Tuesday, July 16, 2024
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प्रदीप श्रीवास्तव की कहानी – सुमन खंडेलवाल

उस सुनसान और दुनिया के लिए डरावने, भूत-प्रेतों से भरे मनहूस रास्ते पर निकलना मुझे किसी शांत सुन्दर उपवन में टहलने जैसा लगता था। शहर में बहने वाले एक गंदे नाले के तट-बंध पर बनी रोड तब बहुत टूटी-फूटी जर्जर हालत में थी। एक तरफ़ पंद्रह-बीस फ़ीट गहरा गंदा नाला, जिसकी धारा किनारे से काफ़ी दूर बीच में है, सिल्ट से पटी हुई। तो दूसरी तरफ़ पंद्रह-बीस फ़ीट गहरे खड्ड हैं। दिन में भी लोग उधर से निकलने में कतराते थे, अँधेरा होने के बाद तो कोई भी विवशतावश ही निकलता था। 
अँधेरा होते ही झाड़-झंखाड़ों में जो होता है, वही वहाँ भी होता था। कीड़ों-मकोड़ों, झींगुरों की आवाज़ें आती थीं। लेकिन मैं अपनी डिज़ायनर जीप लेकर उस उबड़-खाबड़ क़रीब पाँच किलोमीटर लंबे रास्ते पर देर शाम को ज़रूर निकलता था। शाम के पाँच बजते ही मुझे लगता कि जैसे वह रास्ता मुझे अपनी तरफ़ खींच रहा है। अन्धेरा होते ही यह खिंचाव इतना हो जाता था कि मैं सारा काम-धाम भूल जाता था। 
मुझे और कुछ भी याद नहीं रहता था सिवाय वहाँ जाने के। लुटती है मेरी दुनिया तो लुट जाए, मुझे इसकी भी परवाह नहीं रहती थी। अपना मोटर वर्कशॉप कर्मचारियों के हवाले कर अन्धेरा होते ही निकल देता था, दुनिया के लिए उस अभिशप्त रास्ते पर। 
वास्तव में उसके अभिशप्त, कुख्यात होने के एक नहीं कई कारण थे। मुख्य था कि वह गुंडे माफ़ियाओं की पसंदीदा जगह थी, लोगों की हत्या करने, या लोगों की लाशों को ठिकाने लगाने की। ऐसा कोई महीना नहीं बीतता था, जब वहाँ किसी झाड़ी या रोड के दूसरी तरफ़ नाले में किसी का शव न मिलता हो। 
यह सारे शव बहुत बुरी हालत में ही मिलते थे। क्योंकि उनके बारे में पता तभी चलता था, जब दिन में लोग उधर से निकलते और उनकी नाक सड़ी हुई लाश की भयानक बदबू से फटने लगती थी। सड़ने से विकृत हो जाने के कारण वहाँ मिलने वाली किसी भी डेड-बॉडी की कभी भी आसानी से पहचान नहीं हो पाती थी। 
मगर यही अभिशप्त रोड शाम होते-होते मुझे अपनी तरफ़ खींचने लगती थी। यह इतनी ख़राब थी कि मुझे फ़ोर व्हील ड्राइव जीप भी दस-पंद्रह से ज़्यादा स्पीड में लेकर चल पाने में मुश्किल होती थी। इंच भर भी स्टेयरिंग इधर-उधर गड़बड़ हुई नहीं कि गाड़ी या तो गंदे नाले में या फिर दूसरी तरफ़ झाड़-झंखाड़ों, कीड़ों मकोड़ों से भरे पंद्रह-बीस फ़ीट गहरे खड्ड में। 
इसी अभिशप्त रास्ते पर सीधे पाँच किलोमीटर आगे जाने के बाद एक अच्छी सड़क दाहिनी तरफ़ जाती है। जो आगे जाकर एक कॉलोनी को चली गई है। मैं अभिशप्त रास्ते को पार कर उस कालोनी में बनी एक मार्केट में जाता था। वहीं एक साफ़-सुथरा रेस्ट्राँ है। वहाँ रुक कर चाय और दो समोसे लेकर जीप में ही बैठ कर खाता-पीता था। 
उसके समोसे मुझे इसलिए बहुत अच्छे लगते हैं, क्योंकि वह समोसे में आलू के छोटे-छोटे पीस काट कर डालता है, उन्हें कुचलता (मैश) नहीं। उसमें जो मसाला डालता है, वह बहुत टेस्टी होता है। उसकी चटनी भी एकदम अलग तरह की होती है, उत्तराखंड के पहाड़ों पर बनने वाली भाँग के बीज और नीबू की। कई और चीज़ों के साथ बनी इस चटनी के साथ समोसा एक अनूठे स्वाद का मज़ा देता है। चाय तो ख़ैर वह बहुत अच्छी देता ही है। 
मैं क़रीब आधे घंटे तक वहाँ चाय समोसे का आनंद लेने के बाद, फिर वापस दुनिया के लिए भयावह रास्ते की तरफ़ निकलता था। तब-तक अँधेरा घना हो चुका होता था। गाड़ी की हेड-लाइट हर तरफ़ अजीब सी मनहूसियत भरे सन्नाटे का साम्राज्य दिखलाती हुई चलती थी। जिसे मैं मंत्र-मुग्ध सा देखता चलता रहता था। 
 जब वापस वर्कशॉप पहुँच जाता तो यह बात भी दिमाग़ में ज़रूर आती कि आख़िर मैं उधर जाता ही क्यों हूँ? शाम होते-होते मुझे क्या हो जाता है? और इससे बड़ी बात यह कि नाले और आए दिन सड़ी-गली लाशों की चारों तरफ़ फैली बदबू, वहाँ लोगों द्वारा बार-बार भूत-प्रेत देखे जाने की बातें भी, मुझे विचलित करने के बजाए उधर ही क्यों खींचती हैं? इन सबसे ज़्यादा बड़ी और रहस्यमयी बात यह कि इन सबके विपरीत मुझे ऐसा क्यों महसूस होता है कि मैं किसी शांत उपवन में टहल रहा हूँ। 
जब सोता तो कई बार सपने में भी मैं अपने को वहीं पैदल ही चहल-क़दमी करते हुए पाता। कई बार यह भी देखता कि वहाँ एक दुबली-पतली लंबी सी औरत मेरे आगे-आगे चल रही है। मैं तेज़ी से चलकर उसके पास पहुँचता हूँ कि उससे कुछ बातें करूँ, पूछूँ कि वह ऐसे बियाबान में अकेले ही क्यों घूमती है? क्या उसे डर नहीं लगता? क्या उसे अपनी जान, अपनी इज़्ज़त की चिंता नहीं है? क्या उसे मालूम नहीं है कि यहाँ दिन में ही शोहदे महिलाओं की इज़्ज़त पर हमला कर देते हैं। 
उसे रोकने के लिए मैं आवाज़ देता हूँ ‘इस्क्यूज़-मी’, वह मेरी तरफ़ घूमती है, मैं देखता क्या हूँ कि साड़ी ही साड़ी है, कोई शरीर नहीं। और मेरे पलक झपकते ही वह साड़ी सड़क पर ऐसे नीचे गिरी, जैसे किसी दीवार में लगी कील पर टँगी हुई थी, और कील अचानक ही दीवार से निकल गई। 
लेकिन अन्य लोगों की तरह मैं डरता घबराता नहीं हूँ, तीव्र उत्सुकता के साथ वह साड़ी देखने लगता हूँ, जो सड़क पर गिरी थी, लेकिन देखते ही देखते वह भी ग़ायब हो जाती है। फिर तुरंत ही हरसिंगार के फूलों की तेज ख़ुश्बू मेरे नथुनों में भर जाती है। मैं जब-तक कुछ समझूँ तब-तक मेरी नींद खुल जाती है। 
