नींद में वह अक्सर किसी पुरानी भाषा को पुकारते हुए जागती थी। कभी कोई लोरी जो उसने बचपन में माँ की गोद में सुनी थी, कभी कोई टूटी-फूटी धुन जो अब किसी रेडियो पर भी नहीं बजती थी। उसका नाम था “आर्या”-एक ऐसा नाम जो कभी उसके लिए पूरी तरह अनजान था। पर फिर भी क्योंकि यह नाम उसकी माँ का दिया था और इसी नाम के सहारे उसकी माँ शायद अपना अस्तित्व बचाने की कोशिश कर रही थी।
आर्या ने शब्दों से अपना रिश्ता कभी ठीक से नहीं बनाया। जब दूसरों ने अपनी डायरी में कविताएँ लिखी, उसने पेंसिल से दीवारों पर आकृतियाँ खींचीं। जब सहेलियाँ मोबाइल से अपनी बातें रिकार्ड् करतीं थीं,वह एक पुरानी स्केच बुक खोल कर उसमें रंग भरती। न जाने उसे ऐसा क्यों लगता था की शब्द अक्सर धोखा देते हैं। उसे ऐसा लगता था की उसके भीतर जो उबल रहा है शब्द उसे परिभाषित नहीं कर सकते।शब्द हिन्दी के हो या डच शब्द वह कभी उसके मन के उद्गार व्यक्त करने के लिए सक्षम नहीं थे। या यूँ कहें की उसके मन के भावों और उसके अंतर्मन की पीड़ा को कहने के लिए दोनों ही भाषाओं में शब्दों की कमी थी।
मगर तस्वीरें….तस्वीरें झूठ नहीं बोलती थीं।
वे सवाल नहीं करतीं, बस दिखातीं थीं— जैसा मन हो, बिल्कुल वैसा ही।
माँ अक्सर पूछतीं थी,
“तुम हमेशा इतनी चुप-चुप क्यों रहती हो? हमसे बात किया करो। तुम हमेशा अपनी स्केच बुक में केवल चित्र बनाती रहती हो”।
आर्या सोचती “क्या तस्वीरें बात नहीं करतीं?”
उसका पहला बनाया चित्र ,जिसे उसने किसी को नहीं दिखाया था, एक लड़की थी – जिसके होंठ सील दिए गए थे और हाथ खुले आसमान की ओर फैले थे।
उसने माँ के पुराने सूट के टुकड़ों को काट कर उस पर चिपकाया था। नीले रंग की पट्टियाँ जो एक तरफ़ से नीदरलैंड के “डेल्फ” शहर में बनने वाली नीली टाइल्स से मिलती जुलती थीं और दूसरी ओर किसी दुपट्टे की गिरती धार जैसी।
उसने यह चित्र अपनी पढ़ने वाली मेज के नीचे छिपा दिया था। कभी-कभी देर रात उसे निकाल कर देखती।
हर बार वही चुप्पी उसे कुछ कहती- जैसे कि तस्वीर बोलती है,शब्दों के बिना मौन रह कर।
एक दिन आर्या के स्कूल में “कला की भाषा “ पर उसे एक प्रोजेक्ट तैयार करके लेकर जाना था। कक्षा के सभी बच्चे रंगीन फूलों और कैनवास पर चित्र बना कर लाए थे,आर्या ने भी न्यूज़पेपर में लिपटी अपनी वह तस्वीर निकाली। जैसे ही उसने यह तस्वीर कक्षा में सबके सामने प्रस्तुत की कक्षा में एक अजीब सी चुप्पी था गई। तभी एक लड़की बोली “ Het is eng “ ( यह तो बहुत डरावनी है।”) आर्ट की अध्यापिका उसे ध्यान से देखते हुए बोली “ Het is niet zo maar kunst het is juist verhaal over die niet stil wil zijn।(“ यह सिर्फ़ एक कला या तस्वीर नहीं बल्कि यह एक कहानी है जो चुप रहने से इंकार करती है ।”)।
उस दिन अपनी अध्यापिका की बात सुनकर आर्या को पहली बार इस बात का एहसास हुआ कि-तस्वीर उसकी आवाज़ बन सकती है। उनसे वह वो कहलवा सकती है जो आज तक उसके अन्दर क़ैद था।
आर्या की कला अब एक दायरे से बाहर निकल रही थी। उसने पहली बार एक बड़ा कैनवास खरीदा।
