Wednesday, March 25, 2026
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डॉ. आरती स्मित की कहानी – और साज रूठ गया!

“सूरज! ओ सूरज! उठ जा! देख, सूरज निकल रहा है।”
“सोने दो न बापू सा!” दस साल के दुबले-पतले सूरज, जिसके मासूम चेहरे का गोरा रंग धूल और मैल की परत से धूसर हो चला था, तंबू में बिछी दरी के ऊपर पड़ी ठंड से गठरी बनी अपनी मैली-कुचैली देह को फटी चादर में समेटता हुआ कुनमुनाया, “रात को ठंडी से नींद न आ री थी। घंटा भर तो सोने दो।” 
“पूता सा! सूरज सिर चढ़ आवेगो तो ….?”
पिता की अधूरी बात पूरी समझकर नन्हे कलाकार की नींद छू-मंतर हो गई। झटके से उठ बैठा। 
“ले, पानी पी ले।” पिता श्यामल ने पानी का लोटा बढ़ाते हुए कहा।
“माय सा कहाँ गई?”
“रोज सुबे कहाँ जाती है?”
“अच्छा!” खुमारी भरी आँखों से पिता को देखते हुए उसने लोटा मुँह में लगा लिया। 
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‘महीना बीतने को आया। गाँव के कित्ते भाया घरारी के साथ अपना-अपना तंबू लगाकर रहने आए हैं। मगर कोई किसी से मिलता नहीं। सब जैसे घिरनी बने हुए हैं या कि लट्टू। तड़के फारिग होते हैं, कलेवा बाँधते हैं और अपना-अपना साज़ उठाकर मेले की भीड़ में खो जाते हैं। सूरज अभी छोटा है। देह की हड्डी में सुई चुभोती ठंड भी कैसी है! कहाँ मुँह अँधेरे ले जाऊँ? झाड़ी में कोई भी जानवर हो सकता है। न, जितना हो सके, ठीक है। पखवारा भर और। मेला खत्म होते ही लौट चलेंगे। जैसा भी है, अपना गाँव है। अपनी बिरादरी। साथ बैठकर हुक्का पीते भाया सा…बापू सा…’ 
मलियाये धोती-कुरते, जो अपना सफ़ेद रंग खो चुके थे, के ऊपर पुराना पट्टू  लपेटे, सिर पर रंगीन साफ़ा बाँधे, सोच में खोया श्यामल साज़ की गठरी लिए चुपचाप चलता रहा। अभाव ने उसे उम्र से पहले अधेड़ बना दिया। शहनाई उसके बचपन की सखी है। होश संभालते ही अपने बापू के साथ उत्सव में बजाने जाने लगा था। उसके होंठ से लगते ही शहनाई अपनी मधुरता से सबका मन मोह लेती। बापू सा नगाड़ा और ढोलक पर अपनी कला दिखाते। और अब सूरज! उसके घर का उजास! बचपन से ही जिसकी उँगलियों में फँसी स्टिक नगाड़े पर कमाल दिखलाने लगी थी। बाड़मेड़ के उसके पुरखों ने वंश परंपरा की इस कला को जीविका का साधन बनाया और यही थाती श्यामल को सौंपी। अक्षर ज्ञान भर पाया श्यामल संगीत के सुर-लय-ताल का उस्ताद तो नहीं, मगर कच्चा कलाकार भी नहीं। रेतीले रेगिस्तानी अंचल में परिवार का पेट पालना दूभर होने लगा तब रोज़ी रोटी की तलाश में वह भी परिवार लेकर कभी गाँव से बाहर, कभी राजस्थान की सरहद से बाहर के नजदीक के इलाक़ों में लगे लोक उत्सवों, मेलों में जाने लगा था। 
   
     उसने पलटकर देखा। पुरानी टोपी जो मैली होने के कारण अपना नीलापन खो चुकी थी, कान तक खींचता हुआ सूरज माँ से सटा, अपने आप में सिकुड़ता हुआ आगे बढ़ा जा रहा था। घिसे चप्पल से झाँकती उसके पैरों की उँगलियाँ ठंड से अकड़ रही थीं, फिर भी उसकी चाल मंद न हुई। वह जानता था, अगर देर हुई तो उनके बैठने की जगह कोई और हथिया लेगा। उसने सिर उठाकर आसमान पर मासूम निगाहें डालीं। उसके पपड़ाए होंठों पर मुस्कान तैर गई। ‘आज तो सूरज भगवान को भी ठंड लग रही है। कैसे सुस्त पड़े हैं।’            
