दो-तीन महीने पूर्व नीदरलैंड से ओड़िशा में अपने किसी रिश्तेदार की शादी में उपस्थिति दर्ज कराने के लिए डॉ. ऋतु शर्मा नंनन पांडे आई थी, तो समय निकालकर एक दिन के लिए वह सपरिवार अंगुल भी आई थी। अंगुल की साहित्यिक संस्था ‘संवाद-घर’ के अध्यक्ष प्रोफेसर शांतनु सर ने उनके सम्मान में वह एक साहित्यिक आयोजन रखा गया था। उस आयोजन में मैं भी शरीक हुआ था, वहाँ उन्होंने मुझे तीन पुस्तकें ‘बन्द रास्तों के बीच’, ‘नीदरलैंड की लोककथाएं और कविता-संकलन ’संदूकची’ उपहारस्वरूप दी थी। दो किताबें नीदरलैंड उनके नीदरलैंड पहुँचने के एक-दो सप्ताह के भीतर पढ़ ली, मगर ‘बंद रास्तों के बीच’ (ज्यॉं पॉल सार्त्र की रचना ‘नो एक्ज़िट’ का प्रसिद्ध नाटककार विवेकानंद और ऋतु द्वारा किया संयुक्त अनुवाद) जान-बूझकर छोड़ दिया, क्योंकि सार्त्र को पढ़ने और समझने के लिए समय और धैर्य की जरूरत होती है। साथ ही, मूड़ और स्थित-प्रज्ञावस्था की भी।
1964 में नोबेल पुरस्कार विजेता नाटककार, दार्शनिक ज्याँ पॉल सार्त्र, (यद्यपि उन्होंने यह पुरस्कार स्वीकार नहीं किया) द्वारा लिखी गई कृति ‘नो एक्ज़िट’ ( फ्रेंच में हुईस कलोस) को नाटक कहूँ या एकांकी – समझ नहीं पा रहा हूँ, फिर भी आलोचना की दृष्टि से ‘नाटक’ ही मान लेना सही लग रहा है। उचित शांत परिवेश की प्रतीक्षा करते-करते आखिर समय आ गया कि डॉ॰ ऋतु शर्मा जी और विवेकानंद जी के द्वारा अनूदित इस नाटक को पढकर विश्व के अन्यतम बुद्धिजीवी साहित्यकार के मन-मस्तिष्क की टोह ली जाए।
कभी जमाना था, जब वैश्विक साहित्य पटल में ज्याँ पॉल सार्त्र और सिमोन द बोवियर की तूती बोलती थी। उनका लिखा हुआ कोई भी आलेख किसी आंदोलन से कम नहीं होता था। उन दोनों की भेंट पेरिस में दर्शनशास्त्र ‘एग्रीगेशन’ के अध्ययन के दौरान हुई थी। जिन्होंने तत्कालीन दर्शनिक, साहित्यिक और राजनैतिक धारणाओं को काफी प्रभावित किया था। निस्संदेह सार्त्र एक अजीब इंसान थे। उन्हें नोबल प्राइज मिलता है, मगर अस्वीकार कर देते हैं, कारण उनकी अपनी स्वतंत्रता में विश्वास। वे नहीं चाहते थे कि लेखक संस्थागत बने। सिमोन द बिवोयर भी अलग किस्म की महिला थी, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बुद्धिजीवियों की जिंदगी पर उनके द्वारा लिखा गया उपन्यास ‘मंडारिन्स’ बहुचर्चित रहा।
ओशो रजनीश की तरह वे दोनों पारंपरिक विवाह-प्रथा को असंगत बताते है, और अस्वीकार करते है, क्योंकि विवाह व्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाता है। विवाह ही नहीं सामाजिक व्यवस्था, धर्म, आस्था, विश्वास – सब-कुछ तो इसी श्रेणी में आता है। वे दोनों पेरिस के सेंट-जर्मन-दे-डे कैफे, द फ्लोर ले टू मागो, मिस्त्राल होटल में मिलते थे अथवा किराए के अपार्टमेंट में साथ रहते थे। बिना किसी शर्त, एक-दूसरे के लेखन में मदर करते थे। यद्यपि वे स्थायी रूप से एक-दूसरे के साथ नहीं रहे, मगर पत्रों, बातचीत, साझा परियोजनाओं के माध्यम से आजीवन जुडे रहे। ‘लेटर्स टू सार्त्र और ’लेटर टू बोवियर’ के माध्यम से कह सकते है कि उनका रिश्ता भी दोष मुक्त नहीं था, क्योंकि सिमोन के प्रेमी थे नेल्सन अलग्रेन, क्लॉड लैजमेन, जबकि सार्त्र के संबंध थे ओल्गा, वांडा कोसाकिविक्ज से। खुले रिश्तों पर उनकी अपनी सहमति थी। दूसरे शब्दों में, उनके संबंध जटिल थे, बौद्धिक भी, व्यक्तिगत भी, फिर भी दीर्घावधि 1929-1980 तक चले और उनके साझा जुनून की वजह से साहित्य और सामाजिक नियमों को चुनौती देते हुए स्वतंत्रता, जिम्मेदारी और मानव अस्तित्व की निरर्थकता को प्रतिपादित किया। यही वजह है की सार्त्र लिखते हैं ‘बीइंग एंड नथिंगनेस (1943)’, ‘नो एग्जिट (1944)’ तो सिमोन लिखती है “द सेकेंड सेक्स (1949)’, ‘द अदर’।