उसने उसपर एक औरत का चित्र बनाया, बिना चेहरे , बिना बिंदी, बिना जूड़े का , लेकिन उस औरत की आँखें थीं- जैसे वह किसी को ढूँढ रहीं थीं। उस औरत के चारों ओर फूल थे- कुछ कँटीले,कुछ मुरझाए हुए और बीच में एक नीले रंग का अंजाना फूल।
उसने उस फूल का नाम रखा “जिप्सी फूल।”यह किसी किताब या बाग़ीचे में आसानी से पाए जाने वाला फूल नहीं था।
यह एक ऐसा फूल था जो उन औरतों के लिए खिला था जो घर और दुनियाँ की ज़िम्मेदारी व दायित्वों के बीच कहीं खो सी जाती हैं।
माँ ने यह चित्र देखा और वह ख़ामोश हो गई।
“यह कौन है?”
“ मैं नहीं जानती। या शायद यह मैं ही हूँ।”
जब आर्या ने देखा उस चित्र को देखकर माँ अपने को पहचानें की कोशिश कर रही है तो उसे लगा की उसे इसी तरह के चित्र बना कर बाक़ी महिलाओं को भी उन्हें पहचानने में मदद कर सकती है। उसने अपने स्कूल में अपने चित्रों की प्रदर्शनी लगाने के विषय में अपनी कक्षा की अध्यापक व अध्यापिकाओं से बात करी और वह इस प्रदर्शनी के लिए आर्या का साथ देने के लिए तैयार हो गई। जल्द ही वह दिन भी आ गया आर्या जब स्कूल के हॉल में आर्या की बनाई तस्वीर लगाई गई। अन्य तस्वीरों के साथ आर्या की बनाई तस्वीर “ जिप्सी फूल “ टंगी थी- शब्दहीन पर धमाकेदार।
लोग प्रदर्शनी देखने आते गए, कुछ लोग उसकी तस्वीर के आगे रूक कर उसे समझने की कोशिश करते, कुछ डर जाते कुछ मुस्कुराते। तभी वहाँ एक डच महिला रूकी काफ़ी देर तक वह अपनी अनुभवी नज़रों से आर्या की बनाई तस्वीर को देखती रही फिर अचानक बोली “ Dit is geen bloem, dit is een omroep”। (“ यह केवल एक फूल नहीं ,यह एक पुकार है।”)
प्रदर्शनी बहुत सफल रही सभी शिक्षकों व मिडीया में उसकी व उसकी बनाई तस्वीर चर्चा का विषय रही।
पर आर्या को जो याद रह गया, वह थी एक छोटी सी लड़की जो चुपचाप आई, और उस तस्वीर के सामने उसे बहुत ध्यान से समझते हुए वहीं खड़ी रही,और कुछ देर बाद बोली —- “Is zij ook verdwaald?” ( “क्या यह भी खो गई है? “)
आर्या ने उसके सवाल के जवाब में उसके पास जाकर कहा “हाँ,लेकीन शायद उसे अब रास्ता दिख रहा है।”
उस दिन आर्या ने अपने चित्रों को पहली बार “वह” कहना बंद किया। अब वे “मैं”बन गए थे। अब वह अपने भाव लोगों को उसकी तस्वीरें बना कर बता रही थी- लेकीन अब वह खुद को बना कैनवास पर उकेर रही थी।
आर्या की नींद में अब रंग कम सपने ज़्यादा थे। उसे अक्सर यह सपना आता जिसमें वह एक बहुत बड़ा कमरा देखती,जिसमें बहुत सारीं खिड़कियाँ थी, और हर खिड़की के बाहर एक और ज़िंदगी चल रही थी।
वह एक खिड़की से माँ सको देखती- हाथों में पूजा की थाली ,आँखों में इंतज़ार। दूसरी खिड़की से खुद को- एक बड़ी आर्ट गैलरी में, जहाँ उसके बनाएँ चेहरों पर कोई नाम नही था। तीसरी खिड़की ….. ख़ाली थी। वह उस तीसरी खिड़की को खोलना चाहती थी पर दरवाज़ा खुलता नहीं था। मनोवैज्ञानिक ढंग से सोचने पर मन कहता था “ तुम अपनी पहचान बुन रही हो। हर सपना उस पहचान का एक धागा है।”
आर्या सोच रही थी –“तो क्या मैं अभी तक अधूरी हूँ?”
