आज एक लंबे अंतराल के बाद अनामिका अपनी ननिहाल जा रही है। राजीव मामा की गंभीर हालत की खबर सुनकर वह अपने आप को रोक नहीं पाई और अमेरिका से सीधी यहीं चली आई। न्यूयार्क से दिल्ली और दिल्ली से ग्वालियर का लंबा सफर बहुत थकान भरा रहा हालांकि सौरभ उसे लेने ग्वालियर एयरपोर्ट पर पहुंच गया था। सौरभ… उसके बड़े मामा का बेटा…देखते ही गले लगकर रोने लगा,”दीदी चाचाजी …।” उसने बताया कि किडनी ट्रांसप्लांट तो हो गई थी और वे अच्छे भी हो रहे थे पर बाद में पता नहीं फिर कैसे इतनी ज्यादा तबियत बिगड़ गई ?
वह भी रोने लगी आखिरकार उसके सबसे प्यारे मामा हैं राजीव मामा मम्मी के लाडले तो थे ही बचपन से ही हम सब बच्चों के भी दोस्त थे राजू मामा…पिछले साल ही उनकी किडनी फेल होने की खबर सुनकर सब सकते में थे।
अचानक उनका वेंटीलेटर पर आ जाना परिवार पर किसी वज्रपात से कम नहीं था।
उनकी ऐसी स्थिति सुनकर मैं कैसे न आती?
मम्मी ने भी बताया था कि ट्रांसप्लांट ही एकमात्र उम्मीद है पर इतनी जल्दी डोनर का मिलना बहुत मुश्किल है। इतने दिनों से परेशानी में चल रहा थे पर स्थिति इतनी खराब हो जायेगी ये नहीं सोचा था। अब तो दिन रात भगवान से उन्हें जल्दी ठीक करने की प्रार्थना है।
अचानक एक दिन फोन की घंटी घनघना उठी
आजकल फोन की घंटी मन में आशंका भर देती है।मैंने डरते हुए फोन उठाया
दूसरी तरफ मम्मी थी,
“अन्नू मामा को किडनी मिल गई है .”
“किसने डोनेट की मम्मी?”
“पता तो नहीं चल पाया….डोनर ने पूर्ण गोपनीयता की शर्त पर डोनेट की है….लेकिन मुझे मालूम है कि यह काम किसने किया है ? अब तो ईश्वर से प्रार्थना है कि वह उसे उसके हिस्से की खुशियां दे दें बस…”
एयरपोर्ट से घर का रास्ता बहुत लंबा और बोझिल हो चला था। दुःख का समय बहुत धीरे धीरे गुजरता है। जबकि गाड़ी की रफ्तार ठीक ही थी पर आज घर बहुत दूर लग रहा था। उसने चश्मा हटाकर अपने आंसू पोंछे और बाहर देखने लगी….
कितना कुछ बदल गया है यहां भी, अब तो बड़े बड़े शोरूम दिख रहे हैं। अचानक उसकी नज़र एक पुराने मकान पर ठहर गई,” अरे ये तो पीहू का घर है ना !” वह सौरभ को रुकने के इशारा करते हुए बोली, “सौरभ जरा गाड़ी रोको…. “
मकान की हालत बिल्कुल जर्जर हो चुकी थी। जगह जगह से प्लास्टर उखड़ चुका था और दरवाजे खिड़कियां भी टूट चुके थे।
“क्या अब कोई नहीं रहता है यहां? “
“नहीं दीदी …अब तो बहुत जल्द एक बड़ा शॉपिंग मॉल बनने वाला है यहां….”
मेरे चेहरे पर आश्चर्य के भाव देखकर सौरभ बोला, “उन लोगों ने बेच दिया है…न…पिछले साल ही तो सौदा हुआ था। सारे किरायेदारों से तो पहले ही खाली करवा लिया था।”
“ओह….”
उसे पता था कि पीहू और आनंदी बुआ यहां नहीं रहतीं,फिर भी उसे इसके बिक जाने का दर्द अंदर तक महसूस हुआ।
इस घर की टूटी खिड़की से कितनी सारी यादें झांकने लगी…पहले उसका मन हुआ कि उतरकर देखे पर फिर कुछ सोचकर बैठी ही रह गई और सौरभ को घर चलने को कह दिया लेकिन उसका मन वहीं कहीं उतर गया था जैसे….गाड़ी की गति से तेज गति से चलकर उसका मन अपने बचपन में पहुंच चुका था ..…कार के शीशों के पार
पीहू और आनंदी बुआ मौसी के चेहरे तैरने लगे थे। उन सुहाने दिनों की स्मृतियों से उसकी आंखें भरने लगी थी…
कितनी प्यारी प्यारी यादें जुड़ी हुईं हैं इस नाम से…. कितनी सुंदर हुआ करती थी आनंदी बुआ मौसी ! किसी नाजुक गुलाब सी रूपसी !
