तीन कविता संग्रह, दो कहानी संग्रह, दो बाल साहित्य, दो आलोचना संग्रह, 40 से अधिक पुस्तक अनुवाद, धारावाहिक ध्वनि रूपक एवं नाटक, रंगमंच नाटक लेखन, 20 से अधिक चुनिंदा पुस्तकों में संकलित रचनाएँ, बतौर रेडियो नाटक कलाकार कई नाटकों में भूमिका. विभिन्न उच्चस्तरीय पत्रिकाओं में सतत लेखन. सत्यवती कॉलेज,दिल्ली में अध्यापन. सम्पर्क -
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बेहद मार्मिक कहानी..
एक दुख पर अगला दुख और भारी पड़ गया…कहानी के अंत ने मन को झकझोर कर रख दिया…
सुन्दर कहानी के लिए बधाई…
हार्दिक आभार शालिनी जी!
दिल को छूती हुई मार्मिक कहानी, अन्त में “सुबह से रात तक श्यामल की शहनाई रोती, सूरज को पुकारती रही” शब्दों से आँखें नम हो गईं।
मन को भीतर तक छू जाने वाली,छोटे बेसहारा कलाकारों की बेबसी को दर्शाती एक बेहतरीन कहानी। हार्दिक बधाई आरती जी।
हार्दिक आभार सुदर्शन दी !
https://www.thepurvai.com/story-by-dr-arti-smit-4/
प्रिय आरती स्मित जी!
आपकी कहानी “और साज रूठ गया” पढ़ी!
कहानी बहुत ही मार्मिक लगी। हालांकि शीर्षक पढ़कर ऐसा लग ही रहा था कि कहानी दुखान्त होगी, पर अंत इस मोड़ पर होगा इसका जरा भी अंदाजा नहीं था।
राजस्थान हमारे दिल में बसा है इसलिए कहानी पढ़ना प्रारंभ करते ही एक अलग सा आनंद और उत्साह था। और इस तरह की परिस्थितियों से भी वाकिफ थे जिन परिस्थितियों में परिवार था।
कलाकार बहुत स्वाभिमानी होता है चाहे वह अमीर हो, गरीब हो, या जैसा भी हो! कला उसकी प्राण होती है।
कहानी में बच्चे का अंतर्द्वंद्व महसूस हुआ।
बुरा समय उमर को सिर्फ अनुभवी ही नहीं बनाता, कम उम्र में युवा ही बना देता है।
इस कहानी को पढ़ते हुए बिल्कुल ऐसा ही लगा कितना समझदार था छोटा सा सूरज बड़ी सी रोशनी देखना चाहता था।
पूरी कहानी सूरज पर केंद्रित है।
प्रशंसा के दो शब्द कहे बिना पैसे देकर आगे बढ़ जाना उसके आत्मसम्मान को चोट पहुँचाता था। वह उसे भीख की तरह लगता था। उसका छोटा सा दिल अधिक सा आहत होता था। उसे अपमान जैसा महसूस होता था।
एक जगह पिता कहते भी हैं,”म्हे भिखारी कोनी हां,में हवाई कलाकार हां। म्हारी कला सूं लोक खुश होवैं। भीख माँग-माँग के जीणो से तो भलो है, डूब के प्राण दे दीजां!”
तीनों के लिए पर्याप्त भोजन नहीं है यह देखकर “मुझे ज्यादा भूख नहीं है।” कहकर अपने लिए सिर्फ एक ही रोटी माँगते हुए वह बड़ों से भी बड़ा हो जाता है।
कहानी में कुछ बातें
बाल मुख से सुनकर चुभ सी गईं।
10 साल के नन्हें बच्चे की गंगा व उस जैसी पवित्र नदियों के प्रति उसकी सोच-इसके पानी को पवित्र कहा जाता है उसका ही पानी में कितना मैला रहता है।
कहानी बहुत ही सामयिक विषय पर लिखी गई है। जिस तरह से इस समय बच्चे चोरी हो रहे हैं वह चिन्ता का विषय है। जिसकी संतान जाती है उसका दर्द वही समझ सकता है, और वह भी इकलौती!जीवन के सामने अंधकार के सिवा कुछ नहीं दिखाई देता।
बातचीत में राजस्थानी भाषा ने कहानी को जीवन्त बना दिया।
इकलौते बेटे सूरज की किडनैपिंग के बाद बेचारे गरीब माता-पिता बेटी का पता लगाने में असमर्थ रहकर वापस चले जाते हैं।
यहां दुख पर मानो तो दुख का पहाड़ टूट पड़ता है
यहां शीर्षक सार्थक होता है। वास्तव में साज रूठ जाता है।
बेहतरीन कहानी के लिए आपको बधाई।
प्रस्तुति के लिये तेजेन्द्र जी का शुक्रिया।
पुरवाई का आभार।
हार्दिक आभार नीलिमा जी!
आपकी प्रतिक्रिया मुझे सदैव कुछ विशेष लिखने के लिए प्रेरित करती है।