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ढाई किलोमीटर की पैदल यात्रा के बाद दारागंज की ऊँची सीढ़ियों वाले मंदिर के पास पहुँचकर तीनों के चेहरे पर सुकून उभरा। पच्चीस सीढ़ियों के बीच बना चबूतरा अभी खाली था। सूरज दौड़ता हुआ सीढ़ियाँ चढ़ने लगा ताकि दीवार के पास वाली उनकी जगह आज भी सुरक्षित बची रहे। पुराने घाघरे में लिपटी, कंधे पर कलेवा की झोली टाँगे  उसकी माँ तेज़ी से क़दम बढ़ाती हुई पति से बोली, “धीमे आवजो, आराम सूं।” 
साज़ की गठरी सिर पर उठाए श्यामल ने आँखों से हामी भरी और आहिस्ते-आहिस्ते सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। चबूतरे पर पैर टिकाकर सूरज ने आसपास नज़र घुमाई। धरातल से लेकर सीढ़ियों तक फ़र्श पर कपड़े बिछाकर सामान बेचनेवाले कुछ ग़रीब दुकानदार उनकी ही तरह इज्जत की रोटी कमाने की जुगत में लगे ग्राहक बुला रहे थे तो कुछ अभी सजा ही रहे थे। सड़क के एक किनारे खड़ी रेहड़ी पर खट्टी-मीठी लेमनचूस बिक रही थी, वहीं दूसरी रेहड़ी पर चाय-टोस्ट की स्टॉल लगी थी। चलती-फिरती दुकानों के अलावे अस्थायी दुकानें भी खुल रही थीं। इनमें से कुछ पूजा के सामान सजाए थीं तो कुछ ने स्वेटर, टोपी बिछा रखे थे और कुछ ने ग्राहकों के लिए प्रलोभन की तख्ती टांग रखी थी।  
गठरी बनी चादर फ़र्श पर बिछाकर श्यामल ने बेटे को बैठने का इशारा किया। साज़ संभाल, संगत करता सूरज समझ चुका था कि दो सीढ़ी ऊपर बैठी वह मोटी भिखारिन, जिसका चेहरा डरावना तो नहीं, मगर अजीब कठोर है, शनि देव के नाम पर लोगों से अन्न-धन लेती है और उन्हें देखकर खार खाती है, बावज़ूद इसके उसे देखकर वह मुस्कुराया। उसकी प्यारी मुस्कान भिखारन के कठोर आवरण से टकराकर बिखर गई। उसने सिर घुमा लिया। साज़ को हाथ जोड़कर प्रणाम कर श्यामल अपने और उसके सामने कुछ सिक्कों की क़तार खड़ी कर कुछ बुदबुदाने लगा। सूरज उन्हें देखता रहा। उसे याद आया, पहली बार सिक्का सजाते देखकर उसने टोका था, “बापू सा! ई तो थारा पेसा है, ईनां ने सामणे क्यूँ धर्या है?”
“जाँय आवां भाया सा, बाई सा ने ख्याल रहै कि वो भी म्हारी कला सूं खुश होइ तो नकद दे सगे।”
“ए री बात तो सही, फेर तो वो भिखारी ने भी दे दीस।”
“पूता सा! म्हे भिखारी कोनी हां, म्हें भवाई कलाकार हां । म्हारी कला सूं लोक खुश होवैं।  भीख माँग-माँग के जीणो से तो भलो है, डूब के प्राण दे दीजां!” 
   उसे याद आया, पिता की सिकुड़ी आँखों में आत्मसम्मान की लाल डोरियाँ उभर आई थीं। उसने फिर कभी न पूछा। 
     पिता के होंठों से लगी राजस्थानी शहनाई ‘सनई’ के साथ ताल मिलाने नगाड़े और सहताल के लिए ढोलक पर सूरज के नन्हे हाथों में थमी स्टिक नाचने लगी। सुर और ताल की नदी बह निकली। कुहासे ने अब तक सूरज के सातों घोड़ों को बंदी बना रखा था। नदी में डुबकी लगाकर आती हवा नन्हे खुले हाथ को थरथरा जाती, मगर इनसे बेख़बर वह अपनी धुन में खोया रहा। नगाड़े और ढोलक से एक साथ तेज़ और नरम मधुर ध्वनियाँ निकालता हुआ वह अक्सर उनमें खो जाता। भूख-प्यास ग़ायब हो जाती। सरल मुस्कान चुपके से होंठों पर आ बैठती। पिछले कई दिनों से वह ग़ौर कर रहा था, आस्था के सागर में डुबकी लगाते भक्त गंगा नदी की मैली-कुचैली ठहरी-ठहरी देह की भी परवाह नहीं करते। वे यह भी नहीं देखते कि किनारे पर जो मलियाया जल है, उसमें धारा की गति नहीं है। जहाँ कुछ दूर से आते गंदे नाले का पानी आ मिलता है। ‘क्यों नहाते हैं यहाँ?’ नगाड़े पर छड़ी से चोट करते हुए उसने सोचा। ‘बाई सा (दादी) तो कहती थीं, गंगा का जल कभी गंदा नहीं होता, उसमें कभी कीड़े नहीं होते। वह सूरज और चंद्रमा की रोशनी में जगमग करता है। साफ़ और उछलता-कूदता हुआ—- मगर यहाँ तो ऐसा नहीं है। बनारस के अस्सी घाट में भी नहीं। पिछले बरस बापू सा वहाँ भी ले गए थे। अस्सी से नमो घाट तक घुमाने भी ले गए थे। कहीं तो वो गंगा नहीं मिली जिसके बारे में बाई सा कह रही थीं …. बाई सा किस गंगा की बात कह रही थीं?… और माय सा कह रही थी, ‘यहाँ जमुना भी है जिसका पानी मटमैला होता है और दोनों नदी बीच में कहीं मिल जाती हैं। तो गंगा कौन है, जमुना कौन? नदी का तो पूरा पानी ही मटमैला है— गंदा…’।  
    अचानक उसके सामने दस का एक सिक्का नाचता हुआ रुका। उसने सामने से गुजरते  अधेड़ पर नज़र डाली। वह अधेड़ अब आगे बढ़कर उस काले कपड़े वाली भिखारन को सिक्का दे रहा था। 
    ‘बापू सा कहते हैं कि हम अपनी कला से कमाते हैं, लेकिन वो बाबा सा तो रुके भी नहीं, न कुछ कहा। वे उसे भी वैसे ही सिक्का उछालकर दे रहे हैं, जैसे कि हमें। दया की भीख!’ 
   बाल मन में हुक-सी उठी। मन सन्नाटे के शोर से घिरने लगा तो शहनाई से नगाड़े -ढोलक पर संगत करते हाथ का संतुलन बिगड़ा। लय टूटा तो पिता की नज़र बेटे की तरफ़ घूम गई। इशारे से पूछा, ‘क्या हुआ?’ इशारे से ही सिर हिलाकर उसने जवाब दे दिया— ‘कुछ नहीं!’ हाथ आदतन चलते रहे मगर दिमाग में खलबली मचने लगी। पिता की अनुभवी आँखों ने समझ लिया। उन्होंने शहनाई होंठों से काटकर गोद में रखी और उसकी तरफ़ देखकर बोले, “ज्यादा न सोच।” और शहनाई होंठों से लगा ली।
  तीसरा पहर ढलने लगा। धूप न निकली तो आसमान साँझ का धूसरपन समय से पहले ही ओढ़ बैठा। आस-पास के होटलों में या महँगे तंबुओं में ठहरे गंगा स्नान का पुण्य बटोरने और मेले का आनंद लेने आए कुछ भक्त सैलानी सेल्फ़ी लेते, फिर सीढ़ियाँ चढ़ते हुए मंदिर में प्रवेश कर जाते। स्त्री-पुरुष, नन्हे-मुन्ने, किशोर, युवा –- सभी ‘भीड़’ बनकर बढ़े जाते। वह मंदिर परिसर के भीतर ठहरे ग़रीब भक्तों और बाहर से आते भक्तों की भीड़ को नन्ही आँखों से तोलता रहा। मुस्कान रह-रहकर ख़ामोशी ओढ़ने लगी। हाथों में थमी छड़ी से ताल देता हुआ वह बुदबुदाया, “बापू सा, सुबह से दोपहर ढल गई। ऊपर दो सौ से भी अधिक जना  होंगे। हमको रुककर सुननेवाला, सुनकर खुश होने वाला कोई नहीं। तीन-चार बाबू सा मेरे आगे और कुछ आपके आगे सिक्के डालकर आगे बढ़ गए।”    
     बेटे की आवाज़ में उतरी घनी उदासी कानों में पिघली तो श्यामल के होंठों से चिपकी मधुर धुन बिखेरती शहनाई अचानक चुप हो गई। होंठ खुले, स्वर फूटे, “मेरे दादा सा के दादा सा कहते थे, ‘हम कलाकार हैं। हमने अपनी परंपरा बचा रखी है।… और अपनी कला का सम्मान करना हमारा धर्म है’। मेरे दादा सा और बापू ने यही मुझे सिखाया। वही तुझसे कह रहा हूँ। ये जो भाया सा, बाई सा आ-जा रहे हैं, उनको कला की समझ न हो तो क्या उनके कारण हम अपना धर्म छोड़ देंगे?”