उसे अब यह समझ आने लगा था कि नींद सिर्फ़ विश्राम् नहीं एक संवाद है।एक ऐसा संवाद जो वह दिन की चहल-पहल में नहीं कर पाती थी। नीदरलैंड की सर्दियों में जब पाँच बजे के बाद बाहर सब कुछ ठहर जाता है, आर्या भीतर ही भीतर किसी बहती नदी की तरह जागी रहती। उसी सर्द रात में उसने एक नया चित्र बनाया – एक स्त्री जो नाव में बैठी है, लेकीन नाव ज़मीन पर खड़ी है। स्त्री की आँखें खुली है पर आस-पास सब सोया हुआ है। उसने उस चित्र के नीचे उसे नाम दिया “ नींद में जागना”।
माँ ने पूछा, “ अब यह कौन सी खिड़की है?”
आर्या मुस्कुराई, “ शायद वो जो अब खुलने लगी है।”
माँ अक्सर चुप रहती थी, किन्तु उसकी चुप्पी कभी ख़ाली नहीं लगती थी। वो रसोई में चाय का पानी रखते-रखते कुछ कह देती थी- बिना शब्दों के।
उनकी चाल, उनका थाली में आटा गूँथना, मंदिर में दिया लगाना- उनकी हर एक क्रिया में एक कहानी थी, जिसे आर्या ने देर से पढ़ना शुरू किया। बचपन में आर्या सोचती थी, माँ डरती है- डच भाषा से, गोरी औरतों से, शायद नीले आसमान से भी उसे डर लगता है। किन्तु अब यह जानती थी कि, माँ डरती नहीं थी , वह थक गई थी। वे वो सब कुछ थीं जो आर्या बनने से भाग रही थी। और फिर भी, वही थीं जिसमें वह बार-बार लौटती।
एक दिन आर्या ने माँ से पूछा—“ आपको कभी बाहर जाने की इच्छा नहीं हुई?” आर्या ने पहली बार माँ कीं आँखों को पूरी तरह देखा। वहाँ एक झील थी— गहरी ,शांत और ज़िम्मेदारी व कर्तव्यों को निभाने के कारण बेहद थकी हुई। उसी रात उसने एक और चित्र बनाया —-एक औरत, जिसकी आँखों में समुद्र है,और माथे पर एक छोटा घर। इस चित्र का उसने नाम रखा “ माँ की चुप्पी “।
वह पहली बार था जब आर्या किसी “ महिला सभा” में गई थी- यह सभा ऐम्सटर्डम के सामुदायिक भवन में रखी गई थी। क्योंकि यहाँ विभिन्न देशों की औरतें आपस में मिला करती थीं। इंडोनेशिया, तुर्की, मोरक्को, सूरीनामी, चीनी,अफ़्रीका और डच महिलाएँ भी इस मिलन का हिस्सा बनती थी। वहाँ न कोई मंच था, न भाषण— सिर्फ़ चाय की प्यालियाँ, बातें और उनकी कहानियाँ। हर औरत अपनी भाषा मे कुछ कहती और एक दूसरी महिला उनकी बात का अनुवाद करती। सबसे आश्चर्य की बात यह थी कि हर एक आवाज़ किसी ना किसी औरत के भीतर कहीं गूँज जाती थी— भले ही वह भाषा न समझें।
एक मोरक्को स्त्री ने कहा— मैं हर दिन अपने पति को खाना देती हूँ, मगर मेरी भूख के बारे में कोई नहीं सोचता”। वहाँ बैठी सभी स्त्रियाँ चुप हो गई। मगर वह चुप्पी भरी हुई थी—ग़ुस्से,दुख और पहचान के अनसुने क़िस्सों से।
