Saturday, March 28, 2026
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डॉ. मुक्ति शर्मा की कहानी – आधा कब्र में आधा बाहर

बाहर कड़ाके की बर्फ पड़ रही थी चारों ओर बर्फ ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे सफेद चुनरी ओढ़ी हो घाटी ने…
इधर  अतीक मां बनने वाली है उसके घर पांचवें बच्चे का जन्म होने वाला है।
हबीबुल्लाह बहुत खुश है। संतान चाहे पहली हो या पांचवी मां बाप को सब बच्चे प्यारे होते हैं। कहते हैं ना, “पांच उंगलियां बराबर होती हैं। एक उंगली को काटो तब भी उतना ही दर्द होता है दूसरी को काटो तब भी उतना ही दर्द होता है।”
हबीबुल्लाह का मानना है कि औलाद अल्लाह का दिया हुआ अनमोल तोहफा है। इससे  कोई फर्क नहीं पड़ता बच्चा पहला हो या पांचवां।
बाहर हल्की-हल्की बर्फ पड़ रही थी,तभी अतीक  को पेट में दर्द महसूस हुआ उसने हबीबुल्लाह को बुलाया – अजी सुनते हो, कहां हो ? जल्दी आओ। 
“क्या हुआ?”
“मुझे पेट में जोरों से दर्द हो रही है। मुझे लगता है कि समय हो गया है हमें अस्पताल चलना चाहिए।” ऐसा बोलने की देर थी कि जल्दी-जल्दी हबीबुल्ला ने  जैसे- तैसे अतीक को अस्पताल पहुंचा दिया। 
डॉक्टर ने बोला इन्हें जल्दी से लेबर रूम में ले चलो। हबीबुल्लाह बहुत परेशान था।
“अब क्या होगा? हे, मेरे अल्लाह मुझ पर रहम करम करना।” 
डॉक्टर ने जब हबीबुल्लाह की हालत देखी तो कहा कि – “आप परेशान मत होइए । अल्लाह पर छोड़ दें, सब ठीक होगा। अल्लाह ने चाहा तो आप थोड़ी ही देर में अब्बू बन जाएंगे।” 
अतीक का सारा परिवार अस्पताल पहुंच चुका था। सब अल्लाह से दुआ मांग रहे थे, कि मां और बच्चा सही सलामत रहे, हबीबुल्लाह पास में रखी कुर्सी पर बैठा था, सब उसे हौसला दे रहे थे। 
डॉक्टर नर्स आगे-पीछे दौड़ रहे थे, हबीब का लड़का दुकान पर जाकर सारा सामान ले आया। “अब्बू, कुछ और तो नहीं लाना।” सज्जाद ने पिता से कहा। 
“नहीं। तुम यहां बैठ जाओ और आराम करो।” 
जैसे ही लेबर रूम का दरवाजा खुला आधे घंटे के बाद ,सब लोग दरवाजे की तरफ लपके तो डॉक्टर ने कहा – “खुशखबरी है। मुबारक हो। लड़का पैदा हुआ है।”
हबीबुल्लाह की खुशी का ठिकाना नहीं रहा अतीक ने जब बेटे का चेहरा देखा तो वह मन ही मन मुस्कुराने लगी इतना प्यारा बच्चा गोल- मटोल उसके चेहरे पर अद्भुत तेज था।
उस बच्चे के चेहरे की चमक के आगे सब फीका था, उस प्यारे से बच्चे का नाम जावेद रखा गया । 
अतीक हमेशा जावेद को फिरन में रखती थी। ताकि दुनिया की बुरी नजर से  बचाए, दूसरा कश्मीर में बर्फ जब पड़ती है तो ठंड बहुत हो जाती है। ठंड से बचाने के लिए फिरन में ही डाल के रखती थी। 
“यू कहो कि दुनिया की नजर से छुपाना चाहती हो क्योंकि जावेद बहुत ही सुंदर था”! समय अपनी रफ्तार पकड़ रहा था जावेद बड़ा हो रहा था जावेद अपने 
मोहल्ले के बच्चों के साथ खेलता रहता था! उसकी दादी जे़बाआपा बहुत नेक औरत थी कोई भी भूखा उनके घर से नहीं जाता वह जितने भी मुसाफिर गली से गुजरते सभी को कहती – आओ खाना खा लो पानी पीकर जाओ।
उनके घर में अन्न की कमी नहीं थी ना दिल छोटा था …ऐसा था उनके घर का माहौल! 
जे़बा आपा को कभी गुस्सा नहीं आता था। कई बार तो  खाना खा रही होती थी तो तभी कोई भिखारी दरवाजे पर आ जाता तो अपनी थाली से दे देती…