   सूरज ने भरी आँखों से पिता को देखा। श्यामल ने भी उसकी आँखों में उमड़ते सवालों का बवंडर देखा मगर मौक़े की नज़ाकत समझकर अभी बात बढ़ाना उचित न समझा। बेटे के सिर पर हाथ फेरकर बोले, “यही हमारी पूजा है। हम अपनी कला गिरवी नहीं रखते। जिस दिन ऐसा करेंगे। भिवाई कला के मुँह पर कालिख लग जाएगी। तू तो अभी छोटा है, जब बड़ा होगा तब समझ जाएगा।”
  “छोटा है तो छोटे को भूख भी तो लगी होगी। चल सूरज, रोटी खा ले। देर हो गई।” 
     माँ की आवाज़ सुनकर सूरज ने सिर घुमाकर देखा। माँ हाथ में मंजीरा थामे मंदिर की सीढ़ियाँ उतरकर पास आ चुकी है।
“न माय सा! भूख नहीं।” 
“ऐसे कैसे भूख नहीं। सुबे एक मुठल सत्तू ही तो खाया है। रोटी-प्याज है। खा ले।”
“और बापू सा और तुम?”
 “तू खा ले, फेर मैं खा लूँगो।” 
     श्यामल पत्नी का इशारा समझ चुका था। उसने सामने पड़े पैसे देखे। “अब तक दोनों के मिलाकर सौ भी नहीं हुए।” वह बुदबुदाया।
  “मैं मंजीरा बजाती हुई मंदिर में बैठी लुगाइयों के आगे-पीछे डोलती रही, मगर किसी का ध्यान नहीं गया। छोड़ियाँ तो एक-दूजे की फोटु उतारने में मगन रहीं। जो बड़ी थीं, वे भी आपस में बात करने में या मूर्ति का दर्शन करने के लिए भीड़ में घुसने के लिए जोड़-तोड़ कर रही थीं। चार-पाँच लुगायां ने रूपै दिए।” 
  
   माता-पिता की दबी आवाज़ में बातचीत सूरज के कानों में उतरती रही। माँ ने रोटी का नाम लिया तो गड़गुड़ करते पेट की भोंडी आवाज़ को दबा पाना उसके लिए मुश्किल होने लगा। वह चुपचाप उठा और माँ की बगल में जा बैठा। माँ ने उसकी हथेली पर एक कागज़ में लिपटी दो रोटियाँ और कटे प्याज़ रख दिए। वह हसरत भरी नज़र से पल भर रोटी निहारता रहा, फिर पिता को देखा। पिता की हथेली पर भी एक मुड़ा कागज़ था।
   “ज्यादा भूख नहीं है। मैं एक रोटी खाऊँगा। एक तुम खा लो।” कहते हुए उसने एक रोटी हथेली में समेट, एक रोटी-प्याज समेत कागज़ माँ की तरफ़ बढ़ा दिया। उसने चोर निगाह से माता-पिता की नम आँखें और काँपते होंठ देखे पर अनजान बना, सूखी रोटी का निवाला पानी के साथ चुभलाने लगा। इस समय पानी भीगी रोटी से उसे ‘बाटी’ का स्वाद आ रहा था। उसकी आँखों में चमक लौटने लगी।
    साँझ सातों रंग दिखाए बिना अँधेरे के हवाले हो गई। अँधेरा मुँह चौड़ा करने लगा। कालिमा सड़क पर बिछने लगी। मंदिर परिसर के बाहर खड़े ऊँचे खंभों से नीचे झाँकती रोशनियाँ कुहरे में धुँधली परत बिछा जाती। भक्तों की भीड़ सिमटने लगी तो सीढ़ियों पर बिछी दुकानें भी सिमट चलीं। पिछले नौ घंटे से नगाड़ा बजाते हाथ और ढाई किलोमीटर चलकर आने के बाद घुटने मोड़कर सिकुड़े पैरों ने आहिस्ते-आहिस्ते दर्द का मुँह खोल दिया तो लय बिगड़ा। वह पल भर को रुका। उसने पिता को देखा, पिता ने उसकी आँखें पढ़ लीं। 
“आज के लिए जो हुआ, बहुत है। चलो, चलें।”
    पिता की बात सुनकर उसने इत्मीनान से नगाड़ा खिसकाया। पैर सीधे किए। सुन्न हो रही पिंडलियों पर नन्हे मुक्के बरसाए फिर सामने फैले सिक्कों पर नज़र टिका दी। पिता बुदबुदा रहे थे– “तीनों का मिलाकर दो सौ रूपै भी न हुए।”
  
    श्यामल ने साज़ की गठरी बाँधी। वह उसे सिर पर उठाए उठ खड़ा हुआ। पिता को जाने को तैयार देख, सूरज ने कसकर अँगड़ाई ली, देह झाड़ा और झट उठ खड़ा हुआ। उसने मंदिर की उन सीढ़ियों को ऊपर से नीचे तक निहारा— बेमतलब। बिना किसी प्रयोजन के। आस्था के बहाव में बहते आते छिटपुट लोग पूजा का सामान ख़रीदने में जुटे थे।  
   “बापू!” पिता के साथ-साथ सीढ़ियाँ उतरते सूरज ने टोका।
“हम्म!” 