अनामिका की आंखों में उनकी छवि स्थाई रूप से बसी हुई थी…और उनकी हंसी तो ऐसी लगती थी जैसे पेड़ से छनकर गुनगुना अहसास लिए धूप उतरती है…जब कभी वे खिलखिलाकर हंसती तो लगता कि मानों कोई झरना अपने पूरे वेग के साथ चट्टानों से संगत कर रहा हो…जल तरंग सी तैर जाती उनकी हँसी अपने आस पास बैठे लोग उसकी फुहार में भीग जाया करते।
यादों की गलियों में घूमती अनामिका को अपने ननिहाल से जुड़ी हर बात अच्छे से याद थीं क्योंकि उसका बचपन वहीं तो गुजरा था। मम्मी ने पीजी करने के कारण उसे वहां नानी के पास ही छोड़ दिया था। बाद में भी गर्मी की लंबी छुट्टियां नानी के घर पर ही बीता करतीं थीं।वह हमेशा यहां आने के लिए लालायित रहती। नानी मामा के अलावा पीहू से मिलने का लालच जो रहता था।
पीहू …पीहू उसके ननिहाल की सबसे प्यारी सहेली थी हालांकि नानी को बिल्कुल पसंद नहीं थी… ना पीहू ना उसकी बुआ आनंदी पर मुझे तो वो दोनों ही बड़ी अच्छी लगती थीं। पीहू की तरह मैं भी उन्हें बुआ कहकर ही बुलाती तो मम्मी टोक देती बेटा,
“आनंदी बुआ नहीं मौसी हैं तुम्हारी….”
तो कभी बुआ और कभी मौसी कहकर संबोधित करती और मेरी इसी उहापोह ने उन्हें मेरी बुआ मौसी बना दिया था।
आनंदी बुआ मौसी मम्मी की स्कूल से ही सबसे पक्की सहेली थीं। मम्मी की बातें उनकी दोस्ती के किस्सों से भरी रहतीं थीं। शायद ही कोई दिन जाता हो जब मेरी या मम्मी की बातों में उनका जिक्र न हो। इसीलिए उन्होंने जो बताया वो अभी भी यादों में समाया हुआ है।
वे बताती कि दोनों की दोस्ती ऐसी कि दोनों हर समय साथ साथ ही रहतीं थीं यहां तक कि स्कूल से लौटते हुए आनंदी बुआ मौसी अक्सर उनके साथ घर आ जाया करती और फिर शाम को ही अपने घर जाती और कई बार ज्यादा देर होने पर मम्मी और छोटे मामा उन्हें छोड़ने उनके घर तक जाते तो वहीं अटक जाते यह बात नानी को सख्त नापसंद थी।
नानी अक्सर मम्मी को डांट लगाती,
“पूरे दिन तो तुम लोग स्कूल में साथ ही रहती हो फिर भी तुम्हारी बातें पूरी नहीं होती जो इस चितकबरी को अपने साथ लेकर आ जाती हो? और न जाने इसके घर वाले कैसे हैं….इतनी देर के लिए लड़की को दूसरे के घर छोड़ देते हैं।”
मम्मी बताती थीं कि दरअसल उनकी स्किन पर सफेद दाग उभरने लगे थे और नानी को लगता था कि उन्हें कोढ़ है छूत का रोग…और उसके साथ रहने से उनके बच्चों को भी दाग़ हो जायेंगे। हालांकि ऐसा नहीं था पर उन्हें समझाना बहुत मुश्किल था।
“जब भी हम दोनों साथ पढ़ने की बात करते वे बोलती,”हां मुझे पता है सब…. तुम्हें पढ़ाई नहीं करनी होती बातें करनी होती हैं…
वो तो दिन भर खी खी करके हंसती रहती है…मेरी बात ध्यान से सुन लो विन्नी
वो पढ़े ना पढ़े पर तुम्हारा भविष्य जरूर चौपट कर देगी…देख लेना एक दिन
उसके घर वालों को कोई फर्क नहीं पड़ेगा…
उसे कौन सा कैरियर बनाना है?”