एक दिन सलमा को बहुत गुस्सा आया तो उसने पूछा – “आपने अपना खाना मुसाफिर को दे दिया? अब आप खुद क्या खाओगी?” 
“मेरा छोड़ो देखा नहीं कितनी दूर से आया था भूख लगी थी उसको? मेरा क्या है चाय बनाकर पी लूंगी अभी। सलमा तुमने देखा नहीं खाना खाते वक्त कितनी दुआएं दे रहा था। तू अभी बच्ची है तुझे नहीं पता? अल्लाह किस रूप में आ जाए यह पता नहीं। इसलिए मेरी बात याद रखना कभी भी अपने घर से किसी को बिना खाए ना जाने दो। अगर कुछ भी ना हो एक गिलास पानी ही पिला दो। इसी में अल्लाह खुश रहते हैं और बरकत देते हैं।”
जावेद वहां पर खड़ा था, तभी अम्मी ने कहां तुम जाओ यहां से अपनी किताबें निकालो अब्बू तुम्हारे आते ही होंगे। 
जावेद वहीं खड़ा था। बड़ी मासूमियत से दादी से पूछने लगा – मैं भी जाऊं? 
किताबें पढ़ने? 
उसका मासूम सा चेहरा और प्रश्न ने दादी को हंसने पर मजबूर कर गया…”दादी ने पूछा तुम भी पढना चाहते हो?”
“हां, आपने सलमा दीदी को बोला ना किताबें निकालो।” 
“हां मैंने सलमा दीदी को बोला क्योंकि वह बड़ी क्लास में पढ़ती है तुम्हारे तो खेलने के दिन है।जाओ खेलो।” ठीक है पहले तुम मुझे मिठाई दो दादी ने फिरन से दो टाफिया निकाल कर दी। जावेद कुदता हुआ गली की तरफ चला गया।
उसने जल्दी से दोनों टाफिया मुंह में डाल दी… दूर खड़ी अतीक सारा तमाशा देख रही थी और मन ही मन सोच रही थी कि बुजुर्गों का घर में होना कितना जरूरी है।” बड़े-बूढ़े ही तो बच्चों को अच्छे बुरे का ज्ञान देते हैं!” 
समय बीतता गया और जावेद बड़ा हो गया उसने एक दिन मां से जिद की, कि वह अपने  अंकल के घर पर जाएगा।
जावेद अपने अंकल के घर गया खाना खाकर सब सो गए। 
अचानक दूसरे कमरे से शोर सुनाई देने लगा भागते हुए सब बाहर आए। देख कर  हैरान हो गए कि जावेद के अंकल और घर के बाकी सदस्य आतंकवादियों की बंदूक के निशाने पर थे। 
आतंकियों ने एक-एक करके सबको अपना निशाना बनाया, बंदूक की गोली जावेद की कमर से निकली और जावेद घायल हो गया। आतंकवादी वहां से भाग गए।
जावेद जमीन पर तड़पता रहा।
हबीबुल्लाह को जब फोन आया तो उनके पैरों तले जमीन ही खिसक गई। भाई  की लाश ,भाभी,भतीजा। सब …
जावेद तड़प रहा था, उन्होंने जावेद को उठाया अस्पताल ले गए।
दो साल तक जावेद का इलाज चलता रहा। 
उसकी कमर का नीचे वाला हिस्सा बैठ चुका था और वह व्हीलचेयर पर आ गया और बहुत से ऑपरेशन हुए। 
जावेद ने हिम्मत नहीं हारी और घर पहुंच कर उसने लैपटॉप की मदद से सभी को चिट्टियां लिखना शुरू कर दी ताकि उसकी कोई मदद करें।
“तब जावेद को ख्याल आया और अपने आप पर तरस भी आ रहा था उसने सोचा क्यों ना ऐसे लोगों की मदद की जाए जो विकलांग हैं। क्यों ना मैं ऐसे लोगों का सहारा बनूँ  जिन्हें सब ठुकरा देते हैं।”
वे अपने घर में विकलांग बच्चों को शिक्षा देता रहा ,यह काम इतना आसान नहीं था इसमें उसके परिवार ने बहुत साथ दिया और उसके दोस्तों ने उसकी मदद की। 
जावेद ने करके दिखाया उसने जे़बाआपा नाम का स्कूल खोला और दूसरी तहसीलों के बच्चों को भी जोड़ना शुरु किया।
धीरे-धीरे स्कूल में और बच्चे  दाखिला लेने लगे सभी बच्चों को उसने बड़ी मेहनत के साथ पढ़ाया लिखाया।
बच्चों को कंप्यूटर भी सिखाया , कि वह अपने पैरों पर खड़े हो सके बहुत सी एन जी ओ ने जावेद की मदद की जावेद की मेहनत रंग लाई।
  