जल्दी ही यह रात में दो-दो, तीन-तीन बार होने लगा। नींद खुलते ही मैं उठ कर बैठ जाता। पूरी रात सो नहीं पाता। एक दिन सपने में ही कुछ बोल रहा था कि बग़ल में सो रही पत्नी जाग गई। मेरी भी नींद खुल गई थी। उस दिन मैंने उसे सारी बात बताई तो वह किसी बाबा के पास चलने के लिए कहने लगी, मैंने कहा कि मुझसे यह सब नहीं होगा। 
रात में नींद ख़राब होने से दिन-भर वर्कशॉप पर मुझे नींद आती रहती। आलस्य, थकान के कारण कोई काम ठीक से कर नहीं पाता। लेकिन बड़े ही रहस्य्मयी ढंग से शाम होते-होते सारी नींद थकान, आलस्य दूर हो जाता। लगता जैसे मैं छह-सात घंटे की अच्छी नींद ले कर उठा हूँ, बिल्कुल तरोताज़ा हूँ और मेरा वह सुन्दर शांत उपवन मुझे अपनी तरफ़ खींच रहा है। 
अन्धेरा होते ही मैं और मेरी जीप उसी डरावने अँधेरे में, बिल्कुल मस्ती में रेंगते हुए, चल कर उसी कॉलोनी की चाय वाली दुकान पर पहुँच जाते। फिर वही समोसा, भाँग की चटनी, चाय थोड़ा सा समय बिताना और जीप फिर से रेंगती हुई वापस चल देती। लगता जैसे वह अपने आप ही चल रही है। इस रहस्य्मयी स्थिति, समय को जीते हुए देखते देखते कई महीने बीत गए। 
वसंत के दिनों में शुरू हुई यह आवाज़ाही बरसात के मौसम तक पहुँच गई। अब मैं प्रतीक्षा करता था अन्धेरा होने का। मौसम की जब पहली बारिश हुई तो दिन था। उसी समय मेरे दिमाग़ में आया कि मैं जब अँधेरे में गाड़ी लेकर निकलूँ तो धीरे-धीरे बारिश होती रहे, और मैं गाड़ी का वायपर चलाता हुआ, बिलकुल पैदल चाल से एक घंटे में उस दुकान पर पहुँचूँ। मगर हो क्या रहा था कि या तो बारिश ख़ूब तेज़ मिलती, या फिर घने बादल। जैसा मैं चाह रहा था वैसा कुछ भी नहीं। 
एक दिन जब वर्कशॉप से निकला तो घने बादल छाए हुए थे, हवा तेज़ चल रही थी, लग रहा था कि बस बारिश शुरू हो जाएगी। सोचा थोड़ी प्रतीक्षा कर लूँ, जब बारिश शुरू हो तब चलूँ। मगर मैं प्रतीक्षा करता रहा, हवा तेज़ होती रही और धीरे-धीरे बादल हल्के होते चले गए। जैसे-जैसे बादल हल्के हो रहे थे, वैसे-वैसे मेरा दिल बैठता जा रहा था। 
मेरी सारी आशाओं पर बादल बिना बरसे ही पानी डालते जा रहे थे। इस महत्वहीन घटना पर भी मुझे ऐसा महसूस हो रहा था, जैसे कोई मेरे जीवन भर की कमाई, मुझसे छीने जा रहा है, और मैं विवश कुछ नहीं कर पा रहा हूँ। थोड़ी ही देर में आसमान में छुट-पुट बादल आवारा गुंडों से टहलने लगे। 
मेरा मन टूट गया। मैं वापस कुर्सी पर बैठ गया। मैंने लड़के से चाय लाने को कहा। वर्कशॉप पर मैं चाय बाहर से नहीं मँगवाता। गैस चूल्हा, चाय वग़ैरह की सारी व्यवस्था वर्कशॉप पर ही करवाई हुई है। स्टॉफ़ को मेरा आदेश है कि मैं जब भी चाय माँगूँगा तो पूरे स्टॉफ़ को चाय दी जाएगी। कुल मिलाकर पैंतीस-छत्तीस लोगों का स्टॉफ़ है। एक साथ इतनी चाय बनने में थोड़ा समय लगता है। जब वह कप में चाय लेकर आया तभी मुझे महसूस होने लगा कि जैसे कोई मुझे मेरी गाड़ी की ओर धकेल रहा है। 
मैंने लड़के से चाय लेकर एक घूँट पिया। मैं समझ नहीं पा रहा था कि मुझे कौन गाड़ी की तरफ़ धकेल रहा है। मुझे बराबर ऐसा महसूस हो रहा था कि गाड़ी धीरे-धीरे पीछे मेरी तरफ़ चली आ रही है, वो एकदम मेरे क़रीब आ गई है, मैंने चाय छोड़ दी। अचानक मेरे क़दम गाड़ी की तरफ़ बढ़े, और मैंने ख़ुद को ड्राइविंग सीट पर बैठा पाया। 
गाड़ी फिर रोज़ की तरह उसी उबड़-खाबड़ अभिशप्त रास्ते पर रेंगने लगी। पैदल चाल से क़रीब दो किलोमीटर ही आगे चला होऊँगा कि देखा सामने से एक दुबली-पतली सी औरत चली आ रही है। उसके बदन पर पीले रंग का सूट है। उसने रूबिया जैसे सेमी ट्रांसपेरेंट कपड़े का चूड़ीदार पजामा और कुर्ता पहन रखा है। कुर्ता घुटने से ऊपर और काफ़ी चुस्त था। 
उसे देखकर लगा जैसे यह तो फ़ैशन शो में रैंप पर चलने वाली ज़ीरो फ़िगर मॉडल है। गाड़ी की हेड-लाइट डिपर कर दी। वह मुश्किल से बीस-इक्कीस साल की एक बेहद गोरी युवती थी। कपड़े शरीर पर इस तरह टाइट थे कि शरीर की एक-एक रेखा स्पष्ट दिखाई दे रही थी। उसकी टी-शेप नाभि भी। यहाँ तक की अंदरूनी कपड़ों की बनावट भी साफ़-साफ़ दिख रही थी, जो गहरे गुलाबी रंग के थे। 
मैं उसकी नैसर्गिक सुंदरता में खोता हुआ धीरे-धीरे आगे बढ़ता जा रहा था कि पता नहीं कब गाड़ी का स्टेयरिंग बाईं तरफ़ घूम गया, और वह गंदे नाले की गहराई में उतरने लगी। एकदम आख़िरी क्षणों में इस तरफ़ ध्यान जाते ही मैंने ब्रेक लगाया, लेकिन तब-तक बायाँ अगला पहिया सड़क से नीचे उतर चुका था। 
बड़ी मुश्किल से बैक करके गाड़ी को फिर से बीच सड़क पर ले आया। ध्यान फिर युवती पर गया तो देखा वह भी थोड़ी दूर पर रुकी, मेरी तरफ़ ही लगातार देखती हुई हँसती जा रही है। उसके दाँत इतने सुडौल और सफ़ेद हैं कि गाड़ी की लाइट में वाक़ई एकदम मोती की तरह चमक रहे हैं। 
मेरी निगाहें उसी पर स्थिर हो गईं। कुछ देर बाद उसकी हँसी बंद हो गई लेकिन चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान बनी हुई थी। अचानक ही मैंने महसूस किया जैसे कि वह मुझे अपने पास बुला रही है। मैंने गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ाई, मगर कुछ ही देर में महसूस किया कि मैं जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा हूँ, वैसे-वैसे वह भी पीछे खिसकती जा रही है। वह भी उल्टी चलती हुई। 
मैंने गाड़ी की स्पीड और बढ़ाई कि तुरंत उसके पास पहुँचूँ मगर यह समझते ही अचंभित रह गया कि हमारे उसके बीच की दूरी कम ही नहीं हो रही थी। फिर अचानक गाड़ी रुक गई। तभी उसने दाहिने हाथ से इशारा करके मुझे अपने पास बुलाया। मैं सम्मोहित सा उसे देखने लगा। उसने फिर बुलाया तो मैंने गाड़ी के एक्सीलेटर पर एकदम प्रेशर डाला। 