“मम्मी आप भी न बिना किसी कारण उससे चिढती हैं। आप को पता भी है कितनी होशियार है वो… टॉप करती है हर बार चाहे परीक्षा हो या कोई दूसरी प्रतियोगिता….अगर वह मुझे न पढ़ाए तो मेरा रिजल्ट जरूर खराब हो जायेगा।”
नानी भी जानती थी इसलिए किसी कड़वी गोली की तरह उन्हें यह बात निगलनी पड़ती और वो मन मसोस कर रह जातीं। उनकी तमाम हिदायतों के बाद भी हम लोग किसी भी तरह की छुआछूत नहीं मानते थे और न ही उनसे रिश्ता खत्म करने को तैयार नहीं थे।
नानी की नापसंदगी आनंदी के लिए अब नफरत में बदल चुकी थी और वो अक्सर उनका अपमान कर दिया करतीं। मेरे और मामा के विरोध के बाबजूद वो उन्हें चितकबरी कह कर ही संबोधित करतीं। उसे देखकर उनकी भाव भंगिमा बदल जाया करती जो उनकी चिढ़ को जगजाहिर कर देती। इसी कारण आनंदी घर आने से कतराने लगी थी पर मैं ही जिद करके उसे अपने साथ ले आती थी।
एक बार नानी ने मामा को उनका हाथ पकड़े देख लिया उसके बाद तो जैसे तूफान ही आ गया और फिर लाजमी था कि उनके घर आने पर पूरी तरह रोक लगा दी गई।हमें भी उसके घर न जाने की सख्त हिदायत दे दी गई।
पर हमारी दोस्ती में कोई कमी नहीं आई। आनंदी पढ़ने में होशियार तो थी ही तो सबको लगता था कि बारहवीं के बाद उनका डॉक्टर बनने का सपना अवश्य पूरा होगा। उन्होंने मेडिकल कॉलेज की प्रवेश परीक्षा पास भी कर ली थी लेकिन पिता की मृत्यु के बाद उनके परिवार के पास इतने पैसे नहीं थे कि उन्हें महंगी पढ़ाई के लिए दूसरे शहर भेजा जा सके। मुझे आज तक लगता है कि उन्हीं की छोड़ी हुई सीट पर मेरा एडमिशन हो पाया था।
मैंने मेडिकल कॉलेज में दाखिला ले लिया और दूसरे शहर में आ गई और वे वहीं रहकर पढ़ाई करती रहीं।
अब दोनों की मुलाकात रोज तो नहीं हो पाती थी पर जब भी मैं अपने घर आती तो पहले आनंदी के घर जाती फिर ही अपने घर …
नानी के डर के कारण मामा भी उनसे छिपकर ही मिल पाते थे।वे उन्हें पसंद करने लगे थे और किसी न किसी बहाने से उनके घर पहुंच जाते थे। कभी पढ़ाई के बहाने तो कभी कुछ और…कोई न कोई बहाना हमेशा तैयार रहता था उनके पास।
आनंदी उन्हें हमेशा वहां आने से मना करती।
पता नहीं उन्हें मामाजी के इरादे डराते थे या वो खुद को इस आकर्षण के आगे बेबस पातीं थीं पर वो मामाजी से दूरी बनाए रखना चाहती थीं। वे उन्हें अपने कैरियर पर ध्यान केंद्रित रखने को कहती। उन्हीं के बनाए नोट्स पढ़कर मामाजी का भी एडमिशन एमबीबीएस में हो गया था। जब वे भी दूसरे शहर चले गए तो दूरी बढ़ना स्वभाविक ही था,लेकिन दोनों के बीच अनकहा प्रेम और विश्वास कम तो नहीं हुआ बल्कि समय और दूरी ने इसे और प्रगाढ़ कर दिया।जब मुझे इस बारे में थोड़ी सी भनक लगी तो मैंने उनसे पूछा तो वो साफ मुकर गईं,” राजीव तो पागल है तुम भी पगला गई हो क्या…लड़कपन है अभी उसमें समय के साथ खत्म हो जाएगा…और फिर अपनी मम्मी को नहीं जानती क्या? उल्टा टांग कर …मेरा मर्डर कर देंगी, ” कहकर अपने चिरपरिचित अंदाज में हंस पड़ी और बात आई गई हो गई।
यादों के गलियारे में घूम रही अनामिका को मम्मी की बताई बातें आज भी जस की तस याद हैं, “एमबीबीएस करने के तुरंत बाद ही मेरी शादी हो गई । मैं अपने जॉब और गृहस्थी में रम गईं।धीरे धीरे बातों और मुलाकातों में अंतराल बढ़ता ही गया फिर भी दोस्ती वैसी ही बनी रही।चूंकि तेरा जन्म ननिहाल में ही हुआ था तो तुझसे उन्हें बेहद लगाव था।तेरे लिए ढेरों कपड़े खुद सिलकर भेजती रहतीं थीं। पीहू जितना ही प्यार करतीं थीं तुझसे….”