आर्या ने वहाँ महसूस किया कि यह औरतें टूटी हुई नहीं हैं,उन्हें तोड़ा गया है। उस शाम जब वह घर लौटी , उसने एक ऑडियो रिकॉर्डिंग शुरू की। हर रात वह अपनी आवाज़ में कुछ कहती— बिना भूमिका, बिना समीक्षा।
“ आज माँ ने कुछ नहीं कहा, लेकीन उसके हाथ काँपते थे। लेकीन आर्या ने आज माँ को पिताजी से उनके किसी काम को करने से मना करते हुए पहली बार सुना था।
“ आज मैंने एक डच पुरूष से नहीं “Nee” कहा और मुझे लगा जैसे मैंने सौ औरतों के लिए “ मना” किया हो।
धीरे-धीरे वह इन आवाज़ों में धुन पिरोने लगी। उसने इस रचना को नाम दिया —“ टूटी आवाज़ें “Gebroken Stemmen “ और उसकी पहली सार्वजनिक ध्वनि प्रदर्शनी ( sound installation) एक बंद कमरे में थी— जहाँ चारों दिवारों से औरतों की टूटी , अधूरी मगर ज़िंदा आवाज़ें गूँजती थीं। लोग आए और कमरे में खड़े होकर सुनते रहे। कुछ रोए, कुछ बस सिर झुकाकर ख़ामोश रहे।
एक महिला ने कहा “आपने हमें फिर से सुना दिया, हमारी आवाज़ों को अपनों और बाहरी दुनियाँ के कानों तक पहुँचा दिया।” उस महिला के यह शब्द आर्या को उसकी कामयाबी के बिगुल की तरह सुनाई दी।
आर्या को कभी आईने से डर नहीं लगा था, लेकीन अब वह आईना किसी और की तरह दिखता था— जैसे उसमें कोई दूसरी औरत रहती हो। एक औरत जो उसकी तरह दिखती थी। मगर उसकी आँखों में सवाल थे।
“क्या यह तुम्हीं हो?”
क्या यह वही रास्ता है जो तुमने चुना ,या वह जो तुम्हें दे दिया गया?”
उस दिन वह बहुत देर तक अपने स्टूडियो में बैठी रही।उसने आईने के सामने एक चित्र बनाना शुरू किया — बिना स्केच, बिना दिशा के।
एक चेहरा उभरता गया— धीरे-धीरे,धुंधले से साफ़ होता हुआ।
और जैसे ही वह आँखों तक पहुँची,उसने पेंट ब्रश नीचे रख दिया।
क्योंकि वह चेहरा उसका नहीं था। यह उसकी माँ का चेहरा था।
मगर कुछ बदल चुका था— माथे पर झुर्रियाँ कम थीं, होंठों पर कोई अनकही हँसी थी,और आँखों में एक सवाल नहीं, एक जवाब था।
आर्या ने पहली बार महसूस किया कि शायद एक औरत अपने जीवन की सबसे बड़ी खोज तब करती है,जब वह अपनी माँ को एक औरत की तरह देखती है,देवी की तरह नहीं है।
उसने चित्रों नीचे लिखा — “ आईने के पार मैं तुम थी।”
आर्या ने अपनी पहली प्रदर्शनी के लिए एक अनुष्ठान विषय चुना—‘स्वत्व का नक़्शा”।यह कोई पारंपरिक कला प्रदर्शनी नहीं थी ।यह एक यात्रा थी—-वह रास्ता जिसे एक स्त्री तय करती है,जब वह बेटी””प्रवासी -कलाकार ‘“ माँ की परछाई “ से आगे बढ़कर “स्वयं” बनना चाहती है।
प्रदर्शनी में नक़्शे नहीं थे— लेकीन हर चित्र का एक रास्ता था। एक पगडंडी जो गाँव से शहर तक जाती थी,एक समुद्र जो दो महाद्वीपों के बीच काँपता था। एक देह जो अपनी सीमा स्वयं तय करती थी। कई चित्रों में शरीर अधूरा था— कभी गर्दन के नीचे का हिस्सा नहीं था, कभी कंधे बिना उभरे। क्योंकि आर्या मानती थी, औरत का शरीर सबसे ज़्यादा देखा गया,मगर सबसे कम समझा गया नक़्शा है।”