मगर बड़ा ग़ुस्सा आया ख़ुद पर कि मैं बंद गाड़ी को बढ़ाने की कोशिश कर रहा हूँ। वह बार-बार मुझे बुलाने लगी तो मैं स्वयं पर से नियंत्रण खो बैठा, मुझे ध्यान नहीं रहा कि मैं गाड़ी स्टार्ट करूँ, आगे बढ़ूँ, बल्कि मैं एकदम झटके से नीचे उतरा और सीधे उसी की तरफ़ लपका। 
मगर फिर से वही बात कि मैं जितनी तेज़ी से उसकी तरफ़ बढ़ता, वह उतनी ही तेज़ी से दूर होती जाती। मैं रुकता तो वह भी रुक जाती और हाथ से इशारा करने लगती। मैं एकदम तेज़ी से उसकी तरफ़ लपक कर दौड़ने लगता, मगर हमारे बीच की दूरी कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी। 
आख़िर मैं थक कर, बुरी तरह हाँफता हुआ बैठ गया सड़क पर। मेरी साँसें कुछ सँभली तो मैंने सिर उठाकर सामने देखा तो यैलो ब्यूटी क्वीन ग़ायब थी, वहाँ कोई नहीं था। मैं कुछ डरा, पीछे से आती जीप की लाईट में इधर-उधर देखा लेकिन मनहूस सन्नाटे को तोड़ती कीड़ों-मकोड़ों की आवाज़ों, बदबू के सिवा वहाँ और कुछ नहीं था। 
मैं स्वयं में वापस लौटा, वापस जीप की तरफ़ मुड़ा तो देखा वह मुझसे क़रीब चालीस-पचास मीटर पीछे छूट गई थी। उसकी हेड-लाइट अभी तक ऑन थी। जीप की तरफ़ चलते हुए मैं अचरज में पड़ गया कि रोज़ एक घंटा समय जिम में बिताने वाला मैं, कुछ मीटर दौड़ कर ही कैसे इतना ज़्यादा थक गया कि लग रहा है जैसे कई बीघे खेत जोत कर आ रहा हूँ, पैर ज़मीन पर रखे नहीं जा रहे थे, मन कर रहा था कि वहीं लेट जाऊँ। 
मगर भयानक बदबू से भरा, वह पूरा भयावह माहौल जीप की तरफ़ धकेलने लगा। पसीना-पसीना होता तेज़ क़दमों से जीप के पास पहुँचा तो यह देख कर होश उड़ गए कि उसके सारे दरवाज़े खुले हुए थे, जबकि मुझे अच्छी तरह याद था कि अपनी आदतानुसार मैंने नीचे उतरते ही अपनी साइड का दरवाज़ा बंद किया था। बाक़ी दरवाज़े तो बंद ही थे। 
मेरी घबराहट और बढ़ गई कि दरवाज़े तो मैं बंद करके गया था, अंदर न जाने कौन है, हत्यारों, डकैतों का यह पसंदीदा क्षेत्र है, कहीं मेरी हत्या कर जीप, मेरी महँगी घड़ी, चेन, मोबाइल लूटने के लिए डकैत अंदर बैठे तो नहीं हैं। पैंट की जेब में मोबाइल निकालने के लिए हाथ डाला कि उसकी टॉर्च ऑन करूँ लेकिन, फिर गड़बड़ हुई, याद आया कि उसे तो जीप में ही डैशबोर्ड पर छोड़ गया था। 
मैंने मन ही मन कहा, लगता है आज कुछ बहुत बुरा होने वाला है, ये सब-कुछ लूट कर मुझे मार कर यहीं झाड़ियों में फेंक देंगे, मेरी सड़ी हुई डेड बॉडी की बदबू से लोगों को कई दिन बाद पता चलेगा कि मैं कहाँ हूँ। और ज़्यादा परेशान मैं तब हो गया, जब मुझे उसी समय कोई याद आ गया। सोचा यदि मेरे हत्यारों ने मेरे मोबाइल का डेटा वायरल कर दिया तो उसका भी जीवन . . . मुझे उसकी भी चिंता होने लगी। बड़ी सावधानी से मैंने जीप के अंदर झाँका, वहाँ कोई नहीं मिला। 
मेरी जान में जान तब आई जब मुझे मोबाइल सामने डैशबोर्ड पर जैसा छोड़ गया था वैसा ही मिल गया। मैंने जल्दी से मोबाइल उठाया, गाड़ी के अंदर की लाइट ऑन की और पीछे जाकर सारे दरवाज़े बंद किए। अब मेरे सामने समस्या यह थी कि चाहते हुए भी मैं वहाँ से यू-टर्न लेकर वापस नहीं लौट सकता था, क्योंकि सड़क बहुत पतली थी, यू टर्न सम्भव ही नहीं था। आख़िर मैं आगे उसी कॉलोनी में पहुँचा, चाय की दुकान पर चाय पी। 
उस दिन मैंने गाड़ी में चाय नहीं मँगाई बल्कि उस होटल के अंदर बैठा। बैठते ही मेरी आँखें कैश काऊंटर के ठीक ऊपर लगी एक महिला की फोटो पर जा टिकीं। वह उसकी शादी के समय की फोटो थी जिस पर माला टँगी हुई थी, मतलब कि वह ब्रह्मलीन हो चुकी थी। फोटो देखते ही मैं एक नई उलझन में फँस गया। वह मुझे बहुत ही जानी-पहचानी लग रही थी। 
मैं उसे जितना ध्यान से देखता, मुझे वो और ज़्यादा जानी-पहचानी लगती। मैं याद करने की कोशिश करने लगा कि क्या मैं इससे कभी मिला हूँ, यह कौन है? मुझे ऐसा क्यों फ़ील हो रहा है? मुझे ज़्यादा समय नहीं लगा, याद आ गया कि यह बरसों पहले पड़ोस में किराए पर रहने वाली खंडेलवाल फ़ैमिली की सबसे बड़ी लड़की सुमन खंडेलवाल है। 
यह याद आते ही अनायास ही मुँह से निकल गया ‘ओह सुमन यह क्या, क्या हो गया था तुम्हें?’ मन एकदम उदास हो गया। जब पड़ोस में रहती थी तो हम-दोनों बहुत क़रीब आ गए थे। इतना कि छिप-छिपा के घंटों एक-दूसरे में खोए रहते थे। शादी से लेकर बच्चों तक की योजनाएँ बनाते, एक से बढ़ कर एक सपने देखते थे। मैं उसे देवी कहता था, वेनिस की देवी। क्योंकि चित्रों में वेनिस की देवी जैसी दिखती है, वो मुझे बिलकुल वैसी ही दिखती थी। 
अंग-प्रत्यंग बिलकुल वैसे ही। एकदम सफ़ेद संगमरमर सा चमकता हुआ श्वेत रंग, वैसी ही चिकनी त्वचा। रेशम से काले बाल, काली आँखें, छोटे-छोटे ब्रेस्ट, पतली सी कमर, कुछ अंदर को दबे हुए पेट पर कैपिटल टी का शेप लेती नाभि, बारिश की बूँदों से बनने वाले बुलबुलों की बनावट से, छोटे-छोटे नितम्ब, गोल पतली सुडौल जाँघें। मैं सम्मोहित सा उसे देर तक देखता ही रहता था, उसे कपड़े पहनने ही नहीं देता, तो वह मुरली की सी मीठी सुरीली आवाज़ में किसी के आने का डर दिखा कर, जल्दी से पहन कर भाग जाती थी। 
मगर हमारी इस रुपहली दुनिया को ही एक दिन ग्रहण लग गया। उसके फ़ादर अचानक ही एक दिन ग़ायब हो गए। काफ़ी ढूँढ़ा गया, पुलिस में रिपोर्ट लिखाई गई, लेकिन उनका पता नहीं चला। देखते-देखते कई महीने निकल गए। मेरी उस समय कोई इनकम नहीं थी, फिर भी जैसे-तैसे जो भी पैसे इकट्ठा कर पाता वह सब उसे दे देता। 
मकान-मालिक ने भी कई महीने तक किराया नहीं लिया। लेकिन तीन-चार लोगों का परिवार भला ऐसे कब-तक चलता। अंततः मकान का किराया, घर का ख़र्चा चलना मुश्किल हो गया। तो एक दिन उसकी माँ बच्चों को लेकर पैतृक आवास अल्मोड़ा ज़िले, उत्तराखंड वापस चली गईं। 