जे़बा आपा नाम से जावेद का स्कूल चल रहा है और जिसमें सौ से ज्यादा बच्चे पढ़ रहे हैं।
जावेद उन बच्चों की मदद कर रहा है जिनकी मदद कोई नहीं करता।
जिंदगी जावेद को  नित नई  चुनौतियां दे रही थी।
जावेद ने उस स्कूल में बहुत से टीचरों को भी लगाया जो मुफ्त शिक्षा दे रहे थे । सभी ने जावेद का साथ दिया। 
बच्चे घर में बहुत सा गंद फैला देते थे और उनकी बहनें चुपचाप करके उस गंद को समेटती रहती थी।
“अम्मी आपने देखा ना जावेद भैया रोज इन बच्चों को घर पर ले आते हैं और पढ़ाते हैं और यह इतना गंध फैलाते हैं  हम पूरा दिन सफाई करती रहती हैं। क्या आप समझा नहीं सकती जावेद भैया को?” 
“अल्लाह के वास्ते आप लोग चुप हो जाओ कोई बात नहीं मैं जावेद से बात करूंगी। उसे बहुत बुरा लगेगा।तुम अपना मुंह मत खोलो।”
जावेद ने सोचा जमीन तो है क्यों ना स्कूल खोला जाए । फिर क्या था,एन जी ओ की मदद से एक बिल्डिंग बनाई और वहीं पर सभी बच्चों को रखा।
जो भी कश्मीर घूमने जाता बृजबिहाडा में जावेद का हेल्पलाइन स्कूल  देखने जरूर जाता।
सब लोगों ने मदद की।
धीरे-धीरे उस स्कूल के बच्चों की संख्या बढ़ने लगी और चारों ओर जावेद के नाम की चर्चा भी होने लगी। जावेद को जगह-जगह सम्मानित किया जाता क्योंकि वह खुद तो व्हीलचेयर पर था। ऐसे बच्चों के लिए काम कर रहा था जिनकी कोई मदद नहीं करने को तैयार था।
ऐसे बच्चे अपने परिवार के लिए भी बोझ बन जाते हैं।
अतीक :जावेद मुझे तुमसे एक बात करनी है? जी अम्मी बोले क्या बात करना चाहती हैं? मैं और तेरे अब्बू चाहते हैं कि तुम निकाह कर लो। मेरे इन बच्चों का क्या होगा? कौन इन्हें पालें पोसेगा ?” 
“कौन ऐसी लड़की होगी? जो मेरे इन बच्चों से प्यार करेगी इन बच्चों के लिए मैं शादी नहीं कर सकता मैं जैसा हूं वैसा ठीक हूं। “
आपको मेरी चिंता करने की जरूरत नहीं है, आप तो जानती हैं मेरा आधा शरीर कब्र में है और आधा व्हील चेयर पर। 
सारी बात फिर से अतीक की आंखों के आगे घुमने लगी किस तरह जावेद ने अपने जीते जी अपना  आधा शरीर  कब्र में दफन कर दिया था।
जावेद साहब आपके शरीर के निचले हिस्से में बिल्कुल ताकत नहीं है यह बिल्कुल काम नहीं कर रहा तो हम चाहते हैं कि आपकी नकली टांगे लगा दी जाए ताकि आपको थोड़ी सी सहूलियत हो डॉक्टर साहब आप कौन सी सहूलियत की बात  कर रहे हैं? मैं तो इतने सालों से व्हीलचेयर पर जिंदगी गुजर रहा हूं एक काम  करो आप इन टांगों को काट ही दो मसला ही खत्म हो जाएगा और मैं कब्र में दफन कर देता हूं।
कैसी बातें कर रहे हैं कब्र में दफन जीते जी आप अपनी टांगों को कब्र में दफन करेंगे? जब इनका कोई काम ही नहीं है तो यह शरीर भी तो एक दिन कब्र में जाना ही है तो इससे बेहतर है कि अपने जीते जी ही मैं टांगों को भी दफ़न कर दूँ।
“इस बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता बस आपको सलाम है डॉक्टर  इतना कहकर कमरे से चला गया।”
डॉक्टर तो चले गए, पर जावेद एक नई परीक्षा  के लिए तैयार हो गया। इस लड़के ने इतना कुछ बर्दाश्त किया है तभी तो सोच रही हूं कि इस लड़के की शादी कर देते हैं ताकि इसे कुछ पल सुकून के मिल सके।”
“अम्मी, ऐसे इंसान से कौन शादी करेगा?” 
अतीक की आंखें आंसुओं से भर आई…
“मेरे बच्चे तेरे में कोई कमी नहीं है। पता है, प्रधानमंत्री जी ने घोषणा की है कि पद्मश्री लोगों को दिया जाएगा उसमें से तेरा नाम भी है और बहुत जल्दी तुझे दिल्ली पद्मश्री लेने के लिए जाना है।”
“बस फिर क्या था? जावेद के घर  लोगों की लाइन लगी सभी मुबारक देने आ रहे थे आप ने बहुत अच्छे कर्म किए हैं कि ऐसा बच्चा पैदा हुआ है जिसने पूरे गांव का नाम रोशन किया है।”
“अम्मी मैं आज बहुत खुश हूं। यह पद्मश्री अगर मिला है तो सिर्फ इन बच्चों की वजह से मिला है।”
“आंसू छम छम छलकने लगे।”
“मेरे बेटे चुप हो  जा, तूने भी तो बहुत मेहनत की है इन बच्चों के लिए।”