ये मुझे भी अच्छे से याद है कि जब भी हम नानी के घर आते मम्मी अपनी सहेली से मिलना नहीं भूलती। वे मन ही मन चाहती थी कि उनका भी घर बस जाए।उन्होंने कुछ रिश्ते भी बताए पर एक तो दाग दूसरे बच्ची की जिम्मेदारी कहीं बात नहीं बन पाई। हां विधुर, तलाकशुदा और बुढ़ापे की ओर अग्रसर आदमियों के रिश्ते जरूर आते थे। मम्मी उन्हें इस तरह के समझौते करने से मना किया करती,
“नंदू कोई जरूरत नहीं है इस तरह के समझौते करने की….जब तक तुझे समझने वाला, तेरी इज्जत करने वाला शख्स न मिले तब तक शादी मत करना…तू कितनी काबिल है तेरे लायक कोई तो मिलेगा…”
“मेरे लायक कोई होगा तब न” कहकर हंस देती।
“आखिर कमी है क्या तुझमें ?”
“ये दाग…. मेरी देह पर नहीं मेरी किस्मत पर उभर आएं हैं विन्नी…”
“अरे…ये …आजकल पढ़े लिखे लोग हैं जो इन सब पर ध्यान नहीं देते…कोई तो होगा तेरी मन की सुंदरता पर रीझने वाला और वो तुझे जरूर मिलेगा एक दिन देख लेना ।”
कहते हैं न जब आप हंसकर जिंदगी बिताना चाहते हैं तो जिंदगी आपको रुलाने का षड्यंत्र रचाने लगती है। जिंदगी ने आनंदी बुआ मौसी के साथ भी ऐसा ही किया। पिता की मृत्यु के बाद आनंदी बुआ मौसी अपने भाई भाभी की आश्रित होकर रह गई थी। उनके बहुत प्रयास करने पर भी शरीर पर दाग के चलते उनकी शादी नहीं हो रही थी तो उन्होंने परिस्थितियों से सामंजस्य बना लिया था पर दुर्भाग्य और उनका जैसे चोली दामन का सा साथ था। एक एक्सीडेंट में उनके भैय्या और भाभी अपनी दुधमुंही बच्ची पीहू को छोड़कर चल बसे तो आनंदी बुआ मौसी का जीवन दुखों की अनंत गाथा बन कर रह गया।
एक नन्हीं सी जान के लिए जैसे तैसे उन्होंने अपने आप को संभाला। आनंदी बुआ का संसार पीहू के इर्द गिर्द ही सिमट गया।आंखों में पुतली सी पीहू ही उनके जीने की वजह बन गई थी। उन्होंने उसे मां बाप दोनों का प्यार दिया और उसके भविष्य बनाने में खुद को खपा दिया और इस तरह कुछ साल बड़ी तेजी से निकल गए। दिन रात उसकी चिंता में घुलती मां भी चल बसीं…उनकी मृत्यु ने लिए।आनंदी के जीवन से बची खुची सुख की छाया को भी छीन लिया। ये उनके जीवन का सबसे कठिन दौर था। अवसाद की जद में जिंदगी सरक रही थी तो बस पीहू के खातिर
मम्मी अक्सर मन ममोसते हुए कहतीं,
“समय की मुट्ठी में क्या है ये कौन जानता है?
विपरीत परिस्थितियों ने आनंदी को कमजोर करने के बजाय मजबूत ही किया। उन्होंने ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई जारी रखी और पीएचडी पूरी की। जिस दिन पीएचडी अवार्ड हुई तो कन्वोकेशन में राजू मामा को देख कर चौंक गईं,
“तुम और यहां.…..
कब और कैसे आए?
कोई खुशखबरी है क्या ?
बहुत खुश लग रहे हो…”
“उनको देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है,” मामा ने चुटकी लेते हुए कहा।
उन्होंने तुरंत बात पलटते हुए कहा,
“देखो राजीव आखिरकार मैं भी डॉक्टर बन ही गई भले ही नकली …डॉ आनंदी …” वो बेलौस हंसती जा रहीं थीं…कई दिनों से रुकी हंसी का कोई बांध फूट गया हो जैसे, मामा बस उन्हें एकटक देख रहे थे।
“डॉक्टर आनंदी…” मामाजी ने उनका हाथ थामकर कहा,
“अरे नकली कहां बल्कि केमिस्ट्री की डॉक्टर बन गई हैं अब तुम…चलो आपकी इस उपलब्धि को सेलिब्रेट करते हैं “
“अरे नहीं पीहू को किसी के पास छोड़ कर आई हूं मुझे जल्दी जाना है….”
“तो ठीक है तुम्हारे घर ही चलते हैं…या अब भी कोई बहाना है तुम्हारे पास इस पार्टी से बचने का?”
तुम्हारे संबोधन को सुनकर वो थोड़ी चौंक गईं पर इस प्रस्ताव को ठुकरा नहीं पाईं,
“चलो भई…. मैं कहां कोई बहाना ढूंढ रही हूं। बस डरती हूं…..तुम्हारे लिए”
“क्यों …मेरे लिए क्यों?”