कुछ ज़रूरी सामान छोड़कर बाक़ी सब बेच दिया। जो पैसा मिला, उससे कुछ लोगों के क़र्ज़ वापस किए और वापस जाने की व्यवस्था की। संयोग से जिस दिन वह गई, उस दिन मैं रिश्तेदारी की एक शादी में दो-तीन दिन के लिए बाहर गया हुआ था। लौटने पर पता चला तो मुझे बड़ा धक्का लगा। 
मेरे पास कोई भी ऐसा संपर्क सूत्र नहीं था कि मैं उससे संपर्क करता। उसका मोबाइल नॉन-पेमेंट में कटा हुआ था। मुझे उस पर इस बात के लिए भी ग़ुस्सा आया कि शिफ़्ट होने की बात उसने एक बार भी नहीं बताई। यदि उसके गाँव का एड्रेस होता मेरे पास, तो मैं उससे मिलने ज़रूर जाता, चाहे वह देश-दुनिया के किसी भी कोने में होता। उसका एड्रेस ढूँढ़ने की मेरी हर कोशिश बेकार हो गई। समय बीतता गया, मगर उसकी यादें बनी रहीं, कभी भी पूरी तरह दिमाग़ से बाहर नहीं हुईं। 
कुछ ही साल बीते होंगे कि मुझे उसके फ़ादर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर दिखाई दिए। मैं अपने नए-नए शुरू किए गए बिज़नेस के सिलसिले में दिल्ली गया हुआ था। जिस बोगी से प्लैटफ़ॉर्म पर मैं उतरा, उसी बोगी के पिछले दरवाज़े से वह भी उतरे। उनके साथ मध्यम क़द काठी की साँवली सी एक महिला भी थी। उन पर निगाहें पड़ते ही मैंने उन्हें पहचान लिया। 
मेरी आँखों के सामने एकदम से सुमन खंडेलवाल का चेहरा घूम गया। मैं लपक कर उनके पास पहुँचा। हाथ जोड़कर उन्हें नमस्ते की। वह एकदम हक्का-बक्का से हो गए। नमस्ते का जवाब देने के बजाय मुझे अनदेखा कर आगे बढ़ने लगे। लेकिन मेरे सामने तो सुमन खंडेलवाल का चेहरा था। मैं उन्हें ऐसे कैसे जाने देता? मैंने आगे बढ़ कर उन्हें रोक लिया। 
मैंने कहा, “अंकल जी आपने मुझे पहचाना नहीं, आप मेरे पड़ोस में रहते थे।” 
लेकिन वह कोई जवाब देने के बजाय बग़ल से होकर फिर आगे बढ़ गए। मगर मैं उन्हें किसी भी स्थिति में ऐसे जाने देने के लिए तैयार नहीं था। मेरा आश्चर्य तब और बढ़ गया जब वह औरत भी उनका हाथ पकड़कर खींचने लगी थी। 
मैं फिर से उनके एकदम सामने खड़ा हो गया और कहा, “अंकल जी आप पहचान कर भी अनजान क्यों बन रहे हैं। आपको आपका पूरा परिवार, पुलिस ढूँढ़ते-ढूँढ़ते थक गई, आप कहाँ चले गए थे? आपको मालूम है कि आपका परिवार कहाँ चला गया है?” 
लेकिन वह फिर भी कुछ नहीं बोले, फिर से आगे निकलने की कोशिश की। लेकिन मैंने ज़िद कर ली कि इन्हें बात किए बिना, सच जाने बिना जाने नहीं दूँगा। मैंने ज़्यादा कोशिश की तो उनके बजाय वह महिला मुझ पर भड़क उठी। लड़ने पर उतारू हो गई। बोली, “जब यह तुमको जानते नहीं, तो तुम क्यों इनके गले पड़े जा रहे हो। सामने से हटो, हमें जाने दो, नहीं तो मैं अभी पुलिस बुला लूँगी।” 
पुलिस का नाम सुनते ही मेरा ग़ुस्सा और बढ़ गया। मैंने कहा, “तुरंत बुलाइए, तब तो और भी अच्छा होगा। पुलिस में इनकी मिसेज ने कई साल पहले, इनके खो जाने की रिपोर्ट लिखवाई हुई है, आज यह पुलिस को मिल जाएँगे, और पुलिस इन्हें, इनके परिवार को हैंडओवर कर देगी।”
अब तक मेरा ध्यान इस ओर भी चला गया था कि अंकल न सिर्फ़ दुबले-पतले बीमार-बीमार से हैं, बल्कि अजीब तरह से खोए-खोए एबनॉर्मल से दिख रहे हैं। मेरी बात सुनते ही महिला के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। वह जल्दी से जल्दी निकलने की कोशिश करने लगी। लेकिन मैं तेज़ आवाज़ में बात करते हुए उन्हें जाने नहीं दे रहा था। 
मैंने जानबूझकर बात को इतना बढ़ाया कि लोगों की भीड़ लगने लगी, अंततः पुलिस आ गई। मैंने उन्हें सारी बातें बताईं तो वह मुझे और उन दोनों को थाने ले गए। वहाँ से तुरंत ही लखनऊ के उस थाने पर फोन किया, जहाँ उनकी गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाई गई थी। मेरी बात सच निकलते ही पुलिस कड़ाई से पूछताछ करने लगी। मेरी तरह उसे भी मामला सन्देहास्यपद लगा था। 
पूछताछ में अंकल एकदम झूठ बोलने लगे कि “मिसेज बहुत झगड़ा करती थी, सारे बच्चे बहुत परेशान करते थे, इसलिए उन्होंने हमेशा के लिए घर छोड़ दिया और अब वह, वहाँ कभी नहीं जाएँगे।” उस महिला के बारे में भी वह कोई साफ़-साफ़ जवाब नहीं दे पा रहे थे। 
पुलिस को मामला ज़्यादा सन्देहास्यपद लगा तो उन्होंने उस महिला के बारे में सख़्ती से पूछताछ शुरू कर दी, तब वह दोनों सच बोलने लगे। महिला जो पहले अपना नाम सुगंधा बता रही थी, उसका वास्तविक नाम सकीना था। और खंडेलवाल अंकल जी उसके चंगुल में ऐसे फँसे थे कि अपने परिवार से ही हाथ नहीं धो बैठे थे, बल्कि पैंतालीस-छियालीस की उम्र में खतना भी करवा बैठे थे। 
भुवन चंद्र खंडेलवाल से मोहम्मद सुलेमान बन गए थे। यहाँ तक कि काफ़ी हद तक अपना मानसिक संतुलन भी खो बैठे थे, एक रिमोट चालित रोबोट से बन गए थे, और उनका रिमोट सकीना के हाथ में था। वह जो चाहती थी, कहती थी, वह यांत्रिक गति से वही करते थे। 
लेकिन जब थाने में पुलिस ने उन्हें विश्वास में लेकर पूछताछ शुरू की, मैंने भी उन्हें विश्वास दिलाया कि मैं आपके साथ हूँ, मैं आपको आपके परिवार के पास ले चलूँगा तो जैसे वह कुछ हद तक हिम्मत कर पाए और सारी बातें बताने लगे। उनके सच से एक बहुत बड़े ह्यूमन बॉडी ऑर्गन्स को ब्लैक वर्ल्ड में बेचने वाले ख़ूँख़ार क्रूर गैंग का भंडाफोड़ हो गया। 
ऐसा गैंग जो बाइस लोगों का एक बड़ा परिवार था। परिवार का हर सदस्य जब-तक जागता था, तब-तक शिकार की तलाश में हर तरफ़ घूमता था, हर जगह कटिया फेंके रहता था कि कोई तो शिकार फँसेगा। एकदम बुद्धिनाथ मिश्र की इस कविता की तर्ज़ पर कि ‘एक बार और जाल फेंक रे मछेरे, जाने किस मछली में बंधन की चाह हो!”