“हम रोज यहीं क्यों आते हैं?”
“क्योंकि यह बड़ा मंदिर है।”
“लेकिन यहाँ किसी को हमारे संगीत से प्रेम कहाँ है! प्रेम होता तो बाबू सा, बाई सा रुककर सुनते; खुश होते तो ताली बजाते, कुछ कहते फिर रुपै देते। पाँच-दस का सिक्का नहीं। इत्ते दिन हो गए लेकिन यहाँ तो….”
  बेटे ने बात अधूरी छोड़ दी तो सीढ़ी उतरते पिता के क़दम ठिठक गए। नज़र सूरज के चेहरे पर टिक गई।
“बापू सा! क्या हम कहीं और नहीं जा सकते जहाँ अपनी कला को मान मिले। दादा सा भी तो यही कहते थे, ‘दो रोटी न मिले कोई बात ना है, इज्जत ना मिले तो जगह छोड़ दो’। यहाँ के सारे हुकम सिक्के फेंककर देते हैं, जैसे दया कर रहे हों।
    एक साँस में अपनी भड़ास निकालकर सूरज चुप हो गया। उसने अपनी नज़र पैरों की कसमसाती उँगलियों पर टिका दी। भौचक्क श्यामल अपने बेटे को देख रहा था। वह देख पा रहा था नन्हे कलाकार का आहत होता स्वाभिमान। वह कुछ दिलासा देना चाहता था, मगर उसके तालू मानो जीभ से चिपक गए और कंठ में ‘गूँ गूँ की आवाज़ घुमड़ती रही। भूख और अभाव ने उसके भीतर सिसकते कलाकार की मान-मर्यादा को कम कर, उसे इस हाल में ला  दिया था जहाँ कभी झिड़की सुननी पड़ती तो कभी साज़ बचाना पड़ता। इतने दिनों में उसे अब तक समझ नहीं आया कि वे लोग कौन हैं जिन्हें देखकर आँखों के आगे भय का अँधेरा छाने लगता है। आज उसके कराहते आत्मसम्मान को बेटे ने झकझोर दिया। वह थरथराता हुआ वहीं बैठ गया। 
“कई हुयो? तबियत तो साची है ना? दो, गठरी म्हारे सिर पर दो।” उसकी हालत देखकर पत्नी घबराई। 
  “मैं ठीक हूँ।” बेटे को निहारते हुए उसने जवाब दिया, फिर कहा, “सूरज तुझे भूख लगी होगी। चल, कुछ खा ले। उधर गुमटी पर चा-रोटी (ब्रेड बन) मिलती है।” 
    
    वह उठा और उन्हें इशारा कर हौले-हौले सधे कदमों से सीढ़ियाँ उतरने लगा। सूरज की बातों ने भीतर तक कुछ खुरच दिया था जिसके दर्द से आहत वह कुछ समझने की हालत में न था। दिमाग शोर मचाने लगा—“साची ई तो केवे है। सुबे सूं रात होवण ने आई। आपां अठी आपणी वंश परम्परा बचावण ने मदरां अर धार्मिक उत्सवों में आवां। पण अठी आर लागे, कला री कोई मोल नीं। मूं सूं ज्यादा वा भिखारण कमा जावे। अब पाछा जावण जोग पईसा जुड्यां तो लौट चालू आपणा गांव।
“बापू सा!” बेटे ने टोका तो सोच की कड़ी टूटी। सामने चाय की अस्थायी दुकान थी जिसके बाहर अब भी दो-चार लोग चाय पीते हुए ख़ुद को गरमाने का जतन कर रहे थे। उसके मन में आया, रोटी न सही, एक-एक चा (चाय) तो हम भी ले ही लें। उसने पत्नी की तरफ़ देखा। अनपढ़ पत्नी ने इशारे से मना कर दिया। ‘तीन चा के पैंतालीस हो जाएँगे और एक रोटी (बन) के दस। पचपन। दो चा के तीस। इतने में कुछ जोड़कर किलो भर आटा हो जाएगा। घण ठीक ही कहती है।’ ललचते मन की कमान कस, दुकानदार से चाय-बन बेटे की तरफ़ बढ़ाने का इशारा करता हुआ वह वहीं ज़मीन पर बैठ गया। 
    
   ‘कितना टेस्टी है!’ चाय में ब्रेड बन का पहला टुकड़ा डुबोकर मुँह में रखते ही सूरज के उदास चेहरे पर मुस्कान तैर गई। उसने पिता की तरफ़ देखा कि वे भी एक निवाला ले लें, पिता ने इशारे से मना किया, फिर उसके खाने-पीने की गति बढ़ गई। ‘कितनी थोड़ी चाय देते हैं। पूरी रोटी भी न डूबी।’ चाय ख़त्म होने पर मन मसोसता वह सूखा बन निगल, जल्दी से पिता के पास आ खड़ा हुआ।
“अच्छी थी?”