ज्याँ पॉल सार्त्र ने यह नाटक 1944 में लिखा और विवेकानंद तथा डॉ. ऋतु शर्मा द्वारा प्रथम पेपरबैक संस्करण 2006 में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ था और दूसरा पेपर बैक संस्करण 2023 में ‘बंद रास्तों के बीच’ शीर्षक से। परवर्ती काल में इसी नाटक से प्रभावित होकर नोबल प्राइज विजेता सैमुअल ब्रेकट ने ‘वेटिंग फॉर गोडोट’ नाटक की रचना की, जिसके मंचन के समय सार्त्र और सिमोन दोनों उपस्थित थे। ये दोनों विचारोत्तेजक नाटक अस्तित्ववाद के प्रतिनिधि नाटक माने जाते है, जिसमें रिश्तों की जटिलता और मानव स्वभाव का लचीलापन दिखाया गया है।
यह नाटक पढ़ने के बाद मेरे मन में अभिनेता सुरेश औबेरॉय की हिन्दी फिल्म ’ऐतबार’ (1985) की याद आ गई, जिसकी शूटिंग एक ही घर में की गई थी – जो कि अल्फ्रेड हिचकॉक की क्लासिक थ्रिलर “डॉयल एम फोर मरडर” का रीमेक है, जहां फिल्म की पूरी कहानी मुख्य रूप से एक ही स्थान पर केंद्रित है। इसी तरह इस पूरे नाटक में भी एक ही स्थान है – नरक में बंद कमरा, जिसमें तीन मैले-कुचैले सोफे पड़े हुए हैं, निरंतर रोशनी जल रही है, मगर उसे बुझाने के लिए कोई बटन या स्विच नहीं है। न कोई दर्पण है, न कोई खिड़की। बस एक दरवाजा है, वह भी बंद । इस हिसाब से इस नाटक का शीर्षक ‘बंद कमरा’ होनी चाहिए, न कि ‘बंद रास्तों के बीच’, क्योंकि ‘बंद रास्तों के बीच’ का अर्थ किसी सिनेमा हॉल के आठ-दस बंद दरवाजों वाला प्रतिबिंब उभर कर सामने आता हैं। प्रवेश, निकासी के अतिरिक्त कुछ आपातकालीन रास्तों समेत। जबकि नाटक के दृश्य में केवल एक दरवाजा हो दिखाया गया है, वह भी बंद यानि ‘नो एग्जिट’, उससे बाहर नहीं जा सकते। खैर, ’नो एग्जिट’ शब्द पर उपनिषदों की एक कहानी याद आने लगती है, जिसमें 84 लाख दरवाजों वाला महल है और उसमें केवल एक दरवाजा खुला है, ठीक इस नाटक की तरह। इस महल के भीतर एक अंधे आदमी को रखा गया है, वह बाहर निकलना चाहता है। इसलिए एक जगह से दीवार पकड़ते-पकड़ते अपनी यात्रा शुरू करता है, कई सालों बाद वह खुले दरवाजे के पास पहुंचता है, और जैसे ही वह खुले दरवाजे के पास पहुंचता है तो उसे अपने शरीर पर खाज-खुजली आने लगती है, उसे खुजलने के कारण उसके हाथ दीवार से हट जाते है। कुछ ही क्षणों में वह खुला दरवाजा पार हो जाता है। शुरू होता है अंतहीन यात्रा का सिलसिला। फिर से वह 84 लाख दरवाजों के जाल में फंस जाता है। यहां उपनिषद शिक्षा मिलती है, मनुष्य योनि केवल एक ऐसा दरवाजा है, जिसके माध्यम से वह ईश्वर प्राप्ति कर सकता है। बाकी सारी 83,99,999 भोग योनियां है, जिसमें ईश्वर प्राप्ति के सारे रास्ते बंद है। अगर इस नाटक का शीर्षक ‘बंद कमरा’ होता तो उपनिषद की इस कहानी के आधार पर निष्कर्ष निकाला जा सकता था कि नाटक के अंत में वह बंद दरवाज़ा खुलता है, फिर भी इसके तीनों पात्रों की आत्माएं खुले दरवाजे से बाहर निकलना नहीं चाहती है, भले ही, मानसिक तनाव सहते हुए नरक की घोर यातना फिर से क्यों नहीं झेलनी पड़े। उन्हें भी अपनी दबी भावनाओं के कारण मानो खाज-खुजली आने लगी हो। बुद्ध ने कहा था कि मैंने ईश्वर तक पहुँचने वाले रास्ते को देखा है, मगर इस संसार का कोई भी लोग इस रास्ते से जाना नहीं चाहता है। ज्यॉं पॉल सार्त्र का नाटक ‘नो एक्ज़िट’ भी तो यही कहता है। जाने के लिए ‘एक्ज़िट’ रास्ता है, मगर कोई उस रास्ते से ‘एक्ज़िट’ करना ही नहीं चाहता है।
इस नाटक में तीन पात्र हैः-
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जोसेफ गार्सिन (एक डरपोक पत्रकार)
२. इनेज सेरोनो (एक क्रूर डाक महिला कर्मचारी)
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स्टेला रिंगॉल्ट (आत्ममुग्ध सामाजिक महिला)