तो मछलियों-सी मासूमियत वाले लोग, भुवन चंद्र की तरह, इस दरिंदे, ख़ूनी भेड़ियों के झुण्ड से, ख़ूनी गैंग का शिकार होते रहते थे, जो खतना तो खतना, उस समय तक एक किडनी भी गँवा बैठ थे। भुवन चंद्र जी जहाँ काम करते थे, सुगंधा यानी की सकीना आए दिन वहाँ किसी न किसी काम से पहुँचती रहती थी। 
बड़ी सी बिंदी लगाए, बहुत ही ढंग से साड़ी पहने हुए। जब वह चलती थी तो उसके पायलों की छुन्न-छुन्न की आवाज़ में भुवन चंद्र तो जैसे खो जाते थे। एक बार जब सुगंधा ने उनकी आँखों से आँखें मिलते ही बड़े क़रीने से मुस्कुरा दिया तो भुवन चंद्र जी तो जैसे हवा में उड़ने लगे। 
और फिर दो-चार दिन में ही उससे बातें भी ख़ूब करने लगे, होटल में चाय नाश्ता करवाने लगे। उसे लेकर घूमने-फिरने जाने लगे। सुगंधा की एक-एक अदा पर वह मंत्र-मुग्ध से होते चले गए। सुगंधा ने हफ़्ते भर में ही उनकी हालत यह कर दी कि वह ऑफ़िस से छुट्टी ले-ले कर उसके साथ समय बिताने लगे। 
भुवन चंद्र जी को बड़ी ख़ुशी महसूस हुई थी जब सुगंधा ने बताया था कि उसकी शादी हो कर भी, नहीं हुई है। इस बड़ी अजीब सी बात पर उन्होंने उससे पूछा था, ‘यह तुम क्या कर रही हो, मैं समझ नहीं पा रहा हूँ। शादी होकर भी शादी नहीं हुई है, क्या मतलब है इस बात का?’
तो वह सुबकने लगी थी, आँखों से बारिश की बूँदों की तरह आँसू टपकने लगे थे। भुवन चंद्र ने उसके आँसू पोंछते हुए कहा, ‘तुम तो रो रही हो, ऐसी भी क्या बात है, बताओ ना, मुझ से जो भी हो सकेगा, वह मैं तुम्हारे लिए करूँगा।’ उन्होंने अपनी रुमाल से उसके आँसू पोंछते हुए कहा, तो उसने एक लंबी-चौड़ी बहुत भावुक कर देने वाली कहानी उन्हें सुनाई कि वरमाला की रस्म पूरी हो जाने के बाद दहेज़ के लिए झगड़ा हो गया और बड़ी मारपीट के बाद बारात लौट गई, उसकी शादी नहीं हो पाई। 
बाद में घर में माँ-बाप, भाई-बहन सब इसके लिए उसको ही कोसने लगे कि ‘यह इतनी कुलक्षणी न होती तो दरवाज़े पर आई बारात वरमाला के बाद वापस न जाती, दुनिया में उनकी ऐसी बेइज़्ज़ती न होती।’ उठते-बैठते, खाते-पीते सभी उसको ताना मारते थे, इसीलिए आख़िर उसने ऊब कर घर छोड़ दिया। 
उसके बाद से दर-दर की ठोकरें खाती फिर रही है। कभी कहीं, तो कभी कहीं, छोटी-मोटी नौकरी करती, धक्के खाती जी रही है, हर जगह उसे हेल्प करने के नाम पर लोगों ने बार-बार नोचने-खसोटने की ही कोशिश की है। बस ऐसे ही देखते-देखते इतने साल निकल गए। मैंने तो सोचा था कि बस ऐसे ही जल्दी ही ज़िन्दगी ख़त्म हो जाएगी, लेकिन तुम मिल गए, तो लगा नहीं अभी तो ज़िन्दगी और जीनी चाहिए।’
उसकी बहुत ही ज़्यादा भावुक कर देने वाली बातों में भुवन चंद्र जी खोते ही चले गए, इतना खोए कि अपनी पत्नी, बच्चे घर सब भूल गए। और फिर कई रातें अपनी पत्नी बच्चों को छोड़कर उसके घर पर बिताने लगे। ऐसी ही एक रात को वह उसके साथ व्यस्त थे कि तभी उन्हें कमरे में दो और लोग दिखाई दिए, जो लगातार उनकी वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहे थे। 
झटके से उठ कर वह अपने कपड़े की तरफ़ बढ़े तो कपड़े अपनी जगह से ग़ायब थे। वह ग़ुस्से में उन लोगों की तरफ़ झपटे, लेकिन उनमें से एक ने तुरंत तमंचा उनकी तरफ़ तान दिया। वह हक्का-बक्का हो गए कि यह सब क्या हो रहा है। उन्होंने अपने कपड़े माँगे तो बदले में गालियाँ, लात-घूँसे मिले। 
जबकि सुगंधा के कपड़े उसके पास थे, उसने तुरंत पहन लिए। उन्होंने सुगंधा से पूछा, ‘यह सब क्या है?’ तो वह बड़ी निश्चिंतता के साथ बोली, ‘मैं नहीं जानती, मुझे कुछ नहीं पता यह लोग कौन हैं।’ लेकिन उसके हाव-भाव से भुवन चंद्र जी समझ गए कि दाल में कुछ नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। 
बहुत रिक्वेस्ट करने के बाद उनके कपड़े उनको दे दिए। भुवन चंद्र जी ने आख़िर तमंचे वाले से पूछा, “आप लोग कौन हैं? मुझसे क्या चाहते हैं?” 
तो उसने कहा, “अब हम जो कहेंगे, तुम्हें वही करना होगा, नहीं तो यह औरत अभी थाने में रिपोर्ट लिखाएगी कि तुम उसके घर में घुसकर उसका रेप कर रहे थे।”
भुवन चंद्र जी बोले, “यह सब झूठ है, साज़िश। यह मुझसे शादी करने वाली है। हमारे बीच पति-पत्नी का ही रिश्ता है, मैं इनके कहने पर ही यहाँ आता हूँ, सब-कुछ इनकी इच्छा से ही हो रहा है। पुलिस झूठी बातों पर विश्वास नहीं करेगी, ये सारी बातें ख़ुद ही बताएँगी। रेप का तो कोई प्रश्न ही नहीं है।”
तभी तमंचे वाला उजड्ड जंगलियों की तरह गाली देता हुआ बोला, “चुप कर, बहुत हो गई तेरी बकवास। तुम इसको बहला-फुसलाकर बहुत दिन से इसकी इज़्ज़त, पैसे लूटते आ रहे हो, इसे मासूम नादान समझ कर तूने अपने झाँसे में फँसा लिया।” फिर वह सुगंधा की तरफ़ देख कर बोला, “चल, तू ही बता, मैं सच कह रहा हूँ कि नहीं।”
यह सुनते ही सुगंधा बड़ी कुटिलता के साथ मुस्कुराई। यह देखकर भुवन चंद्र जी के होश फ़ाख़्ता हो गए। वह अपने होशो-हवास सँभाल पाते कि उसके पहले ही उसने साफ़-साफ़ कहा, “जी हाँ, मैं इसके बहकावे में आ गई, यह बहुत दिनों से मेरे सारे पैसे, मेरी इज़्ज़त लूट रहा है, वह भी मेरे ही घर में घुस कर। अब तो मेरा घर भी मुझसे छीनना चाहता है।”
यह सुनते ही भुवन चंद्र उस पर चीखे, “तुम झूठ क्यों बोल रही हो?” 