“हाँ!” वह मुस्कुराया।
“अब जल्दी चलो। माँ ने चेताया।
   दुकानदार को पैसे चुकाकर वे तीनों कुछ क़दम बढ़े ही थे कि पीछे से किसी ने आवाज़ दी।  श्यामल ने पलटकर देखा।
   ‘ये तो वही फटफटिया वाले हैं जो उसके पास ही खड़े परली तरफ़ मुँह कर चाय पी रहे थे। इन्हें मुझसे क्या काम?’ 
  “सुनो कलाकार!” इस संबोधन ने पैर रोक दिए। उसने उन्हें देखा। टोपी-मफ़लर से ढँका चेहरा साफ़ न दिखा। क़द-काठी से वे नौजवान लगे। दोनों में से एक ने टोका। “क्या तुमलोग ढोंगा बाबा के सत्संग में बजाओगे? वहाँ तुम्हें बहुत पैसे मिलेंगे। खाना-पीना भी।”
    डूबते मन को किनारा मिलता देख श्यामल के मुँह से हठात् निकला “कहाँ?”
“परली तरफ़। पीपा पुल से जाना होगा।” 
“अभी?”
“हाँ!”
“मगर??”
“देखो, अभी संयोग से तुमलोग दिख गए तो टोक दिया वरना –– “
“चलिए न बापू सा!”
“लेकिन अपना तंबू, सामान…”
“छोड़ो, चलो, ये लोग नहीं जाएँगे। हम बेकार में अपना टाइम क्यों खराब कर रहे हैं.” बाइकर के साथी ने कहा। उसका चेहरा भी मफ़लर से बंधा था।
श्यामल ने पत्नी-बच्चे को देखा। पत्नी सोच में डूबी लगी जबकि सूरज उत्साहित। 
“ठीक है भाया सा! आप रास्ता बता दो।”
“पीपा पुल के आठ नंबर गेट से घुसो तो सीधे पैदल चलते हुए बीस-पच्चीस मिनट में पहुँच जाओगे। उस पार किसी से पूछ लेना, ‘ढोंगा बाबा का डेरा कहाँ है, बता देगा। वैसे तुम बच्चे को कहाँ पैदल ले जाओगे, हम भी वहीं जा रहे हैं, उस पार उतार देंगे। फिर सब साथ ही चलेंगे।”
“भाया सा! कीर्तन तो अब कल सुबे होगा न, तो हम सुबे आ जाएँ?” घरवाली की आवाज़ सुनकर श्यामल ने उसे देखा। वह अब भी किसी सोच में डूबी थी।
“जानो तुम लोग।” दूसरा खीझा। “भलाई का ज़माना ही नहीं है। चलो रे…” 
 “चलो न माँ सा!” सूरज गिड़गिड़ाया। मोटर बाइक पर बैठने की हसरत ने उसे कुछ और सोचने नहीं दिया। माँ की ममता के आगे स्त्री की छठी इंद्रिय बंद हो गई।
“ठीक है।”
   सूरज लपककर बाइकर के पास पहुँचा। उसके साथी ने अपने गले से लिपटे मफ़लर उतारकर सूरज के चेहरे को अच्छी तरह ढँक दिया। 
“ये लो रुपये। ऑटो मिले तो उससे आ जाना। जल्दी पहुँच जाओगे।” कहते हुए उसने जैकेट से एक मुड़ा नोट श्यामल के हाथ पकड़ा दिया। बाइक स्टार्ट हो गई। बाइक ने गति पकड़ ली और जल्द ही दोनों की आँखों से ओझल हो गई। श्यामल ने हथेली देखी। पाँच सौ का नोट देखकर उसकी पलकें नम हो आईं। “अच्छे लोग आज भी हैं। चलो, जल्दी चलें।”  
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दो बड़े के बीच बैठा, गरमाया-सा सूरज नींद में डूबने लगा। पीछे के साथी ने उसे अच्छी तरह ढँककर इशारा किया। पीपा पुल पार कर बाइक अब दुकानों, बाबाओं के डेरों के आगे से दौड़ती हुई पीपा पुल के दस नंबर गेट की तरफ़ दौड़ चली जिधर से वापसी का अस्थायी रास्ता बनाया गया था। छोटी-बड़ी गाड़ियों और पैदल यात्री की भीड़ चीरती बाइक वापस नियत स्थान पर आकर गंतव्य की ओर बढ़ गई। 
“बो गाड़ी तो कहीं दिख नहीं रही, न ही कोई ढोंगा बाबा का डेरा बता पा रहो है।” भूख और थकान से चूर पत्नी के स्वर में चिंता हावी हो गई।
“चल, और आगे चलकर पूछते हैं।” श्यामल थके-थरथराते क़दम बढ़ाता, पेशानी पर उभरी फ़िक़्र छिपाता चल पड़ा।
  
    दो घंटे बीत गए। चहल-पहल ख़ामोशी में बदलने लगी। दुकानें बंद हो चुकीं। बाबाओं के डेरे में सिवाय सूने मुख्य द्वार के कुछ न दिखता। बढ़ती ठंड के साथ गहराता सन्नाटा उन्हें भीतर तक चीथ डालता। क़दम लड़खड़ाने लगे तो वह वहीं धप्प से बैठ गया। उसने गठरी से सनई निकाली और फूँकना शुरू किया। नगाड़े की संगत के बिना सनई रो रही थी, अपने नन्हे साथी को पुकार रही थी और पुकारती-पुकारती थककर मुँह से छूटकर गिर पड़ी। हाहाकार फूट पड़ा। ‘सूsssरज!’