“कुछ नहीं बस यूं ही मुंह से निकल गया”
अनकहा जैसे बाहर आने को तैयार हो,लेकिन उन्होंने अंदर ही निगल लिया। वो अपनों को खोने का दर्द भोग रहीं थीं और अब कोई नया दर्द नहीं चाहतीं थीं।
“बताओ तो क्यों डरती हो मेरे लिए?”
कहना चाहा,”प्रिय का विछोह ….”पर बोल नहीं पाई। प्रेम ने कितना डरपोक बना दिया था उन्हें
“अरे कुछ नहीं चलो भई…. चलना है कि नहीं…” मामा का हाथ पकड़कर खींचते हुए कहा
उनके चेहरे पर अपनों को खोने का दर्द धूप छांव सा तैरने लगा था। बातों में कोई तारतम्य नजर नहीं आ रहा था। उनकी भाव भंगिमा और बातें एक दूसरे की चुगली कर रहे थे क्योंकि जिस क्षण के लिए वो तरसती हैं वह यकायक मिल जाए तो दिमाग काम करना बंद कर देता है।
वो मामाजी से नज़रें चुरा रही थी, जैसे चांद सूरज के गायब होने तक इधर उधर तकता है… प्रकृति ने जैसे उनका मन पढ़ लिया था और वातावरण में ही एक अजीब सी मादकता भर दी थी। शाम ढलने लगी थी।वह शाम कुछ ज्यादा ही सिंदूरी थी,जैसे सूरज धरती को भी अपने रंग में रंगने को उतारू हो चला हो। शरद की हवाएं तन मन में ठंडक घोल रही थीं। मौसम गुलाबी हो चला था बिल्कुल उनके लरजते चेहरे की तरह…
कई बार बोलने से ज्यादा कुछ न बोलना ही
सबसे अच्छा बचाव बन जाता है। तो बिना कुछ कहे दोनों साथ हो लिए।
कितना कुछ दबा हुआ है दोनों के मन में आपस में बांटने के लिए कि बात निकलती तो कई दिनों तक खत्म न होती तो बिना कुछ कहे दोनों भावनाओं के ज्वार भाटे में तैरते उतरते रहे।
कोई कभी नहीं जान पाया कि प्यार के सिंदूरी रंग ने आनंदी के देह के ही नहीं जीवन के भी सारे दाग ढक दिए थे। इस राज के उन दोनों के अलावा दो गवाह और थे….
वो शाम और अपने दागों पर इतराता बादलों के पीछे से उभरता पीला सा वो चांद…
दोनों को एक दूसरे का साथ पसंद था।दोनों चाहते थे कि वो शाम कभी खत्म न हो…
लेकिन जैसा हम चाहें जिंदगी वैसी होती कहां है? इस शाम में प्रेम का स्पर्श था जिसकी छुअन से उनकी शामें अब सिंदूरी हो चली थी।
प्रेम का अतिरेक अभिव्यक्ति को मौन थमा देता है। दोनों ने भी कुछ कहा नहीं सिर्फ सुना… प्रेम की पदचाप उनके दिलों की धड़कन से संगत कर रही थी।
वो शाम सिर्फ शाम कहां थी वो तो आने वाली तमाम शामों के लिए अनुबंध पत्र बन चुकी थी।लौटते हुए मामाजी उन्हें एक आश्वासन थमा आए थे और वो ताजिंदगी उसी को थामे बैठी रहीं ऐसी ही आने वाली शामों की प्रतीक्षा में
मामा उनसे शादी करना चाहते थे और उन्होंने मम्मी को नानी से बात करने को कहा। मम्मी ने हिम्मत जुटा कर नानी से बात की पर नानी किसी भी कीमत पर तैयार नहीं हुईं, “फालतू की बातें मत किया करो विन्नु….मेरे बेटे को क्या लड़कियों का अकाल पड़ा है जो किसी से भी ब्याह कर दूं?”
“आनंदी किसी भी कहां है मम्मी?क्या कमी है उसमें?कितनी अच्छी तो है!”
“एक तो खाज ऊपर से कोढ़….”
“मम्मी उसे कोढ़ नहीं है और ये कोई संक्रामक रोग नहीं होता वो बहुत अच्छी लड़की है और आप तो उसे बचपन से जानती हो और फिर राजीव को पसंद भी है…आप यह क्यों नहीं समझतीं?”
“अच्छी…..? दाग तो पहले से ही थे ऊपर से लड़की और बंध गई है उसके गले से….न विन्नू मुझसे ऐसी उम्मीद भी मत करना, और फिर कोई मेल भी है दोनों का…मेरा बेटा डॉक्टर है डॉक्टर…..”