एक चित्र में एक स्त्री खड़ी थी— उसके पैरों के नीचे नीदरलैंड की ज़मीन थी,और सिर के ऊपर भारत का खुला आसमान। उसका दिल बीच में झूलता था—दो भाषाओं,दो संस्कृतियों और दो सपनों के बीच। प्रदर्शनी में एक कोना ऐसा भी था जहाँ दीवार पर सिर्फ़ एक दर्पण था। उसके नीचे एक पंक्ति लिखी थी— “ यहाँ वह नक़्शा है,जिसे अब तक तुम टालती रही हो।”
“जिप्सी फूल “कोई विशेष जाती का नाम नहीं था।यह वो नाम था जो आर्या ने अपने भीतर की उस स्त्री को दिया, जो हर जगह होकर भी किसी एक जगह नहीं रही।जो ज़मीन पर उगी थी,मगर उसकी जड़ें हवाओं में थीं।नीदरलैंड में रहते हुए आर्या ने सीखा कि घर कभी ईंटों से नहीं बनता, और पहचान कभी किसी सरकारी काग़ज़ में नहीं बंधती ।पहचान एक जीवित अनुभव है—जो हर सुबह थोड़ी-थोड़ी खिलती है,हर शाम थोड़ा और मुरझाती है ,और हर रात फिर से खुद को चुनती है।
उस दिन उसने अपनी डायरी में लिखा— “ मैं कोई कहानी नहीं हूँ।मैं अधूरी कहानियों का एक गुलदस्ता हूँ— जिन्हें मैंने जिया है, सहा है,और कभी-कभी चुपचाप छोड़ दिया है। मैं वही हूँ जो फूल बनकर काँटों में रह सकती है। माँ अब और कम बोलती है किन्तु आर्या अब ज़्यादा समझने लगी है। दोनों के बीच अब शब्दों की ज़रूरत नहीं थी। एक बार माने बस इतना ही कहा—“ तू मेरी इच्छा नहीं – तू मेरी आकांक्षा थी”।
उस दिन आर्या ने अंतिम चित्र बनाया – एक फूल जो जड़ से नहीं हवा से जुड़ा था।
प्रारब्ध,संस्कार, अवचेतन मन ,स्व से स्वाभिमान की भावना इन सब में उभयपक्षीय विश्व की आधी आबादी यानी स्त्री!!!और फिर उनका साहित्यिक सांस्कृतिक मिलान और उन सबका सुंदर सुस्पष्ट आयतन?! जिसे हम जिप्सी फूल कह सकते हैं।
यही है डॉ ऋतु नैनन पांडेय की संवेदनशील कहानी और एक बड़ा सा सलाम उन्हें भी और पुरवाई पत्रिका के संपादक और संपादन मंडल को।
तुम्हारी इस कहानी को कई बार पढ़ा। एक स्त्री का दर्द, प्रवास की पीड़ा, प्रवास के चलते अपनी जमीन से उखड़ दूसरे देश में रोपित होना,देश से विदेश तक की यात्रा।पैर नीदरलैंड में और सर पर भारत।पीछे देखने पर वियोग की पीड़ा और आगे उम्मीद के प्रकाश में भविष्य की स्थिरता का विश्वास।
कहानी बिल्कुल नई शैली में लिखी गई है। जिस तरह शब्द बोलते हैं उसी तरह चित्र भी बोलते हैं।
ध्वनि प्रदर्शनी को समझना जरूरी था।
कहानी इस तरह है जिसे सरसरी तौर पर नहीं पढ़ा जा सकता। जिसे ठहर-ठहर कर और समझ-समझ कर पढ़ने से पता चलेगा कि कथानक की बुनियाद और उसका केंद्रीय भाव क्या है?