  “ऐ, क्या हुआ?”
“बाबू सा! बाबू सा मेरा बच्चा—मेरा सूरज— वो— वो भाया सा फटफटिया पर लेकर आए, अब मिल नहीं रहे।” सामने ख़ाकी वर्दी देखकर श्यामल को हिम्मत बँधी, वह बदहवासी में बोलता रहा। “बाबू सा! हुकम! हम भवाई कलाकार हैं। मंदिर में, धरम-करम वाली जगह अपना साज बजाकर रोटी कमाने आए हैं। फटफटिया वाले भाया सा ने झूठ बोलकर हमारा बच्चा….” बिलखते हुए उसने सारी कहानी सुना दी। फिर उनके पैरों पर गिर पड़ा। 
“हुकम! अब आप ही उबारो!”
“बेटे की कोई फ़ोटो है?”
“फोटु तो ना है हुकम। बो इत्तो बड़ो है— बेटे का रूप-रंग बताते हुए उसने आँखों को बरसने की आज़ादी दे दी। पत्नी बाहर-भीतर से शिला सी ज़मीन पर पड़ी थी। बीच-बीच में हाथ हिलता, मंजीरा बज उठता, होंठ हिलते –- मेरो तो गिरधर गोपाल….
“हम्म! किड्नैपिंग केस लगता है।“ एक ने फुसफुसाकर दूसरे से कहा।
“इनसे कोई क्या फिरौती पा लेगा!”
“क्या मासूम बच्चे सिर्फ़ फिरौती के लिए किड्नैप होते हैं?” पहले की आवाज़ सख़्त हो गई। कुछ देर वे आपस में मशविरा करते रहे, फिर उन्हें साथ लेकर सीनियर के पास गए।
“उन लोगों का कुछ हुलिया बता सकते हो?”
“हुकम! सबका मुँह मफलर से ढका था। ज्यादा रोशनी ना थी। मोटे तो ना होंगे। सामने वाला छोरा चेन वाला स्वेटर पहन रखा था जो फटफटिया चलाते हुए पहनते हैं। पीछो को साथी दिखो नहीं।” स्वर काँपा।
“हम्म! देखो, यहाँ कोई ढोंगा बाबा नहीं है। उन लफ़ंगों ने तुमसे झूठ बोला। इधर अलग-अलग बाबाओं की टोली के सत्संग की जगह और दुकानें ही हैं। रहनेवाले तंबू आगे हैं। हज़ारों भक्त बाहर से आए हैं। उनमें से कौन भक्त है, कौन अपराधी, देखकर पहचान पाना मुश्किल है।”
“हुकम! हमारा सूरज मिल तो जावेगा न?” माँ की पिघलती आँखें ख़ाकी वाले बड़े साहब पर टिक गई।
 “अभी किसी के तंबू में घुसकर सर्च करना भी मुश्किल है। कई ख़ेमे में सिर्फ़ महिलाएँ हैं। जो होगा, सुबह ही होगा। क्या पता, सुबह तुम्हारी शहनाई सुनकर तुम्हारा बेटा सामने आ जाए। अभी घर जाओ।”
“घर! हुकम! हमें यहीं कहीं बैठ रहने दो। हम बेटे को लेकर ही जाएँगे।”
“ऐसे तो तुम्हारी क़ुल्फ़ी जम जाएगी।“
   बड़े साहब कुछ देर सोच में पड़े रहे, फिर जूनियर से कुछ कहा। जूनियर उन्हें एक तंबू के एक कोने में रुक जाने का इशारा कर, बाहर निकला और कुछ देर बाद दो कंबल उनके हवाले कर गया। अपने आप में सिमटे वे गठरी से लिपटे नगाड़े पर चोट करती छड़ी में सूरज के हाथ की ख़ुशबू सूँघते, आँखें बरसाते निढाल पड़े रहे। 
००   
इस पार, पटरी के साथ-साथ जाती सड़क पर दौड़ती बाइक शहर बहुत पीछे छोड़ती हुई एक ढलान पर उतरी और मरी हुई रोशनी में अस्पष्ट एक गली में गुम हो गई। नींद में सूरज का सिर बीच-बीच में हिलता तो पीछे बैठा युवक उसे कसकर थाम लेता। मफ़लर अब सूरज की आँखें ढँक चुका था। बाइक एक स्थान पर रुक गई। एक ने नींद में डूबे उस मासूम को गोद में उठाया फिर दोनों मुख्य दरवाजे में प्रवेश कर, एक धुँधले गलियारे से होते हुए एक छोटे कमरे में समा गए। 
  