उनका इतना बोलना था कि वह दोनों आदमी उन पर टूट पड़े। जम-कर पिटाई कर दी। सकीना ने भी भद्दी-भद्दी गालियाँ देते हुए हाथ साफ़ किए। 
अब भुवन चंद्र जी को विश्वास हो गया कि वह ऐसी गहरी साज़िश का शिकार हुए हैं, जिससे बच निकलने का कोई रास्ता फ़िलहाल दिखता नहीं है। इसी समय उन दोनों ने मोबाइल में उनके कई और ऐसे वीडियो दिखा कर उन्हें बिलकुल पस्त कर दिया, जिसमें वह सुगंधा के साथ अंतरंग खेलकूद में लगे हुए थे। 
उन सब ने सबसे पहले उन पर दबाव डाल कर उनके अकाउंट में जितना भी पैसा था, वह अपने अकाउंट में ट्रांसफ़र करवा लिया। वह हाथ जोड़ते रहे, लेकिन वह नहीं माने, कहा, “तुरंत पैसा ट्रांसफ़र करो, नहीं तो यह सारे वीडियो तुम्हारी मिसेज़ को भेज दूँगा, सोशल मीडिया पर डालूँगा और फिर थाने में रिपोर्ट लिखवाऊँगा, तुम्हें जेल जाते देर नहीं लगेगी। 
“इसका रेप करते रहे, अभी-अभी किया है, यह तो मामूली से मेडिकल चेक-अप में ही साबित हो जाएगा। इसके बाद तुम जेल में होगे और तब हम तुम्हारी बीवी, तुम्हारी लड़कियों को नहीं छोड़ेंगे। तुमने इसके साथ रेप किया, पैसा लूटा, हम उनके साथ करेंगे, एक-एक पैसा वसूलेंगे, तुम अकेले कर रहे थे, हम कई लोग करेंगे। सोचो तुम्हारी बीवी, लड़कियों का क्या हाल होगा।”
इसके बाद उन सब ने उनकी एक-एक जमा पूँजी ले ली। फिर उनके षड्यंत्र का नया अध्याय खुला। एक दिन उनसे कहा कि “तुम इसकी इतने दिनों से इज़्ज़त लूटते रहे, इसलिए अब तुम्हें इसके साथ निकाह करना पड़ेगा।”
भुवन चंद्र जी ने कहा, “मैं निकाह कैसे कर सकता हूँ, मेरी पत्नी है, बच्चे हैं। यह हो ही नहीं सकता। क़ानून इसकी परमिशन नहीं देता।”
तो उन्होंने गालियाँ देते हुए कहा, “तुमसे जो कहा जा रहा, वह तुम्हें करना ही करना है, बाक़ी क़ानून-सानून हम देख लेंगे। ऐसे क़ानून हम अपने . . . पर रखते हैं,” बड़ी भद्दी बात कहते हुए उन्हें फिर धमकाया। 
भुवन चंद्र जी अब उन सब से गँवार उजड्डों की भाषा, व्यवहार से इतर कुछ और की रत्ती भर भी आशा नहीं कर थे। फिर गिरोह उन्हें एक दिन ज़बरदस्ती एक जगह उठा ले गया। वहाँ सकीना, मौलवी सहित पहले से ही कई लोगों का जमावड़ा था। वो कुछ समझें बूझें उसके पहले ही उनसे तुरंत ही इस्लाम मज़हब क़ुबूल करने के लिए कहा गया। 
उनके इनकार करते ही गर्दन पर चाकू रखकर कहा गया कि “जो कहा जा रहा है तुरंत मानो, वरना सिर क़लम कर देंगे। आख़िर उन्हें मानना पड़ा। उसी समय उनका खतना भी कर दिया गया। नाम भुवन चंद्र से बदल कर मोहम्मद सुलेमान कर दिया गया। 
इसके बाद उन्हें एक दूसरी जगह तीन-चार दिन तक रखा गया। नाम-मात्र को खाना दिया जाता, साथ ही कोई नशीली दवा भी। वह बेहोशी की हालत में पड़े रहते थे। जब होश में होते तो उनको कुछ समझ में नहीं आता कि आख़िर यह लोग चाहते क्या हैं? सकीना को सुगंधा बनाकर जाल में फँसाया, धोखे से खतना किया, मुसलमान बनाया, निकाह कराने के लिए कहा, मगर मुसलमान बनाने के बाद से सकीना ग़ायब है। 
कुछ ही दिनों में वह बहुत कमज़ोर हो गए थे। एक दिन फिर उन्हें लेकर कहीं चल दिए। रास्ते में चाय दी गई। उसे पीने के बाद फिर उन्हें होश नहीं रहा। जब होश आया तो अपने को एक थर्ड क्लास हॉस्पिटल में पाया। वह बहुत घबराए कि उन्हें क्या हो गया था जो हॉस्पिटल में एडमिट करना पड़ा। जब नर्स आई तो उससे पूछा, लेकिन वह बिगड़ कर ऊट-पटाँग बोलकर चली गई। 
इसके बाद जल्दी ही फिर बेहोश कर दिए गए। जब होश आया तो ख़ुद को एक कमरे में बंद पाया। पेट के निचले हिस्से में उन्हें दर्द महसूस हो रहा था। जब वहाँ देखा तो ऑपरेशन का निशान पाया। वह घबरा उठे यह क्या, क्या इन सब ने मेरी किडनी निकाल ली है। सोचते ही वह बेहोश हो गए। 
फिर उनका जीवन ऐसे ही चलता रहा। कभी कहीं तो कभी कहीं, किसी कमरे में ख़ुद को बंद पाते। और फिर उस दिन सकीना उनको ख़ास मक़सद से लेकर दिल्ली पहुँची थी। पुलिस ने जब क़ायदे से छानबीन की तो पता चला कि उस दिन ह्यूमन बॉडी ऑर्गन्स बेचने वाला गिरोह, अपने शिकार की आख़िरी सबसे बड़ी क़ीमत वसूलने जा रहा था। और वह दिन उनके जीवन का आख़री दिन होने जा रहा था। वहाँ के एक हॉस्पिटल में उनकी आँखें, लीवर, आदि जितने भी अंग प्रत्यारोपित हो सकते हैं, वह सब निकाले जाने थे। 
उसके बाद बची डेड बॉडी को जलाकर राख कर दिया जाना था। उनकी किडनी पहले ही ब्लैक-वर्ल्ड के ज़रिए तीस लाख रुपए में ह्यूमन बॉडी ऑर्गन्स की, दुनिया की सबसे बड़ी अवैध मंडी गल्फ़ कंट्रीज़ में बेची जा चुकी थी। बाक़ी हिस्से दो करोड़ में बिकने फ़ाइनल हुए थे, मगर मेरे मिल जाने से उनका जीवन बच गया। 
क़ानूनी कार्यवाईयों को पूरा करने के बाद, उनके ख़राब स्वास्थ्य के कारण मैं ख़ुद उन्हें उनके घर अल्मोड़ा तक छोड़ने गया। मैंने सोचा चलो अब सुमन, मेरी देवी भी मिल जाएगी। लेकिन वहाँ पहुँच कर मेरे सपनों पर फिर तुषारापात हो गया। हमारे पहुँचने के कुछ महीने पहले ही उसकी माँ ने मेरी देवी का विवाह पास के ही एक गाँव में कर दिया था। मगर मुझे इस बात की ख़ुशी हुई कि अंकल को उनके परिवार ने फिर अपना लिया था। 
शादी के बाद सुमन का पति काम-धंधे के लिए उसे लेकर लखनऊ चला आया था। यहीं पहाड़ियों के एक सामाजिक संगठन पर्वतीय परिषद के एक पदाधिकारी के सहयोग से उसने एक दुकान खोली थी, जो दोनों के सौभाग्य से चल निकली थी। 
इसी बीच एक दिन पता चला कि सुमन को ब्रेस्ट कैंसर है। उसका प्यारा पति उसका इलाज लखनऊ पीजीआई में करवा रहा था, वह काफ़ी हद तक ठीक भी हो गई थी। लेकिन लंबे ट्रीटमेंट, पैसों की बढ़ती तंगी, भयावह तकलीफ़ों के चलते सुमन हिम्मत हार बैठी, और एक दिन उसने सुसाइड कर लिया। 
मैं जिस दुकान पर चाय पीने उस मनहूस डरावने रास्ते से पहुँचता था, वह उसी की दुकान थी, और उसने अपनी पत्नी यानी मेरी प्यारी देवी सुमन खंडेलवाल का चित्र लगा रखा था। 
एक दिन फिर मैं वर्कशॉप में बैठा था, अचानक ही मुझे महसूस होना शुरू हुआ कि मुझे . . . मैंने गाड़ी निकाली और सीधे वहीं होटल पहुँचा। अंदर बैठकर मैंने चाय-नाश्ता मँगवाया। काऊंटर पर बैठे व्यक्ति के बारे में वेटर से पूछा, “क्या यही होटल के मालिक हैं?”