वास्तव में बेटी अपनी माँ का अक्स होती है।
पितृसत्तात्मक समाज में स्वयं को स्थापित करने के लिये, अपनी पहचान बनाने के लिये, अपने पंखों को उड़ान देने के लिये ,अपने जीवन को अपनी इच्छा के अनुरूप जीने के लिये किसी भी स्त्री को संघर्ष करना पड़ता है। क्यों?
*यह बात सही है कि स्त्री का शरीर सबसे अधिक देखा गया! किन्तु सबसे कम समझ गया।*
एक स्त्री ही स्त्री के दर्द को समझ सकती है।
कहानी में प्रवासी दर्द को भी बखूबी उकेरा है तुमने। तेजेन्द्र शर्मा जी के बाद, प्रवासी कहानियों में, तुम्हारी कहानी ने बहुत प्रभावित किया ऋतु।
“एक चित्र में एक स्त्री खड़ी थी- उसके पैरों के नीचे नीदरलैंड की जमीन थी ,और सिर के ऊपर भारत का खुला आसमान। उसका दिल बीच में झूलता था- दो भाषाओं ,दो संस्कृतियों, और दो सपनों के बीच।”
पीड़ा महसूस हुई।
” “जिप्सी फूल” कोई विशेष जाति का नाम नहीं था ।यह वो नाम था जो आर्या ने अपने भीतर कि उस स्त्री को दिया जो हर जगह होकर भी किसी एक जगह नहीं रही, जो जमीन पर उगी थी मगर उसकी जड़ें हवाओं में थीं। नीदरलैंड में रहते हुए आर्या ने सीखा कि घर कभी ईंटों से नहीं बनता और पहचान कभी किसी सरकारी कागज में नहीं बंधती। पहचान एक जीवित अनुभव है ।”
“माँ अब कम बोलती है आर्या अब ज्यादा समझने लगी है।”
समय से बड़ा कोई शिक्षक नहीं। जो अनुभव और जो ज्ञान समय सिखाता है, वक्त सिखाता है, वह ज्ञान दुनिया की किसी किताब में नहीं मिलता।
भाषाई प्रयोग ने प्रभावित किया। स्थानीय भाषा ने कहानी को जीवंत किया। यह ठीक रहा कि अनुवाद ने अर्थों को समझने में मदद की।
एकदम नवीन और परिपक्व शैली।
बहुत दिनों के बाद एक बहुत अच्छी कहानी पढ़ने को मिली अगर यह पहला प्रयास है तो काबिले तारीफ है। अगर आगाज़ इतना अच्छा है तो अंजाम क्या होगा!!
बहुत-बहुत बधाई और भविष्य के लिए अनेक- अनेक शुभकामनाएँ।
प्रतीकात्मकता मेंशीर्षक सार्थक रहा।
मन को छू लेने वाली अभिव्यक्तियों में सुन्दर रचना
प्रारब्ध,संस्कार, अवचेतन मन ,स्व से स्वाभिमान की भावना इन सब में उभयपक्षीय विश्व की आधी आबादी यानी स्त्री!!!और फिर उनका साहित्यिक सांस्कृतिक मिलान और उन सबका सुंदर सुस्पष्ट आयतन?! जिसे हम जिप्सी फूल कह सकते हैं।
यही है डॉ ऋतु नैनन पांडेय की संवेदनशील कहानी और एक बड़ा सा सलाम उन्हें भी और पुरवाई पत्रिका के संपादक और संपादन मंडल को।
बहुत अच्छी कहानी, बधाई
प्रिय ऋतु!