“हां तो वो भी तो पीएचडी है…”
“तो क्या मेरे बेटे के योग्य हो गई ?
उसके परिवार और अपने परिवार में कोई समानता है?तेरी सहेली तक तो फिर ठीक था लेकिन उसे बहू बना कर ले आऊं ये नहीं हो सकता….समाज कहेगा कि हमारे लड़के में कोई कमी होगी तभी इस तरह का संबंध किया है।”
“ये किस तरह की बात कर रहीं हैं आप?”
“मैं नहीं तू किस तरह के पागलपन की बात कर रही है ? उस दाग दगिली को बहू बना लूं
कभी नहीं….मैंने मना कर दिया यानि चैप्टर खत्म…फिर कभी इस तरह की बात मत करना और हां अपने भाई को भी ठीक से समझा देना मेरे जीते जी तो यह संभव नहीं है…” उन्होंने डांटते हुए कहा
“प्यार करते हैं दोनों आप क्यों तीन जिंदगियों को दांव पर लगा रहीं हैं मम्मी”
“प्यार व्यार का नाटक नहीं टिकने वाला मेरे सामने…. निर्लज्ज अपने से उम्र में छोटे को अपने जाल में फंसाकर रखती है…प्यार का भूत तो जल्दी उतार दूंगी मैं…देखना….”
वो नानी को समझाती रहीं पर नानी टस से मस नहीं हुईं। इतनी सारी अच्छाइयों पर उसकी एक कमी भारी पड़ गई…और
आखिरकार सब को नानी की जिद के आगे झुकना पड़ा।
राजीव मामा की शादी उनकी मर्जी के खिलाफ़ एक धनाढ्य परिवार में तय करके नानी बहुत गौरवान्वित महसूस कर रही थीं। सारे रिश्तेदारों में वाहवाही जो हो रही थी।नानी बहुत खुश थीं क्योंकि एक तीर से दो शिकार हो रहे थे एक तो इतने बड़े परिवार से रिश्ता जुड़ रहा था दूसरा आनंदी से हमेशा के लिए मुक्ति मिल रही थी ।इसीलिए बिना किसी पूछ परख के इस रिश्ते के लिए हां कर दी।
जिस दिन इस रिश्ते की खबर आनंदी बुआ मौसी को मिली उसी दिन उन्होंने चमोली के एक कॉलेज में प्रोफेसर की नौकरी के लिए आए ऑफर को स्वीकार कर लिया और उस साथ बिताई आखिरी शाम की यादें समेटकर घर और शहर दोनों को छोड़ दिया।
जब उम्मीद टूटतीं हैं तो आवाज नहीं करतीं…व्यक्ति बिखर जाता है कई टुकड़ों में…जिसकी चुभन महसूस हुआ करती है जीवन भर… उसने मानों मन ही मन तय कर लिया था कि “रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहां कोई न हो
हम-सुख़न कोई न हो और हम-ज़बां कोई न हो…”
उन्हें लगा कि घर शहर छोड़ने से उनका दर्द कम होगा ,लेकिन कुछ दर्द बड़े बेशर्म होते हैं। जगह बदल देने से कहां खत्म होते हैं?
खैर…अब हमारे बीच बातचीत के सारे हेतु सारे सेतु धीरे धीरे छूटते जा रहे थे।
नानी की ये खुशी बहुत कम दिनों की थी। ये बेमेल विवाह न चलना था न चला क्योंकि पैसे वाले घर की लड़की को मध्यम वर्गीय परिवार में आकर बहुत घुटन महसूस हो रही थी। वो आए दिन अपने मायके चली जाती या फिर देर रात पार्टी करके नशे में लौटती। हैंगओवर के साथ दोपहर चढ़े जागती तो उनके नखरे चालू हो जाते।सबको भला बुरा बोलती और सबसे ज्यादा नानी को जीवन बर्बाद करने का जिम्मेवार मानती क्योंकि उन्होंने ही इस रिश्ते के लिए मीठी मीठी बातें करके पैसे के लालच में उनके परिवार को अपने जाल में फंसाकर ये शादी करवाई है।
उनके इस बिगलैड़ रवैए के पीछे का कारण बाद में पता चला कि वो जिससे शादी करना चाहती थी वह उनके घर वालों को वह पसंद नहीं था।बिना किसी को बताए वो उसके साथ चली गईं थीं पर शादी हो पाती उससे पहले ही अपनी पहुंच और पैसे के बल पर उनके घर वालों ने उन्हें ढूंढ निकाला। उन्हें तो जबरन घर वापिस ले आये और उस लड़के को जेल करवा दी। तभी किसी रिश्तेदार ने मामाजी का रिश्ता बताया तो उनके घरवालों ने आनन- फानन में उनकी शादी मामाजी से कर दी।
अब नानी उस घड़ी को कोसती हैं जब इस रिश्ते को हां की थी लेकिन अब कुछ नहीं है उनके पास सिवाय पछतावे के। मामी के तेवर दिन ब दिन बिगड़ते जा रहे थे और जिस दिन उन्हें पता चला कि वह लड़का जेल से बाहर आ गया है,उसी दिन घर छोड़कर चली गईं और फिर वो तो कभी नहीं आईं पर कुछ ही दिनों बाद दहेज और घरेलू हिंसा का नोटिस जरूर आया ।