    अँधेरी दुनिया की भेंट चढ़ा सूरज अचेत होने लगा।
“अबे, ये मर-मरा तो ना गया?” एक फुसफुसाया।
“तूने कोई कसर छोड़ी थी क्या?” दूसरा झल्लाया।
“अब क्या करें?”
“मरा नहीं है, बेहोश है। इतनी चोट खाकर तो …. हमें यहाँ से निकलना चाहिए। तू उनको मैसेज कर दे कि बिना लफड़े के काम हो गया।”
   
   बंद दरवाजे के नीचे से एक लिफ़ाफ़ा घुसा। दोनों मुस्कुराए। उन्होंने उसके कपड़े ठीक किए, कंबल ओढ़ाया, लिफ़ाफ़ा ज़ेब के हवाले कर, बाहर निकल गए। मेले से सैंकड़ों मील दूर बाइक सवार अपनी अक़्लमंदी पर ख़ुश होते आगे की राह चल दिए। 
००
पंद्रह दिन बीत गए। मेले में यहाँ-वहाँ सुबह से रात तक श्यामल की शहनाई रोती, सूरज को पुकारती रही, साफ़ा साहबों के आगे झुकता रहा, मगर बिना किसी आधार के ढूँढ़ पाना अँधेरे में, नदी के तेज़ प्रवाह में डोंगी खेने जैसा ही रहा। गठरी में बँधे नगाड़े-ढोलक ग्रहण लगे सूरज के जादू भरे हाथों का स्पर्श पाने की आस लिए धीरे-धीरे ख़ामोश हो गए। मेला ख़त्म होने लगा। तंबू उखड़ने लगे। श्यामल पत्नी के साथ पुरानी जगहों पर जा-जाकर शहनाई की धुन पर पुकारता रहा। शहनाई अब गाती नहीं, रोती। लोग रुकते, आगे बढ़ जाते। कोई उसके दर्दीले सुर से भीगकर सिक्का उछाल देता। पति-पत्नी सिक्के की तरफ़ देखते नहीं, जोड़ते नहीं। शहनाई से बेटे को पुकारते, इंतज़ार करते, फिर आगे बढ़ जाते। नन्हे कलाकार के बिना संगत टूटी और साज़ रूठ गया। 
         दो पथराए क़दम अँधेरे में डूबी साँसों को खींचते, रूठे साज़ सिर पर उठाए चल पड़े अपने डीह कि भूले-भटके शायद उग आए उनका सूरज और गा उठे ढोलक संग नगाड़ा ….. धा गे ना ती। ना का धा गे …. धा धिं ना/ ता तिं ना …..   
पट्टू : मोटी ऊनी चादर 
संपर्क 
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आरती स्मित
आरती स्मित
तीन कविता संग्रह, दो कहानी संग्रह, दो बाल साहित्य, दो आलोचना संग्रह, 40 से अधिक पुस्तक अनुवाद, धारावाहिक ध्वनि रूपक एवं नाटक, रंगमंच नाटक लेखन, 20 से अधिक चुनिंदा पुस्तकों में संकलित रचनाएँ, बतौर रेडियो नाटक कलाकार कई नाटकों में भूमिका. विभिन्न उच्चस्तरीय पत्रिकाओं में सतत लेखन. सत्यवती कॉलेज,दिल्ली में अध्यापन. सम्पर्क - [email protected]
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1 टिप्पणी

  1. बेहद मार्मिक कहानी..
    एक दुख पर अगला दुख और भारी पड़ गया…कहानी के अंत ने मन को झकझोर कर रख दिया…
    सुन्दर कहानी के लिए बधाई…

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