तुम्हारी इस कहानी को कई बार पढ़ा। एक स्त्री का दर्द, प्रवास की पीड़ा, प्रवास के चलते अपनी जमीन से उखड़ दूसरे देश में रोपित होना,देश से विदेश तक की यात्रा।पैर नीदरलैंड में और सर पर भारत।पीछे देखने पर वियोग की पीड़ा और आगे उम्मीद के प्रकाश में भविष्य की स्थिरता का विश्वास।
कहानी बिल्कुल नई शैली में लिखी गई है। जिस तरह शब्द बोलते हैं उसी तरह चित्र भी बोलते हैं।
ध्वनि प्रदर्शनी को समझना जरूरी था।
कहानी इस तरह है जिसे सरसरी तौर पर नहीं पढ़ा जा सकता। जिसे ठहर-ठहर कर और समझ-समझ कर पढ़ने से पता चलेगा कि कथानक की बुनियाद और उसका केंद्रीय भाव क्या है?
वास्तव में बेटी अपनी माँ का अक्स होती है।
पितृसत्तात्मक समाज में स्वयं को स्थापित करने के लिये, अपनी पहचान बनाने के लिये, अपने पंखों को उड़ान देने के लिये ,अपने जीवन को अपनी इच्छा के अनुरूप जीने के लिये किसी भी स्त्री को संघर्ष करना पड़ता है। क्यों?
*यह बात सही है कि स्त्री का शरीर सबसे अधिक देखा गया! किन्तु सबसे कम समझ गया।*
एक स्त्री ही स्त्री के दर्द को समझ सकती है।
कहानी में प्रवासी दर्द को भी बखूबी उकेरा है तुमने। तेजेन्द्र शर्मा जी के बाद, प्रवासी कहानियों में, तुम्हारी कहानी ने बहुत प्रभावित किया ऋतु।
“एक चित्र में एक स्त्री खड़ी थी- उसके पैरों के नीचे नीदरलैंड की जमीन थी ,और सिर के ऊपर भारत का खुला आसमान। उसका दिल बीच में झूलता था- दो भाषाओं ,दो संस्कृतियों, और दो सपनों के बीच।”
पीड़ा महसूस हुई।
” “जिप्सी फूल” कोई विशेष जाति का नाम नहीं था ।यह वो नाम था जो आर्या ने अपने भीतर कि उस स्त्री को दिया जो हर जगह होकर भी किसी एक जगह नहीं रही, जो जमीन पर उगी थी मगर उसकी जड़ें हवाओं में थीं। नीदरलैंड में रहते हुए आर्या ने सीखा कि घर कभी ईंटों से नहीं बनता और पहचान कभी किसी सरकारी कागज में नहीं बंधती। पहचान एक जीवित अनुभव है ।”
“माँ अब कम बोलती है आर्या अब ज्यादा समझने लगी है।”
समय से बड़ा कोई शिक्षक नहीं। जो अनुभव और जो ज्ञान समय सिखाता है, वक्त सिखाता है, वह ज्ञान दुनिया की किसी किताब में नहीं मिलता।
भाषाई प्रयोग ने प्रभावित किया। स्थानीय भाषा ने कहानी को जीवंत किया। यह ठीक रहा कि अनुवाद ने अर्थों को समझने में मदद की।
एकदम नवीन और परिपक्व शैली।
बहुत दिनों के बाद एक बहुत अच्छी कहानी पढ़ने को मिली अगर यह पहला प्रयास है तो काबिले तारीफ है। अगर आगाज़ इतना अच्छा है तो अंजाम क्या होगा!!
बहुत-बहुत बधाई और भविष्य के लिए अनेक- अनेक शुभकामनाएँ।
प्रतीकात्मकता मेंशीर्षक सार्थक रहा।