पूरा परिवार इस अप्रत्याशित घटनाक्रम के आगे बेबस …कोर्ट कचहरी, पुलिस, वकील के दुष्चक्र में फंसकर रह गया। मामाजी को जेल हो गई। पूरा परिवार सदमे में था।
जेल से रिहा होने के बाद मामाजी का जीवन कभी पहले जैसा हो ही नहीं पाया और वे हताशा निराशा की दलदल में धंसते चले गए। दिन रात शराब के नशे में चूर रहने लगे। स्थिति पूरी तरह से नानी के हाथों से निकल चुकी थी। अपने बेटे के जीवन बचाने के हर नाकाम कोशिश के बाद उन्होंने अंतिम विकल्प के तौर पर आनंदी बुआ मौसी के किसी रिश्तेदार के हाथों उसके यहां रिश्ता पहुंचवा दिया।
मम्मी ने बताया कि जब उन्हें इस बारे में पता चला तो वे बहुत नाराज हुईं और कई महीनों तक मारे शर्म के आनंदी बुआ मौसी से बात तक नहीं कर पाईं।
“आप ऐसा कैसे कर सकती हो मम्मी?”
“क्यों क्या गलत है इसमें…?
“मतलब आपको कुछ भी गलत नहीं लगता?”
“हां कुछ गलत नहीं है …
“कुछ नहीं सब कुछ गलत ही तो है मम्मी”
“मैं तो उसका भला ही सोच रही थी… पहले तो शादी के लिए मरी जा रही थी पर घमंड देखो…मना कर दिया उसने…रस्सी जल गई पर ऐंठ नहीं गई…”
“तो क्या तैयार हो जाना चाहिए था उसे…
आपके शराबी बेटे से शादी करने के लिए…फिर वो तो आपको बिल्कुल पसंद नहीं थी न….अब कौन से सुर्खाब के पंख लग गए उसके?”
“तुझे अपने भाई का हित नहीं दिखता…”
“उसी का हित देखकर ही तो मैंने आपसे कहा था…तब तो आपको हजारों कमियां नजर आतीं थीं उसमें….”
“पिछली बातें छोड़…नए सिरे से तू बात कर न….तेरी बात नहीं टालेगी…बात करके तो देख… तू ही तो कहती थी कि प्यार करती है राजीव से…”
“क्यों बात की तो थी आपसे? आप ने ही तो मना किया था न इस रिश्ते के लिए …क्या कुछ नहीं कहा था …कोई बराबरी नहीं है उसके और हमारे परिवार में…..याद नहीं है आपको…हां याद आया क्या कहकर बुलाती थी आप उसे…चितकबरी…हैं न?”
“मिट्टी डाल पुरानी बातों पर …कहा तो
अब तो तैयार हूं मैं इस रिश्ते के लिए ….”
“लेकिन अब वो तैयार नहीं है…और मुझे आपकी इस बदली राय के पीछे की मंशा पता है…अब आप इसलिए तैयार हैं मम्मी क्योंकि उसकी देह से ज्यादा दाग़ तो अब आपके परिवार पर लग चुके हैं…..क्यों हैं न मम्मी…सही कह रही हूं न…. ?”
“क्या मतलब है तेरा?”
“अब आपका परिवार चितकबरा हो गया है….और मुझे नहीं लगता कि वो चाहेगी कि उसकी शादी किसी चितकबरे परिवार में हो…”
“पर तू तो जानती है कि सारे इल्ज़ाम झूठे हैं…”
“हां मम्मी ठीक वैसे ही जैसे आनंदी पर लगाए आपके सारे इल्जाम झूठे थे…आप की इस बेवजह नफ़रत ने कितना बड़ा नुकसान पहुंचाया है.…आज राजीव भैया और अपना परिवार जो सजा भुगत रहा है उसकी जिम्मेदार आप हैं,” कहते हुए वो रोने लगी
“हां विन्नू मुझे अहसास है और यही बात मुझे खाए जा रही है…मैं जब भी राजू का मुरझाया हुआ चेहरा देखती हूं,घर पर मंडराते संकट के बादल देखती हूं तो मुझे लगता है आनंदी का ही श्राप है।”
“मम्मी आप अभी भी उस बेचारी के साथ अन्याय ही कर रहीं हैं…अब तो बख्श दीजिए उसे…”
“नहीं बेटा मैं तो उसके साथ न्याय कर रही हूं…मुझे पता चला है कि राजीव जाता है उससे मिलने वहां…उसके घर पर ही रुकता है कितनी बदनामी की बात है ।घर समाज में पता चलेगा तो उसकी कितनी बदनामी होगी यही सोच कर रिश्ते की बात कर रहीं हूं। साथ रहना ही है तो शादी भी कर लें।”
“रहने दीजिए मम्मी अब इसकी कोई जरूरत नहीं है ….अपने स्वार्थ को परोपकार का नाम मत दीजिए…अब तो उन लोगों को उनके हाल पर छोड़ दीजिए ….”
