसके भीतर डूबा हुआ गहरा सच हूँ…”।इतना कहते उसकी आँखे भर आयीं ।वह ऐसे बोलता जा रहा था ,कि  जैसे किसी जाल का आख़री धागा काट कर स्वतंत्र हो गया हो।
शीला मन के भँवर में  उलटती-पलटती रही…वह एक अप्रत्याशित यथार्थ के सामने खड़ी थी ।उसके लिए यह काँच की तरह चकनाचूर करने वाली हक़ीक़त थी…शीला ने एक गहरी साँस ली…और मधुर मुस्कान से कहा “…जो टूट जाता है , उसे जोड़ा भी जा सकता है…”उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया और बोली “ फ़्रेण्ड्स फ़ोर लाइफ़ “।
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6 टिप्पणी

  1. आखिरी धागा ,कहानी ने अरुणा जी गजब का तिलस्मकारी विषय चुना।हालाकि विषय आज आम हो चुका है,लेकिन कहां कितना जानते हैं हम इन्हें करीब से। इसका भीतरी प्ररि दृश्य उतना ही जटिल है।उतना ही उलझा है इनका मनोविज्ञान।अरुणा जी इस कहानी के माध्यम से भीतर से स्त्री और ऊपर से पुरुष का जीवन जीते,या यूं कहे आधा स्त्री आधा पुरुष का जीवन जीते एक इंसान की मानवीय अनुभूतियों,सामाजिक सरोकारों के जद्दोजहद को बहुत ही सहजता से ,शतरंज की गोटियों की तरह सजाती चली गई।पाठक अंत तक उनके शब्दों के मोहपाश में बंधा , सम्मोहित अंत में अवाक और चकित रह जाता है।जो कहानीकार की दृष्टि से सफलता कही जायेगी।अरुणा जी ढेरो शुभकामनाएं

  2. एक त्रासदी को सुंदर ढंग से परोसा आपने।ऐसा ही एक बार मैत्रेयी पुष्पा की आत्म कथा में भी पढ़ा था।सामाजिक जीवन में इनको हेय दृष्टि से देखा जाता है किंतु सभी की रचना की तो ईश्वर ने ही।उत्तम ताना बाना अंत तक बांधे रहा।साधुवाद…

  3. आपको पहले भी पढ़ते रहे हैं अरुणा जी! आप एक बेहतरीन कहानीकार है इसमें कोई दो मत नहीं। जिस तरह से कहानी का प्रारंभ हुआ, इससे तो यही प्रतीत हुआ यह अधेड़ उम्र की एक प्रेम कहानी हो सकती है। जिज्ञासा बराबर बनी रही कि आगे क्या होगा। जब वह कपड़े खरीदने आया जब हमें थोड़ा आश्चर्य हुआ कि यह किसके लिए ले रहा होगा! यहाँ पर आकर जिज्ञासा और अधिक बढ़ जाती है। एकाएक समझ ही नहीं आता। एक पल हमें लगा कि शायद उसकी कोई बेटी होगी।
    कार्ड देना और इंतज़ार की चमक!!!! मनोभावों को आपने बहुत ही बारीकी से पिरोया है।
    कहानी का चरमोत्कर्ष, या कहे अंत बेहद ही चमत्कारिक लगा। यह कल्पना से बिल्कुल ही परे था और यहाँ सारे भाव संकुचित होकर मार्मिकता में समा गए।
    वास्तव में अगर स्त्री में आधा पुरुष हो सकता है तो पुरुष में आधी स्त्री क्यों नहीं हो सकती!!!
    अचानक एक कड़वी सच्चाई के रूप में विलियम एक स्त्री की मॉडर्न वेशभूषा में शीला के सामने आता है, वह स्तब्ध रह जाती है। पर उसके बाद विलियम जो कुछ भी कहता है वह सुनकर उसका कोमल मन पिघल जाता है
    वह शीला को सच्चाई से अनभिज्ञ नहीं रखना चाहता था इसलिए क्योंकि वह शीला को चाहता था और शीला भी उसे चाहने लगी थी और अंत में शीला भी उससे आजीवन दोस्ती स्वीकार करती है।
    वर्तमान में यह विषय कॉमन है। कपिल शर्मा शो में तो यह देखने में आता है एक नियमित किरदार के रूप में। पर इस कहानी में इस चरित्र को आपने बहुत ही बेहतरीन तरीके से गड़ा है अरुणा जी !इसके लिए तो आपकी तारीफ बनती है।

    एक बेहतरीन कहानी के लिए आपको बहुत-बहुत बधाइयाँ।

  4. अरुणा जी! अभी ध्यान दिया कि एक बात कहनी रह गई। *आखिरी धागा* शीर्षक अंत में जाकर अपने आप को सार्थक करता है! विलियम ने अपने जीवन में स्वयं को बहुत अकेला महसूस किया। पूरी कहानी मेरे को कभी ज्यादा नहीं बोला लेकिन अंत में जितना भी बोला वह पूरी कहानी का मर्म है। सारी पीड़ा, सर दर्द, सारा अकेलापन , सबने मिलकर मानो चारों ओर से उसे एक जाल की तरह घेर रखा था। अगर किसी भी सिलाई का आखिरी दगा खोल दिया जाए तो पूरी सिलाई खुल जाती है। जाल का आखिरी धागा खुलने से मानो विलियम को सारी पीड़ाओं से मुक्ति मिल गई। उसे जीवन भर के लिए एक अच्छी दोस्त मिल गई जो उसे समझ सकती थी। उसके जीवन का क अकेलापन दूर हो गया।

  5. अन्त तक कहानी में रहस्य रहा और फिर धागे का एक छोर हाथ आया । कथानक को बहुत सुंदर मोड़ दिया । बधाई अरुणा जी

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