“चलो शुक्र है सरकार को तो तरस आया उन्होंने मेरे कार्य की प्रशंसा की और मुझे अब जल्दी ही दिल्ली जाना है।” 
जावेद को पद्मश्री से नवाजा गया। 
जावेद अपने इस परिवार के साथ बहुत खुश है। ऐसे लोगों की मदद करने में उसे सुख का अनुभव होता है।
एक ऐसा इंसान जिसका आधा शरीर उसके पास हो आधा कब्र में दफन हो, सोचकर ही इंसान के रौंगटे खड़े हो जाते हैं।
हेल्पलाइन स्कूल ही जावेद का परिवार है।


डॉ. मुक्ति शर्मा
डॉ. मुक्ति शर्मा
संपर्क - 9797780901
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13 टिप्पणी

  1. कहानी पूरी पढ़ी। पात्रैकी जीवन यात्रा में कभी दुख कभी सुख की अनुभूति हुई। लाडले जावेद के जीवन में विकलांगता आयी। उसका सम सामयिक अभिशाप वरदान बन गया। उसके उद्यम ,साहस, और उदात्त चरित्र को देखते हुए भारत सरकार ने राष्ट्रीय पुरस्कार के रूप में पद्म श्री से विभूषित किया शरीर का उर्ध्वांग क्रिया शी‌ल और निचला अर्द्धांग अधोगति के रूप में समाधिस्थ जैसा
    होते हुए भी जीवन सर्वहितकारी सिद्ध हुआ।
    कहानी का कथानक और चरित्र चित्रण देश काल प्रसंसनीय है। कहानीकार को बधाई। इति। राधेश्याम ” राधे”.

  2. सम्पूर्ण कहानी पढ़ने के पश्चात ज्ञात होता है कि लेखिका ने जिस विकलांग विमर्श को आधार बनाकर कहानी का लेखन कार्य किया है,उसमें पूर्णता सफल रहीं हैं। कहानी दिव्यांग व्यक्तिओं में एक नयी उर्जा भरने का कार्य करती है, साथ ही उनको यह भी सीख देती है कि वह विकलांग होते हुए भी ,वह सभी कार्य करने में सक्षम है, जिन्हें एक सामान्य व्यक्ति करता है।

    कहानी की लेखिका को ढ़ेर सारी शुभकामनाऍं।

  3. सम्पूर्ण कहानी पढ़ने के पश्चात ज्ञात होता है कि लेखिका ने जिस विकलांग विमर्श को आधार बनाकर कहानी का लेखन कार्य किया है, उसमें पूर्णता सफल रहीं हैं। कहानी दिव्यांग व्यक्तिओं में एक नयी उर्जा भरने का कार्य करती है, साथ ही उनको यह भी सीख देती है कि वह विकलांग होते हुए भी, वह सभी कार्य करने में सक्षम है जिन्हें एक सामान्य व्यक्ति करता है।