“मैंने तो हमेशा ही अपने बच्चों की खुशी चाही…”
“पर किस कीमत पर ….उनकी खुशियों पर अपनी जिद का ताला लगाकर …अब
आप उनकी खुशियों की पहरेदारी छोड़ दीजिए… कभी तो बच्चों पर अपनी पकड़ छोड़ना होती है…अरे मां भी गर्भ में बच्चे का तय समय से ज्यादा नहीं रख सकती उसके प्राणों की रक्षा के लिए ही उसे अपने से अलग करना ही पड़ता है …आप क्यों नहीं समझतीं कि बड़े होकर बच्चे अपना लिए निर्णय ले सकते हैं गलत या सही पर जिंदगी भर आपको कोसने से तो बेहतर है कि वो अपने निर्णय स्वयं लें पछताना पड़े तो पछता लें …आप इसे कितना भी ढकने की कोशिश करें, पर…आप जानती हैं कि इससे आपका अपराध कम नहीं हो जायेगा। आपके मन में खोट है मम्मी… आपका अपराध बोध आपको खाए जा रहा है। निस्वार्थ रिश्ते प्रेम से बंधे होते हैं ऐसे रिश्तों की उम्र आप तय नहीं कर सकते। उनका रिश्ता मरा नहीं था मम्मी….आपने उसकी हत्या की थी…” कहते हुए उनकी आवाज कांपने लगी ।
“आप आज भी उसे मन से नहीं अपने स्वार्थ के कारण अपनाने को कह रही हैं और ये महानता का ढोंग….अब तो रहने दीजिए।प्लीज प्लीज मम्मी उन्हें अपनी जिंदगी जी लेने दीजिए…प्लीज़ किसी तोहमत का दाग मत लगाइए, और हां वो एक दूसरे के साथ नहीं रहते ,वो एक दूसरे में रहते हैं।
खैर… छोड़िए ये सब आप नहीं समझेंगी मम्मी…
उनके अनकहे रिश्तों को अनसुना और अनदेखा करके उन्हें सम्मान से रहने दीजिए।
आपसे हाथ जोड़कर विनती है मम्मी कम से कम अब उनके रिश्ते को चितकबरा मत होने दीजिए।”
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बहुत ही मार्मिक कहानी लगी आपकी गीता जी!
सफेद दाग को लेकर पुरानी महिलाओं के मन में शुरू से यहं बात रही कि यह कोढ़ ही है।
जबकि यह पूरी तरह से गलत है।
और फिर काबिलियत की भी कीमत होती है। योग्यता बहुत मायने रखती है। स्वभाव की निर्मलता ही घर में प्रेम भाव की स्थापना कर पाती है। रूप तो ऊपरी आकर्षण है। और मान लो शादी के बाद होता तो क्या उसे घर से निकाल देते?
आज भी कई पालक बच्चों की खुशियों से ऊपर अपनी उम्मीदों को रखते हैं।
बच्चों की खुशी से बढ़कर माता-पिता के लिए और क्या हो सकता है? लेकिन अपनी ज़िद के आगे अपने बच्चों की जिंदगी बर्बाद कर लेना कभी-कभी बहुत दुखदाई हो जाता है, नासूर की तरह सालता है।
एक जिद के पीछे कितनी जिंदगी असमय बर्बाद हो जाती हैं।
काश पालक इसे समझ पाएँ।
कहानी का शीर्षक अंत में सार्थक सिद्ध होता है।
इस बेहद मार्मिक कहानी के लिये, जो सच की तरह है, आपको बधाई।
आत्मीय आभार मैडम
आपके न सिर्फ कहानी को पढ़ा बल्कि उसकी आत्मा और उसके संदेश को भी अच्छी तरह से गहा।
पुनः धन्यवाद
स्नेह बनाए रखिएगा
बहुत सुंदर मर्मस्पर्शी कहानी । बधाई आपको