तो उसने कहा, “हाँ।”
मैंने कहा, “मैं इनसे कुछ बात करना चाहता हूँ, पूछ कर बताओ वह किस समय बात कर सकते हैं।”
वह मुझे रोज़ देखते ही थे, तो तुरंत बात करने के लिए तैयार हो गए। मैंने उनके पास पहुँच कर बहुत ही विनम्रता से कहा, “देखिए मैं जो बात करने जा रहा हूँ, उसे कहीं से अन्यथा मत लीजिएगा।”
मैंने फोटो की ओर संकेत करते हुए आगे कहा, “आपने यह जो फोटो लगा रखी है, यह शायद आपकी . . . “
मैं जानबूझ कर बात अधूरी छोड़ दी तो उन्होंने बड़ी गहरी साँस लेकर कहा, “जी हाँ, मेरी मिसेज़ की फोटो है। दुर्भाग्य से अब इस दुनिया में नहीं रहीं।”
मैंने सुमन और अपने रिश्ते के बारे में कोई भी बात करना उचित नहीं समझा, इसलिए बात में थोड़ा परिवर्तन करते हुए कहा, “शायद आपको पता हो कि आपकी ससुराल के लोग पहले यहीं लखनऊ में रहते थे, हम एक ही मोहल्ले में रहा करते थे। खण्डेलवाल साहब के यहाँ से मेरे परिवार का बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध था। फिर अचानक ही खंडेलवाल साहब का परिवार अल्मोड़ा चला गया और हमारा सम्बन्ध छूट गया।” 
मैंने अल्मोड़ा जाने तक की बाक़ी सारी बातें इसलिए नहीं की, कि पता नहीं सुमन, उसकी माँ ने कौन सी बातें बताईं हैं, कौन सी नहीं। मेरी बात सुनकर वह कुछ सोचते हुए बोले, “हाँ, कुछ स्थितियाँ ऐसी बनीं कि अचानक ही अल्मोड़ा जाना पड़ा।”
वह बहुत ही विनम्र, भले आदमी लग रहे थे। बात आगे बढ़ी तो मैंने कहा, “जब यहाँ पहली बार यह फोटो देखी तो मुझे लगा कि यह सुमन जी ही हैं। इतने बरसों बाद सुमन जी, खंडेलवाल साहब के परिवार के बारे में इस तरह की जानकारी मिलेगी यह मैंने सोचा भी नहीं था। मुझे बहुत दुःख हो रहा है।”
मैंने उनसे भुवन चंद्र जी के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, “उन्हें कई बीमारियाँ हो गई थीं, एक दिन वह ऊपर से नीचे उतर रहे थे, हल्की-हल्की बारिश की वजह से रास्ते में फिसलन थी, वह सँभल नहीं पाए और गिर गए गहरी खाई में। कई दिन बाद उनकी डेड-बॉडी मिल पाई थी। 
“परिवार की स्थिति देखते हुए मैं सबको यहीं लेता आया। सब मेरे साथ ही रहते हैं, वहाँ जो भी थोड़ी बहुत प्रॉपर्टी थी उसे बेच दी गयी। उसी पैसों से साले को भी बिज़नेस करवा दिया। मुझे बहुत संकोच हो रहा था, लेकिन सास जी, और मेरे माँ-बाप, सब के कहने पर मुझे साली से शादी करनी पड़ी।”
यह सुनते ही मैं अनायास ही पूछ बैठा, “आप इस रिश्ते से ख़ुश तो है ना?” 
उसने तुरंत ही कहा, “ख़ुश भी हूँ और नहीं भी। चम्पा मेरे सामने होती है, तो मुझे लगता है, जैसे सुमन मेरे सामने है। दोनों बहनें एक जैसी ही लगती हैं। जब चम्पा के साथ, घर से बाहर निकलता हूँ, तो लगता है जैसे कि सुमन मेरे साथ-साथ चल रही है। 
“इस पूरे होटल में मुझे सुमन ही सुमन दिखाई देती है। मन बार-बार यही कहता है कि काश उसने ऐसा ग़लत क़दम नहीं उठाया होता। मैं चाहे जहाँ से पैसा ला रहा था, उसका बढ़िया से बढ़िया इलाज करवा रहा था। डॉक्टर भी बार-बार कहते थे बिलकुल ठीक हो जाएँगी, पहली स्टेज में ही पता चल गया है। 
“लेकिन उसने ज़िन्दगी से हार मान ली, बहुत दर्द और परेशानी से थक गई थी। जब देखो तब पूछती रहती थी, ‘तुम इतना पैसा कहाँ से ला रहे हो?’ मैं कहता, ‘ये जानना तेरा काम नहीं, इतना तो कमाता ही हूँ।’ मैं उसे जी-जान से चाहता था। उसकी पूरी देख-भाल करता था। 
“उसे कोई काम नहीं करने देता था। जब मैं चौका-बर्तन, सफ़ाई करता तो वह रोती कि उसके रहते हुए मुझे काम करना पड़ रहा है। मैं कहता, ‘क्यों ऐसे रोती हो, हमेशा ही तो ऐसे नहीं रहेगा न। जल्दी ही तू ठीक हो जाएगी, फिर दोनों मिलकर सब काम किया करेंगे।’ उसकी ज़िद रखने के लिए ही मैंने एक ऐसा काम भी किया . . .” 