    कहानी की लेखिका को ढ़ेर सारी शुभकामनाऍं।

  4. सम्पूर्ण कहानी पढ़ने के पश्चात ज्ञात होता है कि लेखिका ने जिस विकलांग विमर्श को आधार बनाकर कहानी का लेखन कार्य किया है , उसमें पूर्णता सफल रहीं हैं। कहानी दिव्यांग व्यक्तिओं में एक नयी उर्जा भरने का कार्य करती है, उनको यह भी सीख देती है कि वह विकलांग होते हुए भी वह सभी कार्य करने में सक्षम है जिन्हें एक सामान्य व्यक्ति करता है।

    कहानी की लेखिका को ढ़ेर सारी शुभकामनाऍं।

  5. बहुत बहुत धन्यवाद जी,आप ने कहानी के पहलू ओ को गहराई से अध्ययन किया। युवा पीढ़ी का इतनी सुन्दर समझ
    धन्यवाद

  6. मुक्ति जी!

    पहले तो शीर्षक ही अजीब लगा। पर कहानी पढ़ने के बाद समझ में आया कि वास्तविकता क्या है।
    कथानक का चयन तो अच्छा है किंतु ऐसा लगा जैसे कहानी भागती दौड़ती अंत तक पहुँच गई।
    सर्वप्रथम तो परिवार की पूरी जानकारी ही नहीं है। परिवार कैसा है? कहाँ रहता है? कारोबार क्या है? आर्थिक स्थिति कैसी है?
    घर से अस्पताल कितनी दूर है?
    शुरुआत ही”बाहर कड़ाके की बर्फ है” से है‌। पढ़कर लगा कि बहुत बर्फ गिर रही है।
    तभी आगे आपने लिखा कि थोड़ी-थोड़ी बर्फ गिर रही है। पर ऐसे माहौल में घर से अस्पताल जाना सहज नहीं होता लेकिन तत्काल अस्पताल पहुँच गए।
    अस्पताल सरकारी है या प्राइवेट?
    प्राइवेट अस्पताल में तो संज्ञान तत्काल में लिया जाता है। वरना सरकारी अस्पतालों में किसी को जल्दी नहीं पड़ी रहती। सब अपने के हिसाब से ही भागा दौड़ी करते हैं।
    जैसे-तैसे अस्पताल भिजवाना समझ में नहीं आया।
    अस्पताल जाने के बाद भी प्रारंभिक कागजी कार्यवाही होती हैं पहले तो डॉक्टर ही जाँच करते हैं।लेबर रूम में तो बाद में जाते हैं स्थिति समझने के बाद।
    उसमें भी लिखा जाता है कि यह कौन सा बच्चा है अगर पाँचवा बच्चा है तो अब्बू तो पहले ही बन गए।
    हमारे घर ही हमारी सगी मौसेरी बहन जो हमारी जेठानी भी थीं उनका पोता भी बिल्कुल इसी स्थिति में है।युवा है,उसने तो गद्दे में ही डाई लगाई थी और गर्दन से लेकर नीचे तक उसका पूरा शरीर बेजान हो गया। काफी लंबे ट्रीटमेंट के बाद भी उसके हाथ-पैर तक ठीक नहीं हो पाये फिजियोथैरेपी और इलाज ने बस इतना ही किया कि वह भी व्हीलचेयर पर है। व्हीलचेयर भी ऐसी है जिसे वह खुद ऑपरेट कर लेता है। दोनों हाथों की ऑड़ी तिरछी उंगलियों से मोबाइल चलाता है। और आजकल काफी कुछ उससे ही कर रहा है।
    कहानी स्पीडली आगे बढ़कर खत्म हो गई किन्तु इस कहानी का एक बड़ा प्लस पॉइंट यह है यह एक बड़ी प्रेरणा देती है।
    नीरज के गीत की कुछ पंक्तियाँ याद आ गईं।
    *कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है।*

    अगर कभी आपने शिवानी की अपराजिता कहानी पढ़ी हो तो वह भी लगभग ऐसी ही है।
    वह साइंटिस्ट बन जाती है व्हीलचेयर पर ही रहते हुए। और उसे इस सफलता तक पहुँचाने का श्रेय उसकी माँ को जाता है।
    इस प्रेरणा प्रसून के लिए आपको बधाई।

  7. बहुत बहुत धन्यवाद निलिमा जी ,हर इंसान का कहानी पढ़ने देखने का नजरिया अलग होता है, टिप्पणी के माध्यम से आपने दिखाया,आपकी प्रतिक्रिया मुझे बहुत अच्छी लगी भविष्य में इस पालन अवश्य करूंगी।

    शुक्रिया

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