यह कहते-कहते वह बहुत भावुक हो गए, मोटे-मोटे आँसूँ गिरने लगे। मैंने उन्हें बहुत समझाया-बुझाया, तब उन्होंने बताया कि “जब सुमन की बीमारी का पता चला तो वह दो महीने की प्रेग्नेंट थी। डॉक्टर ने भी कहा, मैंने भी समझाया कि किसी तरह सब ठीक हो जाएगा, बच्चे को हो जाने दो। 
“मगर उसने कहा, ‘नहीं मैं बच्चे को ऐसे नहीं आने दूँगी कि वह अपनी माँ का दूध भी न पी सके। यह बीमारी उसे भी हो सकती है। इस बीमारी क्या पता, कब क्या हो, तुम एक साथ उसको और मुझे कैसे संभालोगे।’
“मैंने कहा, ‘घबराओ मत, सब ठीक हो जाएगा, मैं सब कर लूँगा, बस तू सामने बैठी रहे तो मैं दुनिया के सारे काम अकेले कर डालूँगा।’
“मगर शायद मेरे काम, मेरी क्षमता पर उसे विश्वास नहीं था या फिर ज़्यादा समय तक तकलीफ़ों का सामना कर पाने की उसमें हिम्मत नहीं बची थी। और मुझे इस दुनिया छोड़, अकेली ही चली गई। मैं उसे कभी भी भूल नहीं पाऊँगा। आज उसकी बहन उसी की तरह मेरे साथ जीवन बिता रही है। 
“दो बेटे भी हैं। लेकिन सुमन ने जो जगह ख़ाली की थी, वह आज भी ख़ाली ही है, और सदैव ही रहेगी। परिवार में हँसता-बोलता हूँ। मगर तब भी मुझे सुमन सुमन बस सुमन ही याद आती है। लगता है कि जैसे वह भी बराबर मेरे साथ बनी रहती है, बात करती है।”
मैंने मन ही मन कहा, अकेला तो वह मुझे भी छोड़ गई है, और अब मुझसे बात ही नहीं, लगता है वह मिल भी रही है। 
हम-दोनों की बातें बड़ी लंबी खिंचती चली गईं, और उनके होटल बंद करने का टाइम हो चुका था। मैंने वर्कशॉप फोन करके बंद करवा दिया था। जब मैं वापस चला तो ग्यारह बज रहे थे और भयावह रास्ते में गाड़ी उस जगह ख़राब हुई, जहाँ वह बहुत ही सँकरा था। दोनों तरफ़ से आधा-आधा रास्ता टूटा हुआ था। ज़रा सा ग़लती हुई नहीं कि गाड़ी खड्ड में या दूसरी तरफ़ नीचे गंदे नाले में जा सकती थी। 
अब मेरे पास दो ही रास्ते थे कि या तो उस बियाबान में जान हथेली पर लेकर सुबह होने की प्रतीक्षा करूँ या फिर किसी को बुलाऊँ। मैंने एक दोस्त को कॉल करने के लिए मोबाइल उठाया ही था कि तभी गाड़ी की हेड-लाइट में दस-पंद्रह क़दम आगे अचानक ही वह यैलो ब्यूटी-क़्वीन फिर मुस्कुराती हुई दिखाई दी। उसे देख कर मैं इस बार परेशान नहीं हुआ। 
पिछली बार की अपेक्षा वह बहुत क़रीब थी, मैं उसका चेहर साफ़-साफ़ देख पा रहा था। वह भी सीधे मेरी आँखों में देख रही थी, उसे पहचानते ही आश्चर्य से मैं बोल पड़ा सुमन . . . न . . .न . . . उसके पास जाने के लिए मैं गाड़ी से उतरने ही वाला था कि उसकी सुरीली हँसी की आवाज़ कानों में पड़ी। मैं अचंभित, ठिठक गया, और वह कैट-वॉक सी करती आगे बढ़ गई, मुड़-मुड़ कर मुझे देखती और हाथ से इशारा कर बुलाती जा रही थी। 
अचानक मेरा ध्यान गया कि गाड़ी तो स्टार्ट है और पैदल चाल से ही सुमन के पीछे-पीछे चल रही है। मेरे हाथ मज़बूती से स्टेयरिंग सँभाले हुए हैं। मैं सम्मोहित सा पीछे-पीछे चलता हुआ जब गाड़ियों से भरी मेन-रोड पर पहुँचा तो जैसे सम्मोहन से मुक्त हुआ, मुझे सुमन कहीं नहीं दिख रही थी। हर तरफ़ उसे देखा मगर वो कहीं नहीं दिखी। 
वह कभी न कभी ज़रूर मिलेगी, इसी आस में बरसों बाद भी मैं रोज़ उस रोड पर जाता हूँ। हालाँकि अब वह फ़ोर लेन की बहुत अच्छी रोड बन गई है, स्ट्रीट लाइट से चमकती रहती है। उसके प्यारे हस्बेंड, परिवार का मेरे यहाँ से आना जाना बना हुआ है, लेकिन कोई यह नहीं जानता कि मैं हर मौसम में उस रोड पर बिना नागा क्यों जाता हूँ, वह शाम होते ही मुझे क्यों बुलाती है . . . निश्चित ही कभी पता भी नहीं चलेगा।


प्रदीप श्रीवास्तव
प्रदीप श्रीवास्तव
प्रकाशित उपन्यास - 'मन्नू की वह एक रात, बेनज़ीर- दरिया किनारे का ख़्वाब, वह अब भी वहीं है प्रकाशित कहानी-संग्रह - मेरी जनहित याचिका, हार गया फौजी बेटा, औघड़ का दान, नक्सली राजा का बाजा. मेरा आखिरी आशियाना, मेरे बाबू जी; नाटक– खंडित संवाद के बाद कहानी एवं पुस्तक समीक्षाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित. "हर रोज़ सुबह होती है" (काव्य संग्रह) एवं "वर्ण व्यवस्था" पुस्तक का संपादन. संप्रति : लखनऊ में ही लेखन, संपादन कार्य में संलग्न सम्पर्क : [email protected]
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2 टिप्पणी

  1. पिछले सप्ताह ही दिनेश माली जी के द्वारा प्रदीप जी के उपन्यास बेनजीर की समीक्षा पढ़ी थी। समीक्षा ने ही हमें बहुत प्रभावित किया था, पर टिप्पणी में हमने यह लिखा था कि समीक्षा से अधिक प्रदीप जी के परिचय ने हमें प्रभावित किया था। आज उनकी कहानी भी एक साँस में पढ़ गए।
    *हॉरर कहानी* कुछ भय, कुछ आश्चर्य, बहुत जिज्ञासा व उत्सुकता के साथ अपने को पढ़ाकर अंत तक ले गई।
    शीर्षक सुमन पढ़ कर तो ऐसा लगा था इसलिए प्रधान कहानी होगी पर पता नहीं था कि यह एक हॉरर कहानी है।
    कहानी को पढ़कर ऐसा लगा कि कुछ आत्माएँ ऐसी होती हैं, जो मृत्यु के पश्चात भी जीवन के कुछ अनसुलझे विषयों को सुलझाने में मदद कर ही देती हैं।
    जैसे इस कहानी में सुमन के आकर्षण ने उसके पिता की गुमशुदगी और उसके माध्यम से ऐसे क्रूर गिरोह का भंडाफोड़ किया जिसमें महिलाएँ पुरुषों को बहला- फुसलाकर अपने वश में करती हैं, उनका गिरोह उन्हें धमकाकर उन्हें मुसलमान बनाकर मानव -अंगों की तस्करी करने का अमानवीय कृत्य करता था। यह एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय गिरोह था। जो एक-एक करके सारे अंगों को निकाल के अंत में बॉडी को जला दिया करते थे।
    और अंत में पता चलता है कि वह सुमन की ही आत्मा थी जिसने उसे भी मुश्किल से बाहर निकाला, मानो वह उसका धन्यवाद कर रही हो।
    बहुत अच्छी कहानी लगी और सच कहें तो सच्ची भी, क्योंकि हम मानते हैं कि ऐसा संभव है कि आत्माएँ मदद करती हैं। बस वो वास्तव में अच्छी आत्माएँ हों।
    पिछली बार बेनजीर की समीक्षा के पूर्व में दिनेश जी ने प्रदीप जी के स्वास्थ्य का हवाला दिया था कि उनका ऑपरेशन होने वाला था उसके पूर्व लगातार अपनी अधूरी कहानी को पूरा करने में लगे थे। संभवत: ऑपरेशन हो चुका होगा और आशा ही नहीं विश्वास है कि वह पूर्णतया स्वस्थ होंगे.
    ईश्वर उन्हें सदा स्वस्थ रखे और इसी तरह वे अच्छी-अच्छी कहानी रचते रहें और हम लोग पढ़ते रहें। बहुत-बहुत सारी शुभकामनाएँ।
    पुरवाई व तेजेन्द्र जी का आभार तो बनता है इस बेहतरीन कहानी को पढ़वाने के लिए।

  2. बेहतरीन कहानी
    वर्तमान का कठोर यथार्थ
    समसामयिक परिवेश का सजीव चित्रण
    बहुत बढ़िया और बधाई के साथ भविष्य के लिए शुभकामनाएं

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